
यह भारत मुझे अलग भारत दिखता है, अतिरिक्त अभिजात्यता हवा में है, मेरे अगल बगल से गुजरते उन संपन्न भारतीयों का अतिरिक्त गोरापन और चमकदार त्वचा मुझे आतंकित करते है। मुझे एक घबराहट सी होनी शुरू हो जाती है।
यह खान मार्केट है, दक्षिणी दिल्ली का एक नामचीन इलाका, कई सर्वे के मुताबिक सबसे महंगा बाजार भी, इंडिया गेट से थोड़ा ही दूर शाहजहां रोड़ से आगे जाने पर पृथ्वीराज रोड़ से इसके लिए रास्ता जाता है तो पहले पृथ्वीराज मार्केट भी है, एक ओर रोशनी का बाजार है, और यह अब्दुल गफ्फार खान के नाम पर बसाया गया खान मार्केट है, बड़ी सी पार्किंग है, तीन बजे हैं, मैं एक पीपल के पेड़ के नीचे खड़ा हूं, एक चबूतरा उसे घेरे हुए हैं, जिसमें राम-सीता-लक्ष्मण की पारंपरिक सी तस्वीर है तो एक साईं बाबा भी विराजमान हैं, लगता है कि दोनों ने धूप के कई युग झेले हैं, तो भगवान शिव की एक छोटी सी मूर्ति है, उसके नीले रंग का धुंधला होना इसकी कालिक प्राचीनता बताता है। सामने बड़ का पेड़ है, बड़ की ओट में एक ठेला है जिसपे इस तपती गर्मी में ठंडा पानी और किस्म किस्म के पेय हाजिर हैं, आप प्यास बुझा सकते हैं।
एक फिरंगी बुजुर्ग जोड़ा दिखता है, वे पर्यटक प्रतीत नहीं होते, कारोबारी लगते हैं, कारोबार कहां- कहां पहुचा देता है, वाकई! मर्द की अतिरिक्त सफेद शर्ट और बहुत करीने और नफासत से उसे पतलून में पैबस्त किया हुआ होना यही तो प्रकट करता है। तनिक सीढिय़ों से उतरते वक्त महिला ने अपना हाथ उसे दे दिया है, जरूरत शायद ना भी हो बस प्यार ही लगता है मुझे यह! मैं एक साइबर कैफे की तलाश में हूं, मैं उस बुक शॉप की तलाश भी अनजाने में साथ- साथ करता हूं जिसका खुशवंत सिंह अक्सर जिक्र करते हैं, जहां एक प्रेम कहानी शुरू हुई थी, सरहदों के पार फैली हुई, जिसके पात्र नामवर लोग हैं, पर मुझे साइबर कैफे और वह तारीखी बुक शॉप दोनों ही नहीं मिले। मैं एक ऐसे कोने में पहुचता हूं, जहां स्टेशनरी की दुकान है उसके सामने ठीक वैसा ही ठंडे पेय का ठेला है, उसके गिर्द दिल्ली के युवा दिखते हैं, दो आधुनिक लडके, बेतरतीब से जींस टी-शर्ट में, बिखरे बाल एक अदा से लगते हैं, एक के हाथ में स्प्राइट है, दूसरे के हाथ में सिगरेट, लड़की थोड़ी सांवली है, उसकी आंख का काजल बहुत गहरा है, फेबइंडियानुमा कूल-कूल सा हरे रंग का कुर्ता है स्लीवलैस, एक काला बैग कांधे से लटका हुआ है, उसके दाहिने हाथ में लंबी सी सिगरेट है, उसकी अंगुलियों से लंबी! उन बीस—बाइस साल के इन तीनों युवाओं की मस्ती और आपस में खोया होना मुझे खास लगता है। मुझे उन पर बहुत प्यार आता है।
कुछ क्षण उनके साथ बेखयाली में बिताकर आगे बढता हूं, मेगजीन, बेकरी, फूल, होमफर्निशिंग की दुकानें हैं, डेढ दशक महानगरीय जीवन जी चुकने के बाद भी मुझे अपना गंवईपन साफ महसूस होता है। यह भारत मुझे अलग भारत दिखता है, अतिरिक्त अभिजात्यता हवा में है, मेरे अगल बगल से गुजरते उन संपन्न भारतीयों का अतिरिक्त गोरापन और चमकदार त्वचा मुझे आतंकित करते हंै। मुझे एक घबराहट सी होनी शुरू हो जाती है। मैं तेज कदमों से आगे बढ़ जाता हूं।
दुकानों की कतार जहां खत्म होती है, रुक जाता हूं, मेरे माथे पे पसीने की बूंदें हैं, रुमाल निकालता हूं, पोंछता हूं, एक साइकिल सवार दिखता है, उसने साइकिल को सामने की दीवार से सटका दिया है, कुरियर वाला है, अपने हाथ में कई पैकेट लिए है, एक नजर पैकेट पर एक नजर दुकानों के साइनबोर्ड की ओर डालता हुआ चलता है, मुझे डर लगता है कि कहीं किसी अभिजात्य से टकरा गया तो! मेरा उससे बात करने का मन हुआ, पूछ लिया —भैया, दिल्ली के हो! उसने जवाब दिया— ना जी, बाबूजी! मैंने पलटके पूछा— तो! वह बोला— जी, हिसार के पास गांव है जी मेरा। मैंने कह दिया कि मेरे भी दोस्त रिश्तेदार है वहां तो! वह सहज हो गया। मैंने पूछा— कब से हो दिल्ली में ! तो बोला— कोई आठ बरस हो लिए। उससे मेरा अगला सवाल था— यही कर रहे शुरू से! ना जी ! तीसरा काम है जी! कमाई ठीक हो जाती है! धंधा क्यों बदलता जी! तो इससे! इससे भी यही हाल है जी! भाईसाहब, डाक बांट लूं, देर हो रही है, कहकर उसने मेरी इजाजत का इंतजार नहीं किया और आगे बढ़ गया! उसके शब्दों से लगता है कि उसकी जिंदगी आठ साल से वैसी ही है, पर उम्मीद है कि मरती नहीं, बेहतर जिंदगी का ख्वाब होगा या वजूद बनाए रखने की जददोजहद, दोनों मे से कोई एक चीज होगी जो उसे दिल्ली में टिकाए हुए है।
उस छांव वाले कोने में तभी तीक्ष्ण गंध का भभका आया, यह किसी डियोडरेंट की खुशबू थी, जो मेरे नाक तक बेसाख्ता आ गई थी, देखा तो एक अधेड़, बेहद नफासत पसंद औरत मेरे करीब से गुजरी थी, उसका परिधान और उसके जिस्म के खुले भाग को मुझे यहां शब्द देने की हिम्मत नहीं हो रही है। तभी मेरा मोबाइल बजा, मुझे लेने टैक्सी आ गई है, दोपहर अब मेरे लिए घोर असहनीय थी। तेज धूप की शॉल ओढ़े एक बेरहम सी दोपहर!
2 टिप्पणियाँ:
Khan market mein dopahar waise hi garam hoti hai bhai aur jaane waale rupayon ka shawl odhe rahte hain...
bahut sahi kaha aapne...
rochak chitrakan!
shirshak bhi!
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