Sunday, June 5, 2011

ज्ञानोदय के जून अंक में शामिल मेरी कहानी





उल्टी वाकी धार

’राहुल, तुम अच्छी जरह जानते हो, आय नेवर बिलिव्ड इन प्री-मैरिटल फीजिकल रिलेशंस एंड वी हैड इट’
’यस, आय एडमिट, आपसी समझ और सहमति से ही ना और जब हम सोचते हैं और मानते हैं कि हम शादी कर रहे हैं, वी आर सीरियस अबाउट ईच अदर एंड कमिटेड टू, फिर उसमें बुराई क्या है श्वेता ’




दिन के दो बजकर दस मिनट, लंच खत्म होने के तुरंत बाद का समय है। दफतर के ज्यादातर लोग लंच लेकर लौट चुके हैं। विकास सिगरेट पीने रुक गया है तो रीना लंच के बाद सेव का ज्यूस और वर्मा कॉफी के लिए, लगभग 15 मिनट लेंगे अभी और।
’पल-पल दिल के पास तुम रहती हो’
गाना बजा, वह किशोर का हद दर्जे का दीवाना है, अपने मोबाइल की इस रिंगटोन के लिए उसने कहां-कहां नहीं कोशिश की थी।
उसका फोन लगातार बज रहा था, वो कई देर तक फोन सिर्फ इसलिए नहीं उठाता कि गाने का आनंद ले पाये। अकसर पास में बैठे लोग झल्ला जाते हैं,उसकी इस आदत से और उसकी ओर घूरती निगाह से देखते हैं,तब वह एक मुस्कुराहट ऐसे बिखेरता है जैसे कह रहा हो कि यार मैं ऐसा ही हूं, क्या करूं।
इस वक्त कंपनी के अपने ईमेल आई डी पर मेल चेक कर रहा था राहुल। काम में मसरूफ था तो वही प्रिय गाना जैसे उसे चुभ रहा था।

’हू द ब्लडी हेल इज दिस’ कहते हुए आखिरकार उसने फोन उठा ही लिया -
’राहुल, मैं तुमसे तुरंत मिलना चाहती हूँ’
’अभी! अभी पॉसिबल नहीं है यार, अभी लंच से लौटा ही हूं, और बहुत काम है अभी’
’इट्स अर्जेट, आय इमिजिएटली नीड टू टॉक ’
’ऐसा भी क्या है श्वेता, हम आज शाम को मिल रहे हैं ना 7 बजे’
’मैं शाम को नहीं मिल पाऊंगी, और आज ही मिलना बहुत जरूरी है’ उसने 'बहुत' शब्द पर बहुत जोर दिया।
’वाट हैपन्ड, तुम इतनी परेशान क्या हो डियर’ लगभग उतना ही जोर उसने 'इतनी' पर दिया।
’बात है राहुल, सीरियस बात है, फोन पर बिल्कुल भी नहीं बता सकती, जल्दी बताओ कितनी देर में कहां मिल रहे हो, बंक मारो, बॉस को पटाओ, छुट्टी लो, कुछ भी करो, आय जस्ट डोंट नो, जस्ट मैनेज इट’
’ओके, लैट मी ट्राई, आय विल लैट यू नो विदिन मिनट्स’
राहुल सोचता है, दफतर के माहौल की ओर एक नजर डालता है, बहाना तो कोई नहीं चलेगा, बंक भी मुश्किल है, बॉस को कैसे पटाऊँ.... यही एकमात्र रास्ता है....’ इसी उधेड़बुन में राहुल एकदम चौकता है -

’या, दैट्स इट, इट विल वर्क डेफिनेटली’
अपने किसी चमत्कारिक किस्म के खयाल के साथ राहुल बॉस के केबिन में दाखिल हो जाता है। उसका बॉस लैपटॉप पर कुछ काम कर रहा था या लग रहा था कि काम में मशगूल है।
’राहुल! जस्ट कम’
’थैंक्यू सर’
’यस राहुल, तुम्हें ही याद कर रहा था, तुम कुछ खास कर रहे हो?’ कुछ और खास शब्दों के बीच अंतराल और ध्वनि का विस्तार केबिन में गूंज गया।
’नहीं सर, बस यूं ही....’
’गणपति प्लाजा जा सकते हो! मेरे एक दोस्त ने बॉम्बे से कुछ भेजा है’
’सर, श्योर, बट सर....’
’बोलो राहुल, हिचकिचा क्यों रहे हो। कोई गर्लफ्रेंड का चक्कर है क्या? मे आई हेल्प यू, तुम लडकों की यही प्राब्लम है, सालो 1प्यार भी करते हो, फटती भी है ’
’सर, शी इज इन सम प्रॉब्लम, उसे कुछ जरूरी बात करनी है मुझसे, गणपति प्लाजा से पैकेट लेकर उससे मिल लूं, अगर आप परमिट करें तो ?’ हिचकिचाते शरमाते हुए बोल गया राहुल।
’श्योर, राहुल बस इतनी सी बात.... इफ पॉसिबल कंफर्टेबली डू कम अदरवाइज, मेरा पैकेट कल लेते आना ऑफिस आते हुए, गुड लक, ओके’
राहुल मन में सोच रहा था - मेरे आइडिया की जरूरत ही नहीं पडी, वैसे भी यही सोचा था कि कह दूंगा गर्लफ्रेंड से मिलना है, जरूरी काम से, दिन के काम में कुछ बचा नहीं है, पर पता नहीं इससे बॉस कन्विंस होते भी या नहीं, आयआयएम बोम्बे से पास आऊट प्रोबेशनर मैनेजमेंट ट्रेनी भी, तो बॉस की परमिशन को मोहताज है ना.... वो समझती कहां है बेवकूफ, एनी वे आय एम सो लकी, बॉस को शायद ईश्वर ने शायद कोई भविष्यवाणी की हो।

उसने ष्ष्वेता को अपने मोबाइल से रीडायल किया-
’श्वेता, मैकडानल्ड्स में साढ़े तीन बजे मिलते हैं, इज इट ओके’
’श्योर, थैंक्स’ फोन कट गया, राहुल कुछ क्षण मोबाइल को कान से नीचे लाकर उसकी स्क्रीन को यू ही देखता रहा।

राहुल गणपति प्लाजा से बॉस का पैकेट लेते हुए मैक्डॉनल्ड पहुंचता है, दिन काफी गर्म है, मई का पहला हफृता है, इस ष्षहर में मानसून से महीने भर पहले ही तेज गर्मी पडती है। इधर उधर देखता है श्वेता अभी नहीं आई है, अपनी बहुत महंगी सी स्विस वॉच में समय देखता है जिसे पापा ने इसी साल बर्थडे पर गिफ्ट किया था, साढ़े तीन बजने में अभी दस मिनट कम हैं।
....क्यों बुलाया है, ऐसी क्या आफत आ गई, श्वेता भी ना, इतनी दोपहर में बुलाने की क्या जरूरत थी, ये लड़की भी बस पागल ही है.... खुद तो एमएनसी में पीआर मैनेजर है, कैसे भी मैनेज कर सकती है.... ये तो शुक्र है कि बॉस का काम था, वरना कहां आ सकता था, और फिर इसने नाराज होना ही था.... पक्का।....’
राहुल इसी सोच में गुम था विरोधाभासी रूप से मैकडानल्ड्स के शोर में। तभी-
’हे राहुल’ कहते हुए श्वेता धम्म से आके बैठ गई।
’कब से बैठे हो, मुझे देर तो नहीं हुई ना ?’ बनावटी मुस्कुराहट उस लड़की के चेहरे पर साफ झलक रही थी।
’नहीं, मैं ही थोड़ा सा पहले आ गया था,यू आर आल्वेज राइट’ थोडा सा पॉज दिया और बोला ’एंड एट राइट टाइम ’
’ओह’वो थोडा सा सकपका गई, जैसे चोरी पकडी गई हो। उसका अतिरिक्त मेकअप जाहिर हो रहा था,राहुल को इसपे अचरज हुआ पर उसने कुछ कहा नही।
फिर थोडा सहज होने की कोशिश करते हुए उसने अपना हैंडबैग टेबल पर रखा और मोबाइल निकालकर अलग से रख दिया और अपने बालों से क्लचर निकालकर दांतों के बीच दबाया और बालों को फिर से एडजस्ट करते हुए फिर से क्लचर को अपनी जगह पर करीने से बिठा दिया।
’तो क्या लोगी, बाहर बहुत गर्मी है, इजन्ट इट!’
’हां, कोक लूंगी और तुम!’
’मैं भी’ कहते हुए राहुल उठा और सेल्फ सर्विस काउंटर से दो कोक लेकर आया और बैठ गया....बीच में तीन बार टकराते हुए बचा, अजीब सा उहापोह और आशंकाओं से घिरा राहुल।
दोनों के बीच एक मुस्कुराहट की बहुत कुछ कृत्रिम सी एक लकीर का आदान-प्रदान हुआ और फिर एक सन्नाटा सा पसर गया दोनों के बीच, कुछ क्षणों के लिए, मैक्डोनल्ड के भीतर के माहौल में शोर गुल के बीच दो लोगों के बीच पसरा सन्नाटा।
थोडी देर बाद राहुल ने चुप्पी तोड़ी जैसे इतना वक्त मुकर्रर था, किसी स्क्रिप्ट के तहत-
’हां, श्वेता, वाट वैंट राँग, सब ठीक तो है ?’
राहुल, आय एम प्रेगनेंट’ श्वेता ने एकटक बिना पलक झपकाए कहा और राहुल के जवाब की प्रतीक्षा करने लगी।
’वाओ, ग्रेट न्यूज!’राहुल ने तुरंत लपकते हुए कहा।
’सर्टेनली नॉट’ श्वेता के चेहरे के भाव बदल गए और उसने अपने दांये हाथ को क्रिकेट में एम्पायर के चौके के निशान की मुद्रा को आधा अपनाते हुए कहा।
’वाय नॉट, श्वेता! पापा मम्मी 15 तक आ ही रहे हैं और वी विल गेट मैरिड, सिम्पल!’ आश्चर्य, प्रश्न और समाधान की मुद्रा में राहुल ने कहा।
’बट मैं ये बच्चा नहीं चाहती, राहुल’ यानी उसका अपना कोई समाधान था।
’क्या ये बहुत जल्दी है ?’ मैक्डोनल्ड के वातानुकूलित माहौल में भी अपने माथे पर आई पसीने की बूंदों को पोंछते हुए राहुल ने फिर पूछा।
’नहीं, ये बात नहीं है’
’तो, बात क्या है श्वेता!, डॉक्टर्स ने मना किया है क्या!’
’नहीं, राहुल ये बात भी नहीं है’
’तो मैं लडकी चाहता हूं और तुम लडका,अल्टासाउंड की रिपोर्ट में लडकी है, इसलिए!’ राहुल ने मजाक में कहा और माहौल को थोडा सहज बनाने की कोशिश की।
’नहीं, राहुल बी सीरियस, आय एम सीरियस’
’दैन वॉट?’ राहुल ने दांयी हथेली फैलाते हुए कहा।
’राहुल, मैं तुम से शादी नहीं करना चाहती’ श्वेता ने अपनी नजर घुमा ली और फर्श की ओर देखने लगी।
’वॉट, पागल हो गई हो! श्वेता क्या तुम्हारा दिमाग खराब हो गया है! ’ और राहुल की आवाज का वॉल्यूम बढ गया।
’राहुल, सुनो मेरी बात, सुनो तो सही।’
’ओके, स्पीक आउट!’ और उसने अपनी नजरें श्वेता के चेहरे पर केन्द्रित कर लीं।
’मुझे नहीं लगता राहुल कि हम एक दूसरे के लिए बने हैं, सिंपली वी आर नॉट मेड फॉर ईच अदर।’ कहकर वो चुप सी हो गई।
’पर मुझे नहीं लगता कि ऐसा है श्वेता, वी नो ईच एंड एवरीथिंग अबाउट ईच अदर, एक दूसरे को समझते हैं, पिछले एक साल से एक दूसरे को जानते हैं, वी हैड इन्टीमेसी एंड....’
’राहुल, तुम अच्छी जरह जानते हो, आय नेवर बिलिव्ड इन प्री-मैरिटल फीजिकल रिलेशंस एंड वी हैड इट’
’यस, आय एडमिट, आपसी समझ और सहमति से ही ना और जब हम सोचते हैं और मानते हैं कि हम शादी कर रहे हैं, वी आर सीरियस अबाउट ईच अदर एंड कमिटेड टू, फिर उसमें बुराई क्या है श्वेता ’
’ऐसा तुम सोचते हो राहुल, मै नहीं, और भी खास बात ये कि शुरूआत तुमने की!’
’बट यू डिडन्ट अपोज!’
’हां, मैं भी इंसान हूँ, इमोशन लैस तो नहीं हूँ ना...., पर मुझे लगता है, ये नहीं होना चाहिए था और आय टेक इट एज यू डिडन्ट केयर फॉर माय फीलिंग्स एंड प्रिसिंपल्स’ श्वेता नीचे फिर से फर्श की ओर देखते हुए बोली। मिटटी होती तो कुरेद डालती पांव से। ऐसा लग रहा था कि रेस्तरां का फर्श ही ना चटक जाए कहीं।
’बट दिस इज अवर चाइल्ड श्वेता’ राहुल उसकी आंखों में झांकने की कोशिश कर रहा था।
’हां, है पर मैं नहीं चाहती कि एक जिंदगी भर का रिश्ता इस हालत में बने।’
’क्यों नहीं श्वेता, क्यों नहीं ?’ राहुल थोड़ा उत्तेजित होते हुए बोला।
मैं इस मानसिकता में नहीं जीना चाहती कि मेरा बच्चा मेरे प्री-मैरिटल फीजिकल रिलेशन की पैदाइश है और ये भी कि मुझे उसको सही ठहराने के लिए शादी करनी पडी, जिंदगी भर इस फीलिंग के साथ नहीं जी सकती मैं ’
श्वेता, पहली बार मुझे यह लग रहा है और डीपली लग रहा है कि हम कितना अलग-अलग सोच रहे हैं?’
’दैट्स इट, यस राहुल, तुम गलत नहीं हो, मैं भी गलत नहीं हूँ, बट आय एम हैल्पलैस, तुम मुझे कंजरवेटिव कह सकते हो, ये कंजरवेटिव होने या न होने की बात नहीं है, आय डोंट वांट माई रिलेशनशिप ऑन द ग्राउंड ऑफ रिग्रेट। मुझे पता है तुम कहोगे - तुम प्यार करते हो, या मैं तुमसे प्यार करती हूँ, पर राहुल क्या कोई प्यार का रिश्ता बिना फीलिंग्स और प्रिसिपल्स की केयर के हो सकता है, मैं तुम पर कोई इल्जाम नहीं लगा रही हूं, बट.... ये हमारे नजरिए का फर्क हो सकता है.... यू मे बी नॉट राँग, बट आय एम ऑल्सो राइट एट माइ साइड’

श्वेता की आंख में से कुछ आंसू बहे, जिन्हें तुरंत श्वेता ने अपने हैंकी में संभाल लिया, जैसे कुछ हुआ ही ना हो। हैंकी गीला हो गया था,और उसने उसे बहुत सलीके से अपने पर्स में सहेज लिया, शायद इस रिश्ते की आखिरी निशानी के बतौर।

’श्वेता, तुम फैसला ले चुकी हो और यू जस्ट वांटेड टू शेयर इट विद मी?’ राहुल ने एकटक देखते हुए पूछने के लहजे में कहा और दोनों हाथ हवा में खोल दिए।
’राहुल, हां और मुझे पता है तुम थोड़ा सा भी मुझे प्यार करते हो तो मेरे फैसले को समझोगे और मानोगे भी’
’और रास्ता भी क्या है या क्या हो सकता है, इफ यू हैव ऑलरेडी डिसाइडेड?’ राहुल ने पुराने मुहावरे वाली खिसियानी सी मुस्कुराहट से कहा।
दोनों की बीच एक सन्नाटा सा पसर गया, कुछ मिनटों के लिए।
कोक आकर कब का गर्म हो चुका था, दो लोगों के बीच कितना कुछ ठंडा-गर्म हो रहा था -
’शाम को 7 बजे मेरा डॉक्टर से अपांइटमेंट है, आय एम गोइंग फॉर एबॉर्शन ’ श्वेता ने मौन तोडते हुए कहा। राहुल चुप था,जैसे उसके पास कहने को कुछ बचा ही नहीं था, या कहने को था बहुत पर उसे लग रहा था कि कहना यकीनन बेमानी है। दोनों के कदम जैसे ठिठके हुए थे, खडे होकर जाने की पहल कौन करे।

मैकडोनल्ड का शोर अब भी वैसा ही था, भीड में किसी को पता नहीं था कि उनके पास वाली इस टेबल पर कितने तूफान आ के गुजर गए हैं.... चुपचाप....।

6 टिप्पणियाँ:

prithvi said...

good, new flavor.

rashmi ravija said...

nicely written...liked it

Rajesh Kumar Poonia said...

contemproray soch....bahut badhiya abhivyaqti, ek sans me sari gatkane yogy ...but had a must impression...loved d way u written ..bahut achhe, badhai ho!

writer Priya Bharti said...

nice blog..........

writer Priya Bharti said...

nice blog......

writer Priya Bharti said...

nice blog..........