<?xml version='1.0' encoding='UTF-8'?><?xml-stylesheet href="http://www.blogger.com/styles/atom.css" type="text/css"?><feed xmlns='http://www.w3.org/2005/Atom' xmlns:openSearch='http://a9.com/-/spec/opensearchrss/1.0/' xmlns:georss='http://www.georss.org/georss' xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'><id>tag:blogger.com,1999:blog-777405477924605622</id><updated>2012-01-24T23:24:52.163-08:00</updated><category term='हिंद स्वराज'/><category term='झुरावौ'/><category term='बाबूजी'/><category term='media workshop'/><category term='आलोक श्रीवास्तव'/><category term='gujar'/><category term='rajasthan'/><category term='jaipur blast'/><category term='Taslima Nasreen'/><category term='अपूर्वा याज्ञिक'/><category term='jaipur'/><category term='Ira Pande'/><category term='chennai'/><category term='dushyant&apos; s birthday'/><category term='caste'/><category term='इरा पांडे'/><category term='रमेश आशर'/><category term='jaipur literature 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text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 400px; height: 258px;" src="http://4.bp.blogspot.com/-EXWXpNMWZco/Tx-Mew_Tb5I/AAAAAAAAAg4/vjnq2Twy0b4/s400/JLF.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5701430113448718226" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;br /&gt;ए जाते हुए लम्हों जरा ठहरो...जरा ठहरो&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;blockquote&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;सिगरेट के धुएं के छल्ले, कुछ खुशबूएं, कुछ मादक गंध, कुछ प्यारे से- चिकने- चुपड़े चेहरे याद रह जाएंगे, कुछ सितारे यादों में बसे रह जाएंगे, कुछ शब्द जेहन में चिपक के कुछ दिन हमसफर रहेंगे।&lt;/strong&gt; &lt;/blockquote&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बेशक ये दोपहर थी, पर सांझ के कुछ बदमिजाज और जिददी साए जनवरी की धूप में शामिल होकर इतरा रहे थे, लहरा रहे थे। ये आखिरी लंच था इस साल के फेस्ट का, देख पा रहे हैं कि गोविंद निहलानी अकेले अपनी साफ शफाफ सी प्लेट में करीने से छोला- पुलाव डाल रहे हैं, उनके चेहरे के भाव उनकी फिल्मों की तरह हैं। राजस्थान में उनका बचपन गुजरा है, उत्सव के बहाने यहां होना और इन लम्हों को सहेज लेना उनके लिए मुश्किल नहीं है, सीन दर सीन एक निर्देशक की आंखों में दर्ज हो रहे हैं। मैं पूछता हूं-' आखिरी दिन है, कैसा लग रहा है?', मुस्कुराहट के सिवा कुछ नहीं कहते। बीतते लम्हों की कसक का बयान या तो आंसू करते हैं या मुस्कुराहट।&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;माहौल में अभिजात्यता है, गंध में कितनी देशी- विदेशी गंध शुमार हैं, इसकी गिनती बहुत मुश्किल है, गंध में एक गंध शब्दों की है, बातों की है, जो बीत गया है उसकी है, जो ठहर गया है, उसकी है। आखिरी दिन से पहले की शाम की संगीत लहरियों में पार्वती बारूआ के बाद राजस्थानी यूजन की याद नीलाभ अश्क की बातों में अब भी घुली हुई है। उनके साथ बैठे ऑस्टे्रलियन पेंटर डेनियल कॉनेल के मुंह से हिंदी में निकला- 'जयपुर चमक रहा है।' यह चमक- दमक है, इसमें महक भी है, यह वह जयपुर अब नहीं है, दिल्ली से आए छात्राओं के समूह में से एक छात्रा से बात करता हूं, पता चलता है कि उनके मन में क्या है, उनका मन है-''इसे महीने भर का होना चाहिए।'' यह इनसानी मन है, जो भरता नहीं है, भरने की कोशिश में और रीतता जाता है, प्यास बढती जाती है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;किताबों की दुकान पर मेला है, किताबें देख रहे है, खरीद रहे हैं, लगता है दुनिया बस किताबों सी सुंदर हो जाने वाली है, एक लेखक प्रकाशक गेट पर जाते हुए मिल गए, जावेद अख्तर की किताब 'लावा' के विमोचन की बेला की चमक उनकी आंखों में जिंदा है, जाते हुए उनके कदम ठिठक रहे हैं, शायद गुलजार के लफजों में 'रुके रुके से कदम, रुक के बार- बार चले'। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रूश्दी नहीं आए, नहीं बोल पाए, उनके विचार गूंजते रहे जैसे किसी भी कलमकार के होते हैं। सिगरेट के धुएं के छल्ले, कुछ खुशबूएं, कुछ मादक गंध, कुछ प्यारे से- चिकने चुपड़े चेहरे याद रह जाएंगे, कुछ सितारे यादों में बसे रह जाएंगे, कुछ शब्द जेहन में चिपक के कुछ दिन हमसफर रहेंगे। अगले साल इन्हीं दिनों तक, नए मजमें के सजने तक ये लम्हे यादों के एलबम में रह जाएंगे। सबके लबों की दुआ लौट-लौट कर आते कदमों की आहट में घुली हुई सी है कि वक्त ठहर जाए, यहीं कहीं।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/777405477924605622-2347503656792595257?l=dr-dushyant.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://dr-dushyant.blogspot.com/feeds/2347503656792595257/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=777405477924605622&amp;postID=2347503656792595257' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/777405477924605622/posts/default/2347503656792595257'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/777405477924605622/posts/default/2347503656792595257'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://dr-dushyant.blogspot.com/2012/01/blog-post_24.html' title='विदाई का गीत'/><author><name>DUSHYANT</name><uri>http://www.blogger.com/profile/00269010495016554374</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_N8y3Z3aRBB0/S9bM9k9LOYI/AAAAAAAAAZs/tXTU43tzans/S220/dusht.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/-EXWXpNMWZco/Tx-Mew_Tb5I/AAAAAAAAAg4/vjnq2Twy0b4/s72-c/JLF.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-777405477924605622.post-6105870647964822448</id><published>2012-01-14T04:15:00.000-08:00</published><updated>2012-01-14T04:23:38.850-08:00</updated><title type='text'>कविता जैसा कुछ</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://2.bp.blogspot.com/-DiHQiW-Udqg/TxFyWHNav-I/AAAAAAAAAgo/mkhOBC5-Xr4/s1600/in-love-1.jpg"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 400px; height: 258px;" src="http://2.bp.blogspot.com/-DiHQiW-Udqg/TxFyWHNav-I/AAAAAAAAAgo/mkhOBC5-Xr4/s400/in-love-1.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5697460727818403810" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;&lt;blockquote&gt;जिंदा लाशें जश्न मनाती हैं&lt;/blockquote&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;किसी के साथ ना होने से कोई नहीं मरता&lt;br /&gt;ऐसी बातें अच्छी लगती हैं पर सच्ची नहीं होतीं कि -&lt;br /&gt;''जैसे मर जाएंगे हम एक दूसरे के बिना या जिंदा लाश ही हो जाएंगे हम ''&lt;br /&gt;जिंदा रहते हुए मर जाना भी कोई खयाल होता है किताबों में&lt;br /&gt;मर कर जिंदा रहने का जैसे&lt;br /&gt;मरते हुए जिंदा रहते हुए मौत को याद करता भी एक शाइराना खयाल हो सकता है देवदास सा&lt;br /&gt;देवदास का खयाल भी तो किताबी सा है !&lt;br /&gt;प्रेम में जिंदा हो जाने या नई जिंदगी भर देने जैसे महान खयाल भी तो देते हैं शाइर- कवि लोग&lt;br /&gt;भूल जाते है वे खुद भी कि साथ बनाता है जिंदगी को जिंदगी सा &lt;br /&gt;और साथ छूटना भी जिंदगी को संभव अगर किसी तरह तो हम क्यों झूठ बोलते हैं खुद से ही कि नहीं रह पाएंगे तुम्हारे बगैर!&lt;br /&gt;रह लेते हैं, जी लेते हैं, सह लेते हैं खुश भी ...और खुश भी इतने कि कभी कभी लगता है कि ये हंसी ये खिलखिलाहट तो तब भी नहीं थी जब खुश थे, साथ के अहसास के साथ दोनों !&lt;br /&gt;जीना हर हाल में संभव हो जाता है, जिंदा लाशें जश्न मनाती हैं !!&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/777405477924605622-6105870647964822448?l=dr-dushyant.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://dr-dushyant.blogspot.com/feeds/6105870647964822448/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=777405477924605622&amp;postID=6105870647964822448' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/777405477924605622/posts/default/6105870647964822448'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/777405477924605622/posts/default/6105870647964822448'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://dr-dushyant.blogspot.com/2012/01/blog-post.html' title='कविता जैसा कुछ'/><author><name>DUSHYANT</name><uri>http://www.blogger.com/profile/00269010495016554374</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_N8y3Z3aRBB0/S9bM9k9LOYI/AAAAAAAAAZs/tXTU43tzans/S220/dusht.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/-DiHQiW-Udqg/TxFyWHNav-I/AAAAAAAAAgo/mkhOBC5-Xr4/s72-c/in-love-1.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-777405477924605622.post-6082897423421994464</id><published>2011-12-06T23:57:00.000-08:00</published><updated>2011-12-06T23:59:51.397-08:00</updated><title type='text'>उत्तर और दक्षिण के बीच पुल</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://4.bp.blogspot.com/-qjUfM0syFqs/Tt8cjRrF-AI/AAAAAAAAAgM/7aVOuBRhU8M/s1600/Why-This-Kolaveri-Di.jpg"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 400px; height: 267px;" src="http://4.bp.blogspot.com/-qjUfM0syFqs/Tt8cjRrF-AI/AAAAAAAAAgM/7aVOuBRhU8M/s400/Why-This-Kolaveri-Di.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5683292647130003458" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;&lt;blockquote&gt; '' वाय दिस कोलावैरी डी '' ....सामान्य अर्थो में यह एक प्रेम गीत है प्रेमिका के अस्वीकार को जानलेवा स्तर पर भोगने की अभिव्यक्ति का गीतात्मक रूप - प्रेम में रिजेक्शन या अस्वीकार का भाव देवदास में भी है, पर यहां उसका आवेग कुछ अलग है।&lt;/blockquote&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;संभव है आप में से बहुत से लोगों ने ना सुना हो -  '' वाय दिस कोलावैरी डी '' पर यह हमारे समय की एक आवाज है जिसकी गूंज भौगोलिक विस्तार में इतनी व्यापक हो जाएगी। इसके पीछे के लोगों ने भी नहीं सोचा होगा। यह कल्पनातीत सा है कि कोई इतनी तेजी से भारतप्रसिद्ध हो जाए, इतने कम समय में पर यह हुआ है और हम इसके घटित होने के गवाह बने हैं.। तथ्यों के रूप में कहूं तो यह गीत 16 नवंबर को यूट्यूब पर जारी हुआ था और अब तक इसे एक करोड़ पांच लाख 59 हजार 994 मर्तबा सुना गया है। भाषा के बंधन तोडते हुए गाना उत्तरी भारत में भी उतना ही सुना जा रहा है, युवाओं ने उसे रिंग टोन और हैलो टयून के रूप में हाथों हाथ लिया है। इसे गाया है धनुष ने, धनुष रजनीकांत के दामाद हैं, फिल्म है तीन और फिल्म का लेखन निर्देशन धनुष की पत्नी और रजनीकांत की बेटी ऐश्वर्या आर ने किया है. यह निर्देशक के तौर पर उनकी पहली फिल्म है,  संगीतकार है - इक्कीस साल के अनिरूद्ध रविचंद्रन, गीत लिखा भी धनुष ने ही है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सामान्य अर्थो में यह एक प्रेम गीत है प्रेमिका के अस्वीकार को जानलेवा स्तर पर भोगने की अभिव्यक्ति का गीतात्मक रूप - प्रेम में रिजेक्शन या अस्वीकार का भाव देवदास में भी है, पर यहां उसका आवेग कुछ अलग है। सामान्यतः नायक किसी भी फिल्म या नाटक में नायिका को पा ही लेता है, अस्वीकार को स्वीकार में बदलना पटकथा में नीहित होता है। इस लिहाज से कोलावैरी डी हमारे समय के स्त्री विमर्श का वह सशक्त रूप है कि अस्वीकार उसका भी अधिकार है और जबरन उसका साथ हासिल नहीं किया जा सकता, चाहे आपका प्रेम कितना भी तीव्र और प्रगाढ क्यों ना हो। उसे करूणा और तात्कालिक किसी और भाव से भी नहीं जीता जा सकता, अगर उसमें स्वतः ही प्रेम का भाव नहीं है तो कुछ नहीं हो सकता। कहने को कहा जा सकता है कि स्त्री हमेशा से इतनी आजाद तो रही ही है पर साहेब फिल्म या कथा में इतनी आजादी उसे अपवाद स्वरूप ही मिली है …. इसे इस रूप में लेना चाहिए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;महानता के खयाल को अलग रखकर एक बार जरा हम लोकप्रियता और भौगोलिक विस्तार के लिहाज से देखें तो अखिल भारतीय स्तर पर ऐसी स्वीकार्यता के कई अर्थ निकाले जा सकते हैं। सबसे बडा अर्थ क्या यह नहीं है कि शताब्दियों से अलग अलग रूप में परिभाषित किए गए उत्तर दक्षिण के भेद को एक बार फिर बहुत मजबूती से एक सांस्कमिक पहचान ने पाट दिया है, वह है संगीत। बार बार कहा गया है कि संगीत की कोई जुबान नहीं होती पर उत्तर और दक्षिण के संगीत के अंतर को हम जानते पहचानते समझते रहे हैं। लोकप्रिय संगीत के रूप में एआर रहमान हमारे पास हैं पर वे जब बॉलीवुड में होते हैं तो पूरी तरह बॉलीवुड के ही होते हैं, प्रकटतया इस प्रकार का पुल उन्होंने शायद ही बनाया हो या यह कह दिया जाए कि ऐसे पुल सायास नहीं बनते है। &lt;br /&gt;ऐसा नहीं है कि इससे पहले फिल्मों में उत्तर दक्षिण के बीच पुल जैसा काम नहीं हुआ, कमला हसन की फिल्म एक दूजे के लिए आपको याद ही होगी। फिर तो ''आपडिया'' और उसके जवाब में  ''जैसे सब समझ गया'' संवाद भी याद होगा! यूं सामान्यत दक्षिण भारतीय पात्र बॉलीवुड की फिल्मों में मसखरे से ही आते हुए लगते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;राजनीतिक इकाई के तौर पर हम देश हैं और धीरे धीरे एक देश का भाव हम में विकसित भी हुआ है,  और इसमें ऐतिहासिक रूप से भारत की विरासत का भी योगदान है कि हम देश के रूप में मानते और स्वीकार करते हैं,  दक्षिण भारत सामान्यतः इडली डोसा के रूप में याद आए या हर दक्षिण भारतीय कमोबेश पहली नजर में मद्रासी लगे, यही तो सामान्यीकरण है, जो दशकों से उत्तर भारतीयों में व्याप्त है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ये उत्तर और दक्षिण के मिलन का समय है, घोटालों के जरिए डी राजा, कनिमोझी जैसे कुछ नेता  लोग  उत्तर भारतीयों में जाने जाते हैं । रजनीकांत के जोक हम सब के मोबाइलों में आते-जाते हैं, सिल्क स्मिता की कहानी ''द डर्टी चिक्चर'' हमें हमारे आसपास की कहानी लग रही है, और उत्तर दक्षिण के मेल के रूप में कोलावरी का नवीन निगम का गाया वर्जन भी लोकप्रिय हो रहा है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;संदर्भ आ ही गया है तो बता दें, चेतन भगत का उपन्यास ''टू स्टेटस'' दिल्ली और तमिलनाडु के लेखक दपत्ति की कथा से प्रेरित है, चाहे उसे हम लेखकीय मानको पर खारिज ही क्यों न कर दें,  इस पर विशाल भारद्वाज फिल्म भी बना रहे हैं, खुदा खैर करे!!  राजस्थानी होने के नाते हम जानते हैं कि कितने ही राजस्थानी दशकों से दक्षिण में व्यवसाय कर रहे हैं,  इस समय यह बढ गया है लोग नौकरी के लिए वहां जा रहे हैं... हम आपके पारिवारिक करीबी कितने ही युवा बैगलोर से लेकर चेन्नई तक हैदराबाद से लेकर दूसरे शहरों में खुशी से जीवन जी रहे हैं, सरकारी नौकरियों के अलावा ऐसा ऐच्छिक पलायन सभी संतुष्टियों नहीं तो कम से कम अधिकांश के साथ ही हो सकता है.. यह तो आप भी मानेंगे ही! हमें खुश होना चाहिए कि देश के बीच की दूरियां मल्टीपल लेवल पर कम हो रही है, समाप्त प्राय हो रही हैं, पिछली पीढी में नौकरी के नाम पर कम से कम कहा ही जाता था कि खाने से लेकर भाषा तक की दूरियां कहां जीवन को सरल सुगम होने देंगी! &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भारत जैसे महादेश के लिए यह स्वाभाविक है कि हम इतने तहजीबी और भाषाई अंतरों के साथ एक ही देश में सांस लेते हैं …... विध्य के पार का  भारत भी अपना ही है। आर्यो और द्रविडों का भेद अब उतना नहीं रह गया है, यह भेद अभी और कम होगा, ये संपर्क अभी और बढेगा। यकीन मानिए! आने वाले समय में बहुत प्रेम होगे और बहुत प्रेमविवाह भी,  हमारे घरों में उत्तर दक्षिण  का यह मेल सुबह शाम, आठो पहर महसूस होगा।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/777405477924605622-6082897423421994464?l=dr-dushyant.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://dr-dushyant.blogspot.com/feeds/6082897423421994464/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=777405477924605622&amp;postID=6082897423421994464' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/777405477924605622/posts/default/6082897423421994464'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/777405477924605622/posts/default/6082897423421994464'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://dr-dushyant.blogspot.com/2011/12/blog-post.html' title='उत्तर और दक्षिण के बीच पुल'/><author><name>DUSHYANT</name><uri>http://www.blogger.com/profile/00269010495016554374</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_N8y3Z3aRBB0/S9bM9k9LOYI/AAAAAAAAAZs/tXTU43tzans/S220/dusht.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/-qjUfM0syFqs/Tt8cjRrF-AI/AAAAAAAAAgM/7aVOuBRhU8M/s72-c/Why-This-Kolaveri-Di.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-777405477924605622.post-7371911450725487571</id><published>2011-11-29T22:47:00.000-08:00</published><updated>2011-11-29T23:12:55.185-08:00</updated><title type='text'>भला, ऐसे भी कोई जाता है !</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://1.bp.blogspot.com/-tyngGsYh4co/TtXR_LC5yfI/AAAAAAAAAgA/MHhDWFfwX_k/s1600/IndiraGoswami.jpg"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 279px; height: 400px;" src="http://1.bp.blogspot.com/-tyngGsYh4co/TtXR_LC5yfI/AAAAAAAAAgA/MHhDWFfwX_k/s400/IndiraGoswami.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5680677388224678386" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;&lt;blockquote&gt;छिन्नमस्ता नामक उपन्यास के साथ उनके पहला परिचय लेखिका के रूप में हुआ था, फिर उनकी बहुत सी कहानियां और उपन्यास पढ़े, सब हिंदी मे ही, ज्यादातर के अनुवाद पापोरी गोस्वामी के रहे है। उन्हें मैंने बताया था कि इत्तेफाक है कि हिंदी में छिन्नमस्ता जिसे प्रभा खेतान ने लिखा था, और असमी में छिन्नमस्ता  लिखने वाली दोनों लेखिकाओं का स्नेहपात्र हो गया हूं तो बोलीं - किसके ज्यादा हो ? मैंने कहा -सामने कह रहा हूं पर सच है कि आप ही।&lt;/blockquote&gt; &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;blockquote&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;इंदिरा गोस्वामी ने कविताएं शायद ही कभी लिखी जैसे भूपेन हजारिका के लिए- ''मैं अपनी मातृभूमि की तस्वीर नहीं बना सकती तुम्हारी आवाज के बिना।&lt;/span&gt; ''&lt;/blockquote&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इंदिरा गोस्वामी यानी डॉ मामोनी रायसम गोस्वामी ऐसा नाम है जिसे भारतीय साहित्य के पाठकों के साथ उससे इतर भी बहुत बड़े वर्ग में जाना जाता रहा है, उल्फा के साथ शांति वार्ता में केंद्रीय सरकार की प्रतिनिधि के रूप में उनका नाम भारत और दुनिया भर तक पहुंचा है। उनके निधन के साथ असम से सांस्कृतिक राजदूत के तौर पर केवल कुछ दिनों के अंतराल में यह दूसरा प्रस्थान है, भूपेन हजारिका के जाने का दर्द अभी कम कहां हुआ था! एक खास बात बताएं कि इंदिरा गोस्वामी ने कविताएं शायद ही कभी लिखी जैसे भूपेन हजारिका के लिए- ''मैं अपनी मातृभूमि की तस्वीर नहीं बना सकती तुम्हारी आवाज के बिना। ''&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उनसे पहली मुलाकात दिल्ली के नेहरू मैमोरियल म्यूजियम एंड लाइब्रेरी की है जो कोई दस बरस पुरानी है, जहां वे अपनी भतीजी के साथ किसी शोध सामग्री की तलाश में आ रही थीं और मैं भी। माथे पे बड़ी सी बिंदी वाला चेहरा जाना पहचाना लगा और तीसरे दिन कैंटीन में हिम्मत करके बात की, और फिर इतना स्नेह पाया कि उसके लिए मेरे पास शब्द नहीं है। उसके बाद क्योंकि तब तक वे दिल्ली विश्वविद्यालय के आधुनिक भारतीय भाषा विभाग में प्रोफेसर थी हीं, छात्रा मार्ग स्थित उनके आवास पर कई शामों को उनके सान्निध्य में यादगार बनाया, फिर जीवन ने वैसा अवसर नहीं दिया। असम और असम के साहित्य के साथ मेरा यही परिचय आज तक मेरे साथ है, उन शामों में मेरी कुछ कच्ची-सच्ची कविताओं को भी सरंक्षक भाव में हठ के साथ उनका सुनना और सराहना मुझे एक नए कवि की प्रोत्साहन के निमित्त प्रशंसा ही लगती है। फिर जब 2005 में मेरी पहली किताब यानी कविताओं का पहला संग्रह आने को हुआ, तो उन्होने स्नेह में जो लिखा उसे मैंने फ्लैप पर बड़े गर्व से अंकित किया। मैंने उनको कहा कि इतना अतिशयोक्तिपूर्ण क्यों लिखा है आपने मेरे बारे में! तो उनका जवाब था- इसे चुनौती के रूप में लो  कि तुम्हें मेरे शब्दों को सच साबित करना है। और मुझे यकीन है कि कोई अतिशयोक्ति नहीं कर रही हूं। दिल्ली विवि से रिटायर हुईं तो फिर उनसे मिलना नहीं हुआ क्योंकि वे गुवाहाटी रहने लगीं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;छिन्नमस्ता नामक उपन्यास के साथ उनके पहला परिचय लेखिका के रूप में हुआ था, फिर उनकी बहुत सी कहानियां और उपन्यास पढ़े, सब हिंदी मे ही, ज्यादातर के अनुवाद पापोरी गोस्वामी के रहे है। उन्हें मैंने बताया था कि इत्तेफाक है कि हिंदी में छिन्नमस्ता जिसे प्रभा खेतान ने लिखा था, और असमी में छिन्नमस्ता  लिखने वाली दोनों लेखिकाओं का स्नेहपात्र हो गया हूं तो बोलीं - किसके ज्यादा हो ? मैंने कहा -सामने कह रहा हूं पर सच है कि आप ही। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अखिल भारतीय स्तर पर लेखक के तौर पर जिनको प्रतिष्ठा मिली है, उनमें उनका नाम शामिल है, मसनल याद कीजिए अमृता प्रीतम को, महाश्वेता देवी को। भारत में ऐसी लोकप्रियता कम ही लेखकों को मिली है, यह पैन इडियन रिकग्रिशन उन्हें महत्वपूर्ण सिद्ध करता है। बहुत कम लोगों को पॄता होगा कि उन्होंने विविध भारतीय भाषओं में लिखी रामायणों की असमी में लिखी रामायण के साथ तुलना के विषय पर पीएच.डी. की थी। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इशारा भर कर देना काफी होगा कि जीवन के शुरूआती साल बहुत या कहूं कि कल्पनातीत और अविश्वसनीय रूप से कष्ट मे गुजारे पर उनसे ऊपर उठकर लगभग जैसे अल्बेयर कामू के कथन को सही साबित करते हुए कि इनसान निराशा से निकल कर फिर एक नई दुनिया का सृजन करता है। वही उनमें आध्यात्मिकता के बीज का अंकुरण भी था। असम के विख्यात संत शंकरदेव की उपासक थीं वे। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जीवन के लिए रचना और रचना के लिए जीवन के साथ दूसरों के जीवन में रचनात्मक ऊर्जा भरने का काम अद्भुत तरीके से करना उनका ऐसा गुण है जिसकी बार बार यत्र-तत्र मैंने चर्चा की है। एक सप्ताह पहले दिल्ली की यात्रा में असमी फिल्मकार दोस्त रजनी बसुमतरी ने मुझसे कहा कि वे तो मेरी मेंटर हैं, उनका मुझसे वादा किया है कि 'ठीक होकर मैं एक खास कहानी तुम्हारे लिए फिल्म के लिए लिखूंगी।' रजनी से किया उनका वादा अब अधूरा रह गया है। भारतीय साहित्य की जीवन ऊर्जा से भरपूर विरली लेखिका का जाना देश भर के लिए बड़ा सांस्कृतिक नुकसान है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/777405477924605622-7371911450725487571?l=dr-dushyant.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://dr-dushyant.blogspot.com/feeds/7371911450725487571/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=777405477924605622&amp;postID=7371911450725487571' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/777405477924605622/posts/default/7371911450725487571'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/777405477924605622/posts/default/7371911450725487571'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://dr-dushyant.blogspot.com/2011/11/blog-post.html' title='भला, ऐसे भी कोई जाता है !'/><author><name>DUSHYANT</name><uri>http://www.blogger.com/profile/00269010495016554374</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_N8y3Z3aRBB0/S9bM9k9LOYI/AAAAAAAAAZs/tXTU43tzans/S220/dusht.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/-tyngGsYh4co/TtXR_LC5yfI/AAAAAAAAAgA/MHhDWFfwX_k/s72-c/IndiraGoswami.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-777405477924605622.post-1286821387033767661</id><published>2011-10-10T22:49:00.000-07:00</published><updated>2011-10-11T01:29:54.962-07:00</updated><title type='text'>वो गंगा की नगरी, वो डिग्गियों का पानी</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://2.bp.blogspot.com/-E73h0EhieqM/TpPZadwr4GI/AAAAAAAAAfg/sOw0R9Lak2U/s1600/jagjit-singh.jpeg"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 400px; height: 267px;" src="http://2.bp.blogspot.com/-E73h0EhieqM/TpPZadwr4GI/AAAAAAAAAfg/sOw0R9Lak2U/s400/jagjit-singh.jpeg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5662108205223501922" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;- एक हमशहरी &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;मेरी पीढी के बहुत से लोग होंगे मेरी तरह जिनके घरों में जगजीत को सुनने की जिद के कारण टू-इन-वन खरीदा गया होगा, गजल और शाइरी की ओर झुकाव पैदा किया होगा, गजल सुनने समझने और लिखने वाली एक पीढ़ी जगजीत तैयार ने की है, इससे कोई इनकार नहीं कर सकता। &lt;blockquote&gt;&lt;/blockquote&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जगजीत ने जग जीत लिया था, हमारे वक्त में गजलें उनसे जवान हुईं, गजल और जगजीत एक दूसरे के नाम से जाने जाते है, ये मर्तबा सदियों में किसी को हासिल होता है। उनके हमशहरी होने का कितना फख्र करता रहा हूं, यह बताना मुश्किल है, देश भर में जहां भी बैठा हूं बताते ही कि गंगानगर का हूं, जगजीत साहब के नाम से पहचाना जाता रहा हूं। बचपन से सुना कि मेरे शहर का सबसे मशहूर आदमी अगर है तो वह यही नाम था। इत्तेफाक देखिए कि उनसे अंतरंग मुलाकात भी उसी शहर की है, जहां वे बरसों बाद आए थे, कोई दसेक साल पहले, जब उस कंसर्ट को सुनने ही अपने शहर गया था, पांच सौ किमी का सफर तय करके, खयाल था कि जिंदगी कहां ले के जाएगी, पता नहीं उन्हें अपने शहर में सुनने का अवसर शायद ही कभी फिर नसीब हो, ऐसा हुआ भी। कुदरत की पटकथा ऐसी ही होती है। उन कंसर्ट में उन्होंने अपनी मशहूर गजल 'वो कागज की कश्ती' गाने के बीच मे कहा -' भुलाए नहीं भूल सकता है कोई वो गंगा की नगरी, वो डिग्गियों का पानी', तो लोगों के साथ उनकी भी आंखें नम थी अपने शहर को इस रूप में याद करते हुए। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेरी पीढी के बहुत से लोग होंगे मेरी तरह जिनके घरों में जगजीत को सुनने की जिद के कारण टू-इन-वन खरीदा गया होगा, गजल और शाइरी की ओर झुकाव पैदा किया होगा, गजल सुनने समझने और लिखने वाली एक पीढ़ी जगजीत तैयार ने की है, इससे कोई इनकार नहीं कर सकता। जगजीत को जानने के कई नजरिए हो सकते हैं, एक घुड़दौड़ का शौकीन जगजीत थे, गंगानगर की और राजस्थान की रजवाड़ी शराब के शौकीन जगजीत थे, और बतौर गायक तो गजल,भजन, फिल्मी गीत और शास्त्रीय गायन के तमाम रूपों में उनकी याद हम सब के दिलों में पैबस्त है ही। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उन तक किसी ने पहूंचाया दिया था कि मैंने कोई अच्छा शेर कह दिया है, उसके हवाले से जयपुर में हुई आखिरी मुलाकात में बोले-' सुनाओ, तुम्हारे मुंह से सुनना है, और पूरी गजल भी दे दो, तुमसे पहली मुलाकात में कहा था कि तुम्हारी गजल गाउंगा कभी, पर तुम्हें अपने नाम के आगे गंगानगरी लिखना होगा।' मैंने कहा- 'पाजी शेर हाजिर है पर ऐसी गजल अभी नहीं हुई जिसे आप गाएं।' उन्होंने पंजाबी में प्यार से गाली दी, मैं मुस्कुराकर रह गया। उनके गाने लायक गजल मुझसे आज तक नहीं हुई और अब तो कभी नहीं होगी। पिछले दिनों दोस्त आशुतोष दुबे ने कहा कि जगजीत साहब पर डॉक्यूमेंट्री बना रहे हैं, उनके शहर से हो इसलिए कुछ मदद करनी होगी, जाहिर है कि मेरी ओर से मना करने का कोई कारण नहीं था, आशुतोष जगजीत के कई एलबम के वीडियो के निर्देशक रहे है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कह देना चाहिए कि मेरे शहर का सबसे बड़ा नाम अब सिर्फ किस्सों में है, या अपनी आवाज में अमर है, कि उनके होठों से छू के अमर हो गए है जो लफ्ज, जो गजलें, जो नज्में, जो गीत।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/777405477924605622-1286821387033767661?l=dr-dushyant.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://dr-dushyant.blogspot.com/feeds/1286821387033767661/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=777405477924605622&amp;postID=1286821387033767661' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/777405477924605622/posts/default/1286821387033767661'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/777405477924605622/posts/default/1286821387033767661'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://dr-dushyant.blogspot.com/2011/10/blog-post_10.html' title='वो गंगा की नगरी, वो डिग्गियों का पानी'/><author><name>DUSHYANT</name><uri>http://www.blogger.com/profile/00269010495016554374</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_N8y3Z3aRBB0/S9bM9k9LOYI/AAAAAAAAAZs/tXTU43tzans/S220/dusht.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/-E73h0EhieqM/TpPZadwr4GI/AAAAAAAAAfg/sOw0R9Lak2U/s72-c/jagjit-singh.jpeg' height='72' width='72'/><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-777405477924605622.post-209720163632646848</id><published>2011-10-07T06:55:00.001-07:00</published><updated>2011-10-07T06:56:50.813-07:00</updated><title type='text'>'बिज्जी' को नोबेल ना मिलना</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://2.bp.blogspot.com/-DmoqkOk80bc/To8E61aFybI/AAAAAAAAAfY/KCLROJqN5Pk/s1600/bijji1.jpg"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 303px; height: 250px;" src="http://2.bp.blogspot.com/-DmoqkOk80bc/To8E61aFybI/AAAAAAAAAfY/KCLROJqN5Pk/s400/bijji1.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5660748665443436978" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;&lt;blockquote&gt;राजस्थान जिस वाचिक परंपरा की साहित्यिक विरासत के लिए जाना जाता है, 'बिज्जी' उसके जीवंत और स्वाभाविक प्रतिनिधि हैं। अब वैश्विक रूप से यह सिद्ध और प्रसिद्ध हो गया है कि उनकी कथाएं लोक का पुनराख्यान भर नहीं हैं, वे बिना ज्योतिषी हुए अतीत और वर्तमान के बीच पुल बनाते हुए हमें भविष्य दिखाते हैं, उस और जाने का रास्ता बताते हैं, और साथ ही हमारी वैचारिक और कथा विरासत को उस भविष्य की चुनौतियों से लडने के हथियार के तौर पर हमें सौंपते हैं।&lt;/blockquote&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दस साल में सातवी बार नामांकित कवि को नोबेल मिला, कोई दो राय नहीं कि वे स्वीडिश भाषा के बडे कवि हैं, और खुशी की बात यह भी है कि पोलेंड की विस्साव शिंबोस्र्का के बाद 15 साल बाद किसी कवि को नोबेल मिला है, पर हम उम्मीद में थे कि पहली बार नामांकित हमारे विजयदान देथा 'बिज्जी' को इस बार ही नोबेल मिल जाएगा, क्योंकि ऐसा कोई नियम या परंपरा नहीं है कि कोई एकाधिक बार नामांकित हो तभी उसे मिलेगा। खैर, यकीनन नोबेल के लिए नामांकित होना बडी बात है, तो हमारे गौरव का विषय भी, और बिज्जी का लेखकीय कद हमारी नजर में इससे कम भी नहीं होता कि उन्हें नोबेल नहीं मिला।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पर इस बहाने से हमें कुछ बातें करनी ही चाहिए, जो सामान्यतः या तो होती नहीं है या बहुत दबे स्वर में होती हैं। एक बडा प्यारा सा, मासूम सा तथ्य है कि पिछले दस में से सात नोबेल साहित्य पुरस्कार से सम्मानित लेखक यूरोपीय हैं। इतनी ही प्यारी सी बात यह भी है कि इस बार स्वीडन ने नोबेल अपने ही घर में रख लिया है, यानी स्वदेशी को दिया है, इससे पहले 1974 में ऐसा हुआ था, उस वक्त तो विवाद भी हुआ था क्योंकि वे दोनों लेखक उस स्वीडिश समिति के 18 सदस्यों में से थे, जो नोबेल देती है। बहरहाल, स्वीडिश समिति के बारे में अक्सर कहा जाता है कि वह बहुत आगाह रहती है कि कोई इल्जाम उनपर ना आए, शायद यही वजह थी कि स्वीडन के लोग मानने लगे थे कि टाॅमस को शायद इसीलिए नोबेल नहीं मिल रहा कि वे स्वीडन के हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बिज्जी की बात करें तो पहले व्यक्तिगत होने की इजाजत लेते हुए कहूं तो भारत में जम्मू से लेकर चेन्नई और मुम्बई से लेकर बंगाल, असम सहित सुदूर इलाकों में जब भी किसी भी भारतीय भाषा के किसी भी लेखक से मिलना हुआ है, हरेक ने अलग अलग शब्दों में यही कहा - ''अच्छा राजस्थान से हो! अगली बार जब बिज्जी से मिलना हो तो तो मेरा प्रणाम जरूर कहिएगा।'' ऐसे ही एक लेखक ने कहा था- ''आपकी भाषा राजस्थानी है !'' मेरे 'जी' कहने पर वे मेरे गले लग गए - ''तो आप उसी भाषा को बोलते है, जिसमें बिज्जी लिखते हैं।'' सच कहूं तो बिज्जी के प्रति मेरा सम्मान उनके इस सम्मान से सौ गुना बढा है, बार बार छाती चैडी हुई है। जैसा कहा जाता है कि देश में बहुत लोगों ने रवींद्र बाबू की 'गीतांजलि' पढने के लिए लोगों ने बांग्ला सीखी तो जरूर एक वर्ग है जो बिज्जी को पढने को राजस्थानी सीखने की मंशा रखता है। रेगिस्तान के आखिरी कोने पर एक बरसाती नदी के इलाके में लगभग ढाई दशक पहले जहां अकेला अखबार राजस्थान पत्रिका अपने छपने के दिन बमुश्किल ही पहुंचता था, वहां बचपन गुजारते हुए लेखक के तौर पर पहला नाम जो सुना था, वह बिज्जी का ही था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;राजस्थान जिस वाचिक परंपरा की साहित्यिक विरासत के लिए जाना जाता है, बिज्जी उसके जीवंत और स्वाभाविक प्रतिनिधि हैं। अब वैश्विक रूप से यह सिद्ध और प्रसिद्ध हो गया है कि उनकी कथाएं लोक का पुनराख्यान भर नहीं हैं, वे बिना ज्योतिषी हुए अतीत और वर्तमान के बीच पुल बनाते हुए हमें भविष्य दिखाते हैं, उस और जाने का रास्ता बताते हैं, और साथ ही हमारी वैचारिक और कथा विरासत को उस भविष्य की चुनौतियों से लडने के हथियार के तौर पर हमें सौंपते हैं। यह भी बहुत अस्वाभाविक नहीं है कि कोई उन्हें बातां री फुलवारी के कारण प्यार करता है कोई सपनप्रिया या महामिलन के लिए, कोई चैधरण की चतुराई के कारण, कोई उनकी कहानियों पर हबीब तनवीर के किए नाटकों के कारण, कोई मणिकौल और अमोल पालेकर की बनाई फिल्मों के कारण। कई अकादमिक लोग उन्हें हिंदी राजस्थानी कहावत कोश के कारण बहुत इज्जत से देखते हैं, तो बहुत से लोगकोमल कोठारी के साथ रूपायन में किए अतुलनीय लोक विरासत सहेजने के काम के लिए। मुझे एक लेखक के तौर पर कहना और मानना चाहिए कि मुझ जैसे बहुतेरे लेखकों को उनकी भाषा और कथा शिल्प ईष्र्या और प्रेरणा दोनों देते हैं, फिर मैं तो कम से कम उन्हें अपनी शानदार विरासत के रूप में ग्रहण करते हुए नतमस्तक हो जाता हूं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पर क्या इसे दुर्योग नही कहना चाहिए कि वे उस भाषा के कथाकार हैं जिसे संवैधानिक मान्यता नहीं है, बहुत संभव है कि इसीलिए उन्हें भारत का सर्वोच्च साहित्यिक सम्मान माना जाने वाला ज्ञानपीठ नहीं मिला है, पर वे इसके बावजूद देश के चोटी के साहित्यकारों में गिने जाते रहे हैं। उनका काम हाल ही के सालों में कायदे से अंग्रेजी में अनुवाद हुआ है, कथा और पेंगुइन से प्रकाशित हुआ है, मिशिगन विवि में दक्षिण एशिया अध्ययन विभाग की क्रिस्टी मेरिल के अनुवाद को ही माना जा रहा है कि बिज्जी को नोबेल के नामांकन तक पहुंचाया है। इस अनुवाद के काम में कैलाश कबीर उनके साथी रहे हैं। हालांकि यह तय बात है कि कोई पुरस्कार किसी के काम और अहमियत का पैमाना नहीं होता पर जब ऐसा कोई बडा इनाम किसी को मिलता है तो इनाम और उस व्यक्ति दोनों की गरिमा में इजाफा जरूर होता है, उस व्यक्ति के काम को और ज्यादा लोगों तक पहुंचने का बहाना और जरिया मिलता है, और हस्बेमामूल यहां अनुवाद की अहमियत फिर से साबित होती है, जिसे प्रायः हमारे लेखक हीन भाव से देखते हैं, जबकि परस्पर अनुवाद की खिडकियां खुली सांस के लिए हवाओं की तरह हैं। क्या हमें भूल जाना चाहिए कि अमता प्रीतम हिंदी और पंजाबी दोनों में उनती ही बराबर मुहब्बत से पढी और सराही गई हैं और उनका अदबी कद इसी वज्ह से  अखिल भारतीय स्तर का बना है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बिज्जी को नोबेल साहित्य ना मिलने से बिज्जी निराश नहीं हुए, दुखी भी नहीं हुए, हमें यानी विशेषकर राजस्थान और वैसे पूरे भारत के लोगों, दुनिया भर में फैले उनके पाठकों, प्रशंसकों को दुख जरूर हुआ, पर हम नाउम्मीद नहीं है ना ही इससे उनके कद और उनके प्रति हमारी नजर में सम्मान में कोई कमी ही आई है, उनका लिखा जब जब भी पढते हैं, पढंेगे, उनके प्रति सम्मान बढता जाता है, दुआ कीजिए कि वे स्वस्थ हो जाएं, दो सप्ताह पहले फोन पर उनसे बात हुई थी, उन्हें सुनने बोलने में हो रही तकलीफ साफ महसूस हो रही थी, इस नामांकन की खबर के साथ कितने हमपेशा दोस्तों ने उन्हें फोन किया, मेरी हिम्मत नहीं हुई कि उन्हें तकलीफ दूं, मिलकर दुआ करें कि वे मन का पढ-लिख पाएं, क्योंकि लेखक की सबसे बडी यातना ना लिख पाना होता है, और यह यातना वे झेल रहे हैं। संभव है उन्हें अगले किसी साल में नोबेल साहित्य मिल जाए, या अन्य कोई भारतीय लेखक ले आए, राजस्थानी को आठवीं अनुसूची में शामिल कर लिया जाए, पर इसमें किसी को भी संदेह नहीं हो सकता, और ना ही होना चाहिए कि बिज्जी भारतीय साहित्य में अपनी तरह के विरले और अदभुत लेखक हैं,  नामुमकिन नहीं तो बेहद मुश्किल जरूर।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/777405477924605622-209720163632646848?l=dr-dushyant.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://dr-dushyant.blogspot.com/feeds/209720163632646848/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=777405477924605622&amp;postID=209720163632646848' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/777405477924605622/posts/default/209720163632646848'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/777405477924605622/posts/default/209720163632646848'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://dr-dushyant.blogspot.com/2011/10/blog-post.html' title='&apos;बिज्जी&apos; को नोबेल ना मिलना'/><author><name>DUSHYANT</name><uri>http://www.blogger.com/profile/00269010495016554374</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_N8y3Z3aRBB0/S9bM9k9LOYI/AAAAAAAAAZs/tXTU43tzans/S220/dusht.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/-DmoqkOk80bc/To8E61aFybI/AAAAAAAAAfY/KCLROJqN5Pk/s72-c/bijji1.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-777405477924605622.post-2607726539675455273</id><published>2011-09-06T22:18:00.000-07:00</published><updated>2011-09-06T22:37:12.813-07:00</updated><title type='text'>जगमोहन ने जिंदगी का साथ निभाया पर जिंदगी ने ?</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://3.bp.blogspot.com/-LDTnMeF6j4s/TmcCi8gqlhI/AAAAAAAAAfA/SdBaloaW0hE/s1600/jag.jpg"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 300px; height: 400px;" src="http://3.bp.blogspot.com/-LDTnMeF6j4s/TmcCi8gqlhI/AAAAAAAAAfA/SdBaloaW0hE/s400/jag.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5649487056941520402" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;blockquote&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;जगमोहन मूंदडा 62 के थे उनके गुजरने की खबर नाकाबिलेयकीन थी, अभी उम्र ही नहीं थी और ऐसी कोई बीमारी भी नहीं थी, वे यूं शराबी भी नहीं थे, कई सालों से उनके मोबाइल पर एक ही हैलो टयून थी- ''हर फिक्र को धुंए में उडाता चला गया मैं जिंदगी का साथ निभाता चला गया'' उन्होनें जिंदगी का साथ भरपूर निभाया पर कम्बख्त जिंदगी ही बेवफा निकली... &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-style:italic;"&gt;उनसे किया एक पुराना साक्षात्कार बांट रहा हूं(उन्हें यही मेरी श्रद्धांजलि है) जिसमें उन्होंने अपनी जिंदगी के वरक खोलके मेरे सामने रख दिए थे &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;-&lt;/blockquote&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;खुशी की खोज नहीं करता, खोज में खुशी मिलती है - जगमोहन मूंदड़ा&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;बचपन और पढ़ाई&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;मेरा बचपन कलकत्ते में बीता। वहां बड़ा बाजार के ाालिस मारवाड़ी माहौल में। पहले मां और पिताजी वहीं रहते थे पर बाद में वे उस वक्त की बंबई और आज की मुंबई चले गए तो मैं अपने बड़े भाई के साथ दादा दादी के पास रहा। हम जिस बिल्डिंग में रहते थे, वहां निजी बाथरूम जैसी चीज नहीं थी,वो मुबई की चॉल जैसी जगह थी। वहां म्यूनिसिपल नल से पानी आता था हमारे नहाने और पीने के लिए। हमारे घर में कार नहीं थी, हम पब्लिक  परिवहन ही इस्तेमाल करते थे हमारे रिश्तेदार पैसेवाले थे, इनकी जिंदगी देखते थे। पर हमें सिखाया गया था कि किसी से मांगना नहीं है, ईष्र्या नहीं करनी है। हमें फिल्म देखना मना था, दादी साल में एक बार कोई फिल्म दिखाती थीं। घर में कैरम खेलते थे, पर हमें जिंदगी में किफायत का पाठ पढ़ा दिया गया और पर वो वंचित किस्म के नहीं, बहुत खुशनुमा बचपन के दिन थे क्योकि हमारी जरूरतें सीमित थीं। हम खुश थे पर महत्वाकांक्षाएं तो थीं। &lt;br /&gt;मारवाड़ी इलाके के सबसे बेहतरीन हिंदी स्कूल में पढ़े थे हम, फिर नवीं क्लास से अंग्रेजी मीडियम में आए। मेरे दादाजी ने बचपन से एक बात मन में डाल दी कि जिंदगी में पढ़ाई बहुत जरूरी है। इसका नतीजा था कि हम दोनों भाईयों ने पढ़ाई पर ध्यान दिया। मैं हमेशा अपनी क्लास और स्कूल में अव्वल आता था। हायर सैकण्डरी में पूरे पं.बंगाल की मेरिट में मेरा नवां स्थान था, गणित में सबसे ज्यादा नंबर आए। हमारे पिताजी चाहते थे हम दोनों भाई आईआईटी में जाएं, भाई एक साल आगे थे तो पहले परीक्षा पास करके आईआईटी मुंबई पहुचे। पहले हम लोग छुट्टियों में ननिहाल नागपुर जाते थे फिर मां पिताजी के पास तत्कालीन बंबई जाने लगे। और अगले साल मैं भी परीक्षा पास करके आईआईटी मुंबई पहुंच गया। कम से कम उम्र से भी छोटा था तो एफिडेविड देकर उम्र बढवाकर दाािला लिया, क्लास में सबसे कम उम्र का था मैं। आईआईटी में सोशल एक्सपेंशन हुआ। मिलना जुलना हुआ। अमेरिका में और ज्यादा हुआ। वैसे मुझे लगता है कि अभाव में कल्पना  बहुत व्यापक होती है,इसी मेरे कल्पना के संसार में एहसास हुआ कि फेंटेसी तो होनी ही चाहिए। पर मानसिक तस्वीर साफ होनी चाहिए। फिर तेईस साल की उम्र आते आते अमेरिका से दो मास्टर्स डिग्री और पच्चीस साल की उम्र में पीएचडी कर चुका था। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;पहला क्रश, प्रेम और विवाह&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;मेरा पहला क्रश कलकत्ता में मेरी एक बंगाली स्कूल टीचर के लिए था। उस वक्त 10-11 साल का रहा होउंगा, वैसे उस वक्त केवल घर की महिलाओं को ही जानते थे जो सब उम्र में बड़ी थीं। इस समय सामाजिक विस्तार के अवसर नहीं थे ,पैसे भी नहीं थे तो डेटिंग जैसा कुछ नहीं था। दूर के कजिंस से ही संपर्क  होता था। दसवीं ग्यारहवीं क्लास की छुट्टियों में मुंबई आना होता था, तब पिताजी के मित्र की एक लड़की से मिलना होता था जो मुझे अंकल कहकर पुकारती थी, मेरी छोटी बहन की दोस्त थी, जब 1973 में अमेरिका गया वो बारह साल की थी और मैं उन्नीस-बीस का। उसके पिताजी को तब से लेकर आज तक काको जी ही कहता हूं। सब कजंस के साथ  बॉबे की इस कॉनवैंट पढ़ी लड़की के लिए भी अमेरिका से चॉकलेट्स लाता था,जब भाई की शादी में आया तो देखा कि उसने अंकल कहना बंद कर दिया है, पता चला कि परिवार में साजिश,षड्यंत्र,सांठ-गांठ हो चुकी है और इस तरह छब्बीस जनवरी 1974 को हमारी शादी हो गई। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;आईआईटियन बना फिल्ममेकर &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;मेरा मानना है कि हर इनसान को मन का काम करना चाहिए, दृष्टि में स्पष्टता हो तो देर सबेर हम वहां जरूर पहुचते हैं, मेरे दादा कहते थे कि जिंदगी में इनसान कहीं भी पहुंच सकता है और ये तालीम से संभव होता है। छुटपन में लगा ही नहीं कि फिल्म डायरेक्टर भी हो सकता हूं। 12 साल की उम्र में 'कागज के फूलÓ छुप के देखी और फिल्म की बीमारी लग गई। मन में इच्छा तो हुई पर किसी को बोला नहीं। स्कॉलरशिप से आईआईटी और अमेरिका में पढ़ाई की तो स्वतंत्र और आत्मनिर्भर होने का बोध था। पीएचडी करने के बाद कैलिफोर्निया स्टेट यूनिवर्सिटी में पढाना शुरू कर दिया जहां हते में 12 घंटे पढ़ाना होता था। लगा कि फिल्म बनाना सीखना चाहिए और 12 घंटे पढ़ाने के अलावा यूनिवर्सिटी के सिनेमा डिपार्टमेंट के सहकर्मियों से फिल्म मेकिंग सीखना शुरू कर दिया। फिर एक दिन लगा अब फिल्म बनानी चाहिए और काम के लिए लॉस एंजेलिस के स्टुडियो जा पहुंचा। पर मुझे ब्रेक नहीं मिला। अजीब सा जवाब मिला -'पीएचडी हो हमारी रिसर्च यूनिट से जुड़ जाओÓ या 'हिंदुस्तानी होकर अंग्रेजी फिल्म बनाओगे!Ó यूनिवर्सिटी की बेहतरीन नौकरी के बावजूद मेरे भीतर कुंठा सी थी। इस बीच पत्नी ने वहां से बैचलर, मास्टर्स किया। 1980 में बेटी स्मृति पैदा हुई और मैंने नौकरी छोड़ के 'सुरागÓ फिल्म शुरू कर दी-शबाना आजमी और संजीव कुमार के साथ। इसकी रिलीज पर 1982 में भारत आए फिर 'कमलाÓ शुरू की-दीप्ति नवल, शबाना और मार्क जुबेर आदि के साथ। फिल्म सेंसर ने रोक दी, इससे बड़ा आर्थिक झटका लगा था। 1983 में रिलीज के बाद वापिस अमेरिका चले गए। मैंने फिर से पढ़ाना शुरू कर दिया। फिर अमेरिका में फिल्म तकनीक बदली, वीडियोज की डिमांड पैदा हुई, सस्ती फिल्में बनानी थीं, कई स्वतंत्र निर्माता जुड़े, दो हिंदी फिल्मों के अनुभव के आधार पर अंग्रेजी फिल्में मिलनी शुरू हो गईं। अशोक अमृतराज की कंपनी के लिए एक मिलियन डॉलर में बनाई फिल्म 'नाइट आइजÓ ने तीस मिलियन से ज्यादा कमाए। और फिर पंद्रह सालों में हर साल लगभग दो फिल्में बनाईं,अमेरिका में अपना घर खरीदा, बेटी की पढाई हुई। बीच में हिंदी की एक फिल्म पूजा बेदी को लेकर बनाई विषकन्या, उसका अनुभव अच्छा नहीं रहा तो हिंदी फिल्मों का विचार ही छोड़ दिया। &lt;br /&gt;1999 में राजस्थान आया, फिल्म 'थर्ड आईÓ  के लिए शूटिंग लोकेशन देखने-खोजने। हालांकि मेरे पुरखे राजस्थान से ही कोलकाता गए थे पर मैं इससे पहले राजस्थान नहीं आया था,उन दिनों अखबार में खबर पढ़ी-भंवरी देवी के बलात्कार की। मैं विषय की संवेदना से जुड़ा, अपनी जड़ों से जुड़ा, बेटी बड़ी हो गई थी, मेरे विचार भी बदल गए थे और भारतीय मीडिया में जो मेरी सॉफ्ट पोर्नफिल्ममेकर की बेबुनियाद छवि थी, उसे तोडऩे के बेहतरीन अवसर के तौर पर मैंने 'थर्ड आईÓ  के लिए मना करते हुए 'बवंडरÓ के लिए खुद पैसा जुटाया, जोखिम लिया, फिल्म बनाई और फिल्म दुनिया के 35 फेस्टिवल्स में दिखाई गई। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;मेरा सिनेमा &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;मैं खुद को स्टोरी टेलर मानता हूं, ये मेरा पैशन है, मुझे फिल्में बनाने में मज़ा आता है और किसे भी माध्यम की बजाय इसमें सहज महसूस करता हूं। कई लोगों ने मेरी फिल्मों की आलोचना की उन्हें पसंद नहीं किया खालिद मोहम्मद ने 'कमलाÓ की उस साल की दस बुरी फिल्मों में गिना, फिर हमने उनकी बनायी फिल्में भी देखी। अब लोगों के ओपिनियन से जिन्दगी तय नहीं करता हूं और अपनी कमियों को अपने अन्दर स्वीकारते हुए सुधारता हूं और ऐसा ही करना चाहिए &lt;br /&gt;फिल्मों को मैं टाइम पास नहीं मानता हूं, इनसे टाइम पास होता है ये सच है एक फिल्ममेकर के तौर पर मैं दर्शकों को टाइम पास के साथ सोचने का अवसर देना चाहता हूं और मेरे लिए मनोरंजन का मतलब है - दर्शकों का कहानी में शामिल हो जाना डूबना। मेरा ये भी मानना है कि केवल इंटेंशन से ही अच्छी फिल्म नहीं बनती, दर्शकों को कहानी के साथ एंगेज करना ज़रूरी निर्देशकीय खूबी मानता हूं । मेरी पसंद होती है मजबूत कथानक जिसमें से दर्शक को कुछ हासिल हो ऐसा सीखने को मिले जो पहले से पता न हो।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;खाली वक्त में&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;फुरसत में पढता हूं। साहस पूर्ण कहानियां तो बचपन से पढता रहा हूं। वाइल्ड लाईफ के बारे में पढना पसंद रहा है, रोमांटिक किताबें भी पढता हूं । इन दिनों अनिता जैन की 'मेरिंग अनीताÓ और अद्वैत काला की 'अलमोस्ट सिंगलÓ पढ़ रहा हूं। इधर कुछ सालों से भारतीय ही अधिक पढ़ रहा हूं वैसे नॉन फिक्शन, फिल्म क्राफ्ट, जीवनियां आदि पसंद करता हूं । देव आनंद साहब की जीवनी अभी लाया हूं। इसके अलावा खाली वक्त में सुडोकू खेलता हूं । दोस्तों के बीच बैठता हूं, संगीत सुनता हूं, फिल्में देखता हूं, मारवाड़ी खाना बहुत पसंद है, घूमना बहुत पसंद है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;जिंदगी का फलसफा &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;जिन्दगी के हर पल को जीना ज़रूरी मानता हूं, छोटी छोटी खुशियों को सहेजता हूं .. जिन्दगी में बहुत आशावादी हूं। मुझे लगता है कि मज़ा सफऱ में है मंजिल में नहीं ..सफऱ का अंत तो सबका एक ही है । इसीलिए स्वर्ग नरक को मैं महत्वपूर्ण नहीं मानता हूं। एक चीनी कहावत जर्नी इज रिवार्ड कभी नहीं भूलता हूं। आज के हरेक पल को सकारात्मकता, अपने काम, व्यवहार, खुशी से जीना ही मेरे लिए सबसे अहम् है। &lt;br /&gt;हर इंसान की तरह मेरी जिन्दगी में अच्छे बुरे दिन आये हैं, अच्छे दिनों में खुशी के पलों में बहुत्त सारे हैं जैसे मेरा आईआईटी में चयन, बेटी का जन्म, पहली फिल्म का मुहूर्त और रिलीज आदि। बुरे क्षणों में कमला का सेंसर में रुक जाना, एक साल की लड़ाई, प्रोवोक्ड को किसी राष्ट्रीय पुरस्कार और चैनल आदि के अवार्ड के लिए नोमिनेशन तक न मिलना, बवंडर को देश के बाहर बहुत अवार्ड मिले पर भारत में कोई नहीं मिला, भारत में अब तक कोई ब्लॉकबस्टर नहीं दे पाया &lt;br /&gt;पर निराशा के क्षणों में कम भाग्य वाले लोगों को देखता हूं। मेरे संस्कार ऐसे हैं कि जो अपने पास है उसकी अहमियत समझो। मैं खुशी की खोज नहीं, खोज में खुशी प्राप्त करता हूं, बचपन में सुना गाना आज भी मुझे ताकत देता है और मुश्किल वक्त में रास्ता दिखाता है -' मैं जिन्दगी का साथ निभाता चला गया।'&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/777405477924605622-2607726539675455273?l=dr-dushyant.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://dr-dushyant.blogspot.com/feeds/2607726539675455273/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=777405477924605622&amp;postID=2607726539675455273' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/777405477924605622/posts/default/2607726539675455273'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/777405477924605622/posts/default/2607726539675455273'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://dr-dushyant.blogspot.com/2011/09/blog-post.html' title='जगमोहन ने जिंदगी का साथ निभाया पर जिंदगी ने ?'/><author><name>DUSHYANT</name><uri>http://www.blogger.com/profile/00269010495016554374</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_N8y3Z3aRBB0/S9bM9k9LOYI/AAAAAAAAAZs/tXTU43tzans/S220/dusht.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/-LDTnMeF6j4s/TmcCi8gqlhI/AAAAAAAAAfA/SdBaloaW0hE/s72-c/jag.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-777405477924605622.post-9088833522617706738</id><published>2011-08-12T04:34:00.000-07:00</published><updated>2011-08-12T23:34:51.579-07:00</updated><title type='text'>ठेस और ठोस के बीच</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://3.bp.blogspot.com/-Gt39K_luOHM/TkUP1outTLI/AAAAAAAAAe4/9M6FqruQ5aQ/s1600/aarakshan_jpg.jpg"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 400px; height: 264px;" src="http://3.bp.blogspot.com/-Gt39K_luOHM/TkUP1outTLI/AAAAAAAAAe4/9M6FqruQ5aQ/s400/aarakshan_jpg.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5639931522492222642" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;blockquote&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;फिल्म से मेरी भी असहमतियां हैं पर वे असहमतियां यह इजाजत मुझे नहीं देती कि कहूं भई फिल्म नहीं चलनी चाहिए।  दूसरे, यह कोई महान फिल्म नहीं है, एक व्यवसायिक फिल्म है, कभी मेरे प्रिय निर्देशक रहे प्रकाश झा की परंपरा की भी नहीं है, कह देना चाहिए कि मैं उनसे निराश हुआ हूं, पर इस निराशा में भी उनकी फिल्म के प्रदर्शन को रोकने का पक्षधर नहीं हो सकता&lt;/span&gt;। &lt;/blockquote&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पहले संक्षेप में घटनाक्रम बता दें, फिल्म के रिलीज होते होते तीन राज्य आंध्र पदेश, उत्तरप्रदेश और पंजाब 'आरक्षण' के प्रदर्शन पर प्रतिबंध लगा चुके हैं, राजस्थान में आरक्षण के लिए संघर्षरत राजपूत करणी सेना और राजस्थान सर्वब्राहमण महासभा के पदाधिकारियों का विरोध कुछ संवाद हटाकर समाप्त किया गया है और प्रकाश झा कुछ और दृश्यों को हटाने को राजी हो गए हैं, पर इधर उधर विरोध जारी है और प्रकाश झा अपने पक्ष के लिए सुप्रीम कोर्ट जा रहे हैं।  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस फिल्म को देखने के बाद मेरा यह कहना वाजिब मान लिया जाना चाहिए कि फिल्म आरक्षण को लेकर बहस छेडती है। वैसे तो, आरक्षण का मुददा ही अपने आप में इतना संवेदनशील है कि कुछ भी कहना विवाद को विषय बन सकता है, चाहे पक्ष में होइए, विपक्ष में या चुप रहिए तो भी। फिल्म में आरक्षण से जुडे सभी पहलूओं को गोया इस तरह से छू लिया गया है कि फिल्म किसी एक पक्ष को तो कतई संतुष्ट नहीं करती है..और सभी पक्ष क्या करें। इसमें प्रकाश झा की चालाकी और समझ को सलाम करना चाहिए या दूसरे शब्दों में कहें तो व्यवसायिक जरूरतों के बरक्स प्रकाश झा मजबूर थे कि इस संवेदनशील विषय पर ऐसी ही फिल्म बना पाते और धीरे-धीरे चतुराई से फिल्म को आरक्षण से हटाकर शिक्षा व्यवस्था पर चोट करती सवाल खडे करती फिल्म के रूप में याद करने लायक ही बनाते। फिल्म का मीडियम यही इजाजत देता है, ऐसा कहना शायद जल्दबाजी होगी हो, पर माफ कीजिए, यह बेशक कहा जा सकता है कि व्यवसायिक सिनेमा इसी की इजाजत देता है, किसी हद तक यह कहना ठीक हो सकता है। वैसे हमारे लोकतंत्र का बडा सच यह है कि जब कोई मसला राजनीतिक रंग अख्तियार कर ले तो इस बात की गुजाइश क्या बहुत कम नहीं हो जाती कि उसका समाधान कम वक्त में निकल जाए... ऐसा सोचना खाम खयाली भी माना जा सकता है।  यही बात आरक्षण को लेकर भी है अब जब कि प्रायः लोग मान चुके हैं कि आरक्षण सामाजिक न्याय की जरूरत है और चाहे कुछ तबकों के बेमन से ही सही इसे व्यवस्था में लागू करना तो भारतीय समाज से बढकर अब भारतीय राजनीति की बडी अपरिहार्यता है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;थोडा व्यक्तिगत होने की मोहलत लेते हुए कहूं कि मैं उस पीढी में हूं जिसने मंडल के बाद देश को बदलते और खुद को उस  बदलाव का हिस्सा बनते हुए देखा है, यह समय के साथ देखा है कि जो तबके विरोध में थे वे भी उसी पंक्ति में आकर खडे हो गए हैं  बेशक इनमें भी कुछ लोग हैं जो आर्थिक आधार पर सरकारी सुविधाओं के हकदार हैं, और बहुत हद तक शायद आरक्षण के भी। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वापिस फिल्म पर लौटें तो कहना चाहिए कि सिनेमा कथा कहने का जीवंत विजुअल माध्यम है यानी फिक्शन का । और उसे समस्त कला माध्यमों से विकसित और उन्नत कला माध्यम माना जाता है क्योंकि उसमें पेंटिंग,  साहित्य- (कहानी और कविता दोनों),  संगीत, फोटोग्राफी आदि का समावेश है। फीचर फिल्में जैसा हम सब जानते हैं कथा फिल्में होती हैं कथा में सच कितना हो यह बहस का विषय हो सकता है । वैसे भी भारत में कितने निर्देशक रियलीस्टिक सिनेमा बनाते हैं, उसमें भी राजनीतिक सिनेमा तो और भी कम। यही वजह है कि भरत में बायोपिक सिनेमा नहीं बनता है मुददों पर ही फिल्म नहीं बना सकते तो व्यक्तियों पर कैसे बना के दिखा पाएंगें... शायद यही वजहें है कि बवंडर बनाने वाले फिल्मकार दोस्त जगमोहन मूंदडा की एक राजनीतिक फिल्म रिलीज के इंतजार में हैं ...देखना होगा कि संजय पूरणसिंह चौहान जिन्होनें पिछले दिनों संजय गांधी पर फिल्म बनाने की घोषणा की है बना के प्रदर्शित कर पाते हैं कि नहीं। बहरहाल, यहां हमें प्रकाश झा को सलाम करना चाहिए उनके साहस के लिए कि वे राजनीतिक सिनेमा बना रहे हैं और लोगों तक पहुचाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं, आप उनसे सहमत है कि असहमत हैं यह बाद की बात है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सवर्ण पात्र की आर्थिक हालत दिखाते हुए सहानुभूति पैदा करना फिल्म का वह प्रसंग है जो सवर्ण आरक्षण की मांग का परोक्ष समर्थन करता लगता है। दलित नायक सैफ के तर्क पूरी फिल्म की वह थिसिस है जो सवर्ण पात्र की पूरक थिसिस के साथ मिलकर एक मुकम्मल तस्वीर बनाते हैं। यह भी कहना जरूरी लगता है कि अमिताभ की स्थिति तो पक्ष विपक्ष के बीच फंसी सरकार की सी दिखाकर निर्देशक फेंटेसी में जैसे कई सच परोक्ष में जाहिर कर देना चाहता है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस लिहाज से सवाल अभिव्यक्ति का भी है पर उसका अपवाद किसी को ठेस पहुचाने की आजादी कतई नहीं होता है, इस लिहाज से मुझे नहीं लगता कि प्रकाश  झा किसी को ठेस पहुचाने का काम कर रहे हैं, राजनीतिक हितों को ठेस पहुचती है तो वह तो साहेब अभिव्यक्ति के दायरे से बाहर की बात ही कही जाएगी ना! फिल्म से मेरी भी असहमतियां हैं पर वे असहमतियां यह इजाजत मुझे नहीं देती कि कहूं भई फिल्म नहीं चलनी चाहिए।  दूसरे, यह कोई महान फिल्म नहीं है, एक व्यवसायिक फिल्म है, कभी मेरे प्रिय निर्देशक रहे प्रकाश झा की परंपरा की भी नहीं है, कह देना चाहिए कि मैं उनसे निराश हुआ हूं, पर इस निराशा में भी उनकी फिल्म के प्रदर्शन को रोकने का पक्षधर नहीं हो सकता।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आपको याद ही होगा कि हाल ही में हरियाणा व उत्तर प्रदेश के पश्चिमी भाग में 'खाप' फ़िल्म पर प्रतिबंध लगाने की मांग की गई थी और कई सिनेमा हॉल वालों ने उनके दबाव में आकर यह फ़िल्म अपने यहाँ नहीं लगाई थी। इससे पहले मधुर भंडारकर की 'ट्रैफिक सिग्नल' को हिमाचल प्रदेश में, आमिर खान की 'फ़ना'  और राहुल ढोलकिया की फ़िल्म 'परज़ानिया' को तो गुजरात में प्रदेश सरकारों ने प्रतिबंधित कर ही दिया था। वैसे सोचने की बात तो यह भी है कि किताबों, चित्रों, फिल्मों पर प्रतिबंध की परंपरा से ज्यादा जरूरी क्या बहस की परंपरा नहीं होती! दरअसल हम लोग यह मान लेते हैं कि जिसके साथ खडे नहीं हो सकते, उसे जीने का अधिकार तक नहीं है, उसके साथ जीना तो मासूम सा ख्वाब है। यहां सवाल खडा हो जाता है कि तो हम विरोधियों को दुश्मन कब तक मानते रहेगे! इतना ही नहीं यह सवाल भी खडा होता ही है कि क्या हमें नहीं मान लेना चाहिए कि सेंसर बोर्ड के बेमानी होते देखने का दौर है ये ! ''आरक्षण'' चल पाती है या नहीं पर फिलहाल इतना तय है कि सेंसर का होना और चलना संदेह के घेरे में आ गया है। &lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/777405477924605622-9088833522617706738?l=dr-dushyant.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://dr-dushyant.blogspot.com/feeds/9088833522617706738/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=777405477924605622&amp;postID=9088833522617706738' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/777405477924605622/posts/default/9088833522617706738'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/777405477924605622/posts/default/9088833522617706738'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://dr-dushyant.blogspot.com/2011/08/blog-post.html' title='ठेस और ठोस के बीच'/><author><name>DUSHYANT</name><uri>http://www.blogger.com/profile/00269010495016554374</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_N8y3Z3aRBB0/S9bM9k9LOYI/AAAAAAAAAZs/tXTU43tzans/S220/dusht.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/-Gt39K_luOHM/TkUP1outTLI/AAAAAAAAAe4/9M6FqruQ5aQ/s72-c/aarakshan_jpg.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-777405477924605622.post-6948814279927758212</id><published>2011-07-21T02:05:00.002-07:00</published><updated>2011-07-21T02:33:28.832-07:00</updated><title type='text'>सियाह से सफ़ेद हो गयी ज़िन्दगी</title><content type='html'>&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/--g6cidRvOgs/TifyEO4eieI/AAAAAAAAAeo/waNIH5RyusU/s1600/irshad-kamil.jpg"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 400px; height: 266px;" src="http://4.bp.blogspot.com/--g6cidRvOgs/TifyEO4eieI/AAAAAAAAAeo/waNIH5RyusU/s400/irshad-kamil.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5631736013578471906" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;blockquote&gt;&lt;strong&gt;हमारे समय के मशहूरोमारूफ फिल्मी गीतकार और इल्मी शाइर इरशाद कामिल से हम रूबरू हुए तो उन्होंने दिल से जो कहा, आपके सामने हाजिर है....&lt;/strong&gt;&lt;/blockquote&gt; &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt; अपने बचपन के बारे में बताइए .&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; बचपन, पंजाब के एक कसबे मलेरकोटला में, दिहाड़ीदार मजदूरों के बच्चों के साथ बीता. उन्ही के साथ मिटटी भी खाई और मार भी, गुल्ली डंडे से लेकर गली क्रिकेट तक खेला. उनमें और मुझमें सिर्फ इतना सा अंतर था कि वो हर सुबह काम पे जाते थे और मैं स्कूल. उस समय यकीनन मुझे अपना काम स्कूल जाना उनसे कहीं ज़्यादा मुश्किल लगता था. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;&lt;strong&gt;शाइराना तरबियत कैसे हुई ?&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;मेरा भाई जावेद जो मुझसे ५ साल बड़ा है और उससे भी ३ साल बड़ा भाई जब नए नए जवानी में कदम रख रहे थे तो अचानक उनका रुझान रूमानी शायरी की तरफ होने लगा. हालाँकि मेरे सबसे बड़े भाई सलीम को बाकायदा गीत और फ़िल्मी किस्म की कहाह्नियाँ लिखने का शौक़ था क्योंकि वो फिल्म जगत में आना चाहता था लेकिन घरेलु जिम्मेदारियों के कारण और पिता जी का सहयोग न मिलने के कारण वो आ नहीं पाया. जवान होते भाइयों के रूमानी शायरी के शौक़ ने मुझे शायरी जैसी चीज़ के प्रति थोडा उत्सुक कर दिया. उनका शौक़ तो आल इंडिया रेडियो पर 'आबशार' प्रोग्राम सुनकर ख़त्म हो गया लेकिन मुझे ये लत लग गयी. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;शाइर पहले खबरनवीस हुआ और फिर फिल्मी गीतकार ये सफर कैसे मुमकिन हुआ? कब लगने लगा कि आप फिल्मी गीत लिखने के लिए पैदा हुए हैं  ?&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुझे बहुत पहले एहसास हो गया था कि घडी के काँटों से बंधी ज़िन्दगी मेरे लिए नहीं है. मतलब किसी दफ्तर में ९ से ५ तक बध पाना मेरी फितरत में नहीं. इसलिए खबरनवीसी पकड़ ली क्योंकि इस काम में सारा दिन दफ्तर में नहीं बैठना पड़ता, पत्रकारिता का डिप्लोमा मेरे पास था ही. उसके अलावा समाज भी पत्रकारों को थोडा भय से देखता था/है. सारा दिन अपनी खटारा मोटर सायकल पर सड़कों से दोस्ती और शाम को एक डबल कालम रिपोर्ट, बस यही थी ज़िन्दगी. लेकिन इसके साथ साथ जो चीज़ मेरे हमकदम थी वो थी मेरी कलम जो उन दिनों बहुत कवितायेँ लिखती थी. और कभी कभार एल्बम के लिए १००-२०० में कोई गीत भी लिख दिया करती थी. हालांकि मैं अपने आप को न कभी गीतकार लगा हूँ, न कहानीकार, न नाटककार सिर्फ कलमकार लगा हूँ जो ये सभी कुछ बहुत आसानी से लिख सकता है. जो उन विधाओं में भी लिख सकता है जिनको अभी कोई नाम नहीं दिया गया. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;पहली फिल्म कैसे मिली जिसके गाने आपने लिखे ? इस सफर की शुरूआत में बहुत मुश्किलें पेश आई होगी!&lt;/strong&gt; &lt;br /&gt;&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;किसी दोस्त ने जोर डालकर संगीतकार सन्देश शांडिल्य के पास भेज दिया था, हालांकि किसी के पास काम मांगने जाना या काम करने के बाद पैसे के तकाज़े के लिए जाना मुझे कभी अच्छा नहीं लगा. उस दोस्त ने काम मांगने नहीं सिर्फ मिलने भेजा था. मैं सन्देश से मिला, सन्देश ने पूछा क्या करते हो? मैंने कहा लिखता हूँ. उसने पूछा क्या लिखते हो? मैंने कहा सब कुछ लिखता हूँ. उसने पूछा गीत लिखते हो? मैंने कहा गीत अगर कोई कहे तो वैसे ज़्यादातर ग़ज़ल लिखता हूँ. उसने कहा कुछ सुनाओ. सन्देश का इतना कहना था कि मैंने एक के बाद एक उसे अपनी २०-२५ ग़ज़लें सुना दीं. सन्देश शायद काफी प्रभावित हो गया था इसीलिए शायद उसने मुझे इम्तिआज़ अली से मिलवा दिया जो उस समय 'सोचा न था' बना रहा था. मैं और इम्तिआज़ जब मिले तो लगा ही नहीं कि हम पहली बार मिल रहे हैं. 'सोचा न था' कि मेरी पहली फिल्म मुझे इतनी आसानी से मिल जाएगी. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;&lt;strong&gt; जिंदगी कितनी बदली फिल्मी गीतकार होने के बाद ?&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सियाह से सफ़ेद हो गयी ज़िन्दगी, आम रिसाले से पुराण-वेद हो गयी ज़िन्दगी, खुली किताब से छुपा हुआ भेद हो गयी ज़िन्दगी, बहुत सी ख़ुशी और थोडा खेद हो गयी ज़िन्दगी...क्योंकि ज़िन्दगी के साथ थोडा खेद थोडा अफ़सोस थोडा गिला हमेशा रहता है इंसान को. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt; पंजाबी, हिंदी, उर्दू और अंग्रेजी जुबानों का इस्तेमाल रामकथानुमा गीत.. इतनी विविधता को कैसे साध लिया आपने ?&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; पंजाबी मेरी माँ बोली है, हिंदी स्कूल, कालेज, यूनीवर्सिटी में पी एच डी तक पढ़ी है, उर्दू मेरी दीनी जुबान है और अंग्रेजी आज के समाज में रहने की मजबूरी ने सिखा दी. हिंदी साहित्य पढने के कारण या यूँ कहिये तुलसी, सूरदास, मीरा, कबीर और छायाबाद ने सब कुछ आसन कर दिया मेरे लिए. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;दूसरों के लिखे ऐसे गीत जिनको सुनकर लगता हो कि काश मैंने लिखा होता ?&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;वो सभी गीत जो अच्छे है और दूसरों ने लिखे हैं काश उन्हें मैंने लिखा होता.  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;अब इस गीतकार की दिनचर्या क्या रहती है?&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; सुबह मर्ज़ी से उठना, फिर बहुत देर चुपचाप बैठे रहना, फिर तैयार होकर मीटिंग्स और सिटिंग्स के लिए निकल जाना, रात को देर तक कभी काम होने के कारण और कभी नाकाम होने के कारण जागना, शब्दों और विचारों के जंगल में भटकना, कुछ लिखने की कोशिश करना फिर इस अफ़सोस के साथ सो जाना कि आज कुछ अच्छा नहीं लिख पाया और अगली सुबह फिर इस उम्मीद से जागना कि आज ज़रूर कुछ अच्छा लिखूंगा. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;पुराने दोस्तों से राब्ता कायम है अभी ?&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; पुराने "सच के" सभी दोस्तों से वैसा ही राबता बरकरार है. न वो बदले हैं न मैं ही बदल पाया हूँ. न वो अपने पुरानेपन से बाज़ आते हैं न मैं. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;अदबी शाइरी से रिश्ता बना हुआ है क्या अभी भी? उम्मीद करें कि शाइर इरशाद कामिल का कोई शेरी मजमुआ मंजरेआम पर आने वाला है ?&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;फ़िल्मी शायरी के साथ इल्मी शायरी बाकायदगी से जिंदा है. उर्दू मुशायरों में अक्सर शिरकत करता हूँ दो हफ्ता पहले ही हैदराबाद गया था.  हिंदी कवि सम्मलेन वाले नहीं बुलाते शायद इसलिए क्योंकि  मेरी हिंदी कवितायेँ समझ आ जाती हैं लोगों को इसीलिए शायद वो उन्हें मयारी नहीं समझते. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;लिखने के अलावा क्या करने की ख्वाहिशें हैं? &lt;/strong&gt;&lt;br /&gt; हज़ारों खवाहिशें ऐसी कि हर खवाहिश पे दम निकले. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;दस साल बाद इरशाद कामिल  को किस रूप में  तसव्वुर करते हैं?&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt; दस साल बाद अगर इरशाद कामिल रहा तो इंशा अल्लाह दस कदम आगे होगा और दस गुना बेहतर इंसान होगा. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;जिंदगी को कैसे देखते हैं?&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; ज़िन्दगी हरहाल में खूबसूरत है अगर आपको देखना आता है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;आस्तिक हैं ? क्या कभी लगा नहीं कि ''कैसा खुदा है तू ,बस नाम का है तू''  लिखने से फतवा झेलना पड सकता है ?&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; बेहद आस्तिक हूँ. एक मुस्लिम जमात ने इस बात पर बवाल किया भी था. लेकिन ये वो मुस्लिम जमात थी जिसने न मुस्लिम धरम को अच्छी तरह समझा था न मेरे गीत के इस बंद को, ख़ैर जिन्हें बन्दगी समझ नहीं आई उन्हें बंद क्या समझ में आएगा. मैंने लिखा था…&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;माँगा जो मेरा है जाता क्या तेरा है&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैंने कौन सी तुझ से जन्नत मांग ली&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कैसा खुदा है तू बस नाम का है तू &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रब्बा जो तेरी इतनी सी भी न चली&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;यानि मैंने वो चीज़ मांगी है जो मेरी है...मतलब मोहब्बत. मैंने वो चीज़ नहीं मांगी जो तेरी है...यानि जन्नत. हर इंसान अपनी मोहब्बत का मालिक है वो किसी को दे न दे, खुदा जन्नत का मालिक है वो किसी को दे न दे. अपनी चीज़ मांगने पर भी अगर न मिले तो बन्दगी का क्या मतलब? &lt;br /&gt;&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;&lt;strong&gt;''मिल जा कहीं समय से परे...''  जैसा दर्शन इरशाद कामिल इक्कीसवी सदी के फिल्मी गीतों में कैसे ले आते हैं?&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;मुश्किल बात अगर आसान भाषा में कही जाये तो आसान हो जाती है. मेरे लिए फ़िल्मी गीत आटा हैं, आटा जो पेट भरता है. साहित्य नमक है, नमक जो स्वाद बनाता है. मैं आटे में नमक बराबर साहित्य डालता हूँ फ़िल्मी गीतों में. साहित्य में दर्शन भी है और आकर्षण भी. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt; कोई क्यों ना प्यार करे इस मानीखेज, फलसफे से भरपूर शाइरी करने वाले शाइर को और जो  उसे फिल्मों में मुमकिन बना लेता है,  कोई हल्का और चलताऊ गीत आज तक उसने नहीं दिया है ?? &lt;/strong&gt;&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;फिल्मों में आने के बावजूद मैं समाज के प्रति लेखक की ज़िम्मेदारी को भूल नहीं पाया. मैं सिर्फ वही काम करता हूँ जिसकी वजह से मेरी नज़र नीची न हो. चलताऊ या खोखले गीत आपको शोहरत और पैसा दिलवा सकते हैं इज्ज़त और सकून नहीं.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/777405477924605622-6948814279927758212?l=dr-dushyant.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://dr-dushyant.blogspot.com/feeds/6948814279927758212/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=777405477924605622&amp;postID=6948814279927758212' title='4 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/777405477924605622/posts/default/6948814279927758212'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/777405477924605622/posts/default/6948814279927758212'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://dr-dushyant.blogspot.com/2011/07/blog-post_21.html' title='सियाह से सफ़ेद हो गयी ज़िन्दगी'/><author><name>DUSHYANT</name><uri>http://www.blogger.com/profile/00269010495016554374</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_N8y3Z3aRBB0/S9bM9k9LOYI/AAAAAAAAAZs/tXTU43tzans/S220/dusht.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/--g6cidRvOgs/TifyEO4eieI/AAAAAAAAAeo/waNIH5RyusU/s72-c/irshad-kamil.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-777405477924605622.post-4731660908181040689</id><published>2011-07-13T01:52:00.000-07:00</published><updated>2011-07-14T01:19:14.325-07:00</updated><title type='text'>चर्चित साहित्यिक पत्रिका 'बया'  में आई मेरी कहानी</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://4.bp.blogspot.com/-u6fTLjsCQpw/Th1eQ8n5dVI/AAAAAAAAAeg/Ch9ADgFb0wY/s1600/break%2Bup.jpg"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 400px; height: 210px;" src="http://4.bp.blogspot.com/-u6fTLjsCQpw/Th1eQ8n5dVI/AAAAAAAAAeg/Ch9ADgFb0wY/s400/break%2Bup.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5628758754527376722" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;यार, तुम भी बस!&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ब्रेक अप के तीन साल बाद पैच अप की कोशिश में, आदम और इव के दो वशंज -&lt;br /&gt;समय- लगभग उतरती हुई शाम, मौसम- आती हुई सर्दी, स्थान- किसी महानगर के&lt;br /&gt;ठीक से रेस्तरां के बाहरी हिस्से में बना ओपन रेस्तरां, एंबिएंस - भीड कम&lt;br /&gt;पर सडक का शोर मील्यू क्रिएट करता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लडकी- आओ, बैठो!&lt;br /&gt;लडका- हां, ओके! तुम कैसी हो!&lt;br /&gt;लडकी- जैसी तुम छोड के गए थे, उससे कहीं बेहतर!&lt;br /&gt;लडका- याद किया मुझे! याद तो आई होगी !&lt;br /&gt;लडकी- तुमने किया होगा, उससे ज्यादा भी और कम भी।&lt;br /&gt;लडका- हम्म्म! जॉब कर रही हो!&lt;br /&gt;लडकी - जैसे तुम्हें कुछ पता ही नहीं है, मेरे बारे में!&lt;br /&gt;लडका- इतना भी नहीं है यार!&lt;br /&gt;लडकी- बहुत है, मुझे पता है। अपने सारे दोस्तों को लगा रखा होगा, आय एम श्योर!&lt;br /&gt;लडका- छोडो चलो ! तो तुम्हारी आजकल किस किस से दोस्ती है? कोई खास दोस्त?&lt;br /&gt;लडकी- दैटस नन आफ योर बिजनेस!&lt;br /&gt;लडका- वाय?&lt;br /&gt;लडकी- हू आर यू इन माई लाइफ? नो फ्रेंड, नो लवर, नो हस्बैड राइट नाउ!&lt;br /&gt;लडका- वी हैव बिन इन लव यार!&lt;br /&gt;लडकी- विवेक! नॉट हैव बिन, वी वर वैन यू लैफट मी बिहाइंड फॉर नो गुड रीजन !&lt;br /&gt;लडका- तो मैं अब वापिस आया हूं तो यह जानने का हक नहीं है मुझे?&lt;br /&gt;लडकी- नो ! बिल्कुल भी नहीं ! पहले माफी मांगकर जिंदगी में शामिल होओ,&lt;br /&gt;एंड इफ आई फील लाइक, दैन यू मे आस्क वेयर अबाउट आफ माइन !&lt;br /&gt;बे्रेक - वेटर आता है, तीस डिग्री झुकता है, कहता है सर आॅर्डर! लडकी हवा&lt;br /&gt;में हाथ खेल देती है जैसे कह रही हो- एज यू विश, लडका कहता है- टु&lt;br /&gt;एसप्रेसो कॉफी प्लीज! सुनके वेटर एक हथेली जिनती डायरी पर अंकित करता है&lt;br /&gt;और चला जाता है।&lt;br /&gt;लडका- तो क्या इस हालत में हमारा वापिस जुडना पॉसिबल लगता है तुम्हें ?&lt;br /&gt;लडकी -क्यों सब कुछ तुम्हारे एकॉर्डिग ही हो सकता है या होना चाहिए! हाउ&lt;br /&gt;मेल इगोइस्टिक यू आर!&lt;br /&gt;लडका -आय एम नॉट !&lt;br /&gt;लडकी - यू आर! इटस प्रूव्ड हेअर! इजंट इट ?&lt;br /&gt;लडका- सर्टेनली नॉट! तुम्हारा दिमाग तो मेरे लिए नेगेटिव हो गया है!&lt;br /&gt;लडकी - यू फोस्र्ड मी टु !&lt;br /&gt;लडका - इफ यू थिंक सो, आय कांट हेल्प।&lt;br /&gt;लडकी - आय नेवर सॉट योर हेल्प विवेक!&lt;br /&gt;लडका - बात को बदलो मत!&lt;br /&gt;लडकी- बात बदली मैंने?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वेटर चुपचाप कॉफी रखकर चला गया, इसी बीच किसी क्षण, देानों को पता नहीं&lt;br /&gt;चला या दोनों ने यह अभिनय किया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लडका- यस ! ये तुम्हारी पुरानी आदत है, एंड यू आर मास्टर आफ इट!&lt;br /&gt;लडकी- हुंह!!  बोलते जाओ अपनी औकात पे आ गए हो!&lt;br /&gt;लडका- मैं अपनी औकात पे आया हूं या तुम ?&lt;br /&gt;लडकी- बकवास करोगे ! बकवास ही करनी है यहां बैठ के!&lt;br /&gt;लडका - यह बकवास है !&lt;br /&gt;लडकी - और नहीं तो क्या ?&lt;br /&gt;लडका-  तुम भी करती थी ना!&lt;br /&gt;लडकी - तुम भी कितनी बकवास करते थे उन दिनों !&lt;br /&gt;लडका - कब?&lt;br /&gt;लडकी - जब हम मिले थे शुरू में तब!&lt;br /&gt;लडका - मुझे तो याद नहीं है।&lt;br /&gt;लडकी - तुम लडकों की यही प्राब्लम है! भूल जाते हो, और अपने मतलब का सब&lt;br /&gt;याद रहता है।&lt;br /&gt;लडका - मेरी चीजें तुम्हें प्रॉब्लम लगती है हमेशा से, तुम बकवास नहीं&lt;br /&gt;करती थी, स्टाइल नहीं मारती थीं !&lt;br /&gt;लडकी - तो क्यों प्रपोज किया था ! मैं तो ऐसी ही थी, एंड आय विल रीमेन द&lt;br /&gt;सेम एज आई वाज!&lt;br /&gt;लडका - मैंने ऐसा तो नहीं कहा!&lt;br /&gt;लडका- तो क्या कहना चाहते हो ? तुम्हारी प्रॉब्लम है यार! जो कहना चाहते&lt;br /&gt;हो कभी नहीं कह पाते और जो कह देते हो, उसके लिए कहते हो -मेरा इंटेशन वो&lt;br /&gt;नहीं था !&lt;br /&gt;लडका - एटीटयूड बाकी है तुम्हारा अब भी !&lt;br /&gt;लडकी - तुम्हारा नहीं है ?&lt;br /&gt;लडका - सोचा था, सुधर गई होगी !&lt;br /&gt;लडकी - तुम सुधर गए हो?&lt;br /&gt;लडका - आग्र्यूमेंटेटिव बहुत हो तुम !&lt;br /&gt;लडकी - ये खराबी है! है तो है यार मेरी ! पहले से नहीं पता कि ऐसी हूं !&lt;br /&gt;लडका - खैर जाने दो! आरकुट, फेसबुक पर पे एक्टिव हो बहुत ?&lt;br /&gt;लडकी-  तो स्पाइंग करते हो मेरी ?&lt;br /&gt;लडका-  नहीं, ऐसा तो नहीं है यार !&lt;br /&gt;लडकी-  और क्या है ये ! कोई स्पाइंग एजेंसी भी हायर कर ली होगी है ना! आय नो यू !&lt;br /&gt;लडका-  यू डोंट नो मी !&lt;br /&gt;लडकी-  और जानने की जरूरत भी नहीं है ! तुम जानते हो मुझे ?&lt;br /&gt;लडका - आय थिंक सो&lt;br /&gt;लडका - यू थिंक दैट यू थिंक ! हा हा !! सो फनी ! सोचते तो जाते छोडकर यूं मुझे !&lt;br /&gt;लडका-  यार, तुम भी बस ! ले के बैठी हो उस बात को !&lt;br /&gt;लडकी-  वैसे तुम क्या सोच के चले गए थे, मरेगी नहीं, शादी वादी कर लेगी,&lt;br /&gt;बच्चे हो जाएंगे, पीछा छूटेगा आफत से, जो गले पड गई है, टाइम पास से&lt;br /&gt;फुलटाइम बनना चाहती है, गल्र्स आर लाइक दिस ओनली, इजंट इट! यही सोच के गए&lt;br /&gt;थे ना!  या यू थिंक ए लॉट यू थॉट लाइक दिस !&lt;br /&gt;लडका - कॉफी ठंडी हो रही है, पी लें ?&lt;br /&gt;लडकी - कॉफी पीने आए हो ? पी लो ! हा हा !!&lt;br /&gt;लडका - तुम नहीं पीयोगी ?&lt;br /&gt;लडकी - मन तो है तुम्हारा खून पी लूं !&lt;br /&gt;लडका - मुझे भी नहीं पीनी, जाने दो !&lt;br /&gt;लडकी - बात का जवाब नहीं है ? कॉफी में बात मत बदलो !&lt;br /&gt;लडका - यू आर जस्ट इंपॉसिबल ! यू आर आल्वेज मोर वरीड अबाउट वॉट वुड बी&lt;br /&gt;रादर दैन वॉट इज !&lt;br /&gt;लडकी-  वॉट इज, लैट मी नो ? दैट यू किक्ड माय एस वन डे, एंड.. केम लाइक&lt;br /&gt;फकर, अगेन एंड कॉल्ड मी -बस एक बार मिल लो मुझ से, नेहा प्लीज, नौटंकीं&lt;br /&gt;साले !&lt;br /&gt;लडका-  तुम्हारी लेंग्वेज बहुत बिगड गई है !&lt;br /&gt;लडकी - तुम जो लाइफ बिगाड गए, उसका क्या ?&lt;br /&gt;लडका - सुधारने दोगी अब!&lt;br /&gt;लडकी - इस मेल इगो के साथ कि सुधार दोगे!&lt;br /&gt;लडका - यार तुम भी है ना बस !&lt;br /&gt;लडकी-  क्या बस! अब दया करके आए हो कि बैठी है तुम्हारे लिए, बेचारी है !&lt;br /&gt;लडका - ऐसा नहीं है यार!&lt;br /&gt;लडकी - कोई मिली नहीं मुझसी बेवकूफ, तुम्हे झेलने वाली?&lt;br /&gt;लडका - तुम बेवकूफ नहीं हो यार! मैंने कभी कहा तुम्हे!&lt;br /&gt;लडकी - कहा नहीं, माना तो !&lt;br /&gt;लडका - यार, तुम भी बस!&lt;br /&gt;लडकी - क्या बस! तुम्हें लगता है -मैं जी नहीं सकती तुम्हारे बिना, और&lt;br /&gt;हां,  किसी मर्द के बिना नहीं रह सकती मैं, और तुम ही वो महा मर्द हो&lt;br /&gt;सकते हो, दयावान, सुपरहीरो, टु सेव माइ लाइफ!&lt;br /&gt;लडका - यह तो नहीं कहा मैंने ?&lt;br /&gt;लडकी - तुम क्या कहते हो, आज तक मेरी समझ में तो आया नहीं !&lt;br /&gt;लडका - समझने की कोशिश तो करो !&lt;br /&gt;लडकी - ये इल्जाम और लगा लो मैंने समझने की कोशिश नहीं की तुम्हें ! साले&lt;br /&gt;! छोडके तुम जाओ और समझने की कोशिश भी मैं करूं और वह भी ठीक वैसे ही,&lt;br /&gt;जैसे तुम चाहते हो !&lt;br /&gt;लडका - तुमसे बात करने में कोई फायदा नहीं है शायद !&lt;br /&gt;लडकी - फायदा सोच के आए थे ? बनिए हो गए हो ?&lt;br /&gt;लडका - चलें ?&lt;br /&gt;लडकी - इसी में फायदा लग रहा होगा ?&lt;br /&gt;लडका - ऐसा तो नहीं है !&lt;br /&gt;लडकी - जाने दो खैर, आय विल पे फॉर कॉफी, ये नुकसान मैं भुगत लूंगी, तुम&lt;br /&gt;इतने तो फायदे में रहो ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लडका पता नहीं क्यों उठता है, कहता है- जस्ट ए मिनट। ठंडी हो चुकी कॉफी&lt;br /&gt;का केवल अपना कप उठाकर ओपन रेस्तरां की चहारदीवारी को जैसे दरवाजे से&lt;br /&gt;चीरकर पार करते हुए बाहर डालकर आता है, कप वापिस वहीं उसी टेबल पर एक&lt;br /&gt;कोने पर रख देता है, लडकी तब तक बिल पे कर चुकी है, बिना उसकी तरफ देखे&lt;br /&gt;तेज कदमों से रेस्तरां से बाहर निकल जाती है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/777405477924605622-4731660908181040689?l=dr-dushyant.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://dr-dushyant.blogspot.com/feeds/4731660908181040689/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=777405477924605622&amp;postID=4731660908181040689' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/777405477924605622/posts/default/4731660908181040689'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/777405477924605622/posts/default/4731660908181040689'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://dr-dushyant.blogspot.com/2011/07/blog-post.html' title='चर्चित साहित्यिक पत्रिका &apos;बया&apos;  में आई मेरी कहानी'/><author><name>DUSHYANT</name><uri>http://www.blogger.com/profile/00269010495016554374</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_N8y3Z3aRBB0/S9bM9k9LOYI/AAAAAAAAAZs/tXTU43tzans/S220/dusht.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/-u6fTLjsCQpw/Th1eQ8n5dVI/AAAAAAAAAeg/Ch9ADgFb0wY/s72-c/break%2Bup.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-777405477924605622.post-1254361526671955745</id><published>2011-06-07T01:32:00.000-07:00</published><updated>2011-06-07T03:42:25.879-07:00</updated><title type='text'>रामदेव अन्ना नहीं हैं, ना ही अब बाबा हैं !</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://2.bp.blogspot.com/--vwr_H5uMvo/Te3j8_xDJqI/AAAAAAAAAd0/KsYsquAQWxQ/s1600/baba345.jpg"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 400px; height: 266px;" src="http://2.bp.blogspot.com/--vwr_H5uMvo/Te3j8_xDJqI/AAAAAAAAAd0/KsYsquAQWxQ/s400/baba345.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5615394947449693858" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;blockquote&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;आप में से ज्यादातर लोग मुझसे सहमत होंगे कि बाबा रामदेव संत नहीं हैं, योगाचार्य हैं, जिन्होंने भारत और दुनिया में योग को एक ब्रांड बनाया है, जाहिर है कि उन्हें बेचना आता है, किसी भी आयआयएम या हावर्ड बिजनेस स्कूल के पास आउट से ज्यादा बेहतर तरीके से&lt;/span&gt;।&lt;/blockquote&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बाबा की बाबागिरी जिन बादलों से घिर गई है, शायद बाबा ने भी नहीं सोचा होगा। ऐसे कोई भी नहीं सोच सकता, बेचारे बाबा क्या सोचेंगे! एक खुद को संत कहलवाने वाला व्यक्ति देश सेवा के नाम पर राजनीति करने लगता है, और राजनीतिक साधनों का इस्तेमाल करते हुए अपनी ही राजनीतिक चाल में फंस जाता है, इसे क्या कहेंगे, संत से धोखा या कि संत की कुटिल राजनीतिक चाल का पर्दाफाश होना। खैर आप दोनों ही मान सकते हैं या जो आपका दिल करे, मान लीजिए! &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पहली बात तो हमें यह देखने की जरूरत है कि बाबा अन्ना नहीं है, अन्ना का कोई प्रत्यक्ष या परोक्ष साम्राज्य नहीं है, दूसरे उनकी कोई राजनीतिक महत्वाकांक्षा नहीं है, प्रकटतया उन्हें मीडिया मोह भी नहीं है, एक करोड का पुरस्कार अस्वीकार वही कर सकते थे, बाबा नहीं, मुझे लगता है कि बाबा तो अपनी योगपीठ के लिए आने वाले दान की बछिया के दांत नहीं गिनते होगे! &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आप में से ज्यादातर लोग मुझसे सहमत होंगे कि बाबा रामदेव संत नहीं हैं, योगाचार्य हैं, जिन्होंने भारत और दुनिया में योग को एक ब्रांड बनाया है, जाहिर है कि उन्हें बेचना आता है, किसी भी आयआयएम या हावर्ड बिजनेस स्कूल के पास आउट से ज्यादा बेहतर तरीके से। पर मेरी मासूम जिज्ञासा के लिए क्षमा करें कि भारतीय परंपरा के मुताबिक तप वे कैसे करते होंगे, मुझे माफ कीजिएगा, संदेह है, आत्मावलोकन और तप के बीच में ही उनके योग कैंप आ जाते होगे! स्वीकारता हूं कि योग और भारतीयता के पुनरूत्थान के लिए उनकी नायकीय छवि मेरे अंदर भी रही है, पर मुझे कहने की इजाजत दीजिए कि बाबा के चेहरे पिछले दिनों में उजागर हुए हैं, उन्होंने मुझ जैसे अनेक भारतप्रेमियों के मन में उनकी छवि को भंग नहीं तो कम से कम धूमिल जरूर किया है। भारतीयता से बढ़कर हिंदूवादी सिद्ध होते चले जाना और लोगों से मिले चंदे को चंदे के रूप में भाजपा को देने की खबरों का आना उनके कद को बौना करने के लिए काफी नहीं था क्या! अब कांग्रेस के साथ गुप्त समझौता और उसकी पोल खुलने पर चिल्लाना क्या उन बलात्कारों की दर्ज रिपोर्टों जैसा नहीं है, जिसमें आपत्तिजनक अवस्था में पकडे जाने पर जबरदस्ती का इल्जाम लगा के अपने आपको पाक साफ साबित करने की कोषिष होती है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;खैर, चाहे उनकी नीयत साफ हो, वे एक बेहतर भारत चाहते हों पर इस प्रकरण से उनकी छवि को नकारात्मक नुकसान ही हुआ है, पहले तो राजनीतिक हल्कों में यह माना गया कि गैर राजनीतिक कद्दावरों में अन्ना की छवि से खुद की छवि को कमतर होता देखते हुए इस सत्याग्रह की योजना बनी। दूसरे एक उभरते जननेता चाहे राजनेता वे ना कहलाना चाहें तो उसका यूं भागने की कोशिश करना, और मूर्खतापूर्ण बयान कि उनका एनकाउंटर करने वाली थी सरकार! जबकि लोकतंत्र का थोड़ा सा भी जानकार यह दावे के साथ कह सकता है कि बाबा रामदेव को मारकर सरकार अपनी राजनीतिक आत्महत्या का इंतजाम कभी नहीं करेगी, और अगर ऐसा होता तो उन्हें सरकारी विमान से देहरादून नहीं छोडती, बीच में बाबा गायब भी हो सकते थे। ऐसा हास्यास्पद बयान बाबा की बौद्धिक छवि का घोर अवसान प्रतीत होता है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वैसे, मेरी एक जिज्ञासा यह भी है कि जरूरत पडने पर एक बार भगवा वेश छोडने पर क्या उन्हें बाबारूप से विचलित भी नहीं मान लेना चाहिए या फिर यह मान लिया जाए कि  बाबा या फिर सामान्य स्त्री जैसा कोई वेष दोनों में उन्हें कोई अंतर नहीं दिखता, ऐसा है तो मैं भारत के सारे धर्माचार्यों, शंकराचार्यों से निवेदन करता हूं कि बाबा के वेश के प्रति उनकी प्रतिबद्धता पर भी सवाल उठने चाहिए। इसकी शुरुआत शंकराचार्य स्वरूपानंद सरस्वती ने कर दी है जिन्होंने कहा है कि बाबा का साम्राज्य 11 हजार करोड रूपए का है, बाबा रामदेव को भ्रष्टाचार को खात्मे का प्रारंभ अपने घर से करना चाहिए। स्वरूपानंद का यह कहना भी मायने रखता है कि बाबा अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षा के लिए यह सब कर रहे हैं। यहां क्या उनके कार्यकर्ताओं को उनसे नहीं पूछना चाहिए कि बाबा आप रहनुमा थे, आप को तो आगे बढ के गिरफतारी देनी चाहिए थी, आप मर्दानगी छोडकर स्त्रीवेश में भाग गए, हम डंडे खाते रहे, क्या ये सच्ची रहनुमाई है! हालांकि डंडे खाकर भागने वालों में कितने उनके वैचारिक समर्थक थे, कितने योग अनुयायी और उनकी आयुर्वेदिक दवाई बेचने वाले रिटेलर, अभी कहना मुश्किल है, मेरी राय यह भी है कि अगर उनमें ज्यादातर राजनीतिक विचार के समर्थ होते तो भागते नहीं! हां, यह तय है कि राजनीतिक कार्यकर्ता तो उस भीड में न्यूनतम ही होगे वरना राजनीतिक करिअर के लिए डंडे खाकर भी अड़े रहते! &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;क्या बाबा से हमें नहीं पूछना चाहिए कि केवल पांच हजार लोगों के लिए योग शिविर की अनुमति लेकर भी पचास हजार की भीड़ बुलाकर उन्होंने क्या उस सरकारी अनुमति का मजाक नहीं उडाया है, फिर अगर उस भीड़ पर अगर सरकरी कार्रवाई हुई तो बाबा जी दोष केवल सरकार का ही क्यों है! और फिर कुटिल अकेले कपिल सिब्बल ही क्यों है, आप भी तो हैं! वे तो राजनेता है, उनका आचारण तो वैसा ही है जैसा आप या तमाम भारतीय मानते हैं, जिसके लिए हम उन्हें कोसते हैं, पर आपका आचरण भी वैसा ही नहीं है, क्या और आगे जाकर आपका व्यवहार और ज्यादा भारतीय लोकतांत्रिक व्यवस्था जैसा नहीं हो जाएगा! हमें बताइए कि आप उनसे अलग कैसे खड़े हैं! आपसे तो हम और पूरा देश आचारण में शुचिता की उम्मीद करते हैं। क्या ये उम्मीदें बेमानी हैं?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आखिर में, मुझे कह देना चाहिए कि लालू की चिंता वाजिब है, मुझे खुशी है कि देश को नया नेता मिल गया है जिसे देश की चिंता है, राजनीति की पहली परीक्षा उन्होंने ऊंचे दर्जे में पास कर ली है, आत्मप्रचार, मीडिया मोह, गुप्त समझौता, सरकार पर मारने का इल्जाम, मौके के मुताबिक जुबान और वेश बदलने जैसे सारे काम बाबा ने बखूबी किए हैं, नेताओं को अब इसे चुनौती मानना ही चाहिए। बेशक बाबा को बतौर हिंदुस्तानी संविधान के अनुसार राजनीति में आने का हक है, यह सोचना जनता का काम है कि योग के बहाने से वे अपनी राजनीति की नींव डाल रहे थे, ऐसे व्यक्ति को स्वीकारना चाहिए या नहीं! वे सिखा योग रहे थे, पर एजेंडा कुछ और था, और राजनेता राजनीति करते हैं, पर दरअसल कुछ और रहे होते हैं, तो रामदेव भी निश्चित ही प्रकारांतर से वहीं आके खडे हो जाते हैं, आगे से क्या भारतीय हर संत को राजनीति के रंगरूट के तौर पर नहीं देखेगे या उन्हे नहीं देखना चाहिए। हम तो इतना ही कह दें -'' वो सबसे जुदा है तो जुदा ही लगे, वो सबसे खफा है तो खफा ही लगे!'' आमीन!&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/777405477924605622-1254361526671955745?l=dr-dushyant.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://dr-dushyant.blogspot.com/feeds/1254361526671955745/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=777405477924605622&amp;postID=1254361526671955745' title='6 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/777405477924605622/posts/default/1254361526671955745'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/777405477924605622/posts/default/1254361526671955745'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://dr-dushyant.blogspot.com/2011/06/blog-post_07.html' title='रामदेव अन्ना नहीं हैं, ना ही अब बाबा हैं !'/><author><name>DUSHYANT</name><uri>http://www.blogger.com/profile/00269010495016554374</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_N8y3Z3aRBB0/S9bM9k9LOYI/AAAAAAAAAZs/tXTU43tzans/S220/dusht.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/--vwr_H5uMvo/Te3j8_xDJqI/AAAAAAAAAd0/KsYsquAQWxQ/s72-c/baba345.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>6</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-777405477924605622.post-2953273135328999231</id><published>2011-06-05T22:23:00.000-07:00</published><updated>2011-06-06T05:48:50.239-07:00</updated><title type='text'>ज्ञानोदय के जून अंक में शामिल मेरी कहानी</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://3.bp.blogspot.com/-fd9goc51-3o/TexmMKucOII/AAAAAAAAAds/lFMh1aqyooY/s1600/love.jpg"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 400px; height: 289px;" src="http://3.bp.blogspot.com/-fd9goc51-3o/TexmMKucOII/AAAAAAAAAds/lFMh1aqyooY/s400/love.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5614975194647771266" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;उल्टी वाकी धार&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;blockquote&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;’राहुल, तुम अच्छी जरह जानते हो, आय नेवर बिलिव्ड इन प्री-मैरिटल फीजिकल रिलेशंस एंड वी हैड इट’&lt;br /&gt;’यस, आय एडमिट, आपसी समझ और सहमति से ही ना और जब हम सोचते हैं और मानते हैं कि हम शादी कर रहे हैं, वी आर सीरियस अबाउट ईच अदर एंड कमिटेड टू, फिर उसमें बुराई क्या है श्वेता ’&lt;/span&gt;&lt;/blockquote&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दिन के दो बजकर दस मिनट, लंच खत्म होने के तुरंत बाद का समय है। दफतर के ज्यादातर लोग लंच लेकर लौट चुके हैं। विकास सिगरेट पीने रुक गया है तो रीना लंच के बाद सेव का ज्यूस और वर्मा कॉफी के लिए, लगभग 15 मिनट लेंगे अभी और।&lt;br /&gt;’पल-पल दिल के पास तुम रहती हो’&lt;br /&gt;गाना बजा, वह किशोर का हद दर्जे का दीवाना है, अपने मोबाइल की इस रिंगटोन के लिए उसने कहां-कहां नहीं कोशिश की थी।&lt;br /&gt;उसका फोन लगातार बज रहा था, वो कई देर तक फोन सिर्फ इसलिए नहीं उठाता कि गाने का आनंद ले पाये। अकसर पास में बैठे लोग झल्ला जाते हैं,उसकी इस आदत से और उसकी ओर घूरती निगाह से देखते हैं,तब वह एक मुस्कुराहट ऐसे बिखेरता है जैसे कह रहा हो कि यार मैं ऐसा ही हूं, क्या करूं।&lt;br /&gt;इस वक्त कंपनी के अपने ईमेल आई डी पर मेल चेक कर रहा था राहुल। काम में मसरूफ था तो वही प्रिय गाना जैसे उसे चुभ रहा था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;’हू द ब्लडी हेल इज दिस’ कहते हुए आखिरकार उसने फोन उठा ही लिया -&lt;br /&gt;’राहुल, मैं तुमसे तुरंत मिलना चाहती हूँ’&lt;br /&gt;’अभी! अभी पॉसिबल नहीं है यार, अभी लंच से लौटा ही हूं, और बहुत काम है अभी’&lt;br /&gt;’इट्स अर्जेट, आय इमिजिएटली नीड टू टॉक ’&lt;br /&gt;’ऐसा भी क्या है श्वेता, हम आज शाम को मिल रहे हैं ना 7 बजे’&lt;br /&gt;’मैं शाम को नहीं मिल पाऊंगी, और आज ही मिलना बहुत जरूरी है’ उसने 'बहुत' शब्द पर बहुत जोर दिया।&lt;br /&gt;’वाट हैपन्ड, तुम इतनी परेशान क्या हो डियर’ लगभग उतना ही जोर उसने 'इतनी' पर दिया।&lt;br /&gt;’बात है राहुल, सीरियस बात है, फोन पर बिल्कुल भी नहीं बता सकती, जल्दी बताओ कितनी देर में कहां मिल रहे हो, बंक मारो, बॉस को पटाओ, छुट्टी लो, कुछ भी करो, आय जस्ट डोंट नो, जस्ट मैनेज इट’&lt;br /&gt;’ओके, लैट मी ट्राई, आय विल लैट यू नो विदिन मिनट्स’&lt;br /&gt;राहुल सोचता है, दफतर के माहौल की ओर एक नजर डालता है, बहाना तो कोई नहीं चलेगा, बंक भी मुश्किल है, बॉस को कैसे पटाऊँ.... यही एकमात्र रास्ता है....’ इसी उधेड़बुन में राहुल एकदम चौकता है -&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;’या, दैट्स इट, इट विल वर्क डेफिनेटली’&lt;br /&gt;अपने किसी चमत्कारिक किस्म के खयाल के साथ राहुल बॉस के केबिन में दाखिल हो जाता है। उसका बॉस लैपटॉप पर कुछ काम कर रहा था या लग रहा था कि काम में मशगूल है।&lt;br /&gt;’राहुल! जस्ट कम’&lt;br /&gt;’थैंक्यू सर’&lt;br /&gt;’यस राहुल, तुम्हें ही याद कर रहा था, तुम कुछ खास कर रहे हो?’ कुछ और खास शब्दों के बीच अंतराल और  ध्वनि का विस्तार केबिन में गूंज गया।&lt;br /&gt;’नहीं सर, बस यूं ही....’&lt;br /&gt;’गणपति प्लाजा जा सकते हो! मेरे एक दोस्त ने बॉम्बे से कुछ भेजा है’&lt;br /&gt;’सर, श्योर, बट सर....’&lt;br /&gt;’बोलो राहुल, हिचकिचा क्यों रहे हो। कोई गर्लफ्रेंड का चक्कर है क्या? मे आई हेल्प यू, तुम लडकों की यही प्राब्लम है, सालो 1प्यार भी करते हो, फटती भी है ’&lt;br /&gt;’सर, शी इज इन सम प्रॉब्लम, उसे कुछ जरूरी बात करनी है मुझसे, गणपति प्लाजा से पैकेट लेकर उससे मिल लूं, अगर आप परमिट करें तो ?’ हिचकिचाते शरमाते हुए बोल गया राहुल।&lt;br /&gt;’श्योर, राहुल बस इतनी सी बात.... इफ पॉसिबल कंफर्टेबली डू कम अदरवाइज, मेरा पैकेट कल लेते आना ऑफिस आते हुए, गुड लक, ओके’&lt;br /&gt;राहुल मन में सोच रहा था - मेरे आइडिया की जरूरत ही नहीं पडी, वैसे भी यही सोचा था कि कह दूंगा गर्लफ्रेंड से मिलना है, जरूरी काम से, दिन के काम में कुछ बचा नहीं है, पर पता नहीं इससे बॉस कन्विंस होते भी या नहीं, आयआयएम बोम्बे से पास आऊट प्रोबेशनर मैनेजमेंट ट्रेनी भी, तो बॉस की परमिशन को मोहताज है ना.... वो समझती कहां है बेवकूफ, एनी वे आय एम सो लकी, बॉस को शायद ईश्वर ने शायद कोई भविष्यवाणी की हो।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उसने ष्ष्वेता को अपने मोबाइल से रीडायल किया-&lt;br /&gt;’श्वेता, मैकडानल्ड्स में साढ़े तीन बजे मिलते हैं, इज इट ओके’&lt;br /&gt;’श्योर, थैंक्स’ फोन कट गया, राहुल कुछ क्षण मोबाइल को कान से नीचे लाकर उसकी स्क्रीन को यू ही देखता रहा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;राहुल गणपति प्लाजा से बॉस का पैकेट लेते हुए मैक्डॉनल्ड पहुंचता है, दिन काफी गर्म है, मई का पहला हफृता है, इस ष्षहर में मानसून से महीने भर पहले ही तेज गर्मी पडती है। इधर उधर देखता है श्वेता अभी नहीं आई है, अपनी बहुत महंगी सी स्विस वॉच में समय देखता है जिसे पापा ने इसी साल बर्थडे पर गिफ्ट किया था, साढ़े तीन बजने में अभी दस मिनट कम हैं।&lt;br /&gt;....क्यों बुलाया है, ऐसी क्या आफत आ गई, श्वेता भी ना, इतनी दोपहर में बुलाने की क्या जरूरत थी, ये लड़की भी बस पागल ही है.... खुद तो एमएनसी में पीआर मैनेजर है, कैसे भी मैनेज कर सकती है.... ये तो शुक्र है कि बॉस का काम था, वरना कहां आ सकता था, और फिर इसने नाराज होना ही था.... पक्का।....’&lt;br /&gt;राहुल इसी सोच में गुम था विरोधाभासी रूप से मैकडानल्ड्स के शोर में। तभी-&lt;br /&gt;’हे राहुल’  कहते हुए श्वेता धम्म से आके बैठ गई।&lt;br /&gt;’कब से बैठे हो, मुझे देर तो नहीं हुई ना ?’ बनावटी मुस्कुराहट उस लड़की के चेहरे पर साफ झलक रही थी।&lt;br /&gt;’नहीं, मैं ही थोड़ा सा पहले आ गया था,यू आर आल्वेज राइट’ थोडा सा पॉज दिया और बोला ’एंड एट राइट टाइम ’&lt;br /&gt;’ओह’वो थोडा सा सकपका गई, जैसे चोरी पकडी गई हो। उसका अतिरिक्त मेकअप जाहिर हो रहा था,राहुल को इसपे अचरज हुआ पर उसने कुछ कहा नही।&lt;br /&gt;फिर थोडा सहज होने की कोशिश करते हुए उसने अपना हैंडबैग टेबल पर रखा और मोबाइल निकालकर अलग से रख दिया और अपने बालों से क्लचर निकालकर दांतों के बीच दबाया और बालों को फिर से एडजस्ट करते हुए फिर से क्लचर को अपनी जगह पर करीने से बिठा दिया।&lt;br /&gt;’तो क्या लोगी, बाहर बहुत गर्मी है, इजन्ट इट!’&lt;br /&gt;’हां, कोक लूंगी और तुम!’&lt;br /&gt;’मैं भी’ कहते हुए राहुल उठा और सेल्फ सर्विस काउंटर से दो कोक लेकर आया और बैठ गया....बीच में तीन बार टकराते हुए बचा, अजीब सा उहापोह और आशंकाओं से घिरा राहुल।&lt;br /&gt;दोनों के बीच एक मुस्कुराहट की बहुत कुछ कृत्रिम सी एक लकीर का आदान-प्रदान हुआ और फिर एक सन्नाटा सा पसर गया दोनों के बीच, कुछ क्षणों के लिए, मैक्डोनल्ड के भीतर के माहौल में शोर गुल के बीच दो लोगों के बीच पसरा सन्नाटा।&lt;br /&gt;थोडी देर बाद राहुल ने चुप्पी तोड़ी जैसे इतना वक्त मुकर्रर था, किसी स्क्रिप्ट के तहत-&lt;br /&gt;’हां, श्वेता, वाट वैंट राँग, सब ठीक तो है ?’&lt;br /&gt;राहुल, आय एम प्रेगनेंट’ श्वेता ने एकटक बिना पलक झपकाए कहा और राहुल के जवाब की प्रतीक्षा करने लगी।&lt;br /&gt;’वाओ, ग्रेट न्यूज!’राहुल ने तुरंत लपकते हुए कहा।&lt;br /&gt;’सर्टेनली नॉट’ श्वेता के चेहरे के भाव बदल गए और उसने अपने दांये हाथ को क्रिकेट में एम्पायर के चौके के निशान की मुद्रा को आधा अपनाते हुए कहा।&lt;br /&gt;’वाय नॉट, श्वेता! पापा मम्मी 15 तक आ ही रहे हैं और वी विल गेट मैरिड, सिम्पल!’ आश्चर्य, प्रश्न और समाधान की मुद्रा में राहुल ने कहा।&lt;br /&gt;’बट मैं ये बच्चा नहीं चाहती, राहुल’ यानी उसका अपना कोई समाधान था।&lt;br /&gt;’क्या ये बहुत जल्दी है ?’ मैक्डोनल्ड के वातानुकूलित माहौल में भी अपने माथे पर आई पसीने की बूंदों को पोंछते हुए राहुल ने फिर पूछा।&lt;br /&gt;’नहीं, ये बात नहीं है’&lt;br /&gt;’तो, बात क्या है श्वेता!, डॉक्टर्स ने मना किया है क्या!’&lt;br /&gt;’नहीं, राहुल ये बात भी नहीं है’&lt;br /&gt;’तो मैं लडकी चाहता हूं और तुम लडका,अल्टासाउंड की रिपोर्ट में लडकी है, इसलिए!’ राहुल ने मजाक में कहा और माहौल को थोडा सहज बनाने की कोशिश की।&lt;br /&gt;’नहीं, राहुल बी सीरियस, आय एम सीरियस’&lt;br /&gt;’दैन वॉट?’ राहुल ने दांयी हथेली फैलाते हुए कहा।&lt;br /&gt;’राहुल, मैं तुम से शादी नहीं करना चाहती’ श्वेता ने अपनी नजर घुमा ली और फर्श की ओर देखने लगी।&lt;br /&gt;’वॉट, पागल हो गई हो! श्वेता क्या तुम्हारा दिमाग खराब हो गया है! ’ और राहुल की आवाज का वॉल्यूम बढ गया।&lt;br /&gt;’राहुल, सुनो मेरी बात, सुनो तो सही।’&lt;br /&gt;’ओके, स्पीक आउट!’ और उसने अपनी नजरें श्वेता के चेहरे पर केन्द्रित कर लीं।&lt;br /&gt;’मुझे नहीं लगता राहुल कि हम एक दूसरे के लिए बने हैं, सिंपली वी आर नॉट मेड फॉर ईच अदर।’ कहकर वो चुप सी हो गई।&lt;br /&gt;’पर मुझे नहीं लगता कि ऐसा है श्वेता, वी नो ईच एंड एवरीथिंग अबाउट ईच अदर, एक दूसरे को समझते हैं, पिछले एक साल से एक दूसरे को जानते हैं, वी हैड इन्टीमेसी एंड....’&lt;br /&gt;’राहुल, तुम अच्छी जरह जानते हो, आय नेवर बिलिव्ड इन प्री-मैरिटल फीजिकल रिलेशंस एंड वी हैड इट’&lt;br /&gt;’यस, आय एडमिट, आपसी समझ और सहमति से ही ना और जब हम सोचते हैं और मानते हैं कि हम शादी कर रहे हैं, वी आर सीरियस अबाउट ईच अदर एंड कमिटेड टू, फिर उसमें बुराई क्या है श्वेता ’&lt;br /&gt;’ऐसा तुम सोचते हो राहुल, मै नहीं, और भी खास बात ये कि शुरूआत तुमने की!’&lt;br /&gt;’बट यू डिडन्ट अपोज!’&lt;br /&gt;’हां, मैं भी इंसान हूँ, इमोशन लैस तो नहीं हूँ ना...., पर मुझे लगता है, ये नहीं होना चाहिए था और आय टेक इट एज यू डिडन्ट केयर फॉर माय फीलिंग्स एंड प्रिसिंपल्स’ श्वेता नीचे फिर से फर्श की ओर देखते हुए बोली। मिटटी होती तो कुरेद डालती पांव से। ऐसा लग रहा था कि रेस्तरां का फर्श ही ना चटक जाए कहीं।&lt;br /&gt;’बट दिस इज अवर चाइल्ड श्वेता’ राहुल उसकी आंखों में झांकने की कोशिश कर रहा था।&lt;br /&gt;’हां, है पर मैं नहीं चाहती कि एक जिंदगी भर का रिश्ता इस हालत में बने।’&lt;br /&gt;’क्यों नहीं श्वेता, क्यों नहीं ?’ राहुल थोड़ा उत्तेजित होते हुए बोला।&lt;br /&gt;मैं इस मानसिकता में नहीं जीना चाहती कि मेरा बच्चा मेरे प्री-मैरिटल फीजिकल रिलेशन की पैदाइश है और ये भी कि मुझे उसको सही ठहराने के लिए शादी करनी पडी, जिंदगी भर इस फीलिंग के साथ नहीं जी सकती मैं ’&lt;br /&gt;श्वेता, पहली बार मुझे यह लग रहा है और डीपली लग रहा है कि हम कितना अलग-अलग सोच रहे हैं?’&lt;br /&gt;’दैट्स इट, यस राहुल, तुम गलत नहीं हो, मैं भी गलत नहीं हूँ, बट आय एम हैल्पलैस, तुम मुझे कंजरवेटिव कह सकते हो, ये कंजरवेटिव होने या न होने की बात नहीं है, आय डोंट वांट माई रिलेशनशिप ऑन द ग्राउंड ऑफ रिग्रेट। मुझे पता है तुम कहोगे - तुम प्यार करते हो, या मैं तुमसे प्यार करती हूँ, पर राहुल क्या कोई प्यार का रिश्ता बिना फीलिंग्स और प्रिसिपल्स की केयर के हो सकता है, मैं तुम पर कोई इल्जाम नहीं लगा रही हूं, बट.... ये हमारे नजरिए का फर्क हो सकता है.... यू मे बी नॉट राँग, बट आय एम ऑल्सो राइट एट माइ साइड’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;श्वेता की आंख में से कुछ आंसू बहे, जिन्हें तुरंत श्वेता ने अपने हैंकी में संभाल लिया, जैसे कुछ हुआ ही ना हो। हैंकी गीला हो गया था,और उसने उसे बहुत सलीके से अपने पर्स में सहेज लिया, शायद इस रिश्ते की आखिरी निशानी के बतौर।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;’श्वेता, तुम फैसला ले चुकी हो और यू जस्ट वांटेड टू शेयर इट विद मी?’ राहुल ने एकटक देखते हुए पूछने के लहजे में कहा और दोनों हाथ हवा में खोल दिए।&lt;br /&gt;’राहुल, हां और मुझे पता है तुम थोड़ा सा भी मुझे प्यार करते हो तो मेरे फैसले को  समझोगे और मानोगे भी’&lt;br /&gt;’और रास्ता भी क्या है या क्या हो सकता है, इफ यू हैव ऑलरेडी डिसाइडेड?’ राहुल ने पुराने मुहावरे वाली खिसियानी सी मुस्कुराहट से कहा।&lt;br /&gt;दोनों की बीच एक सन्नाटा सा पसर गया, कुछ मिनटों के लिए।&lt;br /&gt;कोक आकर कब का गर्म हो चुका था, दो लोगों के बीच कितना कुछ ठंडा-गर्म हो रहा था -&lt;br /&gt;’शाम को 7 बजे मेरा डॉक्टर से अपांइटमेंट है, आय एम गोइंग फॉर एबॉर्शन ’ श्वेता ने मौन तोडते हुए कहा। राहुल चुप था,जैसे उसके पास कहने को कुछ बचा ही नहीं था, या कहने को था बहुत पर उसे लग रहा था कि कहना यकीनन बेमानी है। दोनों के कदम जैसे ठिठके हुए थे, खडे होकर जाने की पहल कौन करे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैकडोनल्ड का शोर अब भी वैसा ही था, भीड में किसी को पता नहीं था कि उनके पास वाली इस टेबल पर कितने तूफान आ के गुजर गए हैं.... चुपचाप....।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/777405477924605622-2953273135328999231?l=dr-dushyant.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://dr-dushyant.blogspot.com/feeds/2953273135328999231/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=777405477924605622&amp;postID=2953273135328999231' title='6 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/777405477924605622/posts/default/2953273135328999231'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/777405477924605622/posts/default/2953273135328999231'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://dr-dushyant.blogspot.com/2011/06/blog-post.html' title='ज्ञानोदय के जून अंक में शामिल मेरी कहानी'/><author><name>DUSHYANT</name><uri>http://www.blogger.com/profile/00269010495016554374</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_N8y3Z3aRBB0/S9bM9k9LOYI/AAAAAAAAAZs/tXTU43tzans/S220/dusht.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/-fd9goc51-3o/TexmMKucOII/AAAAAAAAAds/lFMh1aqyooY/s72-c/love.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>6</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-777405477924605622.post-812270538242782797</id><published>2011-05-23T04:37:00.000-07:00</published><updated>2011-05-23T04:39:59.719-07:00</updated><title type='text'>''दूसरों के अंतस से जोड़ती है कविता''</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://1.bp.blogspot.com/-rNhbw-p-6E4/TdpHTP_sjvI/AAAAAAAAAdg/jxfeHYNZcw8/s1600/ingrid.jpg"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 275px; height: 183px;" src="http://1.bp.blogspot.com/-rNhbw-p-6E4/TdpHTP_sjvI/AAAAAAAAAdg/jxfeHYNZcw8/s400/ingrid.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5609874681880153842" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;&lt;blockquote&gt;इंग्रिड स्टोरहॉमेन  भारत दूसरी बार आई हैं, उन्होंने तुलनात्मक  साहित्य की पढ़ाई की है, दो कविता संग्रह आ चुके हैं। एक कथात्मक रिपोर्ताज लिखा है चेर्नोबिल पर, जिस पर  उन्हेंं नार्वे का प्रतिष्ठित सुल्ट सम्मान प्राप्त हुआ है..&lt;/blockquote&gt;.&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;काफी हाउस की आखिरी टेबल, जहां से स्मोकिंग जोन शुरू होता है, अपने लैपटॉप पर तेजी ग्रोवर की कविताओं का अनुवाद करते  हुए थमी इंग्रिड स्टोरहॉमेन को एक सिगरेट ब्रेक की जरूरत थी। मुझे ऑफर किया तो मैंने जवाब दिया कि मैं खुशकिस्मत नहीं हूं। मेरी बात के जवाब में उनका ठहाका धुएं के छल्लों में घुल-मिलकर उस टेबल पर बिखर गया और गंध ने मुझे भी अपने आगोश में ले लिया। पड़ोस की टेबल पर कुछ किशोरों का समूह अठखेलियों, शरारतों में मुब्तिला है और अगली टेबल पर एक युवा जोड़ा जेरेबहस है। उस हंसी में शामिल था बहुत कुछ। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वह इंग्रिड हैं, भारत दूसरी बार आई हैं, उन्होंने तुलनात्मक साहित्य की पढ़ाई की है। दो कविता संग्रह आ चुके हैं, एक कथात्मक रिपोर्ताज लिखा है चेर्नोबिल पर, जिस पर उन्हें नार्वे का प्रतिष्ठित सुल्ट सम्मान दिया गया है। सुल्ट का अर्थ है- भूख। सुल्ट दरअसल नार्वे के नोबेल विजेता लेखक हाम्सुन का चर्चित उपन्यास है, जिसके नाम पर ये सम्मान दिया जाता है। वो अपने बारे में बताती हैं कि ओस्लो में छ: साल तक कॉलेज की पढ़ाई की, अब पूर्णकालिक लेखक हैं, पिछले दस साल से, चार किताबें और फिलहाल एक उपन्यास कुछ अनुवाद और कुछ छिटपुट काम में लगी हैं। नार्वे सरकार की एक राइटर फैलोशिप पर भारत आई हैं और इसके तहत एक किताब लिख रही हैं। भोपाल में कई भारतीय कवियों को वह सुन आई हैं, कोलकाता घूम लिया है, ईसाई मिशनरियों के काम, उनकी कार्य शैली और विरासत से प्रभावित हुई हैं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वे बताती हैं कि उनका दूसरा कविता संग्रह फॉर्म आधारित कविताओं का संग्रह है अब उन्होंने भारतीय कवियों का अनुवाद भी शुरू किया है उनमें पहला नाम तेजी ग्रोवर का है। मैं उनसे पूछ बैठता हूं कि भारतीय और नार्वेजियन कविताओं में क्या अंतर पाया है तो वे सोच में पड़ गईं। मुझे लगा कि मैंने जल्दबाजी की है, जबकि इंग्रिड ने अभी भारतीय कविताओं से साक्षात्कार किया ही है, पर उसने जो जवाब दिया वह यह था -'' मुझे लगता है कि नार्वे की कविताएं ज्यादा अंतर्मुखी और राजनीतिक है। मुझे लगा कि भारतीय कवि फिजिकल कविता को ज्यादा पसंद करते हैं। हालांकि इसे मेरा शुरुआती निर्णय भी कहा जा सकता है और संभव है कि कुछ और कवियों को पढऩे के बाद मेरी धारणा पूरी तरह बदल जाए।'' &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस समय मुझे महसूस होता है कि सही समय है, जब मुझे इंग्रिड से उनके पसंदीदा कवियों के बारे में और उनकी पसंदीदा कविता के बारे में पूछ लेना चाहिए, मैं पूछ लेता हूं तो वे कहती हैं -'' ग्रीक माइथोलॉजिकल कविताएं मुझे प्रिय हैं वहीं रिल्के और  मारिना स्वेतायेवा भी मेरी पसंद में शामिल हैं।'' थोड़ा रुककर वह कहने लगती हैं कि दरअसल मुझे लगता है कि कविता मेरे अंतस को दूसरों के अंतस से जोड़ देती है। जब इसके बाद उन्होंने यह कहा कि उसे बौद्धिक तत्वमीमांसीय कविताएं पसंद हैं, तब  मुझे लगा कि जरूर वह दर्शन की छात्रा रही हैं तो उसने कहा -'' कुछ औपचारिक, कुछ अनौपचारिक। कविता और भाषा उसे जीने के लिए जगह उपलब्ध कराते हैं, शायद मन का सा जीवन, जो अन्यथा असंभव सा हो।'' शायद सब लेखक और कवि ऐसा ही चाहते हैं, इंग्रिड फिर कहां अलग हैं। वह भी सच्ची और पक्की कवयित्री हैं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उनकी पहली सिगरेट कब की खत्म हो चुकी थी, मुझे पता ही नहीं चला, अब इंग्रिड दूसरी के लिए व्याकुल थीं।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/777405477924605622-812270538242782797?l=dr-dushyant.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://dr-dushyant.blogspot.com/feeds/812270538242782797/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=777405477924605622&amp;postID=812270538242782797' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/777405477924605622/posts/default/812270538242782797'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/777405477924605622/posts/default/812270538242782797'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://dr-dushyant.blogspot.com/2011/05/blog-post_23.html' title='&apos;&apos;दूसरों के अंतस से जोड़ती है कविता&apos;&apos;'/><author><name>DUSHYANT</name><uri>http://www.blogger.com/profile/00269010495016554374</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_N8y3Z3aRBB0/S9bM9k9LOYI/AAAAAAAAAZs/tXTU43tzans/S220/dusht.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/-rNhbw-p-6E4/TdpHTP_sjvI/AAAAAAAAAdg/jxfeHYNZcw8/s72-c/ingrid.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-777405477924605622.post-5116346122191593588</id><published>2011-05-21T03:00:00.000-07:00</published><updated>2011-05-21T03:05:12.672-07:00</updated><title type='text'>2050 तक भारत का विभाजन जातीय आधार पर हो जाएगा! /  बेहतर दुनिया एक असंभव ख्वाब है !</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://1.bp.blogspot.com/-70iL3aBsYzA/TdeN3A-zeQI/AAAAAAAAAdY/E3awi8RY2yA/s1600/caste.gif"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 295px; height: 362px;" src="http://1.bp.blogspot.com/-70iL3aBsYzA/TdeN3A-zeQI/AAAAAAAAAdY/E3awi8RY2yA/s400/caste.gif" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5609107837208983810" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;&lt;blockquote&gt;जातीय गणना की परिणति जो मुझे नजर आती है वह यह है कि किसी भी विधानसभा या संसदीय क्षेत्र में आनुपातिक रूप से कम जनसंख्या वाली जाति के लोग कभी प्रतिनिधि नहीं हो पाएंगे क्योंकि कोई राजनीतिक दल उन्हें टिकट ही नहीं देगा...&lt;br /&gt;इन हालात में 2050 तक भारत को कई विभाजनों के लिए तैयार रहना चाहिए, और तब विभाजन के आधार धर्म नहीं, जातियां होंगी!&lt;/blockquote&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब साधु भी जाति वाले होते हैं, हमारे समय के एक लोकप्रिय संत कैंसर का इलाज करते हैं, मगर जाति उनके नाम के साथ संत होने के बावजूद जुड़ी है, जो जातीय बोध से मुक्त नहीं हो पाए, मुझे माफ करें वे कितने संत हुए हैं, मेरी चिंता और जिज्ञासा है! यह अब सिद्ध और प्रसिद्ध है कि राजनीति की अस्तित्वमूलक जरूरत है जाति, पर दुख तब होता है जब बौद्धिक लोग आर्थिक स्थितियों के अंदाजे के लिए सामाजिक आधार की गणना को सही ठहराते हैं। मुझे क्षमा कीजिए, इतिहास का छात्र होने ने यह समझ दी है कि धर्म ने आर्थिक आधार पर समाज का बंटवारा किया और उसका आधार कर्म था और समय के साथ उसका आधार जन्म हो गया। अब अगर आर्थिक जरूरत से गणना करनी है तो आर्थिक गणना ही कर लीजिए साहेब! दूसरा यह कि मुझे समतामूलक समाजवादी समाज की कल्पना में जाति की यह निरंतरता बाधा नजर आती है, भारत के लिहाज से कहा जाए तो पूर्व वैदिक युग जिसे ऋग्वैदिक युग भी कहा जाता है, केवल कर्म आधारित वर्ण थे जो उत्तरवैदिक युग में जन्म आधारित हो गए। कहना जरूरी है कि ऋग्वैद के पुरुष सूक्त में आदि पुरुष के अंगो से वर्ण उत्पत्ति को भास शास्त्रीय आधार पर बाद में जोड़ा गया स्वीकार किया गया है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अगर जातीय गणना को स्वीकार करने का कारण हम यह मानते हैं कि यह भारतीय समाज की कड़वी सचाई है, तो धर्म इससे पहले का सच है और धर्म के अन्यायों को भी हमें कड़वा सच मानकर स्वीकार लेना चाहिए और सामाजिक विभेद को भी मान लेना चाहिए, और उसकी निरंतरता में कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए। मुझे हैरानी के साथ दुख है कि हमखयाल वामपंथी दोस्त भी इसके समर्थन में दिख रहे हैं, ऐसी संस्थागत पैदाइश जिसका जनक धर्म है, उसे कैसे स्वीकार पा रहे हैं, फिर धर्म को भी स्वीकार करना चाहिए, क्या यह धार्मिक स्वीकार बाबा माक्र्स की सोच से विरोधाभासी नहीं है! &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुझे यह भी प्रकारांतर से लगता है कि सामाजिक सुधार की एनजीओवादी एजेंडे की जरूरत भी जातीय निरंतरता है। संभव है कि गांधी द्वारा जन्म आधारित जाति व्यवस्था का समर्थन करना उनकी भी राजनीतिक मजबूरी हो, जिसका अंबेडकर ने विरोध किया था, यह एक ऐतिहासिक सच और तथ्य है। इस जातीय गणना की परिणति जो मुझे नजर आती है वह यह है कि किसी भी विधानसभा या संसदीय क्षेत्र में आनुपातिक रूप से कम जनसंख्या वाली जाति के लोग कभी प्रतिनिधि नहीं हो पाएंगे क्योंकि कोई राजनीतिक दल उन्हें टिकट ही नहीं देगा, और फिर मतदान व्यवहार भी उत्तरोत्तर इसे प्रगाढ़ करेगा, कहिए कि क्या मैं गलत सोचता हू! &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जिन लोगों की आंखों में बेहतर दुनिया का सपना अब भी झिलमिलाता है, बेहतर दुनिया का मतलब बिना हमारी रेशियल, एथ्नीकल पहचान के, समान वजूद और व्यवहार के साथ जी पाना है, उनके लिए भारत एक भौगोलिक संभावना बचा है, सेवा में सविनय निवेदन है कि अब मुझे नहीं लगता। अब भारत में जाति छोड़ो, भारत जोड़ो के नारे शायद ही कभी सुनाई दें। खुदा न करे, पर इन हालात में 2050 तक भारत को कई विभाजनों के लिए तैयार रहना चाहिए, और तब विभाजन के आधार धर्म नहीं, जातियां होंगी!&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/777405477924605622-5116346122191593588?l=dr-dushyant.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://dr-dushyant.blogspot.com/feeds/5116346122191593588/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=777405477924605622&amp;postID=5116346122191593588' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/777405477924605622/posts/default/5116346122191593588'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/777405477924605622/posts/default/5116346122191593588'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://dr-dushyant.blogspot.com/2011/05/blog-post.html' title='2050 तक भारत का विभाजन जातीय आधार पर हो जाएगा! /  बेहतर दुनिया एक असंभव ख्वाब है !'/><author><name>DUSHYANT</name><uri>http://www.blogger.com/profile/00269010495016554374</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_N8y3Z3aRBB0/S9bM9k9LOYI/AAAAAAAAAZs/tXTU43tzans/S220/dusht.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/-70iL3aBsYzA/TdeN3A-zeQI/AAAAAAAAAdY/E3awi8RY2yA/s72-c/caste.gif' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-777405477924605622.post-6797096404136074969</id><published>2011-04-25T00:50:00.000-07:00</published><updated>2011-04-25T00:58:05.438-07:00</updated><title type='text'>एक दोपहर मिली, धूप की शॉल ओढ़े</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://2.bp.blogspot.com/-rw_X89JL-d0/TbUpX4fvmxI/AAAAAAAAAdQ/X4ujnMbL1fY/s1600/khanmarketl.jpg"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 400px; height: 267px;" src="http://2.bp.blogspot.com/-rw_X89JL-d0/TbUpX4fvmxI/AAAAAAAAAdQ/X4ujnMbL1fY/s400/khanmarketl.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5599427201984338706" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;&lt;blockquote&gt;यह भारत मुझे अलग भारत दिखता है, अतिरिक्त अभिजात्यता हवा में है, मेरे अगल बगल से गुजरते उन संपन्न भारतीयों का अतिरिक्त गोरापन और चमकदार त्वचा मुझे आतंकित करते है। मुझे एक घबराहट सी होनी शुरू हो जाती है।&lt;/blockquote&gt; &lt;/span&gt; &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह खान मार्केट है, दक्षिणी दिल्ली का एक नामचीन इलाका, कई सर्वे के मुताबिक सबसे महंगा बाजार भी, इंडिया गेट से थोड़ा ही दूर शाहजहां रोड़ से आगे जाने पर पृथ्वीराज रोड़ से इसके लिए रास्ता जाता है तो पहले पृथ्वीराज मार्केट भी है, एक ओर रोशनी का बाजार है, और यह अब्दुल गफ्फार खान के नाम पर बसाया गया खान मार्केट है, बड़ी सी पार्किंग है, तीन बजे हैं, मैं एक पीपल के पेड़ के नीचे खड़ा हूं, एक चबूतरा उसे घेरे हुए हैं, जिसमें राम-सीता-लक्ष्मण की पारंपरिक सी तस्वीर है तो एक साईं बाबा भी विराजमान हैं, लगता है कि दोनों ने धूप के कई युग झेले हैं, तो भगवान शिव की एक छोटी सी मूर्ति है, उसके नीले रंग का धुंधला होना इसकी कालिक प्राचीनता बताता है। सामने बड़ का पेड़ है, बड़ की ओट में एक ठेला है जिसपे इस तपती गर्मी में ठंडा पानी और किस्म किस्म के पेय हाजिर हैं, आप प्यास बुझा सकते हैं।&lt;br /&gt;एक फिरंगी बुजुर्ग जोड़ा दिखता है, वे पर्यटक प्रतीत नहीं होते, कारोबारी लगते हैं, कारोबार कहां- कहां पहुचा देता है, वाकई! मर्द की अतिरिक्त सफेद शर्ट और बहुत करीने और नफासत से उसे पतलून में पैबस्त किया हुआ होना यही तो प्रकट करता है। तनिक सीढिय़ों से उतरते वक्त महिला ने अपना हाथ उसे दे दिया है, जरूरत शायद ना भी हो बस प्यार ही लगता है मुझे यह! मैं एक साइबर कैफे की तलाश में हूं, मैं उस बुक शॉप की तलाश भी अनजाने में साथ- साथ करता हूं जिसका खुशवंत सिंह अक्सर जिक्र करते हैं, जहां एक प्रेम कहानी शुरू हुई थी, सरहदों के पार फैली हुई, जिसके पात्र नामवर लोग हैं, पर मुझे साइबर कैफे और वह तारीखी बुक शॉप दोनों ही नहीं मिले। मैं एक ऐसे कोने में पहुचता हूं, जहां स्टेशनरी की दुकान है उसके सामने ठीक वैसा ही ठंडे पेय का ठेला है, उसके गिर्द दिल्ली के युवा दिखते हैं, दो आधुनिक लडके, बेतरतीब से जींस टी-शर्ट में, बिखरे बाल एक अदा से लगते हैं, एक के हाथ में स्प्राइट है, दूसरे के हाथ में सिगरेट, लड़की थोड़ी सांवली है, उसकी आंख का काजल बहुत गहरा है, फेबइंडियानुमा कूल-कूल सा हरे रंग का कुर्ता है स्लीवलैस, एक काला बैग कांधे से लटका हुआ है, उसके दाहिने हाथ में लंबी सी सिगरेट है, उसकी अंगुलियों से लंबी! उन बीस—बाइस साल के इन तीनों युवाओं की मस्ती और आपस में खोया होना मुझे खास लगता है। मुझे उन पर बहुत प्यार आता है।   &lt;br /&gt;कुछ क्षण उनके साथ बेखयाली में बिताकर आगे बढता हूं, मेगजीन, बेकरी, फूल, होमफर्निशिंग की दुकानें हैं, डेढ दशक महानगरीय जीवन जी चुकने के बाद भी मुझे अपना गंवईपन साफ महसूस होता है। यह भारत मुझे अलग भारत दिखता है, अतिरिक्त अभिजात्यता हवा में है, मेरे अगल बगल से गुजरते उन संपन्न भारतीयों का अतिरिक्त गोरापन और चमकदार त्वचा मुझे आतंकित करते हंै। मुझे एक घबराहट सी होनी शुरू हो जाती है। मैं तेज कदमों से आगे बढ़ जाता हूं।&lt;br /&gt;दुकानों की कतार जहां खत्म होती है, रुक जाता हूं, मेरे माथे पे पसीने की बूंदें हैं, रुमाल निकालता हूं, पोंछता हूं, एक साइकिल सवार दिखता है, उसने साइकिल को सामने की दीवार से सटका दिया है, कुरियर वाला है, अपने हाथ में कई पैकेट लिए है, एक नजर पैकेट पर एक नजर दुकानों के साइनबोर्ड की ओर डालता हुआ चलता है, मुझे डर लगता है कि कहीं किसी अभिजात्य से टकरा गया तो! मेरा उससे बात करने का मन हुआ, पूछ लिया —भैया, दिल्ली के हो! उसने जवाब दिया— ना जी, बाबूजी! मैंने पलटके पूछा— तो! वह बोला— जी, हिसार के पास गांव है जी मेरा। मैंने कह दिया कि मेरे भी दोस्त रिश्तेदार है वहां तो! वह सहज हो गया। मैंने पूछा— कब से हो दिल्ली में ! तो बोला— कोई आठ बरस हो लिए। उससे मेरा अगला सवाल था— यही कर रहे शुरू से! ना जी ! तीसरा काम है जी! कमाई ठीक हो जाती है! धंधा क्यों बदलता जी! तो इससे! इससे भी यही हाल है जी! भाईसाहब, डाक बांट लूं, देर हो रही है, कहकर उसने मेरी इजाजत का इंतजार नहीं किया और आगे बढ़ गया! उसके  शब्दों से लगता है कि उसकी जिंदगी आठ साल से वैसी ही है, पर उम्मीद है कि मरती नहीं, बेहतर जिंदगी का ख्वाब होगा या वजूद बनाए रखने की जददोजहद, दोनों मे से कोई एक चीज होगी जो उसे दिल्ली में टिकाए हुए है।&lt;br /&gt;उस छांव वाले कोने में तभी तीक्ष्ण गंध का भभका आया, यह किसी डियोडरेंट की खुशबू थी, जो मेरे नाक तक बेसाख्ता आ गई थी, देखा तो एक अधेड़, बेहद नफासत पसंद औरत मेरे करीब से गुजरी थी, उसका परिधान और उसके जिस्म के खुले भाग को मुझे यहां शब्द देने की हिम्मत नहीं हो रही है। तभी मेरा मोबाइल बजा, मुझे लेने टैक्सी आ गई है, दोपहर अब मेरे लिए घोर असहनीय थी। तेज धूप की शॉल ओढ़े एक बेरहम सी दोपहर!&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/777405477924605622-6797096404136074969?l=dr-dushyant.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://dr-dushyant.blogspot.com/feeds/6797096404136074969/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=777405477924605622&amp;postID=6797096404136074969' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/777405477924605622/posts/default/6797096404136074969'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/777405477924605622/posts/default/6797096404136074969'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://dr-dushyant.blogspot.com/2011/04/blog-post_25.html' title='एक दोपहर मिली, धूप की शॉल ओढ़े'/><author><name>DUSHYANT</name><uri>http://www.blogger.com/profile/00269010495016554374</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_N8y3Z3aRBB0/S9bM9k9LOYI/AAAAAAAAAZs/tXTU43tzans/S220/dusht.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' 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style="font-weight:bold;"&gt;बिनायक सेन को देशद्रोही मानने से इनकार करते हुए भारत की अदालते आला का यह कहना बहुत मायने रखता है कि किसी के घर में नक्सली साहित्य मिल जाने से वह नक्सली ठीक वैसे ही नहीं हो जाता जैसे गांधी की आत्मकथा रख लेने मात्र से कोई गांधीवादी।&lt;/span&gt; &lt;/blockquote&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बिनायक सेन के बहाने कितना कुछ कहा जा सकता है ठीक वैसे ही जैसे अन्ना हजारे के बहाने।  जब कभी इक्कीसवी सदी के दूसरे दशक का इतिहास लिखा जाएगा तो कहा जाएगा कि यह अन्ना और बिनायक का समय था जिसमें इरोम शर्मिला भी थी, और तीनों के साथ देश का सुलूक अलग अलग था। बिनायक सेन को लेकर भारत की अदालते आला का फैसला और उसकी भाषा दोनों ही महत्वपूर्ण हैं, आला अदालत का यह कहना बहुत मायने रखता है कि किसी के घर में नक्सली साहित्य मिल जाने से वह नक्सली ठीक वैसे ही नहीं हो जाता जैसे गांधी की आत्मकथा रख लेने मात्र से कोई गांधीवादी। इस अहम फैसले के बाद आज क्या यह नहीं सोचना चाहिए कि आजाद भारत का सबसे बडा इतिहासकार रामचंद्र गुहा और अर्थशास्त्री आद्रे बेते क्यों उनके साथ खडे थे। क्यों दुनिया भर के बुद्धिजीवियों ने उनका समर्थन किया उनमें अमत्र्य सेन जैसे दर्जनों नोबेल पुरस्कार विजेता थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेरी पहली अनौपचारिक मुलाकात बिनायक सेन से कोई दस बरस पहले शायद जेएनयू के ब्रह्मपुत्रा छात्रावास में हुई थी, यह एक सार्वजनिक मुलाकात थी, जब वे मैस में बुलाए गए थे, जब मैं करोलबाग के एक सस्ते से होटल में अपने एक ब्रिटिश रिसर्च स्कॉलर दोस्त के साथ रुका था और राष्ट्रीय अभिलेखागार की अपनी तय दिनचर्या को तोडक़र दिल्ली की सर्दी में दो बसें बदलकर उन्हें सुनने पहंचा था, हालांकि ठीक-ठाक सी व्यक्तिगत मुलाकात इसके सालों बाद हाल ही कुछ महीनों पहले जयपुर में पीयूसीएल के एक आयोजन में हुई। तब तक पिछली मुलाकात धुंधली हो गई थी, देखना भर जेहन में अटका हो तो बहुत, पर अब जो चेहरा सामने था, वक्त के निशान उस चेहरे पर कुछ इस तरह से थे कि शक्ल के नक्श बदल गए थे, कि चेहरा नया सा था।  मेरा बहुत मन था कि उनके नक्सली संपर्को पर उनसे तीखे सवाल करूं कि क्यों वे मासूम मनुष्यों को मारने वाले लोगों के साथ खड़े नजर आते हैं? पर मैं स्वीकार करता हूं कि उनकी मासूमियत और सहज मानवीयता ने मुझे वे क्रूर सवाल करने से रोक दिया। हालांकि बहुत से मित्र लोग सेन की इस मासूमियत के दूसरे अर्थ निकाल सकते हैं, निकालेंगे ही, और निकालना उनका लोकतांत्रिक अधिकार भी है। पर क्या यही अधिकार सेन को दिया जाता है, यकीनन नहीं! उनसे मैंने पूछा- 'क्या योजना है? कल को किस उम्मीद से देखते है?' तो उनका जवाब था- 'जी पाना और बेहतर दुनिया के लिए खड़े लोगों का साथ देने की कोशिश करना।' ..&lt;br /&gt;फिर कुछ समय बाद उनकी यह गिरफ्तारी हो गई और उसके बाद जो कुछ हुआ वह सब अखबारों में दर्ज है ही।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुझे कहने में शर्म नहीं है कि कुछ महीनों पहले जब बिनायक सेन की पत्नी और बेटी जयपुर आए तो  सामाजिक कार्यकर्ता और बिनायक समर्थक उनसे मिले, उनकी भीड़ के पीछे मैं भी कहीं खड़ा था, तब भी मेरा नैतिक समर्थन उन्हें था, जब मुख्य धारा का मीडिया उनके पक्ष में खड़ा होने से कतरा रहा था या उसकी जुबान बिनायक को लेकर कमोबेश वही थी जो उसे गिरफ्तार करने वाली पुलिस की थी या तदंतर सरकार की थी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;विश्वकप जीतने के उन्माद में डूबे देश को टीआरपी ढूंढते मीडिया ने अन्ना से मिलवा दिया, क्या अजीब बात नहीं है कि जो लोग पत्रकार सरकार विरोधी होने को देशद्रोह कहते थे, अन्ना के पक्ष में खडे हो गए जबकि अन्ना भी सरकार का ही विरोध कर रहे थे। संयोग ही है कि कोई सरकार विरोधी होकर नायक हो जाता है कोई खलनायक की हद तक खड़ा कर दिया जाता है बिनायक को खलनायक की हद तक ले जरने का तार्किक आधार यह दिया गया कि वे नक्सली समर्थक हैं और नक्सली सरकार विरोधी हैं, अब सर्वोच्च न्यायालय का यह कहना कि नक्सल समर्थन भी देशद्रेह नहीं है, बहुत बहुत मायने रखता है, यह अपने आप में एक नजीर है और भारतीय लोकतंत्र की ताकत भी। हालांकि संभावना थी भी और ऐसा हुआ भी कि बिनायक को फांसी चढ़1ने की मंशा रखने वाले लोग देशद्रोह के कानून को ही बदलवाने की मांग करेगे और ऐसी आवाजें उठने लगी हैं। यह फैसला इस लिहाज से भी देखे जाने की जरूरत है कि सरकार और देश में अंतर होता है और पुलिस ट्रायल खतरनाक होता है, पुलिस की बात को अक्षरश: स्वीकारना सरकार और मीडिया देानों के लिए ठीक नहीं है, उसके आधार पर बात करें तो एक मासूम सा सामान्यीकरण करने की गुस्ताखी करने की इजाजत दें कि पुलिस की नजर में क्या हर व्यक्ति अपराधी, हर स्त्री चरित्रहीन, हर संबध अवैध संबध नहीं होता है, ऐसा पुलिस महकमे में आला अफसर दोस्तों के मुख से भी सुना है कि क्या करें यार, ना चाहते हुए भी सोच लगभग ऐसी ही हो जाती है। पुलिस से आगे बढकर, मुझे एक भारतीय के रूप में कह और स्वीकार कर लेना चाहिए कि सामान्यीकरण करने की हड़बड़ी में कितने ही गलत निष्कर्ष निकाल लिए जाते हैं हालांकि दार्शनिक भाषा में यह भी एक सामान्यीकरण ही है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तारीख गवाह है कि दुनिया में कितने ही उदाहरण है जब दार्शनिकों, लेखकों, कलाकारों को सरकार विरोधी कहकर जेलों में डाला गया। और ऐसे मामलों में प्राय: और बार- बार यह स्थापित हुआ है कि सरकार विरोधी होने और देश विरोधी होने में अंतर होता है, तानाशाह तो अपने खिलाफ को ही देश विरोधी मान लेते हैं क्योंकि अपने आप में वहीं स्वयंभू देश होते है। निसंदेह भारत में ऐसे उदाहरण कम है सिवाय एमरजेंसी के, तो यह उदाहरणों की अनुपलब्धता बनी रहे हमें ऐसी ईश्वर से प्रार्थना और हमें आपस में ऐसी कोशिश करनी चाहिए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उम्मीद करें कि बिनायक के बाद पुलिस हर सरकार विरोधी को नक्सल समर्थक को देशद्रोही नहीं मानेगी और पुलिस के बयान और निष्कर्ष को मीडिया के लोग अंतिम सत्य नहीं मानेगे, (जबकि हम देखते हैं किसी भी अपराध समाचार में एक ही नजरिया होता है जो कि पुलिस की नजरिया होता है ) हम भारत को एक दुनिया का सबसे बडा ही नहीं परिपक्व और बेहतर लोकतंत्र भी कह सकेगे। आखिर में बिनायक की तरह देशद्रोह के आरोप में पड़ौसी मुल्क पाकिस्तान की जेल में बंद रहे फैज अहमद फैज जिनकी इस साल पूरी दुनिया में जन्म शताब्दी मनाई जा रही है, के शब्द याद कर लें- ''अब वही हर्फे जुनूँ सबकी जुबां ठहरी है, जो भी बात निकली है, वो बात कहां ठहरी है।''&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/777405477924605622-2107271954807508378?l=dr-dushyant.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://dr-dushyant.blogspot.com/feeds/2107271954807508378/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=777405477924605622&amp;postID=2107271954807508378' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/777405477924605622/posts/default/2107271954807508378'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/777405477924605622/posts/default/2107271954807508378'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://dr-dushyant.blogspot.com/2011/04/blog-post_19.html' title='हर्फे जुनूँ सबकी जुबां ठहरी है'/><author><name>DUSHYANT</name><uri>http://www.blogger.com/profile/00269010495016554374</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_N8y3Z3aRBB0/S9bM9k9LOYI/AAAAAAAAAZs/tXTU43tzans/S220/dusht.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/-n3iU2hinWOM/Ta1SQWMvzfI/AAAAAAAAAdI/CgVC-kMGhL0/s72-c/India-Binayak-Sen.jpg' height='72' 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रहा हूं, &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पूर्व कथन -&lt;blockquote&gt; अपनी बात शुरू करने से पहले कहना ठीक रहेगा कि इसे पढने के बाद संभव है कि दोनों और के दोस्त मुझ पर टूट पडे पर फिर भी कहने की जुर्रत और जरूरत है, और दूसरी बात यह कि इसे अनाधिकारिक बयान भी माना जा सकता है पर यह सब कहने की गुस्ताखी इसलिए कर पा रहा हूं कि लगभग एक दशक से अंदर- बाहर रहकर दोनों के रिश्ते और बदलती स्थितियों को देखने का मौका मिला है.. और अंग्रेजी की कहावत रीड बिटविन दी लाइंस को दोहराते कहूं तो आगे की पंक्तियों में दोनों के तरफ के दोस्त अपनी पीडाओं को महसूस करेगे, ऐसा  भी मुझे विरोधाभासी रूप से  लगता है...&lt;/blockquote&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक मासूम सा इत्तेफाक है कि अखबारवाले साहित्य को, साहित्यकारों को या तो हीन भाव से देखते है या गालियां देते हैं और कमोबेश यही हालत दूसरी तरफ भी है. जरा पतला करके बात करूं तो हिंदी में कम लोग बचे है जो अखबारनवीसी के पेशे में पढने से सरोकार रखते हैं, यहां पढने से तात्पर्य साहित्य से है या साहित्य से इतर नॉन फिक्शन गंभीर लेखन &lt;br /&gt;से भी, मुझे माफ कीजिए,  वो जमाना हवा हुआ जब साहित्यकार और पत्रकार भाई- भाई होते थे, कहा जाता था कि साहित्यकार पत्रकार का बडा भाई होता है... हुआ करता होगा साहिब, हिंदी में तो अब उत्तरोत्तर छोटा भाई महाभाई बन गया है और बडा भाई उसका मुखापेक्षी निरीह बुजुर्ग.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बहरहाल मीडिया के दोस्तों में जाहिर तौर पर लोक-लिहाज में थोडा बहुत सम्मान अब भी साहित्यकार और साहित्य का बचा हुआ है,  इसे आंख की शर्म भी कह सकते हैं, &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हालांकि मेरा मानना है कि पत्रकार का साहित्य या इससे इतर पढना बहुत जरूरी नहीं है पर इसके दो फायदे होते हैं, एक तो संवेदना को बनाए रखने में,  दूसरा भाषा के निरंतर विकास में वह पढना मदद करता है...मुझे कहने में कोई परहेज नहीं है कि साहित्य से दूरी ने उन्हें संवेदनारहित बनाया है..और शायद हमारे समय की कॉर्पोरेट पत्रकारिता की जरूरत यह है भी तो इस लिहाज से यह जस्टीफिकेशन भी इसे हासिल है , तो पढना गैरजरूरी होना गैरवाजिब ठहराए वह तो पागल ही कहलाएगा.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब इसे क्या कहेगे कि पत्रकारों की निगाह में पल्प साहित्य लिखनेवाले लेखक सच्चे और आइकननुमा साहित्कार हैं, तो  बेस्टसेलर को उम्दा लेखन का मानक मानने वालों में अखबार के लोग सबसे पहले हैं, यह नजरिया साहित्य से जुडी खबर को अखबार में जगह से जुडा है क्योंकि प्रकारांतर से वहीं लेखक जो पत्रकार साहब की जानकारी में है, अखबार की खबर में जगह पाएगा. मुझे खुशी होती है जब कोई कहता है कि उसने इन दिनों यह किताब पढी है (और ऐसे अवसर दुर्लभ ही होते हैं) वरना प्रायः उनके लिए आज भी साहित्य का मतलब या तो प्रेमचंद है या फैशन के बतौर चेतन भगत. ..और मुझे हमेशा याद रहता है कि किसी भी कारण से पत्रकारों पर  पडने वाली गालियां मेरे उस पेशे के भाईयों पर पडने वाली गालियां है जिससे मुझे दाल रोटी मिलती है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अपनी आत्मा पर हाथ रखकर पूछिए कि  क्या यह पिछले दशक की देन नहीं है कि अखबार में काम करने वाला पत्रकार यानी रिपोर्टर यर डेस्क वाला व्यक्ति अगर साहित्य के पास भी फटकता है तो गुनाहगार है, यहां तक कि इस अहसास को जन्म देने वाली कि मियां अगर इतना ही पढने लिखने का शौक था तो इस पेशे में आने की जरूरत ही क्या थी! और तुरंत यूं भी खारिज किया जा सकता है कि आपको खबर लिखनी क्या आएगी, और एक वक्त था जब माना जाता था कि आप लेखक है तो खबर भी अच्छी लिखेगे, मेरे पास एकाधिक उदाहरण है कि धर्मयुग आदि में प्रकाशित कहानियों  के आधार पर बहुत से युवाओं को बडे समूहों में पत्रकारिता की नौकरी मिली और वे कालांतर में बडे नामी पत्रकार साबित हुए&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब जरा दूसरी तरफ का रुख कर लें, साहित्यकारों का वर्ग प्रायः अखबार के लोगों को मूर्ख मानकर अपना अहं तुष्ट करता है और उनमें खबर या इतर छपास की आकांक्षा या जरूरत ना हो तो शायद वे बात ही ना करें, इसके लिए मूर्ख से मूर्ख को भी वे महान पत्रकार और साहित्य संवेदना सम्पन्न कहने से नहीं चूकते.वे अक्सर गाली देते पाए जाते है कि अखबारों में साहित्य की जगह कम हो रही है मैं भी सहमत हूं, तथ्यात्मक तौर पर यह कहना सही है पर कोई संपादक को कहने की जुर्रत नहीं करता कि आप ऐसा नहीं करते, हमेशा यही कहा जाता है कि 'आप तो समझते है आपके हाथ बंधे है पर जो कर सकते हैं, वह ऐसा होना रोक नहीं रहे हैं ' और यह कहना उनके लिए भी ठीक ऐसा ही होता है जिनके लिए वे कहते है कि वे ऐसा कर सकते हैं पर कर  नहीं रहे हैं .... जबकि मेरा तो यह मानना है कि साहित्य का छौंक पूरे अखबार में हो पर वह उसे गरिष्ठ ना बनाए कि केवल साहित्कारों का अखबार(साहित्यिक पत्रिका या शोध जर्नल जैसा कुछ होकर ) बनकर रह जाए और लोग उल्टी गिनती शुरू कर दें ..&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुझे गालियां दी जाती होगी, दी भी जाएंगी कि मुझे दुख नहीं होता कि अखबारों में साहित्य की तयशुदा जगहें कम हो रही हैं, पहली बात तो यह कि ये चिंताएं केवल साहित्यकारों की चिंताएं है, दूसरे, हिंदी के उन अध्यापकों की चिंताएं है प्रकारांतर से जिनके पांडित्यपूर्ण लेख छपने की जगहें नहीं बची हैं...दूसरे जब साहित्य को बचाने की जिम्मा हमारे पूरे समाज ने ही भुला दिया है, हम अपने बच्चों का साहित्य पढने के संस्कार नहीं देते, समझ-विचार और सरोकार की बजाय धन, सफलता और पता नहीं किन किन चीजों के ख्वाब दिखाते हैं तो अखबार से क्यों उम्मीद करें ? उन्हें क्यों ठेकेदार बनाते हैं, मेरी मान्यता है कि पब्लिक आइकन के तौर पर लेखकों को देखना समाज ने पहले छोडा, मीडिया ने बाद में,  बेशक मीडिया की जिम्मेदारी कम नहीं है और आप मुझे कह सकते हैं कि ''तू भी है इस गुनाह में बराबर का शरीक अपने किस्से औरों को सुनाता क्या है ''&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;और कहना लाजिम है कि अखबार में साहित्य की उपस्थिति मुझे भी सुख देती है, वज्ह ये कि प्रकारांतर से मैं भी इसी जमात में हूं क्योंकि पत्रकारिता करते हुए भी हमेशा यह माना है कि जीवन का लक्ष्य तो अंततः स्वतंत्र लेखक के बतौर जीना संभव बनाना है&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वैसे, मेरी निगाह में जिंदगी के दूसरे हिस्सों- विज्ञान, दर्शन (धर्म से इतर) जैसी बहुत सी चींजें अखबारों से  गायब है, ले दे के जाने माने लोगों की दिनचर्या और राजनीतिक  उठापटक,  कुछ खेल कुलमिलाकर यही तो अखबार है इनदिनों ..बदलते समय में, मुझे हैरानी है कि हिंदी के साहित्यकारों को यह नहीं दिखता कि केवल नई किताबों पर सूचनात्मक और कहीं कहीं समीक्षात्मक टिप्पणियों के अलावा अंग्रेजी मीडिया भी कहां साहित्य छापता है तो साहित्य का बचना और उसका  भविष्य अखबार पर निर्भर करता है, ऐसी कोई गलतफहमी मुझे जरा भी नहीं है जिन्हे है, उनके लिए मेरी शुभकामनाएं ही हो सकती है, वे भी मददगार होगी, मुझे संदेह है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;और आखिर में बस इतना ही कि अदब को अखबार और व्यापार दोनों ही ना बनाया जाए, वहीं यह भी कि अखबार को अदब भी नहीं बनाया जाए, पर दोनों में दोस्ती रहे, आवाजाही बनी रहे ...और व्यापार भी चलता रहे.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/777405477924605622-3497563404459290634?l=dr-dushyant.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://dr-dushyant.blogspot.com/feeds/3497563404459290634/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=777405477924605622&amp;postID=3497563404459290634' title='3 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/777405477924605622/posts/default/3497563404459290634'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/777405477924605622/posts/default/3497563404459290634'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://dr-dushyant.blogspot.com/2011/04/blog-post_08.html' title='साहित्य का आउटहाउस'/><author><name>DUSHYANT</name><uri>http://www.blogger.com/profile/00269010495016554374</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_N8y3Z3aRBB0/S9bM9k9LOYI/AAAAAAAAAZs/tXTU43tzans/S220/dusht.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/-ivDvEnzWfdQ/TZ75xAKVinI/AAAAAAAAAdA/5oIfzogGUWs/s72-c/literature-2.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-777405477924605622.post-3694678630408545115</id><published>2011-04-02T03:51:00.000-07:00</published><updated>2011-04-02T03:56:21.884-07:00</updated><title type='text'>इतिहास की मौत के दिनों में</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://3.bp.blogspot.com/-wPEeYfRXczA/TZcAj_Oq-qI/AAAAAAAAAc4/2QDDwDquavo/s1600/gandhi.jpg"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 270px; height: 400px;" src="http://3.bp.blogspot.com/-wPEeYfRXczA/TZcAj_Oq-qI/AAAAAAAAAc4/2QDDwDquavo/s400/gandhi.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5590938080672152226" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;&lt;span style="font-style:italic;"&gt;&lt;blockquote&gt;इस देश में अब इतिहास की जरूरत नहीं बची है, उसकी जगह प्रशस्तिमूलक जीवनियां और मिथकशास्त्र पढाए जाने चाहिए, और ऐतिहासिक शोध में लग रहे धन और उर्जा को नष्ट होने से बचाना चाहिए...&lt;/blockquote&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गांधी को लेकर फिर एक किताब और लेखक चर्चा में है। महान इनसान पर ऐसे लांछन शुक्र है कि अब भी लोगों को दुखी करते हैं, खासकर जब उन दुखी लोगों में ज्यादातर लोगों का प्राथमिक आदर्श सच नहीं है और बात ऐसे महान इनसान की हो रही है जो सच के पैरोकार के रूप में मशहूर रहा है, वैसे सच का आदर्श निरपेक्ष ही होना चाहिए या होता है, सापेक्ष नहीं।  गांधी खुद भी अगर होते तो तो शायद शायद क्या कम से कम मुझे तो यकीन ही है कि वे ऐसा व्यवहार नहीं करते।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सवाल पुलित्जर से सम्मानित पत्रकार लेखक जोसेफ लेलीवेल्ड की किताब ''ग्रेट सोल - महात्मा गांधी एंड हिज स्टृगल विद इंडिया'' में उनकी समलैंगिता की ओर इशारे का है हालांकि लेखक ने एक बयान में इसका खंडन किया है कि मेरी किताब में उन्हें समलैंगिक बताया गया है..&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यहां यह बताना जरूरी है कि  गांधी जी के पोते गोपाल कृष्ण गांधी के एक ताजा लेख में ऐसी अंध भावुकता का ना होना बहुत सुखद है, क्या कीजिएगा अगर उन्हे गांधी जी पर ऐसे गैरभावुक लेख के लिए देश निकाला दे दिया जाए... ताजा खबर यह है कि इस किताब के बाद सरकार का रूख है कि कौमी प्रतीकों के साथ राष्ट्रपिता के अपमान पर भी सजा होगी(बजाय इसके कि इतिहासकारों का एक समूह उस किताब में प्रस्तुत तथ्यों की प्रामाणिकता और ऐतिहासिकता जांचता), तो ऐसे में मेरी बुनियादी स्थापना और निजी विचार है कि अब इतिहास को विषय और अनुशासन के तौर पर समाप्त कर देना चाहिए, क्योकि जब ऐतिहासिक सच की तलाश से बडा सवाल अपमान को रोकना हो जाएगा, वहां इतिहास के जिंदा बचने की संभावना क्षीणतम ही होगी। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;याद कीजिए कुछ समय पहले एक ऐतिहासिक मसले पर न्यायालय का फैसला देश की आस्था के आधार पर आया था तो  इतिहासकारों के बडे वर्ग ने इतिहास के साथ इस बलात्कार (यह शब्द मैं दे रहा हूं, क्षमा करें), पर सामूहिक चिंता जताई थी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फर्ज कीजिए कि या मान ही लीजिए कि मेरे दादा अपने जीवन की अनगिन उपलब्धियों के साथ, एक दिन मुझे पता चले कि बलात्कारी भी थे, मेरी नजर में वे गिर जाएंगे और मुझे तुरंत लीपापोती करनी चाहिए और उन प्रमाणों को नष्ट करने में अपना सबकुछ दांव पर लगा देना चाहिए कि यह सच यह राज जाहिर ना हो और मेरी और प्रकारांतर से सब मुझे या मेरे दादा को जानने वालों की नजर में उनकी प्रतिष्ठा बची रहे, बहुत सभव है कि आप सहमत होगे कि मुझे ऐसा ही करना चाहिए और तमाम सबूतों को नष्ट करके मुझे  मान लेना चाहिए कि दादाजी की छवि मैंने बचा ली है और वे महान बने रहेगे और कभी वैसा सबूत दुबारा नहीं मिलेगा जैसा मैंने नष्ट कर दिया है....पर मेरी राय है कि इतनी सहिष्णुता तो हम में अवश्य ही होनी चाहिए कि अपने पूर्वजों को इनसान मानकर उनकी मानवीय कमजोरियों और उससे जुडी बातों को हम उसी भाव से स्वीकार कर लें जिस भाव से उनपर गर्व करने वाली बातों को स्वीकार करते हैं, और इस स्वीकार के साथ उनका इनसान होना खारिज ना करें।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इतिहास के साथ जुडाव ने यह समझ बनाई है कि तथ्य मिलें और प्रमाण हों तो कुछ भी प्रिय अप्रिय स्वीकार करना ही चाहिए वहा भावुकता का सवाल नहीं है, पुनः कहना चाहिए कि इस किताब से उपजे विवाद के मददेनजर भी ऐतिहासिक नजरिए से तथ्यों कर परीक्षण सबसे पहली प्राथमिकता होनी चाहिए थी होनी ही चाहिए !&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेरी समझ में यह नहीं आता कि अब तक जो बाते जाहिर और सिद्ध  हुई है जिनसे गांधी के व्यक्तिगत जीवन के बारे में वह पता चलता है जो उनकी देश के पिता के बतौर सम्मानीय होने में बाधक हो सकती थीं! क्या वाकई उनसे अंतर आया है या आना चाहिए? आजादी के आंदोलन की उनकी भूमिका एक नेता की भूमिका थी और व्यक्ति के तौर पर गांधी की भूमिका अलग मसअला नहीं है क्या? सुभाष, भगतसिंह, चौरी चौरा, पूना पैक्ट  और भारत का विभाजन लगातार उनकी चर्चा और आलोचना के विषय रहे हैं,  पर मेरा मानना है कि कोई भी मसअला, बहस, कुलमिलाकर देश की आजादी में उनके योगदान को कमतर नहीं कर सकते, ऐसा ही मेरा मानना उनके व्यक्तिगत जीवन को लेकर है !&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बहरहाल ताजा बहस पर लौटते हैं, अगर यह विधेयक बन जाता है तो पारित होकर लागू हो जाता है तो, अब फिर वही सवाल खडा है कि क्या महान लोगों को क्रमश: देवता बनाकर आस्था का प्रश्न ही बनाता है, उन्हें हम ऐसे व्यक्ति हाड़ - मांस के इनसान के तौर पर देख और मान नहीं सकते जिन्होने मानव इतिहास में उपस्थित होकर अपनी मानवीय कमजोरियों के साथ महान काम किए...पर महान इनसान को सम्मान देते हुए उसे सामान्य व्यक्ति के रूप में खारिज करना क्यों जरूरी है, दूसरा अगर व्यक्ति के बतौर उसकी कुछ ऐसी छवियां प्रकट हो जाएं जो उसकी महान छवि में तनिक निषेध आरोपित करती हों और सप्रमाण हो तो क्या हमारी परंपरागत छवि की निरंतरता के लिए उन नए ऐतिहासिक तथ्यों को कूडेदान में डाल इेना चाहिए और उन खोजी व्यक्ति को जेल में! अगर ऐसा करना ही महान व्यक्तियों के प्रति हमारे सम्मान को निरंतरता दे सकता है तो मेरा बहुत विनम्र सा निवेदन है कि इस देश में अब इतिहास की जरूरत नहीं बची है, उसकी जगह प्रशस्तिमूलक जीवनियां और मिथकशास्त्र पढाए जाने चाहिए, और ऐतिहासिक शोध में लग रहे धन और उर्जा को नष्ट होने से बचाना चाहिए,. एक गलती देशद्रोही का खिताब दिलवा सकती है, उम्र भर की अकादमिक या वैचारिक दुनिया की प्रतिष्ठा को नेस्तनाबूत कर सकती है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/777405477924605622-3694678630408545115?l=dr-dushyant.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://dr-dushyant.blogspot.com/feeds/3694678630408545115/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=777405477924605622&amp;postID=3694678630408545115' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/777405477924605622/posts/default/3694678630408545115'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/777405477924605622/posts/default/3694678630408545115'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://dr-dushyant.blogspot.com/2011/04/blog-post.html' title='इतिहास की मौत के दिनों में'/><author><name>DUSHYANT</name><uri>http://www.blogger.com/profile/00269010495016554374</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_N8y3Z3aRBB0/S9bM9k9LOYI/AAAAAAAAAZs/tXTU43tzans/S220/dusht.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/-wPEeYfRXczA/TZcAj_Oq-qI/AAAAAAAAAc4/2QDDwDquavo/s72-c/gandhi.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-777405477924605622.post-576235859411530336</id><published>2011-03-20T03:08:00.000-07:00</published><updated>2011-03-25T01:02:46.117-07:00</updated><title type='text'>दुनिया से लडे सबके लिए, पर काल से होड हार गए आलोक</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://3.bp.blogspot.com/-keYxMGjhkXE/TYdsB7DyTmI/AAAAAAAAAcw/7B7wg4hYyB4/s1600/aloktomar.jpg"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 180px; height: 179px;" src="http://3.bp.blogspot.com/-keYxMGjhkXE/TYdsB7DyTmI/AAAAAAAAAcw/7B7wg4hYyB4/s400/aloktomar.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5586552643065630306" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;मन बहुत, बेहद भारी है, लिखने का मानस ना भी हो तो लिख रहा हूं कि जिसने लिखना सिखाया, और उससे भी बढकर लिखने का हौसला दिया, उस पर लिखना जरूरी है....&lt;br /&gt;&lt;/span&gt; &lt;br /&gt;&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'बको, संपादक बको' ये शब्द अब मेरे लिए कभी नहीं होगे. मुख्यधारा की पत्रकारिता में मेरे पहले संपादक जिसने क्या कुछ नहीं सिखाया, आज ये सोचता हूं तो लगता है पत्रकारिता में जो जानता हूं, लिखना सीखा है अगर उसमें से आलोक जी की पाठशाला के पाठ निकाल दूं तो कुछ बचेगा क्या? क्या कहूं उनके लिए ज्यादातर मेरा अपना है, वज्ह ये कि  एक दशक से ज्यादा बडे भाई का सा हाथ सिर पे रहा ..एक बार बोले-'' उदास क्यों हो, ब्रेक अप हो गया!'' मैं ने कहा -''हां'' तो जो कहा आज भी याद है - ''और प्यार कर ले, सुप्रिया से पहले दो बार प्यार में हारा था, आज ही पहली प्रेमिका का तबादला करवाया है, परेशान थी..  सो चीअर अप! चल, बियर पीएगा ''.. सीनियर इंडिया के लिए काम करते लिखते वक्त एक बार उन्हें फोन किया (ऐसे ही पूछता था हमेशा उनसे - क्या लिखूं हालात यह है)  तो बोले - ''जाफना हूं, किसी ने वादा किया है कि प्रभाकरण से मिलवा देगा'' तो मैंने कहा- ''मुझे ही साथ ले लेते'' तो बोले -''कलेजा है इतना अरे पागल! चलो अगली बार आजमाउंगा '' उनसे जुडे अनंत किस्से हैं, उनके मिजाज का दूसरा पत्रकार होना दुर्लभ है, उनकी इस उर्जा और हौसले का स्रोत ईश्वर ही जानता है .&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सोचता हूं किस रूप में याद करूं, जो एक कवि था, अपने मूल में, समय के साथ पत्रकार हो गया जिसने हमेशा सरोकार की पत्रकारिता की जिसका शब्द शब्द जनता की पक्षधारिता का है, टीवी सीरियल लिखे तो मनोरंजन के नए प्रतिमान दिए ..'एक हरा भरा अकाल' और 'पाप के दस्तावेज' जैसी किताबें लिखी, कई अधूरी फिल्मों की पूरी पटकथाएं, रोजाना असंभव लेकिन संभव किस्म का लेखन- गुणवत्ता  और मात्रा दोनों में अपनी बेहद खास शैली में  लिखने वाले आलोक मेरी नजर में अब भी हिंदी के अकेले वैश्विक पत्रकार हैं, वो प्रिंट का समय था भारत से दाउद का पहला मीडिया इंटरव्यू उन्होनें किया था  उन के जैसी क्राइम रिपोर्टिंग आज भी मिसाल है ...डेटलाइन इंडिया में  उनके सहयोगी मिलन के मुंह से अनेक बार सुना-' सर कितना पढते हैं, कितना लिखते हैं '..और दोनों की वास्तविक परख कोई भी उनका पाठक कर सकता है...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उनके गुरू प्रभाष जी ने उनके लिए कहा था- '' आलोक एक प्रतिभा का विस्फोट है और ऐसी प्रतिभाएं आत्मविस्फोट से ही कभी समाप्त हो जाती है'' वह आत्मविस्फोट ऐसे कैंसर के रूप में होते हैं, यह अंदाजा नहीं था...प्रभाष जी पर उनसे लिखवाने  की गुजारिश का दिन याद है -&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;''मुझ पे लिखने का वक्त भी आ जाएगा, संपादक, जल्दी ही!''&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;''बकवास मत कीजिए, बताइए लिख  पाएंगे?''&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;''लिख पाएंगे का क्या मतलब है लिखना है और जरूर लिखना है, मैं नहीं लिखूंगा तो कौन लिखेगा!''&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आज उन पर लिखते हुए यही दोहरा रहा हूं- ''मैं नहीं लिखूंगा तो कौन लिखेगा!''&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तिहाड मामले के दोरान प्रभाषजी ने जो कागद कोरे लिखा, वह मुझे कभी नहीं भूलता, इससे आलोक जी की भारतीय पत्रकारिता में अहमियत का अंदाजा होता है ..समय के साथ जाना कि पत्रकारिता के बदलते स्वरूप से आहत थे...पत्रकारिता के पतनशील समय में बदलाव के लिए योजना थी और सोच भी पर काल ने उन्हें मोहलत नहीं थी, सरोकार की पत्रकारिता के राडिया की पत्रकारिता होने से वे बहुत आहत थे पर निराश नहीं थे, उन्हें निराशा, टूटा हुआ कभी नहीं पाया, पैगंबर कार्टून मामले में तिहाड जाने पर भी नहीं, मालिकों के असहयोग पर भी नहीं जब मैंने सीनियर इंडिया में काम छोड दिया कि जब मालिक आपसे ऐसे व्यवहार कर सकते हैं तो मैं क्यो जारी रखूं, बहुत नाराज रहे -''जीयोगे कैसे! पागल हो!'' खैर.. वे टूटे नहीं, लडते रहे, तोडते रहे, लोगों को अपने शब्दों से जोडते रहे ,लोग मुग्ध रहे, उनके शब्दों पर और शब्दों पर यूं मोहित होना शायद ही किसी पत्रकार के लिए देखा हो मैंने ...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक दिन बोले कि तुम मेरा लिखा पढते हो, मैंने कहा- 'आपको संदेह है', बोले-'नहीं,जानना चाहता हूं, क्यों पढते हो? मैंने कहा-'' मेरा स्वार्थ होता है, लिखना सीखता हूं आपका लिखा पढते हुए'' बोले -''बकवास मत करो '',   वे दिल से नहीं चाहते थे कि मैं दिल्ली में आकर पत्रकारिता करूं, पिछले दिनों कहा-'' चाहता रहा हूं कि तुम लेखक के तौर पर ही पहचाने जाओ, मैं सलीम खान रहूं, तुम जावेद अख्तर हो जाओ..आखिर शाइर तो तुम ही हो ना..'' &lt;br /&gt;&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भाभी सुप्रिया और भतीजी मिष्टी के लिए यह वक्त कैसा होगा, इसका अंदाजा दुष्कर है, संकेत हो सकता है कि जब तिहाड जाना पडा था उन क्षणों का गवाह रहा हूं, आखिरकार वे मेरे शब्दों मे जिंदा रहेगे, मेरा शब्द-शब्द उनका है, महान लोग कम जीकर सदियों तक करोडों जिंदगियों को रौशन रखते हैं, उन्हें जिंदगी जीने का हौसला देते हैं.कह देना चाहता हूं कि मेरे लिए उनका जाना मेरे अंदर के साहस का चले जाना है, लिखने और जीने का साहस उन्होंने लगातार मुझमें भरा, ऐसा करने वाला मुझे अपने जीवन में कोई दूसरा मिलेगा क्या!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;''कम्प्यूटरजी लॉक कर दिया जाए'' लिखने वाले की जिंदगी का यूं लॉक होना मेरे भीतर का कितना कुछ अनलॉक कर रहा है, मेरे शब्दो कुछ देर विराम ले लो, मेरे भाई जान सोने गए हैं, इससे ज्यादा विश्वास नहीं हो रहा है .. अभी मेरा मोबाइल उनके नंबर से कॉल डिसप्ले करेगा, आवाज आएगी - ''बको संपादक''&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/777405477924605622-576235859411530336?l=dr-dushyant.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://dr-dushyant.blogspot.com/feeds/576235859411530336/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=777405477924605622&amp;postID=576235859411530336' title='3 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/777405477924605622/posts/default/576235859411530336'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/777405477924605622/posts/default/576235859411530336'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://dr-dushyant.blogspot.com/2011/03/blog-post_5231.html' title='दुनिया से लडे सबके लिए, पर काल से होड हार गए आलोक'/><author><name>DUSHYANT</name><uri>http://www.blogger.com/profile/00269010495016554374</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_N8y3Z3aRBB0/S9bM9k9LOYI/AAAAAAAAAZs/tXTU43tzans/S220/dusht.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/-keYxMGjhkXE/TYdsB7DyTmI/AAAAAAAAAcw/7B7wg4hYyB4/s72-c/aloktomar.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-777405477924605622.post-6326125418824783408</id><published>2011-03-15T00:57:00.000-07:00</published><updated>2011-03-15T01:06:38.377-07:00</updated><title type='text'>शोध में क्या रखा है !</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://2.bp.blogspot.com/-_arR9YylQDM/TX8dFMawKYI/AAAAAAAAAcg/UJvxsvtBmP0/s1600/gutenburg.JPG"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 400px; height: 281px;" src="http://2.bp.blogspot.com/-_arR9YylQDM/TX8dFMawKYI/AAAAAAAAAcg/UJvxsvtBmP0/s400/gutenburg.JPG" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5584214038032689538" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;blockquote&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-style:italic;"&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;खबर आई कि जर्मनी की सरकार में रक्षा मंत्री कार्ल थियोडोर त्सु गुटनबर्ग साहब को अपने पद से इस्तीफा देना पड़ा। उन पर आर्थिक भ्रष्टाचार या कि यौन दुराचार जैसा कोई आरोप नहीं था, उन पर आरोप यह था कि उन्होने पीएच डी के शोध प्रबंध में नकल की थी।&lt;/span&gt;&lt;/span&gt; &lt;/blockquote&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;blockquote&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;शोध नहीं बल्कि शोध से प्राप्त होने वाली उपाधि ही सर्वोपरि होती है, किसी को यह भय नहीं सताता कि कभी हमारी आत्मा सवाल करेगी कि क्या तुमने वाकई शोध किया था! कुछ ज्ञान की दुनिया में वाकई इजाफा किया है! या कि कोई हिस्सा अगर गुटनबर्ग साहब की तरह पकड़ा गया तो क्या होगा!&lt;/span&gt;&lt;/blockquote&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पहले मामले का परिचय दे दिया जाय, उन्होनें 2006 में संविधान और संवैधानिक संधि: अमेरिका और यूरोपीय संघ के देशों के संविधान का विकास विशय पर अपना शोध प्रबंध लिखा था, जिस पर उन्हें 2007 मेे डॉक्टरेट की उपाधि दे दी गई थी और यह पाया गया कि उन्होने कई शोध लेखों का हुबहू इस्तेमाल किया है, गत 21 पफरवरी को उन्होने घो ाणा कर दी थी कि वे अब उस अकादमिक उपाधि का इस्तेमाल नहीं करेगे, दो दिन बाद बायरूथ विवि ने उनकी उपाधि को खारिज कर दिया था। उन पर आरोप है कि उन्होने छ: ऐसे शोध लेखों का इस्तेमाल किया जिन पर कॉपीराइट था। मुछदा इतना उछला कि जर्मनी के 51 हजार डॉक्टरल शोधार्थियों ने इसको लेकर खुला पत्र लिखा था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ये घटना हमें चौंकाती नहीं है क्योंकि भारत में शोध की स्थितियां और इज्जत बहुत उत्साहजनक नहीं है, शायद ही कोई महफि ल हो जहां पीएचडी की उपाधि को गुणवत्ता के लिहाज से संदेह से ना देखा जाता हो, ये हालात हमारे यहां हमारे ही लोगों की चाही अनचाही गतिविधियों का नतीजा है, क्या वजह है कि समाजविज्ञान और मानविकी के प्राय: शोध हिकारत भरी नजर से देखे जाते हैं,  उनमें गुणवत्ता की बात करना ही अपने आप में शोधपरक होता है। कितने ही दोस्तों, सहपाठियों और समकालीनों तथा अगली एकाधिक पीढियों के शोध की प्रक्रिया, सोच और मंतव्यों का गवाह रहा हूं, दुख होता है शोध नहीं बल्कि शोध से प्राप्त होने वाली उपाधि ही सर्वोपरि होती है, किसी को यह भय नहीं सताता कि कभी हमारी आत्मा सवाल करेगी कि क्या तुमने वाकई शोध किया था! कुछ ज्ञान की दुनिया में वाकई इजाफा किया है! या कि कोई हिस्सा अगर गुटनबर्ग साहब की तरह पकड़ा गया तो क्या होगा!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मामला इतना इक तरफा नहीं है, यहां हमें यह भी देखना होगा कि शोध के लिए उत्साहजनक परिस्थितियां देने में क्या हमारे अकादमिक संस्थान नाकामयाब नहीं रहे हैं! हालांकि ऐसा नहीं है कि यह हालात अमेरिका या अन्य विकसित देशों में आदर्श स्तर पर हों, वहां के कई शोधार्थियों के साथ सलाहकारी भूमिका में काम करते हुए जाना कि शोध उपाधि के बाद बेरोजगारी की प्रबल संभावनाओं के बावजूद भी कम से कम शोध उपाधि के समय तो अकादमिक संस्थान शोध के लिए अनुकूल परिस्थितियां बना ही रहे हैं, यहां तर्क यह दिया जा सकता है कि भारत में भी फेलोशिप्स हैं, बहुुत से संस्थान है जो अच्छा काम कर रहे हैं, पर पहली दिक्कत उनके कम होने की है, दूसरे,  व्यवहारिक दिक्कतें हैं जो भारतीय परिवेश की दिक्कतें हैं। यह मेरी व्यक्तिगत राय है कि प्राय: संस्थानों को धोखे में रखे जाने की संभावनाएं बहुत हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हम वापिस बडे सवाल गुणवत्ता पर फिर आते हैं, उसके लिए हमें संस्कारित होने की जरूरत महसूस होती है, हम प्राय: ऐसे क्यों संस्कारित होते हैं कि बस डिग्री की अहमियत है, या कुछ भी लिख दिया जाए, थिसिस रिजेक्ट तो होती ही नहीं हैं, जमा करवाने के बाद कौन पूछता है कि आपने क्या लिखा था आदि आदि।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक तो यह हुआ है कि समाज में वैसे ही प्रबंध और तकनीक की वाजिब बढती अहमियत ने शोध के प्रति उत्साह को कम किया है पर जो करें उनके लिए वाजिब माहौल, वाजिब संस्कार और वाजिब हालात देने का जिम्मा किसका है! महज उच्चशिक्षा को व्यवस्थागत कारणों से गाली देना इस कलमी कवायद का मकसद नहीं हैं, गुटनबर्ग साहब के बहाने से अपने गिरेबां में झााकने और कुछ बेहतर कल की उम्मीद में रास्ता ढूंढने के लिए लालटेन को रौशन करना है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुझे हैरानी होती है, हमारे प्रदेश में समाजविज्ञान के अधिकांश शोध प्रबंध प्रकाशन योग्य नहीं होते, हालांकि परीक्षक महावरे के रूप में प्रकाशन की संस्तुति करते हैं, फिर क्या वजह है कि वे ज्ञान की दुनिया की जरूरत नहीं बनती, इसीलिए कोई प्रकाशक उन्हें प्रकाशित करेन का हौसला नहीं दिखाता! और मार्के की बात यह भी कि कोई डॉक्टरेट होल्डर इसलिए प्रकाशित नहीं करवाना चाहता कि इससे ज्ञान की दुनिया का भला होगा इजाफा होगा, बल्कि महज इसलिए कि प्रकाशित शोधप्रबंध किसी विवि में प्रध्यापक की नौकरी में मदद करेगा। हालाकि मुझे यह भी लगता है कि अच्छे प्रकाशक या किसी भी प्रकाशक से उसे छपवाने की कोशिश इसलिए भी शायद ना होती हो कि गुटनबर्ग साहब की तरह कुछ गड़बड़ भी हो सकती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अपने कई प्राध्यापक साथियों को मैं बुरा लगता हूं जब उन्हें कहता हूं कि इस पर शोध पत्र केवल इसलिए मत लिखिए कि इस विषय को तो हम जानते ही हैं और सेमिनार में पर्चा पढने का एक और सर्टिफिकेट मिल जाएगा, जब तक कि आपके शोध का विषय नहीं है और उसमे भी कुछ नया विचार या तथ्य हम नहीं दे पा रहे हैं तो। अकसर डांट और  फटकार साथ में मिलती है मुझे, अपना काम करो, ज्ञान मत दो भाई।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इंशाल्लाह मेरा यह भ्रम कायम रहे कि अब भी कुछ शोध निर्देशक हैं जो उपाधि के दौरान शोधार्थी से कोई तोहफा नहीं लेते, अब भी कुछ शोध प्रबंध परीक्षक हैं जो वायवा के लिए आते हुए तोहफे के अलावा आने जाने का व्यय विवि और शोधार्थी दोनों से नहीं वसूलते।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक तरफ तमाम उपाधियां मूल्यहीन हो रही हैं, अगर वे धनोपार्जन में सहयोगी नहीं है तो बेकार है, सोच को सुलझााने और बेहतर बनाने वाली किसी उपाधि को अनपाने की आज करिअर काउंसलर भूल के भी सलाह नहीं देता। मुझे खुशी है कि कुछ लोगों को वहम है कि नाम के आगे डॉक्टर लगाना गौरवपूर्ण है, अरे लोगो! मुझे चिकोटी काटो, यकीन नहीं हो रहा है, जबकि अंतत: विचार और ज्ञान की दुनिया में अहमियत उपाधि की नहीं नए विचार और ज्ञान के बेहतर इस्तेमाल की है। ऐसे वक्त ज्ञान का अर्थ धन कमाने की विधियां और कौशल ही रह गया हो और नए विचार का अर्थ धन कमाने के नए तरीकों से हो गया हो, नाम के आगे डॉक्टर लगाने की ऐसी मासूम शरारतें लोग क्यों करते हैं साहब! ये तो अंतत: यह जाहिर करेगी कि सबसे निठल्ला आदमी ही डॉक्टर होगा जिसे धन वैभव और सुख के साधनों से इतर केवल ज्ञान की बात और विचार सुख दे रहे हैं! संभव है शोध और उपाधियों का यह हाल पूरी दुनिया में ऐसा ही हो, खुदा ना करे कि ऐसा ही हो, ऐसा सुनने से पहले मेरे कान बहरे हो जाएं!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;खैर, गुटनबर्ग साहब तो केवल एक नाम है, बेचारे नाहक बदनाम हुए हैं! ये तो शायद एक वैश्विक परंपरा का हिस्सा भर हैं, तो जश्न मनाएं कि शोध में नया शोध हो रहा है, शोध के नए आयाम सामने आ रहे हैं। वैसे शोध में क्या रखा है, कमाने के नए तरीके सोचिए, शोध तो फालतू लोगों का काम है। इसलिए मेरा अनुरोध है कि गुटनबर्ग साहब को माफ कर देना हमारा वैश्विक कर्तव्य है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/777405477924605622-6326125418824783408?l=dr-dushyant.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://dr-dushyant.blogspot.com/feeds/6326125418824783408/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=777405477924605622&amp;postID=6326125418824783408' title='3 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/777405477924605622/posts/default/6326125418824783408'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/777405477924605622/posts/default/6326125418824783408'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://dr-dushyant.blogspot.com/2011/03/blog-post_15.html' title='शोध में क्या रखा है !'/><author><name>DUSHYANT</name><uri>http://www.blogger.com/profile/00269010495016554374</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_N8y3Z3aRBB0/S9bM9k9LOYI/AAAAAAAAAZs/tXTU43tzans/S220/dusht.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/-_arR9YylQDM/TX8dFMawKYI/AAAAAAAAAcg/UJvxsvtBmP0/s72-c/gutenburg.JPG' height='72' width='72'/><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-777405477924605622.post-466829274280168198</id><published>2011-03-02T01:55:00.000-08:00</published><updated>2011-03-02T02:04:03.911-08:00</updated><title type='text'>नाशुकरे की कुबूलियत</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://1.bp.blogspot.com/-EX-Xm-NOovY/TW4V2mheRPI/AAAAAAAAAcY/rpoaefgEygk/s1600/Sri%2BGanganagar%252C%2B.jpg"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 67px;" src="http://1.bp.blogspot.com/-EX-Xm-NOovY/TW4V2mheRPI/AAAAAAAAAcY/rpoaefgEygk/s320/Sri%2BGanganagar%252C%2B.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5579421016156685554" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;&lt;blockquote&gt;श्रीगंगानगर के मुशाइरे में पढी मेरी इस नज्म को बहुत प्यार मिला मुलाहिजा फरमाएं&lt;/blockquote&gt; &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं भी देखो किन अफवाहों में फंस गया हूं&lt;br /&gt;गया जो एक रोज गांव अपने&lt;br /&gt;दूर तक साथ कौन था कोई नहीं था&lt;br /&gt;आधी रात कुंडा खडकाने वाला भी कोई नहीं था&lt;br /&gt;कुछ सरकंडे थे,&lt;br /&gt;कुछ तंगलियां थी&lt;br /&gt;कुछ बियाबान खेत थे,&lt;br /&gt;टूटी हुई कोठे की जंगलियां थी&lt;br /&gt;सरहद के इस पार मगर साठ साल का इतिहास था&lt;br /&gt;हरेक लम्हा पानी के लिए गोली खाके मरे किसानों की प्यास था&lt;br /&gt;कुछ जिस्मों के कुप्पे थे जिनमें तूडी नहीं थी अबके सालों में&lt;br /&gt;अब खेत में किसी मोगे पर बैठके बीडी और&lt;br /&gt;गुवाड में मुडडे पर बैठकर होका पीने का सुकून नहीं था&lt;br /&gt;कस्सी मांग कर खेत में पानी लगाने का भी मन नहीं था&lt;br /&gt;कारीगरों के घर से बास्ते मांगकर चूल्हा जलाने का मन नहीं था&lt;br /&gt;इन सालों में&lt;br /&gt;गांव में सरदारों के अकेले घर के लोग छोड गए थे गांव&lt;br /&gt;और चुनाव पंचायत के कई बार तोड गए थे गांव&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पता नहीं&lt;br /&gt;किस किस मामूली बात पर आपस में लड गया था गांव&lt;br /&gt;कितनी ही बार बेमतलब अपने ही बुजुर्गो से अड गया था गांव&lt;br /&gt;बरसों पहले ही मधानी में तरेड आ गई थी&lt;br /&gt;खडवंजे लगे तो गांव कई मुल्कों में बंट गया&lt;br /&gt;सरहदें बन गईं गलियां और चोबारों से मिसाइलें भी बेसाख्ता चलने लगीं&lt;br /&gt;गांव की पाक मटटी कहीं गांव में खो गई, रूल गई&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गली गुजरती औरत को बाई, बेबे, काकी और ताई कहने को तरस गया हूं मैं&lt;br /&gt;फिर भी झूठ कह रहा हूं कि दूर शहर में बस गया हूं मैं।&lt;br /&gt;किन अफवाहों में फंस गया हूं मैं&lt;br /&gt;ये सारी सच्ची अफवाहें हैं&lt;br /&gt;मैं एक झूठा नाशुकरा हूं&lt;br /&gt;अभी अभी जयपुर की बस से उतरा हूं।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/777405477924605622-466829274280168198?l=dr-dushyant.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://dr-dushyant.blogspot.com/feeds/466829274280168198/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=777405477924605622&amp;postID=466829274280168198' title='5 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/777405477924605622/posts/default/466829274280168198'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/777405477924605622/posts/default/466829274280168198'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://dr-dushyant.blogspot.com/2011/03/blog-post.html' title='नाशुकरे की कुबूलियत'/><author><name>DUSHYANT</name><uri>http://www.blogger.com/profile/00269010495016554374</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_N8y3Z3aRBB0/S9bM9k9LOYI/AAAAAAAAAZs/tXTU43tzans/S220/dusht.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/-EX-Xm-NOovY/TW4V2mheRPI/AAAAAAAAAcY/rpoaefgEygk/s72-c/Sri%2BGanganagar%252C%2B.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>5</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-777405477924605622.post-5516839086644279985</id><published>2011-01-20T03:49:00.000-08:00</published><updated>2011-01-20T03:53:23.606-08:00</updated><title type='text'>सरहद पार सब ठीक नहीं है</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://3.bp.blogspot.com/_N8y3Z3aRBB0/TTgh2fWTdDI/AAAAAAAAAcM/_4qBGlrwppQ/s1600/salmaan_tavleen_20090323.jpg"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 366px; height: 282px;" src="http://3.bp.blogspot.com/_N8y3Z3aRBB0/TTgh2fWTdDI/AAAAAAAAAcM/_4qBGlrwppQ/s400/salmaan_tavleen_20090323.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5564234559627949106" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;blockquote&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;पाकिस्तान में सलमान तासीर के कत्ल के बाद सेकुलरिज्म बहुत बड़े खतरे की स्थिति में पहुच गया है...&lt;/span&gt;&lt;/blockquote&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पाकिस्तानी पंजाब के गवर्नर सलतान तासीर दरअसल पूरे भारतीय उपमहाद्वीप का चेहरा था और उनका कत्ल इसीलिए मानीखेज है। वो इसीलिए भी मायने रखता है कि वह एक मुहीम के झंडाबरदार थे, वह मुहीम गैरइरादतन तरीके से सीधे सीधे इस्लाम के खिलाफ हो गई थी। थोड़ा खुलासा करके बताया जाए तो खेत में काम करने वाली एक गरीब अनपढ़ ईसाई महिला असिया बीबी द्वारा तथाकथित रूप से पैगंबर साहब के लिए कुछ कह दिया गया, जिया उल हक के जमाने में बने एक कानून के तहत उसे सजा-ए-मौत मिलनी थी कि तासीर ने उसका पक्ष ले लिया। फिर क्या था, जो होना था, हम आप उसकी कल्पना कर सकते हैं कि पाकिस्तान में क्या होना चाहिए यानी क्या हो सकता है?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जरा पीछे जाएं तो सलमान तासीर का परिचय यूं दे सकते हैं कि वे मशहूर शाइर फैज अहमद फैज की साली बिल्किस तासीर के बेटे हैं, उनके पिता एमडी तासीर विभाजन से पहले भारत के अमृतसर में एक कॉलेज के प्रिसिपल थे। उनकी गिनती उर्दू में प्रगतिशील आंदोलन यानी तरक्कीपसंद तहरीर के शुरूआती लोगों में सैय्यद सज्जाद जहीर साहब के साथ होती है। यही वजह रही कि सलमान तासीर की परवरिश ऐसे ही माहौल में हुई जहां उनमें कट्टरता के संस्कार तो हरगिज नहीं आ सकते थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उनके कत्ल के पीछे सिर्फ और सिर्फ यही वजह हो कि उन्होंने एक ईसाई औरत की तरफदारी की, ऐसा लगता नहीं हैं, इसके पीछे कहीं ना कहीं उनका भारतीय पत्रकार तवलीन सिंह से जुड़ाव, जिससे उनके एक बेटा आतिश तासीर पैदा हुआ जो आज अंग्रेजी का एक चर्चित युवा लेखक है, भी है, तो इस कत्ल के साथ चाहे अनचाहे भारत बहुत गहरे से जुड़ता है और इसे कतई नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। क्योंकि परंपरा और जड़ें साझी हैं, और इस लिहाज से वे हिंदुस्तान की साझी और सेकुलर परंपरा के प्रतीक ही तो थे। उन्हें मारनेवाले वाला मुमताज कादरी छब्बीस साल का युवा कट्टर मुस्लिम है, ऐसा ही होना चाहिए था ना हमारी कल्पना के मुताबिक। इत्तेफाक देखिए कि दोनों मुल्कों और कई तहजीबों को जोडऩे वाले लगभग इतनी ही उम्र आतिश तासीर की है। कुल मिलाकर वजह जो बनती है, वह सेकुलरिज्म ही बनती दीखती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;खास बात यह भी है कि पाकिस्तानी मीडिया के ऑनलाइन संस्करणों पर जब मैंने नजर दौड़ाई तो पाया कि उर्दू के अखबार तासीर के पक्ष में खड़े होने से हिचकिचा रहे है और अंग्रेजी मीडिया उदारता से उदार तासीर पर लिख रहा है, कत्ल के खिलाफ उठती आवाजों की खबरें दे रहा है। इसके संकेत भी हमारे लिए साफ ही हैं। कुलमिलाकर यह कत्ल भी पाकिस्तान में सेकुलरिज्म के लिए काम करने वाले मुट्ठी भर लोगों के लिए भी संकेत के रूप में बहुत साफ है, बहुत महत्वपूर्ण बात यह भी कि बहस या चर्चा की भी कोई गुंजाइश नहीं है, और यह संकेत सबसे बुरा है। मुझे इतना सा कह लेने दीजिए कि जब किसी मुल्क में ईशनिंदा कानून में बिना किसी सुनवाई के सजाएमौत देने के खिलाफ भी सुनवाई या आवाज के लिए कत्ल की सजा अवाम तय करने लगे तो हुक्मरां और देश की तकदीर पर बहस कौन और कैसे करेगा?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;प्रकारांतर से यह कत्ल बेनजीर भुट्टो वाली पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी के लिए भी मायने रखता है क्यांकि सलमान तासीर उसके सदस्य थे, और मुस्लिम जनभावनाओं और सेकुलरिज्म के बीच पार्टी फंस गई है, दोनों में से एक को चुनना जाहिर है कि पाकिस्तान जैसे मुल्क में बड़ा चुनौतीपूर्ण है, हालांकि बेनजीर के बेटे बिलावल ने सलमान के कत्ल के खिलाफ बयान दिया है, पर उनका स्वर जरा कमजोर सा है, शायद सियासत इसी का नाम है, चाहे यह सरहद के इस तरफ हो या उस तरफ। इस सियासती खेल में एक जरूरी सवाल यह भी उठ गया है कि क्या पाकिस्तान की राजनीति में अब किसी उदारवादी राजनेता की कोई गुंजाइश या जरूरत नहीं बची है? &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बहरहाल, ईशनिंदा के खिलाफ बने इस कानून में सुधार का प्रस्ताव पाकिस्तानी संसद में लाया गया है, शेरी रहमान को इसका श्रेय जाता है, या कह लें कि वह अकेली मर्द सांसद साबित हुई हैं। पाकिस्तान में जगह जगह से इस सुधार प्रस्ताव के समर्थन में प्रदर्शन और सभाओं की खबरें आ रही हैं। पर यकीन मानिए, ऐसी उम्मीद बहुत कम है कि ऐसा कोई सुधार उस कानून में लागू हो जाएगा। इसी बीच पोप बेंडिक्ट सोलहवें के ईशनिंदा कानून के खिलाफ आए बयान से यह मसअला नया धार्मिक रंग ले रहा है जो सलमान तासीर की मंशा और नजरिये के भी खिलाफ जाता है। और, हम सरहद के इस तरफ जब प्याज, महंगाई, नेताओं के घोटालों और भगवा आतंकवाद को परिभाषित करने में उलझे हुए हैं, पड़ोस से उठती लपटों से बेखबर हैं जब कि ये भूल जाते हैं कि दिल्ली से जितनी दूरी मुम्बई, कोलकाता या चेन्नई क्रमश: १४०७, १४६१ और २०९५ किमी की है, उससे कहीं कम भौगोलिक दूरी दिल्ली से लाहौर, इस्लामाबाद या कराची की क्रमश: ४२७,६८२ और १०९५ किमी है, यानी दिल्ली से पाकिस्तानी शहर भारत के तीनों अन्य महानगरों की बजाय नजदीक हैं। इसके गहरे और दूरगामी अर्थ हम आप बखूबी निकाल सकते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सलमान तासीर के मौसे फैज साहब के ही एक शेर को याद करें- ''हर इक कदम अजल था, हर इक गाम जिंदगी, हम घूम फिर के कूचा-ए- कातिल से आए हैं।'' आज और अब जबकि दुनिया फैज की जन्म शताब्दी मना रही है, कितने मौजूं है ये दो मिसरे, यानी कि पाकिस्तान में लोकतंत्र का रास्ता कितनी मुश्किलों भरा है, इस कत्ल से साफ जाहिर है, और यह भी कहीं ना कहीं कि सेकुलरिज्म एक कितना बड़ा ख्वाब है एक दीवाने का? चाहे जिन्ना ने संविधान सभा में ११ अगस्त १९४७ को जिन भी शब्दों में अपनी तकरीर में सेकुलरिज्म की उम्मीद जाहिर की थी- आप आजाद है, पाकिस्तान में आप कहीं भी जाने के लिए, अपने मंदिरों में, मस्जिदों में या अपने किसी भी पूजा स्थल में। उनका बनाया वह मुल्क आज किस हाल और दौर में पहुच गया है, यह सोच कर उन्हें अल्लाह मियां के पास बैठकर भी तकलीफ हो रही होगी, बहुत संभव है वह इसमें जाने अनजाने हुआ अपना कोई गुनाह भी शामिल कर रहे हों।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/777405477924605622-5516839086644279985?l=dr-dushyant.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://dr-dushyant.blogspot.com/feeds/5516839086644279985/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=777405477924605622&amp;postID=5516839086644279985' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/777405477924605622/posts/default/5516839086644279985'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/777405477924605622/posts/default/5516839086644279985'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://dr-dushyant.blogspot.com/2011/01/blog-post_20.html' title='सरहद पार सब ठीक नहीं है'/><author><name>DUSHYANT</name><uri>http://www.blogger.com/profile/00269010495016554374</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_N8y3Z3aRBB0/S9bM9k9LOYI/AAAAAAAAAZs/tXTU43tzans/S220/dusht.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_N8y3Z3aRBB0/TTgh2fWTdDI/AAAAAAAAAcM/_4qBGlrwppQ/s72-c/salmaan_tavleen_20090323.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-777405477924605622.post-6116399773944380633</id><published>2011-01-20T02:28:00.000-08:00</published><updated>2011-01-20T02:31:22.623-08:00</updated><title type='text'>सेन को फांसी दे दो</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://3.bp.blogspot.com/_N8y3Z3aRBB0/TTgO7cz3khI/AAAAAAAAAcE/pCYvlIL1BJ8/s1600/binayak-sen_6.jpg"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 400px; height: 281px;" src="http://3.bp.blogspot.com/_N8y3Z3aRBB0/TTgO7cz3khI/AAAAAAAAAcE/pCYvlIL1BJ8/s400/binayak-sen_6.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5564213754125062674" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;&lt;blockquote&gt;क्या हमें नहीं सोचना चाहिए कि लोकतंत्र में भ्रष्टाचार से निपटने से बड़ी चुनौती अब उसको औपनिवेशिक और साम्राज्यवादी होने से बचाने की है&lt;/blockquote&gt; &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;२४ दिसबर की शाम जब सूरज ढ़ल रहा था, गीतकार नीलेश मिश्रा फेसबुक वॉल पर जो लिख रहे थे, वह उनका अगला गीत नहीं था, वह जो था , उसका कार्यकारी अनुवाद यह हो सकता है कि *''बिनायक सेन नक्सलियों को जानते हैं, जो दातेवाड़ा में काम करने के लिए उन्हें जरूरी था, क्या उन्होंने उनके आंदोलन को भड़काया? मुझे नहीं पता पर अगर नहीं तो नक्सली लोगों को जानना और उनसे संपर्क होना आतंकवादी और देशद्रोही नहीं बना सकता। क्या इंटेलीजेंस एजेंसी के लोगों को जानने भर से कोई जासूस करार दिया जा सकता है? *''&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं २४ दिसबर की शाम से आज तक भी नीलेश मिश्रा से असहमत होने का तर्क नहीं खड़ा कर पाया हूं। दरअसल मुझे तो लगता है कि बहुत जरूरी हो गया था बिनायक सेन को अंदर करना। कलमाडियों, राडियाओं, वीर सांघवियों और बरखा दत्तों के देश में बिनायक सेन को कैसे खुला घूमने दिया जा सकता है?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आजाद भारत का सबसे बड़ा इतिहासकार बिनायक सेन के लिए लिख रहा है ! क्यों आंद्रे बेते और हर्ष मंदर जैसे राष्ट्रीय सलाहकार परिषद के लोग उसके पक्ष में बोल रहे है? मेरी समझ में नहीं आ रहा है? क्यों एमनेस्टी वाले इस नॉनसेंस सेन के लिए चिल्ला रहे हैं? उनके पास और कोई काम नहीं है क्या?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेरी पहली अनौपचारिक मुलाकात बिनायक सेन से कोई दस बरस पहले शायद जेएनयू के ब्रह्मपुत्रा छात्रावास में हुई थी, यह एक सार्वजनिक मुलाकात थी, जब वे मैस में बुलाए गए थे, जब मैं करोलबाग के एक सस्ते से होटल में अपने एक ब्रिटिश रिसर्च स्कॉलर दोस्त के साथ रुका था और राष्ट्रीय अभिलेखागार की अपनी तय दिनचर्या को तोड़कर दिल्ली की सर्दी में दो बसें बदलकर उन्हें सुनने पहंचा था, हालांकि  ठीक-ठाक सी व्यक्तिगत मुलाकात पिछले दिनों जयपुर में पीयूसीएल के एक आयोजन में हुई। तब तक पिछली मुलाकात धुंधली हो गई थी, देखना भर जेहन में अटका हो तो बहुत, पर अब जो चेहरा सामने था, वक्त के निशान उस चेहरे पर कुछ इस तरह से थे कि शक्ल के नक्श बदल गए थे, कि चेहरा नया सा था।  मेरा बहुत मन था कि उनके नक्सली संपर्को पर उनसे तीखे सवाल करूं कि क्यों वे मासूम मनुष्यों को मारने वाले लोगों के साथ खड़े नजर आते हैं? पर मैं स्वीकार करता हूं कि उनकी मासूमियत और सहज मानवीयता ने मुझे वे क्रूर सवाल करने से रोक दिया। हालांकि बहुत से मित्र लोग सेन की इस मासूमियत के दूसरे अर्थ निकाल सकते हैं, निकालेंगे ही, और निकालना उनका लोकतांत्रिक अधिकार भी है। पर क्या यही अधिकार सेन को दिया जा सकता है, क्या दिया जाना चाहिए, शायद नहीं, यकीनन नहीं! उनसे मैंने पूछा-'' क्या योजना है? कल को किस उम्मीद से देखते है?'' तो उनका जवाब था- ''जी पाना और&lt;br /&gt;बेहतर दुनिया के लिए खड़े लोगों का साथ देने की कोशिश करना।'' ये बिनायक सेन कितना वाहियात आदमी है, कितना अजीब सोचता है, भारतीय लोकतंत्र में सब खुशी से जी ही रहे हैं, तरक्की कर रहे हैं? उसको हम सबकी इन तरक्कियों से जलन हो रही है, शायद, नहीं उनके ये शब्द प्रमाण हैं, भारतीय परंपरा में प्रमाण की बड़ी महिमा है, इसलिए उसको फांसी नितांत वाजिब है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सेन का नॉनसेंस व्यवहार उन्हें इक्कीसवीं सदी का सुकरात बना सकता है, हम क्या इजाजत दे सकते हैं? कतई नहीं दे सकते? यह ईसा से पांच सौ साल पहले का यूनान नहीं है, यह दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है, कोई मजाक थोड़े ही है साहेब।&lt;br /&gt;मेरी पुरजोर मांग है कि सेन को फांसी बहुत जरूरी है, देशहित मानवहित से बड़ा है, देश यानी सत्ता भारत के चुने हुए नेताओं की सत्ता। घोटालों से बचकर जीवन जीना और चुनाव लड़कर फिर फिर घोटलों के लिए जनता का लाइसेंस हासिल कर देना यथेष्ट देशहित है। इससे लोकतांत्रिक अधिकार से किसी ने बिनायक सेन को वंचित किया क्या? कोई प्रमाण नहीं है, तो दोष सरकार का नहीं है, और लोकतंत्र का तो बिल्कुल भी नहीं है। उसे खाने और कमाने से किसी ने रोका था क्या? बदनाम करते हैं ऐसे टुच्चे लोग, देश को, देश की गरीबी को, यह राष्ट्रद्रोह हुआ ना? फांसी के लायक भी हो गया ना? तो दे दीजिए ना रोज-रोज का टंटा खत्म कीजिए, नहीं तो कहीं पुलिस मुठभेड़ में ही मार देना चाहिए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;देश विकास के पथ पर है, इसमें गरीब और गरीबी, आदिवासी और जंगल की बात सिर्फ मानव संसाधन के लिहाज से होनी चाहिए, गरीबों को रोका ही नहीं है कि वे विकास कार्यो में मजदूरी करें, ऐसे मानव संसाधनों को जो देश के विकास की नींव हो सकते हैं, के किसी इतर स्वाभिमान की बात करना उन्हें देश के विकास के अलावा अपने विकास और भूख के नारे लगाने के लिए भड़काने का काम सेन प्रत्यक्ष परोक्षत: करते रहे हैं। यह राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा है। उन्हें तुरंत फांसी देनी चाहिए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेरी समझ में नहीं आता कि ऐसे सेन-नॉनसेंस जन्म ही कैसे ले लेते हैं? क्या ऐसे गुणसूत्रों को बैंक में रखकर किसी भी नवगर्भस्थ के गुणसूत्रों के मिलान और मिलान पर गर्भपात की राष्ट्रीय हित में मुकम्मल व्यवस्था करवाने का समय आ गया है। देश आजाद हो चुका है ऐसे नॉनसेंस को यह समझ क्यों नहीं आता? अब भगतसिंह की जरूरत नहीं है जिनकी जरूरत है वे सब हैं हमारे पास। ऐसे भगतसिंह को फांसी देनी ही चाहिए, २३ मार्च अभी दूर है, पहले ही दे दो। आखिर में १९९६ के नोबेल साहित्य की विजेता शिंबोर्स्का की एक पंक्ति- ''सबसे बड़ा व्यभिचार है सोचना''। इसलिए मेरे महान राष्ट्र भारत के वीरो, सोचिए मत, सेन बाबू को तुरंत फांसी देना सबसे बड़ा राष्ट्रहित है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/777405477924605622-6116399773944380633?l=dr-dushyant.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://dr-dushyant.blogspot.com/feeds/6116399773944380633/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=777405477924605622&amp;postID=6116399773944380633' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/777405477924605622/posts/default/6116399773944380633'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/777405477924605622/posts/default/6116399773944380633'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://dr-dushyant.blogspot.com/2011/01/blog-post.html' title='सेन को फांसी दे दो'/><author><name>DUSHYANT</name><uri>http://www.blogger.com/profile/00269010495016554374</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_N8y3Z3aRBB0/S9bM9k9LOYI/AAAAAAAAAZs/tXTU43tzans/S220/dusht.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_N8y3Z3aRBB0/TTgO7cz3khI/AAAAAAAAAcE/pCYvlIL1BJ8/s72-c/binayak-sen_6.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-777405477924605622.post-1572006273294917173</id><published>2010-12-17T09:41:00.001-08:00</published><updated>2010-12-17T09:55:41.222-08:00</updated><title type='text'>हमने अपनाया दर्द जमानेवाला</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://2.bp.blogspot.com/_N8y3Z3aRBB0/TQuj57O1a0I/AAAAAAAAAbw/rdQV41W15hI/s1600/Radia-Ratan-Tata.jpg"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 400px; height: 212px;" src="http://2.bp.blogspot.com/_N8y3Z3aRBB0/TQuj57O1a0I/AAAAAAAAAbw/rdQV41W15hI/s400/Radia-Ratan-Tata.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5551711181212052290" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;blockquote&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;निजता वहां समाप्त हो जाती है जहां उसके दायरे में आपके निजी संदर्भ समाप्त होना शुरू होते हैं।&lt;/span&gt;&lt;/blockquote&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;व्यवहार का बुनियादी सिद्धांत है कि मेरी आजादी का दायरा आपकी आजादी तक है और व्यक्तिगत आजादी का दायरा लिहाजा मौहल्ले, गांव, शहर प्रदेश और देश की आजादी से तय होना ही चाहिए। मैं अगर आपका दोस्त हूं और आपके परिवार और प्रियजनों के बारे में पूछता हूं और ठीक वैसा ही आप भी करते हैं तो यह निजता के दायरे में आता है, पर अगर हम आपस में देश समाज का कोई मुद्दा ले आते हैं और तय करते हैं, अगर वैध अवैध रूप से तय करने की स्थिति में हैं तो, तो यकीनन यह निजी बात नहीं है। राडिया मोहतरमा रतन टाटा साहेब से क्या गुफ्तगू करती हैं, कितनी अंतरंगता से करती हैं यह किसी गॉसिप का विषय हो सकता है पर गंभीर चर्चा का नहीं, वह अंतरंगता अगर किसी स्तर पर देश के फैसलों पर असर डालती है तो सेवा में सविनय निवेदन यह है कि यह आपकी निजता का उल्लंघन नहीं है, कतई नहीं है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह ऐसे वक्त का मसअला है जब विकीलिक्स के खुलासे कहर बरपा रहे हैं, इसके प्रमुख जूलियन असांजे को झूठे-सच्चे रेप के मुकदमे में फंसाया गया है और यह पंक्तियां लिखे जाने तक उन्हें लंदन हाईकोर्ट ने सशर्त जमानत दे दी है। वहां यही सवाल सरकारें भी उठा रही हैं, कि यह हमारी निजता और गोपनीयता का हनन है। मानना पड़ेगा कि वहां तो देशों के परस्पर संबध और कूटनीतिक सवाल तथा चुनौतियां महत्वपूर्ण हैं, दूसरे शब्दों में कहें तो निजता वहां समाप्त हो जाती है जहां उसके दायरे में आपके निजी संदर्भ समाप्त होना शुरू होते हैं। सिमटे तो बूंद और फैले तो समंदर, माफ कीजिए साहिब, ये तो मुमकिन नहीं है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;साहित्य और कलाओं में कहते हैं कि आपका लेखन और सृजन बडा होता है जब आपका दर्द और अनुभूतियां पूरे जहान का दर्द हो जाए, राडिया और रतन टाटा जैसे दीवानों की दीवानगी देखिए, देश के तथाकथित दर्द का अपना दर्द कहकर अपना बचाव करने की बेहद मासूम सी फिराक में हैं। इस मासूमियत पे कौन ना मर जाए ए खुदा? हां यह जरूर संभव है कि जहां से राष्टृ गौरव राडिया जी और रतन जी की अंतरंग बातें प्रारंभ होती हों उन्हें सार्वजनिक ना किया जाए। पर सब कुछ वैसा कब होता है जैसा होना चाहिए या जैसा हम चाहते हैं। राडिया रतन जो चाहते थे बहुत कुछ हुआ अब यह भी हो जाता कि सारा प्रसंग-प्र्रपंच जाहिर ना होता तो शाइर निदा फाजली की बात तो झूठ हो जाती और उन्हें जमी भी मिल जाती, आसमां भी मिल जाता और मुकम्मल जहां भी मिल जाता।    &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लगभग अप्रासगिक से कर दिए गए या हो गए नेता चौधरी देवीलाल का एक कथन हरियाणा के हर विधान सभा चुनाव में दीवारों पर पुतवाया जाता है कि लोकराज लोकलाज से चलता है, मुझे बेतरह इस प्रसंग में भी याद आ रहा है, दरअसल यह लडा़ई निजता की नहीं है लोकलाज की है, जिसे सत्ता और धन के मद में भुला दिया जाता है पर जब वे कर्म सामने आते है तो हमारी छवि को छिन्न-भिन्न होते हुए देखना हमारे लिए असह्य हो जाता है तो हमें निजता का आवरण याद आता है। मेरा बहुत विनम्र सा खयाल है कि हैकिंग, टैपिंग और सूचना का अधिकार कहीं करीब करीब ही हैं। संभव है ये सब मिलकर कुछ अच्छा करेगे। मंतव्य और परिणामों को साथ रखकर हर बात का मतलब निकालने की फुरसत किसके पास है साहेब। खुशवंत सिंह, अरिंदम चौधरी और कई स्तंभकार खुलकर पत्रकारों की कार्यशैली की आड़ में बरखा दत्त-वीर संाघवी को बचाने का प्रयास कर चुके हैं, पर मेरे जैसे कितनों के ही मन में उनकी नायकीय छवि कर जो हश्र हुआ है, वह नाकाबिलेभरपाई है। राडिया-रतन अपनी निजता और बरखा- वीर सांघवी अपनी पत्रकारीय शैली की दुहाई देकर क्या सब कुछ को झुठला सकते हैं? विज्ञान के ऊर्जा सरंक्षण के नियम को भी याद कर लूं कि ऊर्जा ना नष्ट होती है ना उसका जन्म होता है केवल रूप बदलता है। राडियाओं, रतनों, बरखाओं और वीरों के  फैसले, उनके पाप-पुण्य,अंतरंगताएं और अतुलनीय राष्ट्रप्रेम हमारी फिजाओं में रहेगा। क्यांकि अब यह इतिहास है और इतिहास पीढियां भुगतती हैं, लम्हों की खता सदियां झेलती हैं।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/777405477924605622-1572006273294917173?l=dr-dushyant.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://dr-dushyant.blogspot.com/feeds/1572006273294917173/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=777405477924605622&amp;postID=1572006273294917173' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/777405477924605622/posts/default/1572006273294917173'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/777405477924605622/posts/default/1572006273294917173'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://dr-dushyant.blogspot.com/2010/12/blog-post_17.html' title='हमने अपनाया दर्द जमानेवाला'/><author><name>DUSHYANT</name><uri>http://www.blogger.com/profile/00269010495016554374</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_N8y3Z3aRBB0/S9bM9k9LOYI/AAAAAAAAAZs/tXTU43tzans/S220/dusht.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_N8y3Z3aRBB0/TQuj57O1a0I/AAAAAAAAAbw/rdQV41W15hI/s72-c/Radia-Ratan-Tata.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-777405477924605622.post-4107873643947660752</id><published>2010-12-05T23:08:00.000-08:00</published><updated>2010-12-05T23:22:29.058-08:00</updated><title type='text'>पाखी के दिसम्बर अंक में आयी मेरी कहानी</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://2.bp.blogspot.com/_N8y3Z3aRBB0/TPyO8gTZWqI/AAAAAAAAAbo/zpLBlWvh1Ho/s1600/Mancora%2BPeru%2BSunset.jpg"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 300px; height: 400px;" src="http://2.bp.blogspot.com/_N8y3Z3aRBB0/TPyO8gTZWqI/AAAAAAAAAbo/zpLBlWvh1Ho/s400/Mancora%2BPeru%2BSunset.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5547466011128191650" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;&lt;br /&gt;ये भी समय है&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-style:italic;"&gt;&lt;span style="font-style:italic;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;&lt;blockquote&gt;यकायक एक अमेरिकन कंपनी में मैनेजर हो गया था मैं..तीसरे दर्जे के मेनेजमेंट इंस्टीटयूट से निकल कर ऐसी नौकरी एक चमत्कार ही था.. ये बाजाार के उत्कर्ष का दौर था...गधों और खच्चरों के घोडों के रूप में गिने जाने का दौर था.. ये वो दौर भी था जब अगर अंग्रेजी नहीं आती या कि कुछ नहीं बेच सकते तो सिर्फ  चुनाव के दिनों में किसी नेता के कार्यकर्ता ही बन सकते हो और कुछ नहीं..&lt;/blockquote&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;समय की बात इन लफ्जों में करना कहानीनुमा नहीं लगता होगा ना, फिर भी एक कहानी है ये और कहानी की हकीकत में ये नितांत निर्मम सा समय है, जब लगता है कि मैं ख़ुद को लगभग खो चुका हू...मेरा ये खोना भी मुझे कभी अजीब सा लगता है तो कभी ख़ुद का ये खोना एक नशे सा हो जाता है जैसे वोदका के तीन पैग हो गए हैं और डेढ़ पैग से ज्यादा मेरी औकात नहीं हैं..&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अवतार सिंह संधू पाश की कविता सबसे खतरनाक होता है सपनों का मर जाना को याद करते हुए गुनगुनाता हूं -&lt;br /&gt;मेरे सपनों की मौत के दिन अभी दूर हैं ..&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तो अक्षय कुमार गा रहा है&lt;br /&gt;अपनी शादी के दिन अब नहीं दूर हैं..&lt;br /&gt;या&lt;br /&gt;राजश्री की फिल्म विवाह से जन्मे और फैले कोर्टशिप के सपने मुझे नहीं दीखते हैं..ये बेवजह नहीं है वैसे हर बात और चीज की वजह जरूरी भी क्यों होनी चाहिए...ठीक यही बात सपनों के लिए है ...सपनों के बीच एक भूखा सा विराट दिन है जब काम के लिए घर से भूखा निकल गया हूं ..इन दिनों जब बेहद उदास रात है बेचौन सी सुबह है जैसे रात का हेंग ओवर अभी उतरा नहीं हो ..शांत दोपहर है जैसी गर्मियों की कोई दोपहर ..आज मेरी प्रेमिका साक्षी के आने के आसार नहीं के बराबर हैं .. वो किसी कंपनी में साक्षात्कार देने के लिए लॉबी में बैठी होगी हाथ में फाइल लिए ..उसे पता है साक्षात्कार के नाम पर उसके जिस्म और खासकर चेहरे के कोनों को देखा परखा जाना है। पर अब उसे इस चीज की आदत सी हो गयी है, पर अभी भी लगता है जैसे कई जोड़ी आंखें उसके शरीर को नोंच रही हैं। पहली बार जब उसे इसी तरह साक्षात्कार के वक्त  एक के सवालों के बीच कई लोगों की आंखें नख से शिख तक घूर रही थीं तो बेहद अटपटा लगा था..उस दिन वो  सचिवालय के पास वाले उस केफेटेरिया में मेरे कांधे पे सर रख के कितना रोई थी..मुझे आज भी याद है।&lt;br /&gt;ये बीतते अक्टूबर की एक महानगरीय सुबह है, बच्चे स्कूल के लिये निकल रहे हैं, सडक की सफाई करने वाले कुछ लोग दिख रहे हैं तो कुछ युवा जो खूबसूरत बदन चाहते हैं,लड़कियां जो जीरो साइज की हसरत लिये हैं अधेड़ अपना पेट कम करने को दौड़ते लग रहे हैं... कुछ लोग दूध ब्रेड लेने निकले हैं शायद... ये सुबह कभी बहुत तेज तो कभी प्रकटतया बहुत सुस्त लगती है पर वास्तव में बददिमाग और बदमाश सी हवाओं वाली चालाक सुबह है। इस सुबह में भी समय लगातार गतिमान है हमेशा की तरह...ये कहते हुए बी. आर. चोपडा की महाभारत के  हरीश भिमानी की आवाज नहीं भूलता- मैं समय हूं ..हां तो ये वो समय है जब चुनाव सर पे है....आदमी हताश है निराश है मैं भी उनमे से एक  हूं मेरा भी एक वोट है .. कई साल हो गए वोट देते हुए ,सरकारें बदली.. एमएलए बदले सांसद भी बदले..मेरा वोट भी उसमे भागीदार रहा पर अब सोचता हूं कि वोट से कुछ होता है क्या..मेरे या किसी के भी वोट से चेहरा नहीं बदला ..देश का न देश के राज का ..तकदीर नहीं बदली ..अपने कुटिल दिमाग से धन कमाकर घर या जिन्हें महल कहना ज्यादा ठीक होगा, बनवाकर रहने वाले लोगों की तकदीर बदली है, जमीनों को बेचकर उसकी दलाली में अतार्कि क रूप से बेतहाशा धन अर्जित करनेवालों की तकदीर बदली है ..ये वो समय है जब हिमेश रेशमिया टोपी उतार कर हीरो बन गया है ..प्रियंका चोपड़ा मलिका शेरावत और राखी सावंत में कोई फर्क नजार नहीं आता है .. कर्ज में डूबे किसान के लगभग बिकने की कगार पर खड़े हरेक खेत में मोबाइल है मोबाइल में नायिका है नायिका के कपड़े क्लीवेज दिखाने से शुरू  होकर अब बहुत कम रह गए हैं..बदन दिखाने के लिए कपड़े नहीं हैं अब बदन के बीच में कहीं कहीं कपड़े हैं ..नौकरियों के नाम पर नए सपने हैं पर नौकरी कहीं नहीं है ..रोटी के नाम पर चांद है चांद के नाम पर वोट हैं ..इसी समय में मैं अपनी तमाम सीमाओं में प्रेम कर रहा हूं सीमाओं में इसलिए कि बिना सीमाओं के जीना ही जब मुमकिन नहीं है तो प्रेम भला कहां सम्भव होगा.....तो सीमाओं के बीच मेरे इस प्रेम के बीच में भी सपने हैं ..सपनों में प्रेम है..प्रेम के साथ संकट हैं पर संकट के साथ समाधान नहीं है.. वो किसी टेलीशॉप पर सीधे साधे बिकाऊ  भी नहीं है उसके लिए कवच है हनुमान जी का ....मां दुर्गा का ....शिर्डी सांई बाबा का ..इन कवचों के बीच सास बहू की नोक झोंक और फूहड़ अभिजात्यता के दी एंड की ख़बर आयी है..मध्यमवर्गीय घरों में शोक पसर गया है.. पर ये शोक शांत नहीं है इस अशांत का बारहवें तक शांत होना असंभव है, ये अशांत शांति कई महीनों तक रहेगी ..कभी ये खबर भी उसी सास बहू के किस्से का हिस्सा नजर आती है&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ये समय है है जब ... इधर नवम्बर की घास मुरझा गयी है..ओबामा अमेरिका के राष्ट्रपति हो गए हैं ..भारत ये सुनकर खुशी के  मारे पागल सा हो गया है गांव की चौपाल से लेकर महानगरों के कॉफी हाउसेज से पब, बारों और मयखानों तक ...भारत को गर्व से लग रहा है हम अब अमेरिकी उपनिवेश हो गए हैं..या विश्व नागरिक  हम ..विश्व का राष्ट्रपति ओबामा ... प्रतिभा पाटील भारत की गवर्नर और मनमोहन सिंह मुख्यमंत्री... मेरा कुटिल दिमाग तो काफी समय से ये मान रहा है ..भारत तो अब मान रहा है ..अपनी नौकरी के लिए अमेरिका का शुक्रगुजार हूं .. ये एक अमेरिकन कंपनी है जिसमे नौकरी करता हूं...याद आता है कि मेरे अमेरिकन एक्सेंट में अंग्रेजी बोलने की तारीफ हुई थी जब तीन साल पहले मैं साक्षात्कार देने आया था..यकायक एक अमेरिकन कंपनी में मैनेजर हो गया था मैं..तीसरे दर्जे के मेनेजमेंट इंस्टीटयूट से निकल कर ऐसी नौकरी एक चमत्कार ही था.. ये बाजाार के उत्कर्ष का दौर था...गधों और खच्चरों के घोडों के रूप में गिने जाने का दौर था.. ये वो दौर भी था जब अगर अंग्रेजी नहीं आती या कि कुछ नहीं बेच सकते तो सिर्फ  चुनाव के दिनों में किसी नेता के कार्यकर्ता ही बन सकते हो और कुछ नहीं.. मेरे चयन के बाद घर पे दिवाली सा माहौल था.. बचपन से लेकर आज तक ऐसी दिवाली भी घर पे कहां मनी थी... रिश्तेदारों ने मान लिया था जैसे किसी अमेरिकन कंपनी नहीं अमेरिका में ही लाट साहब हो गया था.. औकात तो मुझे पता थी कि कोई बड़ा करिश्मा नहीं हुआ है वो दरअसल अमेरिका की एक दोयम दर्जे की या तीसरे भी कहें तो अतिशयोक्ति नहीं होगी, कंपनी है। तब मेरे एक सहकर्मी नैयर ने कहा था- हिन्दुस्तानी लोग फिल्मवालों और अमेरिका के नाम पर तो कूड़ा करकट भी चंदन की तरह माथे से लगाते हैं ...गुस्सा आया था मुझे। एक बार लगा कि नैयर देशद्रोहात्मक बात कर रहा है ...पर सच तो यही है। देखते देखते तीन साल गुजर गए हैं.. परिवार की उम्मीदों और सपनों का एक ही सहारा- मैं, और मेरा सहारा या आधार ये अमेरिकन कंपनी की नौकरी ...चीनी कम का अमिताभ बोलते हुए मेरे कानों में गूंजता है - डेव्लपड कंट्री माई फुट ।&lt;br /&gt;     अब देखें आर्थिक मंदी भी अमेरिका से शुरू हुई है ..&lt;br /&gt;मेरी कम्पनी के कारिंदों को एक मासूम सी सूचना दी जा चुकी है ..हमारी नौकरियां कभी भी जा सकती हैं..हम जिन पैकेज का नाम लेकर अपने छोटे शहरों में नायक बन गए थे वो कुछ दिनों में फिर से एक सपना होने वाले है ..सुनने में आया है कम्पनी ने हमारे बॉस संजय झा को अमेरिका बुला लिया है बस उसकी नौकरी बचने वाली है ..सिर्फ एक. नौकरी ..और हो सकता है उसे वहां जाकर अकेले में एक दिन आत्महत्या करनी पड़े और भारत में अखबारों के नवें या दसवें पेज की सिंगल कॉलम खबर बने जिस पर निगाह जाना भी नामुमकिन सा हो ।&lt;br /&gt;बहन की शादी के लिए लिया लोन अभी चल रहा है ..बापूजी रिटायर हो गए हैं..छोटा भाई  चिंटू पूना में आईटी पढ़ रहा है..वो भी हताश है कल उसका फोन आया है उसके सीनियर्स को नौकरी नहीं मिल रही है.. सुपर सीनियर्स की नौकरी जाने वाली है ..सुपर सुपर सीनियर के पैकेज घटा के आधे कर दिए गए हैं....उसकी पढ़ाई के लिए बाबूजी अपनी पूरी रिटायरमेंट मनी लगा चुके  हैं।&lt;br /&gt;देश डूबनेवाला है ..या बचने वाला है कोई नहीं जानता..उस मामले में मुझे तो देश के वित्तमंत्री भी कन्फ्यूज से लग रहे हैं ..खुदा खैर करे ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;समय बहुत निर्मम है .. या सपनों की निर्मम मृत्यु को देखना निर्मम लग रहा है ..&lt;br /&gt;मेरी प्रेमिका सपने देख रही हैं, उसके सपने पूरी तरह इस्टमेन कलर हैं, मैं अपनी नौकरी में तरक्की करते हुए अमेरिका जाऊंगा .. साक्षी अक्सर अमेरिका को एक्सप्लोर करती है इन्टरनेट पर.. वहां की सडकों और इमारतों .. लोगों और हरियाले मैदानों के सपने उसकी आंखों में आने लगे हैं या मुहावरे में कहूं तो तैरने लगे हैं....वो मुझसे रोज कहती है गूगल अर्थ पे आज बोस्टन देखा.. आज न्यूयार्क ...आज वॉशिंगटन.. आज सेंटियागो.. कभी कहती है उस अमेरिकन भारतीय को जानते हो क्या, कभी किसी प्रवासी भारतीय की उपलब्धि से इतना खुश होती है जितना अपने परिवार में किसी की उपलब्धि से नहीं हुई ..वो भी ना इन्टरनेट पर पता नहीं क्या क्या देखती है.. एक तरफ मेरे क्रेडिटके भुगतान बाकी हैं..मेरे मोबाइल के भुगतान और कार, एलसीडी की किश्तें बाकी हैं तो दूसरी तरफ उसे हवाई जहाज के किराए के सारे उतार चढ़ाव मालूम हैं ...अमेरिका के आईएसडी काल रेट भी याद हैं..अमेरिका के प्राइम शोपिंग डेस्टिनेशन भी उसकी उंगलियों पर हैं..अमेरिका में घरेलू नौकर आसानी से नहीं मिलते उसे पता है... वहां की सडकों पर कौनसी गाडियां ज्यादा ठीक रहती हैं..इसका उसे पूरा ज्ञान है इस ज्ञानार्जन में दोष उसका तो नहीं है.. मेरा भी नहीं है निर्मम समय का है.. वो अपने पति की पर्याप्त कमाई के साथ अनाथों, बुजुर्गोें के लिए काम करते हुए समाज सेवा करना चाहती है ...वो यूं बहुत डिमांडिंग नहीं है पर मानव स्वभाव के मुताबिक तो है ही, और उतना होना बुरा भी तो नहीं है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अपने से ऊपर यानी मैं, मेरी साक्षी, मेरा परिवार, मेरी छोटी सी दुनिया से उठकर सोचूं तो इस समय में साध्वी हिसा में लिप्त है या नहीं, इस बात को लेकर अखबारों में हल्ला है। राज ठाकरे मातृभूमि के लिए संघर्षरत हैं.. मायावती पता नहीं किस चीज के लिए संघर्षरत है.. अब उसकी लड़ाई ब्राह्मणों से मनुवादियों से नहीं रह गयी है, वे सब अब उसकी सामाजिक अभियांत्रिकी का हिस्सा हैं, लड़ाई अब सिर्फ मनु की किताब से.. ब्राह्मण नामक शब्द से है जिनका इन ब्राह्मणों से कोई वास्ता नहीं है जो अब उसके वोट हैं, मुलायम भी अब नए समाजवाद का सपना पाल रहे हैं- अखिलेशवादी समाजवाद क्योंकि ये राहुलवादी कांग्रेस का समय है और अपने अमर सिंह भैया, वे फिर मीडिया में दिखने वाले हैं सटोरिये सट्टा लगा रहे हैं इस बार उनके  साथ कौन होगा..अमिताभ .. ऐश्वर्या ..अभिषेक या अम्बानी या सब साथ..या अकेले...मेरे प्रेम से किसी का जुड़ाव नहीं है, मेरा प्रेम जिस निर्मम समय में संकट में है वो दरअसल इन सबका समय है।&lt;br /&gt;मेरा प्रेम भी संक्रमणकालीन ही तो है, मेरा किसी सार्वजनिक स्थान पर साक्षी को बात करते करते छूना कभी उसे असभ्य लगता है तो कभी जब वो सरेआम मुझे मेरी प्रशंसा करते हुए चूम लेती है तो मेरे झेंपने पर कहना कि तुम भी ना कितने मिडिल क्लास हो, मेरे पास चुप रहने के अलावा चारा नहीं होता..या जान बूझ कर बेचारा बन ना मुझे भला लगता है..पर ग्रंथि दिमाग में स्थिर हो जाती है, घर बना लेती है पर उसका यहां भी दोष नहीं होता, दोषी मैं भी नहीं होता, दोष निर्मम समय का होता है जिसे हम पकड़ नहीं सकते, उसे कोई सजा नहीं सुना सकते।&lt;br /&gt;वैसे देखें और आप भी कहेंगे कि समय अभी निर्ममतम नहीं हुआ है । अभी देश राम भरोसे है..पहले भी था.. अब कुछ ज्यादा ही हो गया है .. या कहें पूरी तरह से हो गया है... निर्ममतम समय इसलिए नहीं हुआ है कि मकबूल फिदा हुसैन और तसलीमा नसरीन अभी जिंदा हैं... पर बच्चन जी की मधुशाला को इस्लाम विरोधी घोषित कर दिया गया है... सत्यार्थ प्रकाश को भी इस्लाम विरोधी माना जा रहा है।&lt;br /&gt;समय अभी बस निर्मम है.. मैं प्रेम में हूं, एक नौकरी है, एक घर है, कुछ क्रेडिट कार्ड है , एक लोन है, कुछ किश्तें हैं, कुछ सपने हैं, मंदी है, अमेरिका है, ओबामा है, खुशी है, उल्लास है, स्टार प्लस से कलर तक पर चमचमाता भारत है। समय बेहतर है कि हम जिंदा हैं..समय उत्तम है कि  सांसें अभी आ रही हैं.. उसकी किश्तें नहीं देनी पड़ती.. समय अच्छा है कि सुबह घर से निकलता हूं तो शाम को मेरा घर मेरी शक्ल ठीक वैसी ही.. थोड़ी बुझी सी पर शक्ल देख तो पाता है। समय निर्मम है क्या? समय अभी गुमसुम है, समय अभी सुस्त है, समय अभी हमारा है , समय सबका है.. जिसमें ओबामा से ओसामा तक  सब अमेरिका के  नाम पर फिदा हैं। एक कारपोरेट और मल्टी नेशनल कंपनी में काम करते हुए वो भी अमेरिकन कंपनी में... जब मैं अमेरिका के खिलाफ  बोलता हूं.. सहकर्मी एक स्वर में मुझे माकर््िसस्ट कह देते हैं..मैं न तो न कह पाता हूं न ही हां। मुझे सच इन दोनों का बीच में कहीं प्रतीत होता है..मेरे साथ अक्सर ये अनिर्णय की स्थिति होती है जब मेरा निर्णय दो निर्णयों के बीच में कहीं होता है ।&lt;br /&gt;पर मैं खुश हूं कि मेरा वजूद अभी है.. साक्षी और मेरे परिवार का भी है, देश का भी होगा ही। इस बीच पूना से चिंटू के हॉस्टल से फोन आया है, वार्डन कर्नल मेहता ने उसके डिप्रेशन में आने की सूचना दी है, व्यथित हूं। ये खबर मेरे लिये दुखद तो है पर अप्रत्याशित कतई नहीं हैं। पता नहीं चिंटू कैसा होगा?&lt;br /&gt;मैं जिंदा हूं ..जिंदा मैं के साथ मुर्दा और निर्मम से इस समय में अखबार से लेकर सरकार तक सब किसी न किसी के परस्त हैं..जो परस्त नहीं है वो पस्त है ..उसका सूरज चांद सब अस्त है...&lt;br /&gt;फिर भी सबकी जय बोलने का मन है .. सबकी जय बोलने का समय है .. पराजय के क्षणों में जय का स्वर सुख देता है, चाहे वो छद्म की क्यों ना हो ।&lt;br /&gt;शांत! ये सबसे छुपके  रोने का समय है !&lt;br /&gt;समय की इस कहानी में मेरी आत्महत्या की खबर भी जोडकर इसे फिल्मी लहजे में जिगजैग वाली कहानी का धांसू दी एंड करने का मेरा कोई मन नहीं हैं... कोई अकेला नहीं मरेगा,हम लाख कहें कि मौत आदमी को अकेले ही गले लगानी होती है पर वास्तव में कभी मौत अकेले नहीं आती,अकेले नहीं ले जाती।&lt;br /&gt;समय के इस निरंतर संवाद को संभव है आप कहानी ना मानें पर ये अपने समय की कहानी है, समय जो सबसे छुपके रोने का है ...&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/777405477924605622-4107873643947660752?l=dr-dushyant.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://dr-dushyant.blogspot.com/feeds/4107873643947660752/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=777405477924605622&amp;postID=4107873643947660752' title='3 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/777405477924605622/posts/default/4107873643947660752'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/777405477924605622/posts/default/4107873643947660752'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://dr-dushyant.blogspot.com/2010/12/blog-post.html' title='पाखी के दिसम्बर अंक में आयी मेरी कहानी'/><author><name>DUSHYANT</name><uri>http://www.blogger.com/profile/00269010495016554374</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_N8y3Z3aRBB0/S9bM9k9LOYI/AAAAAAAAAZs/tXTU43tzans/S220/dusht.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_N8y3Z3aRBB0/TPyO8gTZWqI/AAAAAAAAAbo/zpLBlWvh1Ho/s72-c/Mancora%2BPeru%2BSunset.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-777405477924605622.post-7957111856112755944</id><published>2010-11-20T19:24:00.004-08:00</published><updated>2010-11-20T19:44:28.730-08:00</updated><title type='text'>शाही शादी में अब्दुल्ला और दीवाने कितने?</title><content type='html'>&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;&lt;blockquote&gt;&lt;br /&gt;एक सरकार आई थी जिसके लिए परंपरा और हैरिटेज का अर्थ केवल पर्यटन का बाजार था और अब अनेक बुद्धिजीवियों और मीडिया के दोस्तों के लिए हैरिटेज और राजस्थानी संस्कृति का अर्थ केवल सामंती परपराओं और प्रतीकों की निरंतरता है...&lt;/blockquote&gt;&lt;/span&gt;.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शादी की तैयारियां जोरों पर थी, और पर्यटन व्यवसाय से वाबस्ता एक दोस्त चैट पर मुखातिब थे, उन्होंने पूछा कि क्या मैं उसमें शामिल हो रहा हूं, तो मैं ने कहा कि मन नहीं है और मन होता भी तो न्यौता नहीं हैं। मैंने प्रतिप्रश्र कर दिया आप तो जा ही रहे होगे पेशेवर कारणों से? तो उन्होंने कहा कि कहां राजाओं के घर मैं सुदामा? मेरा जवाब अनायास था बंधु, माफ कीजिए, ना तो वो राजा हैं और ना आप सुदामा ही। तो मेरे दोस्त मेरी इस बात पर मुग्ध भाव से मुस्कुराए, जैसी भी मुस्कुराहट चैट बॉक्स में संभव थी। पर मेरी यह छोटी बात या छोटे मुह और छोटी बात कि वे अब राजा नहीं रहे, सबको पता है और नहीं भी, या बहुत से लोग पता होकर भी अनजान बने रहते हैं, संभव है इससे उनके कोई हित जुड़े हों, माफ कीजिए साहिब, अगर पत्रकार के लहजे में कुछ कह रहा हूं तो। पर देखिए ना, मीडिया का एक बड़ा तबका अब भी यह मान रहा है कि किसी राजकुमार की शादी है, कई राजे-राजकुमार शादी में शामिल हैं। संविधान में हम सब बराबर हैं, सारी शाही पदवियां समाप्त की जा चुकी हैं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब जब कि शादी हो गई है, मुहावरे में कहें तो सब कुछ राजी खुशी, सांई सेंती निपट गया है, मेरी यह अब्दुल्लानुमा दीवानगी ही मानिए कि अशुभ बातें कह रहा हूं, गौरवान्वित शहर का मजा किरकिरा कर रहा हूं, पर क्या किया जाए। एक सरकार आई थी जिसके लिए परंपरा और हैरिटेज का अर्थ केवल पर्यटन का बाजार था और अब अनेक बुद्धिजीवियों और मीडिया के दोस्तों के लिए हैरिटेज और राजस्थानी संस्कृति का अर्थ केवल सामंती परपराओं, प्रतीकों की निरंतरता है तो तकलीफ का ईमानदारी से बयान दीवानगी कहा जाए, वाजिब ही है। इस शहर में ऐसी दीवानगी वाले लोग कम नहीं होगे, यह भी मुझे यकीन है, अकेले होने का कोई मुगालता नहीं है मुझेे। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;खैर, हम सब आजाद हैं, अपनी राय बनाने के लिए, अपनी जिंदगियां और उसे जीने के तौर तरीके चुनने के लिए, संविधान को भूलने के लिए भी। पर राजस्थानी की एक कहावत हमें अपने आसपास टांग या चस्सा करके रख लेनी चाहिए- आप कमाया कामड़ा कीनै दीजे दोस।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/777405477924605622-7957111856112755944?l=dr-dushyant.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://dr-dushyant.blogspot.com/feeds/7957111856112755944/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=777405477924605622&amp;postID=7957111856112755944' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/777405477924605622/posts/default/7957111856112755944'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/777405477924605622/posts/default/7957111856112755944'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://dr-dushyant.blogspot.com/2010/11/blog-post.html' title='शाही शादी में अब्दुल्ला और दीवाने कितने?'/><author><name>DUSHYANT</name><uri>http://www.blogger.com/profile/00269010495016554374</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_N8y3Z3aRBB0/S9bM9k9LOYI/AAAAAAAAAZs/tXTU43tzans/S220/dusht.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-777405477924605622.post-4926835811349718481</id><published>2010-10-02T04:30:00.000-07:00</published><updated>2010-10-02T04:33:11.019-07:00</updated><title type='text'>मेरी जात क्या पूछते हैं साहिब ?</title><content type='html'>&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_N8y3Z3aRBB0/TKcYVqPj1tI/AAAAAAAAAbU/4NQff5wTj0k/s1600/caste.jpg"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 260px; height: 247px;" src="http://3.bp.blogspot.com/_N8y3Z3aRBB0/TKcYVqPj1tI/AAAAAAAAAbU/4NQff5wTj0k/s400/caste.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5523410228389074642" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;blockquote&gt;महानगरों में डेढ़ दशक की रहनवारी के बाद मैं नाउम्मीद सा हूं कि भारत में कभी ऐसा होगाकि जब लोग आपकी जातीय पहचान जानने को लालायित नहीं होंगे। मेरा जाती खयाल है कि यह लालायित तबका हमेशा ही बड़ा रहा है और रहेगा भी। &lt;/blockquote&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; लेखक और जाने माने स्तंभकार डॉ. वेदप्रताप वैदिक पिछले दिनों मेरे लिए अतिरिक्त सम्माननीय इसलिए हो गए कि उन्होंने जनगणना में जातीय आधार और फिर जातिवाद के खिलाफ एक अभियान की जोरदार कोशिश की, मैं जाती तौर पर इस खयाल का रहा हूं, थोड़ा व्यक्तिगत बात कहने की छूट लेते हुए कहूं तो इसीलिए अपने नाम को किसी जातिमूलक प्रत्यय से बचा के रखता हूं। मेरा मानना है कि अगर मैं अपने काम में बुरा हूं तो गाली देने के लिए और अच्छा हूं तो भी श्रेय के लिए किसी जातिसूचक शब्द तक जाने की जरूरत क्या है। वैसे यह भी पूरी तरह जाती मामला है कि आप अपनी पहचान किस रूप में मानते हैं और किस रूप में लोगों के सामने पेश होना चाहते हैं, यकीन मानिए मुझे जरा भी अफसोस नहीं है कि इस घोर गैरजातिवादी सोच के कारण जिंदगी में कितने दोस्त खोए हैं जिनके लिए किसी की पहचान उसकी जात से शुरू होती है। इतिहास के थोड़े बहुत जानकार तो कम से कम मेरे साथ खड़े ही होंगे कि इनसान तो दुनिया में तब भी था जब किसी काल विशेष में जातियों का विभाजन नहीं हुआ था, और तार्किक रूप से जब कर्म के आधार पर, अगर केवल भारतीय संदर्भों की बात करें तो, पहले वर्ण बनें और तदंतर वे जाति के रूप में प्रतिस्थापित, प्रचलित और मान्य हो गए, सेवा में, सविनय निवेदन है कि, तो फिर क्या इस मूलत: कर्म आधारित व्यवस्था को पूरे जीवन का आधार बनाना वाजिब है?  &lt;br /&gt;मुझे अपने विद्यार्थी जीवन का एक किस्सा याद आता है, मुझसे एक बहुत मेधावी लड़की, जो एक दर्जा आगे थी पर उम्र में मुझसे छोटी थी, तथाकथित रेगिंग के दौरान, उसने मेरे नाम को अधूरा पाकर पूछा- आगे?  तो इस अप्रत्याशित सवाल पर मेरा जवाब भी अनायास था कि अगर मैं जिस जाति से हूं जिससे आप, तो क्या आप मुझसे शादी कर लेंगी और नहीं तो क्या मुझे गोली मार देंगी? मेरे जवाब में तल्खी थी और अब उसके पास कोई जवाब नहीं था, जाहिरन उसका मूड खराब हुआ और मेरा भी। और फिर जब तक हम उस संस्थान में रहे, हमारा छत्तीस का आंकड़ा रहा। इससे इतर भी जिंदगी में जाति ना जाहिर करने की वजह से बहुत अजीबोगरीब वाकए मेरे साथ हुए हैं, कई बार लोग यह मानते हैं कि दलित होकर किसी हीनताबोध में जाति छुपाता हूं, या कई बार तथाकथित वर्णसंकर होने के किस्से अपने बारे में सुनने को मिलते हैं, जो मानना चाहें लोग मान सकते हैं। काबिले गौर है कि ऐसे वाकए तथाकथित सभ्य-पढ़े लिखे तबकों की ओर से होते हैं, महानगरों में डेढ़ दशक की रहनवारी के बाद मैं नाउम्मीद सा हूं कि भारत में कभी ऐसा होगाकि जब लोग आपकी जातीय पहचान जानने को लालायित नहीं होंगे। मेरा जाती खयाल है कि यह लालायित तबका हमेशा ही बड़ा रहा है और रहेगा भी। &lt;br /&gt;अपने निजी उदाहरण से ही एक बात और कहूं तो अपनी नौकरियों के दौरान भी एचआर विभागों के लोगों से हर जगह मेरी झड़प हुई है, वे कोई तर्क आसानी से नहीं मानते कि मैं क्यों अपनी पहचान में जाति इस्तेमाल नहीं करता, और वे मेरे पिता के नाम से उठा के जातिवाचक शब्द मेरे नाम से जोड़ देते हैं, और मैं अकसर उग्र हो जाता हूं, पर फिर मुझे उन पर रहम आता है, और फिर खुद पर भी। दुआ ही कर सकते हैं कि जातियां हमारी बुनियादी पहचान ना बनें, और जातियों के आधार पर हम दोस्तियां या रिश्ते या दुश्मनियां ना बनाएं। ऐसे जातिनिरपेक्ष लोग अभी तो बहुत कम हैं, वैसे भी हमें जातियों में बांटकर अपनी जीत को पक्का करना सियासत की मजबूरी और बेशर्मी हो सकती है, पर हमारी क्यों हो?&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/777405477924605622-4926835811349718481?l=dr-dushyant.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://dr-dushyant.blogspot.com/feeds/4926835811349718481/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=777405477924605622&amp;postID=4926835811349718481' title='4 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/777405477924605622/posts/default/4926835811349718481'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/777405477924605622/posts/default/4926835811349718481'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://dr-dushyant.blogspot.com/2010/10/blog-post.html' title='मेरी जात क्या पूछते हैं साहिब ?'/><author><name>DUSHYANT</name><uri>http://www.blogger.com/profile/00269010495016554374</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_N8y3Z3aRBB0/S9bM9k9LOYI/AAAAAAAAAZs/tXTU43tzans/S220/dusht.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_N8y3Z3aRBB0/TKcYVqPj1tI/AAAAAAAAAbU/4NQff5wTj0k/s72-c/caste.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-777405477924605622.post-7593588470625884663</id><published>2010-08-07T03:57:00.000-07:00</published><updated>2010-08-07T04:03:56.518-07:00</updated><title type='text'>राय साहब को खुद शर्म क्यों नहीं आती ?</title><content type='html'>&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_N8y3Z3aRBB0/TF09DQpdCFI/AAAAAAAAAa4/y8aUXpjw7W4/s1600/vc.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 192px; height: 200px;" src="http://2.bp.blogspot.com/_N8y3Z3aRBB0/TF09DQpdCFI/AAAAAAAAAa4/y8aUXpjw7W4/s200/vc.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5502621445934352466" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;blockquote&gt;मेरी मासूम जिज्ञासा है कि वे बेवफाई के विशेषज्ञ के रूप में साक्षात्कार दे रहे थे या कि स्त्रीविमर्श के अधिकारी विद्वान के रूप में? एक जिज्ञासा यह भी है कि क्या राय साहब को एकांत में बैठकर भी इस बयान पर थोड़ी शर्म आई होगी या नहीं? क्या सोचा नहीं होगा कि अपनी लेखिका मित्रों का सामना वे इस बयान के बाद कैसे करेंगे?&lt;/blockquote&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;...पहले घटना से आपका परिचय कराना जरूरी लगता है, दुनिया के अकेले हिंदी विश्वविद्यालय के कुलपति ने एक साक्षात्कार में कह दिया - 'लेखिकाओं में यह साबित करने की होड़ मची है कि कौन बड़ी छिनाल है।' यहां कहना जरूरी है कि शब्दकोश के मुताबिक छिनाल शब्द का अर्थ होता है- यौनकर्मी या साधारण लफ्जों में कहें तो वेश्या। इतने कहके वे रुक जाते तो गनीमत थी, पर नहीं रुके तो नहीं रुके, आगे कहा - ''मुझे लगता है कि इधर प्रकाशित एक बहुप्रमोटेड और ओवर रेटेड लेखिका की आत्मकथा पुस्तक का शीषर्क कितने बिस्तरों में कितनी बार होना चाहिए था।' उन्होंने तो सारे स्त्रीविमर्श को बेवफाई के विराट उत्सव का ही नाम दे दिया। अब जरा संज्ञाओं में बात की जाय। महात्मा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा के कुलपति विभूतिनारायण राय ने भारतीय ज्ञानपीठ द्वारा प्रकाशित चर्चित साहित्यिक मासिक पत्रिका के अगस्त अंक में जो कि सुपर बेवफाई विशेषांक था, में अतिउत्साहित होकर दिए साक्षात्कार में यह प्रवचन दिया था। बतादें कि इस पत्रिका के संपादक रवींद्र कालिया हैं।&lt;br /&gt;मेरी मासूम जिज्ञासा है कि वे बेवफाई के विशेषज्ञ के रूप में साक्षात्कार दे रहे थे या कि स्त्रीविमर्श के अधिकारी विद्वान के रूप में? एक जिज्ञासा यह भी है कि क्या राय साहब को एकांत में बैठकर भी इस बयान पर थोड़ी शर्म आई होगी या नहीं? क्या सोचा नहीं होगा कि अपनी लेखिका मित्रों का सामना वे इस बयान के बाद कैसे करेंगे?&lt;br /&gt;पहली अगस्त को जब यह दिल्ली के अखबारों की खबर बनी तो बवाल मचना ही था, सो मचा। हिंदी की लेखिकाओं के साथ हिंदी लेखकों में साबित करने की होड़ मच गई कि वे स्त्री अधिकारों और उनकी अस्मिता चेतना के प्रति गंभीर हैं। चैनलों ने शायद पहली बार हिंदी साहित्य को इतना प्रमुखता से उठाया, कुलपति के कारण टीआरपी के खेल में इससे मदद मिलनी ही थी। कुलपति महोदय चैनलों पर कहते रहे कि छिनाल शब्द का तो प्रेमचंद ने भी सौ बार इस्तेमाल किया है, मेरे कहने का तात्पर्य तो उन्हें अनिश्चित कहने यसे था। जवाब में मैत्रेयी पुष्पा जिनकी आत्मकथा की ओर उन्होंने इशारा किया था, ने उन्हें लफंगा कहा, और यहां तक कि राय और कालिया की लेखिका पत्नियों के बारे में भी कहा। स्त्रीविरोधी वक्तव्य के लिए उनकी माफी की मांग हुई, लेखिकाओं का दल वृंदा करात के साथ मानव संसाधन विकास मंत्री कपिल सिब्बल से भी मिला, पता चला कि कुलपति महोदय को भी मंत्री ने बुलाया और कहा कि वे माफीनामा दें और आगे से सतर्क रहने की बात कहें, तो राय ने कहा कि आगे से सतर्क रहने कर बात वे लेखक के तौर पर नहीं कह सकते तो सिब्बल ने कहा कि या वे लेखक ही रहें या कुलपति। इसी बीच ज्ञानपीठ से सम्मानित मशहूर बांग्ला लेखिका महाश्वेता देवी भी कुलपति की बर्खास्तगी और माफी की मांग करने वालों के साथ आ गईं। इधर फेसबुक और ब्लॉग की दुनिया में भी माहौल अपने चरम पर है। फिलहाल ताजा खबर है कि विभूति ने सिब्बल को माफीनामा सौंप दिया है, और दूसरी तरफ ज्ञानपीठ सम्मान देने वाली समिति के पैनल से उन्हें हटा दिया गया है और उनकी जगह नामवर सिंह को ले लिया गया है। पर बवाल अभी थमा नहीं है, लेखिकाएं और लेखक खासकर युवा लेखकों की जमात विभूति नारायण राय के माफीनामे से संतुष्ट नहीं हैं, वे उनकी कुलपति के पद से विदाई चाहते हैं, इस आधार पर कि ऐसी सामंती और पुरुष सत्तावादी सोच वाला व्यक्ति ऐसे संवैधानिक पद पर कतई नहीं होना चाहिए। और साथ ही संपादक रवींद्र कालिया भी उनके निशाने पर हैं ही। कालिया की विदाई कर मांग तो तार्किक है ही क्योंकि पीआरबी एक्ट के तहत जिम्मेदारी संपादक की होती है कि उसके यहां क्या छप रहा है। &lt;br /&gt;यकीनन हिदी समाज की अपनी समस्याएं और पूर्वाग्रह हैं, यह प्रकरण उनकी छाया से मुक्त नहीं हैं, वैसे, हर समाज, हर वर्ग में राजनीति होती है तो हिंदी की साहित्यिक दुनिया में भी हैं ही। कुछ लोगों का मानना है कि अब इस विवाद का व्यापक होता रूप कुलपति के दावेदारों के बीच की लड़ाई है, उन्हें मौका मिल गया है और अब वे विभूति को निपटाने में लगे हैं। पहले माफी पर जिस तरह हिंदी लेखकों में एक जुटता रही, अब उसमें इस बात पर दरार भी है कि माफीनामे के बाद विभूति नारायण पर बहस खत्म हो जानी चाहिए, और अब अभियान का निशाना केवल संपादक कालिया को बनाया जाना चाहिए। जबकि दूसरा खेमा जिसमें विभूति को हर तरह निपटाने की मंशा में जुटे लोगों के साथ पीड़ित लेखिकाओं और स्त्री अस्मिता के पहरूवा लेखकों का है। &lt;br /&gt;१९७५ बैच के यूपी कैडर के आईपीएस विभूति नारायण राय बतौर इस विश्वविद्यालय के दूसरे कुलपति, पहले भी विवादित रहे हैं, संस्थापक कुलपति रहे थे अशोक वाजपेयी। विश्वविद्यालय में स्थाई नियुक्तियों का काम राय ने किया है पर विवाद वहीं हुआ जिसमें अनिल चमड़िया की प्रोफेसर पद पर नियुक्ति के बाद उन्हें हटाया जाना भी शामिल है। यहां तक कि पत्रकारिता विभाग में प्रोफेसर और अध्यक्ष पद पर नियुक्ति पर भी अच्छा खासा विवाद रहा था। आरोप में कहा गया कि उनके द्वारा नकल करके किताबें लिखी गईं और उन्हीं के आधार पर उन्हें नियुक्ति मिली। &lt;br /&gt;बहरहाल, ताजा प्रकरण में देखना जरूरी है कि नैतिकताओं के सवाल तो बड़े हैं ही साथ ही, यह भी है कि राय प्रकरण के बहाने हिंदी साहित्य समाज की बुनियादी चीजों पर नजर डाली जाए। मैंने कई मित्रों से बात की, एकाधिक पुरुष लेखक दोस्तों ने चुपके से कहा कि राय की बात किसी हद तक सही है, पर यूं कहने की नहीं है, आखिर इसे किस रूप में लिया जाए। दरअसल भारतीय समाज की बुनियादी समस्याओं से हिंदी समाज और खासकर लेखक समाज दुर्भाग्य से अलग नहीं हो पाया है। बड़ा करके देखें तो उसका हिस्सा हैं तो अलग दिखना और होना आसान नहीं है। बारबार दोहराने का मतलब नहीं है कि हमारा समाज अब भी पुरुषसत्तावादी, उसकी सोच सामंती है, तो वह छनकर हिंदी साहित्यिक समाज तक भी आएगी ही। सच है कि चंद माफीनामे कितना असर डालेंगे? यह तो वह हैे जो छपकर आ गया, वरना बंद किवाड़ों में, महफिलों में, कॉफी हाउसों में, मयखानों में शाब्दिक बलात्कार की हदें तो कल्पनातीत हैं ही। यहां सवाल अभ्व्यिक्ति की आजादी का भी है, कहां तक और कितनी? कमाल यह है कि इस प्रकरण पर अभिव्यक्ति की आजादी को इस संदर्भ में कोई नहीं देख रहा? मैं यह नहीं कह रहा कि देखना चाहिए ही, पर तर्क की कसौटियां संदर्भश: होती है, बदलती हैं, यह तो लगता ही है। तार्किक तौर पर बोधिसत्व के इस मत कि माफीनामे के बाद राय की कुलपति पद से विदाई की मांग छोड़ देनी चाहिए, से मैं भी सैद्धांतिक रूप से सहमत हूं पर मेरा मन यह पूछता है कि ऐसी सोच के साथ राय साहब अपने विश्वविद्यालय की छात्राओं महिला अध्यापकों और अन्य महिलाकर्मियों से कैसे पेश आते होंगे या मन में क्या सोचते हुए उनसे बात करते होंगे? संभव है कि मैं तकरीबन एक दशक तक प्रत्यक्ष परोक्षत: स्त्री विमर्श और शोध-संधान में बिताने के बाद अगर थोड़ा भावुक होकर यह कह रहा होऊं, पर किसी भी पुराने शहर के तंग रास्तों से गुजरते हुए जिस तरह की की मिलीजुली अनुभूति होती है, वैसी इस प्रकरण पर सोचते लिखते हो रही है तो यकीन कीजिए कि यह कतई सायास नहीं है। वैसे, इस प्रकरण का उत्स लगभग वैसी ही बात है कि जैसे कुछ बरस पहले हंस के सपादकीय में राजेंद्र यादव ने कहा था कि 'क्यों पुरुषों की तमाम गालियां चाहे पुरुष को दी जाने वाली हों या महिलाओं को दी जाने वाली, का संबध सिर्फ महिलाओं से ही होती है, उसके ही यौनकर्म और जननेंद्रिय से होता है।' और मैं अपनी तरफ से जोड़ दूं कि पुरुष के यौन व्यवहार और जनने¨द्रय का इस्तेमाल तथाकथित वीरता के रूप में ही होता है। क्या राय साहब इसी शर्मनाक तथाकथित वीरता की मुद्रा में नहीं है?&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/777405477924605622-7593588470625884663?l=dr-dushyant.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://dr-dushyant.blogspot.com/feeds/7593588470625884663/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=777405477924605622&amp;postID=7593588470625884663' title='4 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/777405477924605622/posts/default/7593588470625884663'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/777405477924605622/posts/default/7593588470625884663'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://dr-dushyant.blogspot.com/2010/08/blog-post.html' title='राय साहब को खुद शर्म क्यों नहीं आती ?'/><author><name>DUSHYANT</name><uri>http://www.blogger.com/profile/00269010495016554374</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_N8y3Z3aRBB0/S9bM9k9LOYI/AAAAAAAAAZs/tXTU43tzans/S220/dusht.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_N8y3Z3aRBB0/TF09DQpdCFI/AAAAAAAAAa4/y8aUXpjw7W4/s72-c/vc.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-777405477924605622.post-1576030430692251668</id><published>2010-06-21T01:54:00.000-07:00</published><updated>2010-06-21T02:03:20.424-07:00</updated><title type='text'>लेखक भी तो बाजार का हिस्सा हैं</title><content type='html'>&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_N8y3Z3aRBB0/TB8qeo3sdhI/AAAAAAAAAaw/Mj_fXIl-lWE/s1600/book.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 240px;" src="http://4.bp.blogspot.com/_N8y3Z3aRBB0/TB8qeo3sdhI/AAAAAAAAAaw/Mj_fXIl-lWE/s320/book.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5485149577016014354" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;blockquote&gt;क्या आप यकीन कर सकते हैं कि आजादी के बाद के साठ सालों के बारे में कोई इतिहास निर्विवादित रूप से लिखा जा सकता है जिस पर कोई ना कोई ‘आहत’ ना हो। &lt;/blockquote&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कोई लेखक क्यों लिखता है, सवाल बहुत बड़ा है और इसके जवाब कई हो सकते हैं। इस एक सवाल पर सैंकड़ों शोध हो सकते हैं, हुए भी होंगे, कई किताबें लिखी जा सकती हैं, लिखी भी गई होंगी। इस विषय पर लिखने के बारे में सोचने से पहले लेखक रसेल बेकर का एक कथन कहीं से मेरे सामने आया और जेहन पर तारी रहा है। वह कथन यह है- ‘मैं केवल लेखक होने के लिए ही उपयुक्त था, मुझे संदेह था कि क्या मैं वास्तव में कोई भी कर सकता हूं, लेखन के लिए किसी काम को करने की जरूरत ही कहां होती है।’ आंशिक रूप से सहमत होते हुए भी मैं रसेल के इस कथन से पूरी तरह सहमत तो नहीं हो सकता। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इतिहास का विद्यार्थी हूं और हाल के कुछ सालों में इत्तेफाकन इतिहास पर लिखी किताबों ने ही ज्यादा कहर बरपाया है, कई चूलें हिलाई हैं, सत्ताएं उखड़ती-उखड़ती बची हैं। कभी नेहरू को लेकर, कभी गांधी को लेकर, कभी जिन्ना को लेकर कभी इंदिरा को लेकर। मैं अक्सर ये सोचता हूं कि आजादी के बाद के भारत को लेकर सबसे महत्वपूर्ण किताब रामचंद्र गुहा ने लिखी- इंडिया आफ्टर गांधी। शुक्र है कि उस पर कोई विवाद नहीं हुआ, मुझे यकीन है कि विवाद पैदा करने वाले इसका वृहदाकार देखकर खोलने की हिम्मत नहीं करते होंगे, खोजकर विवादास्पद पंक्ति या विचार खोजना तो बाद की बात है। क्या आप यकीन कर सकते हैं कि आजादी के बाद के साठ सालों के बारे में कोई इतिहास निर्विवादित रूप से लिखा जा सकता है जिस पर कोई ना कोई ‘आहत’ ना हो। इसलिए मेरे प्रिय इतिहासकार गुहा पर निस्संदेह ईश्वर मेहरबान है, शुक्र है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जिन्ना पर जसवंत सिंह ने लिखा, बवाल मचा, गांधी पर जेड एडम्स की किताब आई -नेक्ड एम्बिशन, बवाल ना हो, ऐसा हो नहीं सकता था, तो हुआ। अब तो कई बार यह भी लगता है कि इन ऐतिहासिक पात्रों पर कुछ भी लिख दीजिए, चर्चा और विवाद तय है। और यही बात इस बहस की मूल बात है जिसे दूसरे तरीके से कान पकडऩे के रूप में लेना चाहिए यानी लेखक विवादित होकर चर्चा मे आकर लिखता है या इन विषयों पर कुछ भी लिख दे तो चर्चा में आना, विवाद में आना लाजिम है। मेरी राय है कि नई किताब आए तो ज्यदा महत्वपूर्ण उसका तथ्यसम्मत होना है, संभव है लेखक ने अब तक अज्ञात या लगभग अज्ञात तथ्यों और स्रोतों को खेजा हो या पूर्व उपलब्ध तथ्यों और स्रोतों की पुनव्र्याख्या की हो। जेड एडम्स जो एक काबिल और समझदार इतिहासकार माने जाते रहे हैं, ने भी यही किया, विवाद होना लाजिम था क्योंकि इसमें एक महान इनसान की सहज मानवीय कमजोरियों की ओर इशारा था, यह कौन पूछे कि वो तथ्यसम्मत है या नहीं, हम उनके नाम पर राजनीति की रोटी सेंकते हैं, तो उनकी छवि को बेदाग रहना चाहिए तथ्य जाए भाड़ में, व्याख्या जाए जहन्नुम में। और यही बात बहुत संभव है कि जेवियर मोरो की लाल साड़ी को लेकर हो। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब जरा इस बात पर आएं कि लेखक क्या ऐसे विषयों पर जानबूझ कर लिखता है, इस तरह से जानबूझकर लिखता है कि वह विवाद में आ जाए, पहली बात तो यह कि विवदित विषय पर लिखने में कोई बुराई नहीं है, पर शर्त इतनी सी है कि तथ्यों के साथ लिखा जाए। ओमपुरी की जीवनी लिखी नंदिता पुरी ने, जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल के दौरान एक डिनर पर वे साथ थीं तो पत्रकारीय मित्रता भाव से पूछ बैठा, उनका जवाब विश्वसनीय था, जिसे बाद में उन्होंने मंच से भी स्वीकारा कि उस किताब के विवादित अंश बिना उनकी जानकारी के संभवत: प्रकाशक ने जारी कर दिए। तो दूसरी बात यह कि मुझे यह लगता है कि विवाद और उसके बाद बेस्टसेलर होने के गणित में  लेखक से ज्यादा भूमिका प्रकाशक की होती है, किताब लिखना और छपना दोनों अलग बाते हैं और छपकर बिकना इससे भी अलग और आगे की बात। लेखक चाहे- अनचाहे इस बाजार के गणित का हिस्सा ना हो, ऐसा दावे के साथ हम नहीं कह सकते, पर लेखक लिखता क्यों है और विवादित लेखन सायास करता है क्या? इस सवाल के लिए हमें यह और साफ तौर पर देखने की जरूरत है कि यश की इच्छा तो सृजन में छुपी होती ही है, और सृजन के पाठक या दर्शक या श्रोता की दरकार भी सहज है, इसके साथ अर्थ का जुडऩा भी स्वाभाविक है, अखबार तात्कालिक और विवादित विषयों को उठाते ही है, यह पठनीयता के लिहाज से किया जाता है, और यह पठनीयता बाजार से भी कई बार संचालित होती है, पर पुस्तक लेखन हो या अखबार, इसका विस्तार अतिरेक में किसी भी हद तक जाने का हो जाए, यह असंभव नहीं है तो सही तो इसे कोई शायद ही कहेगा, पर अंतत: अगर बाजार का दोष है तो गालियां सिर्फ लेखक को क्यों दी जाए? यानी उसे बेचारा मान कर उसी को बलि का बकरा मत बनाइए।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/777405477924605622-1576030430692251668?l=dr-dushyant.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://dr-dushyant.blogspot.com/feeds/1576030430692251668/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=777405477924605622&amp;postID=1576030430692251668' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/777405477924605622/posts/default/1576030430692251668'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/777405477924605622/posts/default/1576030430692251668'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://dr-dushyant.blogspot.com/2010/06/blog-post.html' title='लेखक भी तो बाजार का हिस्सा हैं'/><author><name>DUSHYANT</name><uri>http://www.blogger.com/profile/00269010495016554374</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_N8y3Z3aRBB0/S9bM9k9LOYI/AAAAAAAAAZs/tXTU43tzans/S220/dusht.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_N8y3Z3aRBB0/TB8qeo3sdhI/AAAAAAAAAaw/Mj_fXIl-lWE/s72-c/book.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-777405477924605622.post-7493391289554692655</id><published>2010-05-22T23:48:00.000-07:00</published><updated>2010-05-23T00:09:16.996-07:00</updated><title type='text'>चेतन भगत की मासूम अनभिज्ञता और मेरा मत खाप पंचायतों के पक्ष में !</title><content type='html'>&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_N8y3Z3aRBB0/S_jT-dM0kzI/AAAAAAAAAao/4XnwBwD6o5M/s1600/herzinlila.jpg"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 378px; height: 331px;" src="http://4.bp.blogspot.com/_N8y3Z3aRBB0/S_jT-dM0kzI/AAAAAAAAAao/4XnwBwD6o5M/s400/herzinlila.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5474358417012593458" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;blockquote&gt;&lt;strong&gt;जाति व्यवस्था का बदनाम दर्जे का विरोधी हूं, पर बावजूद इसके सगोत्रीय विवाह के समर्थन में खडा नहीं हो पा रहा हूं। .....प्यार बहुत खूबसूरत चीज है, चीज ना कहें भावना कह लें, पर क्या यह तर्क हमें इस दर्जे की अराजकता की ओर नहीं ले जाएगा कि कल को सगे भाई बहन भी प्यार करके शादी कर रहे हैं!&lt;/strong&gt;&lt;/blockquote&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चेतन भगत को मैं इसलिए बहुत पसंद करता हूं कि उन्होने भारत में लेखकीय गरिमा को नई उचाइयां दी है, हालांकि मैं वाकिफ हूं कि वे अंग्रेजी साहित्य के वेदप्रकाश शर्मा हैं और ये भी जानता हूं कि साहित्यिक मर्तबे में अमित चौधरी चेतन से कहीं आगे हैं, चाहे उनकी किताबें चेतन से चौथाई भी ना बिकती हों। चेतन ने अपने एक ताजा स्तंभ में यह कहकर मुझे बिल्कुल भी नहीं चौंकाया कि वे गोत्र नाम की चीज को नहीं जानते, उन्हें अपना गोत्र भी पता नहीं है, हालांकि अगली बात जो उन्होंने कही, वह उनकी व्यक्तिगत पसंद का मसला है कि वे उसे जानना चाहते हैं या नहीं। चौकाया इसलिए नहीं कि अक्सर यह कहा जाता है कि अंग्रेजी पढे लोग अपनी जडों और परंपराओं से वाकिफ नहीं है, चेतन की यह मासूम अनभिज्ञता क्या उसी मिथ को पुख्ता नहीं करती ! चेतन से यह उम्मीद बेमतलब नहीं है कि हम चाहें असहमत हों पर भारत के सामाजिक विकास और परंपराओं के इतिहास की इतनी समझ तो भारत के लेखक को होनी ही चाहिए। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;खापों के मुददे पर लिखने का मन था, पर खुद को भारी असमंजस में पाया, वजह यह थी कि जाति व्यवस्था का बदनाम दर्जे का विरोधी हूं, पर बावजूद इसके सगोत्रीय विवाह के समर्थन में खडा नहीं हो पा रहा हूं। खापों की तरीका यकीनन अमानवीय, अलोकतांत्रिक और तानाशाहीपूर्ण है, उन पर नियंत्रण की बात बिल्कुल वाजिब है, पर उनकी सगोत्र विवाह की मनाही की बात गलत नजर नहीं आती, दिल्ली में एक टीवी चैनल में काम करने वाले मेरे दोस्त ने कहा कि भाई! आप प्यार पर बंधन चाहते हैं क्या! प्यार तो कहीं भी हो सकता है!  तो मैंने उन्हे भारी असमंजस और मुझे दकियानूसी कहे जाने की प्रबल संभावनाओं के भय के साथ कहा कि प्यार बहुत खूबसूरत चीज है, चीज ना कहें भावना कह लें, पर क्या यह तर्क हमें इस दर्जे की अराजकता की ओर नहीं ले जाएगा कि कल को सगे भाई बहन भी प्यार करके शादी कर रहे हैं! हालांकि मैं जानता हूं कि तब इसके लिए भी समर्थन जुटाने की कोशिश में भाई लोग ऋग्वेद के यम यमी संवाद और संबंध तक पहुंच जाएंगे। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दूसरी बात यह कि जातीय आरक्षण के लिए आंदोलनों के दौर से पहले जिस तरह का माहौल, चाहे वैचारिक ही सही, जाति तोडो, दहेज छोडो के नारों का था, या थोडा बहुत अब भी हो, खुदा करे, हालांकि लगता तो नहीं है, उस माहौल में या फिर ग्लोबलाइजेशन की सुखद आंधी या आवारा पूंजी से पैदा हुए सामाजिक बदलावों में हम जिन आधारों पर अंतर्जातीय और अंतर्धार्मिक विवाहों को तार्किक और वैज्ञानिक मानते आए हैं, सगोत्र विवाह का समर्थन या अविरोध उन आधारों के खिलाफ नहीं जाता क्या! &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बहरहाल, नवीन जिंदल जैसे आधुनिक युवा का खापों के समर्थन में आना उनकी सियासी जरूरत हो सकता है और ओमप्रकाष चौटाला का भी। पर प्यार के नाम पर कितनी छूट हो, जो अराजकता ना कहलाए, यह सवाल तो हमें सताएगा ही। इसका मुकम्मल और तार्किक जवाब भी ढूंढने की कोशिश हमें जल्दी ही कर लेनी चाहिए।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/777405477924605622-7493391289554692655?l=dr-dushyant.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://dr-dushyant.blogspot.com/feeds/7493391289554692655/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=777405477924605622&amp;postID=7493391289554692655' title='3 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/777405477924605622/posts/default/7493391289554692655'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/777405477924605622/posts/default/7493391289554692655'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://dr-dushyant.blogspot.com/2010/05/blog-post_22.html' title='चेतन भगत की मासूम अनभिज्ञता और मेरा मत खाप पंचायतों के पक्ष में !'/><author><name>DUSHYANT</name><uri>http://www.blogger.com/profile/00269010495016554374</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_N8y3Z3aRBB0/S9bM9k9LOYI/AAAAAAAAAZs/tXTU43tzans/S220/dusht.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_N8y3Z3aRBB0/S_jT-dM0kzI/AAAAAAAAAao/4XnwBwD6o5M/s72-c/herzinlila.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-777405477924605622.post-3772289778253742753</id><published>2010-05-04T02:37:00.000-07:00</published><updated>2010-05-04T03:21:31.355-07:00</updated><title type='text'>कहानी - प्रेम की उप-कथा</title><content type='html'>&lt;strong&gt;हिंदी की जानी मानी साहित्यिक पत्रिका कथादेश के मई अंक में मेरी कहानी आई है, आपसे बांट रहा हूं - &lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_N8y3Z3aRBB0/S9_uh1vixuI/AAAAAAAAAag/l2aOWgZ47CE/s1600/love.bmp"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 400px; height: 300px;" src="http://3.bp.blogspot.com/_N8y3Z3aRBB0/S9_uh1vixuI/AAAAAAAAAag/l2aOWgZ47CE/s400/love.bmp" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5467350737780655842" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;blockquote&gt;जब दोस्ती प्रेम मे धीरे-धीरे तब्दील हो जाती है तो दोस्ती के अधिकार और आदते-प्रक्रियाएँ खत्म थोड़े ना होते है वहाँ तो एक समानता का रिश्ता होता है..... थोड़ा अजीब सा....., तू तड़ाक और पिटने-पीटने की बात भी बहुत आम होती है, चाहे सिर्फ बात ही हो, पर वो बात पिटने-पीटने से कही ज्य़ादा असरदार होती है, और तो और..... प्रेम की ससद के ससदीय शब्दो की शब्दावली की हद मे गालियाँ तक भी चलते है।&lt;/blockquote&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फर्स्ट सिनेमा से अमिताभ की ताजा फिल्म देखकर निकलता हूँ, सड़क लगभग वैसी ही है, जैसी बारह से तीन के शो मे घुसने से पहले थी, थोड़ी गीली जरूर है, लगता है बारिश हुई है, दूर तक नजर फैलाता हूँ तो विश्वास हो जाता है, सड़क के किनारे के पेड़ ताजा नहाये हुए लगते है, दुपहिया वाहनो पर लोग आधे भीगे से दिखते है और चौपहिया वाहनो के वाइपर अब भी फ्रट ग्लासेज पर गतिमान है।&lt;br /&gt;अकेले फिल्म देखना भी अजीब किस्म का अनुभव और शगल है, पर बारह से तीन के शो मे अकेले फिल्म देखना वैसे भी मजबूरी ही हो सकता है, एक नौकरीपेशा युवा सडे को ही बिना बॉस की डाट के इस शो मे फिल्म देख सकता है। एक नौकरी छूटने और दूसरी के लिए भागदौड़ के बीच हम पूरी तरह अकेले होते है, तमाम एडवेचर्स अनुभवो के साथ। कभी-कभार कोई दोस्त भले ही साथ हो ले। देखिये ना फिल्म भी कितनी अजीब पर प्यारी सी चीज है, तीन घटे तक आप अपनी दुनिया से निहायत दूर एक कल्पना लोक मे विचरते है, तमाम व्यक्तिगत पीड़ाओ से निरपेक्ष कुछ वक्त, जहाँ कुठाओ का निवारण होता है और आप अपने आपको फेटेसी मे महसूस करते है। कम से कम मुझे तो यही लगता है और ऐसे मे फिल्म ठीक एक दर्दनिवारक की तरह काम करती है, सारे दु:ख और पीड़ाओ को हर लेती है, चाहे कुछ वक्त के लिए ही सही, इसे मेरा पलायनवादी होना माने तो ये आपकी मर्जी, पर मेरे साथ ऐसा है तो है, क्या कर सकता हूँ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कल रात को घर पहुचते-पहुचते, मै जहाँ रहता हूँ उसे घर ही कहता हूँ, हालाकि वो घर मेरा नही, 15 बाई 12 फीट के उस कमरे और किचन, लैटबॉथ को किराये पे लेकर उसे घर कहना मुझे अच्छा लगता है, हाँ, तो कल रात को घर पहुँचते-पहुँचते एक बज गया था, यू ही यायावरी या कहूँ आवारगी मे, एम.आई. रोड़ पर बीयर के एक कैन मे खुद को लट्टू होने का भ्रम पाले हुए खासाकोठी से सागानेरी गेट तक की परिक्रमा कर लौटते हुए पाँच बत्ती चौराहे पर ठीक चौराहे के बीचो बीच बैठकर खुद को एग्री यगमैन अमिताभ ही महसूस किया था, व्यवस्था और समाज को गालियाँ देते हुए, ऐसे दुस्साहस करते हुए कि पुलिस की कोई पीसीआर गाड़ी मेरी इन बेजा हरकतो को देख न ले और कही ऐसा न हो कि बची हुई रात पुलिस स्टेशन मे गुजारनी पड़े, बिना कबल के, मच्छरो के स्वागत के बीच। 12 बजे के बाद जब राजमदिर सिनेमा का शो छूटा तो कई लोगो से लगभग भिड़ते-भिड़ते ही बचा था मै, विकास ने मुझे पकड़ लिया था हालाकि वो ना भी पकड़ता तो मै कुछ ज्य़ादा कर नही सकता था, हाँ, ये जरूर है, उसके पकडऩे की वजह से पिटने से जरूर बचा गया होऊगा। इत्ती सी बीयर मे मुझ मे शेर की सी ताकत आ जाती है या कहँू ताकत का वहम आ जाता है और अपनी औकात भूल जाता हूँ, लगता है सारी दुनिया मुझ से चलती है और मै किसी की भी ऐसी तैसी कर सकता हूँ, पर गनीमत है कि आज तक किसी की एैसी-तैसी नही कर पाया, वरना कुछ भी कहने, करने या लिखने लायक नही बचता। पर एक डर मेरे सारे वहम के गुब्बारे की हवा निकाल देता है, कही इस तरह से भटकते हुए शोभिता मुझे ना देख ले इतनी रात गये ऐसी खतरनाक किस्म की सभावना नगण्य है फिर भी....। हालाकि उसे मेरे बीयर पीने के बारे मे पता है, पर इतनी रात गये यू आवारागर्दी और ऊपर से कभी भी पिटने की प्रबल सभावनाओ के कारण उसकी डाट खाने से मुझे डर लगता है कि कही लोग मुझे पीटेना पीटे, वो जरूर पीट डालेगी। जब दोस्ती प्रेम मे धीरे-धीरे तब्दील हो जाती है तो दोस्ती के अधिकार और आदते-प्रक्रियाएँ खत्म थोड़े ना होते है वहाँ तो एक समानता का रिश्ता होता है..... थोड़ा अजीब सा....., तू तड़ाक और पिटने-पीटने की बात भी बहुत आम होती है, चाहे सिर्फ बात ही हो, पर वो बात पिटने-पीटने से कही ज्य़ादा असरदार होती है, और तो और..... प्रेम की ससद के ससदीय शब्दो की शब्दावली की हद मे गालियाँ तक भी चलते है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फर्स्ट सिनेमा से निकलते हुए भी मुझे ये डर लगा हुआ था कि कही शोभिता सामने ना मिल जाये, नही तो डाटने के लहजे मे कहेगी - 'क्यो गच्चा दे दिया बॉस को। निखिल, तुम्हारी प्रॉब्लम क्या है ? तुम्हारा काम मे मन नही लगता क्या? किसी चीज को तो जिन्दगी मे सीरियसली ले लिया करो।'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मै कोई सफाई पेश करूँ या उसे सास लेने के लिए कहूँ, ताबड़तोड़ उसका लेक्चर जारी रहने की सभावनाएँ भीषणतम स्तर पर होती है। मै जानता हूँ यह इसी तरह स्टीरियो टाइप लहजे मे होना होता है। इन दिनो जब भी वो मुझसे मिलने को कहती है प्राय: बचता हँू, अपने चेहरे की भाव-भगिमाओ पर मै बहुत वक्त तक नियत्रण नही कर पाता या कहँू बड़ी कमी है कि अभिनय ज्यादा देर तक और ज्यादा अच्छे से नही कर पाता हूँ। ऐसा नही कि ऐसा चाहता नही हूँ और ये मेल इगो है ही कि खुद को बेरोजगार साबित या जाहिर नही होने देना चाहता। ऊपर से वो भी तो बहुत शार्प है (उसकी शार्पनैस यानी स्मार्टनैस का कायल हूँ पर कभी-कभार मै ही इसके लपेटे मे आ जाता हूँ तो ये ख्याल कुछ बदल सा जाता है) ऐसी किसी स्थिति मे मेरे पास झेप कर सॉरी बोलने के सिवा कोई चारा नही होता और वो भी इतना कहकर नॉर्मल होने और मुझे नॉर्मल करने की कोशिश करती है - निखिल, क्यो करते हो ऐसे, जैसे हो, जहाँ हो, आई लाइक यू यार....., क्यो झूठ बोलने की बेजा कोशिश करते हो तुम भी। मै फिर भी बहुत बार ऐसा करता हूँ, उसकी इस बात को भूलते हुए। हालाकि नौकरी छूटने के दौर मे पहली बार ऐसा हो रहा है, क्योकि इससे पहले मै इस तरह कभी बेरोजगार नही रहा, पहली नौकरी से पहले तो मजर ही कुछ और था, पर अब पहली नौकरी के बाद बेरोजगारी का ये आलम तो किसी औरत के विधवा या परित्यक्ता होने सा महसूस करता हूँ। एक सूनापन -खालीपन -चिता, कुठा, अवसाद, और पता नही क्या-क्या? ऐसे दौर मे सच कहूँ तो प्रेम भी एक गुनाह सा लगने लगता है। कई बार शोभिता के हठ के आगे मजबूर होकर रेस्त्रा जाना भी बड़ा भयावह लगता है, हालाकि एक सिद्धात हमने बना रखा है कि अल्टरनेटिवली बिल पेमेट करते है, पर वो कब कह दे कि 'ए मिस्टर, बिल आज तुम्हारी तरफ से और ऑर्डर मैम की तरफ से', फिर अगर मेरे वॉलेट मे उतने रूपये ना हो या लगे कि इस पेमेट के बाद बचे-खुचे से आने वाले दिनो का गुजारा कैसे होगा, सोचकर प्रेम की सारी फेटेसी काफूर हो जाती है। हालाकि इन दिनो मे कभी ऐसा नही हुआ और वैसे भी वो बहुत महगे मैन्यू की शौकीन भी नही है, पर पता नही क्यो मन मे एक डर सा तो बना ही रहता है..... और फिर माक्र्स बड़ी प्रखरता के साथ मेरे जेहन से निकलकर मेरे सामने  खड़े होते है और लगता है कि उनका दर्शन मै प्रवचनवत श्रवण कर रहा हँू, विश्वास करता हूँ कि वे जो कुछ कह रहे है, सौ फीसदी सच है और भौतिक तत्व के अलावा कुछ भी दुनिया मे सच नही है, सब मिथ्या है - प्रेम-व्रेम और भावनाएँ, केवल वही और सिर्फ वही प्राथमिक और आधारभूत सत्य है, ये निष्कर्ष मेरा दिमाग स्वत निकाल लेता है और अपनी प्रेमिका के साथ इस भौतिकवाद के द्वन्द्वात्मक होने और वर्ग सघर्ष की स्थितियो की कल्पना मे अपने आपको उलझा लेता है, सर्वहारा की क्राति के सपने बुनने भी शुरू कर देता है। पर मेरा यह दार्शनिक घड़ा जल्द..... बहुत जल्द फूट जाता है और मै अपने आस-पास की, यथार्थ की, पर अपनी ही फेटेसी की दुनिया मेलौट आता हूँ, जहाँ प्रेम और बेरोजगारी दोनो ही जिन्दगी का एक अहम हिस्सा है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तभी मेरे मोबाइल की स्क्रीन चमकती है - देखता हूँ एक एसएमएस है, शोभिता का ही होगा, धन्यवाद कहना चाहिए एसएमएस सुविधा को कि इस वक्त़ मे भी लोगो से सपर्क बना हुआ है.....। &lt;br /&gt;मै इन बॉक्स खोलता हूँ, उसी का है - &lt;br /&gt;'वेयर आर यू, मीट मी एट फाइव इन निरोज रेस्त्रा, आई नीड टू टॉक'&lt;br /&gt;मुझे ना कहने का कोई कारण नजर नही आया, सोचता हूँ कुछ खास बात होगी वरना वो ऐसे कभी नही कहती, पूछती है, 'आर यू फ्री, कैन वी मीट ' मै ये सोचते हुए उसे 'श्योर बट नॉट निरोज, कॉफी हाउस, ओ.के.' लिखकर एसएमएस रिप्लाई कर देता हूँ। मैसेज की डिलीवरी रिपोर्ट आते-आते मै उन्ही आशकाओ से फिर जाता हूँ, बड़ी मुश्किल से मूवी मैनेज की, वो भी आगे बैठकर देखी, जबकि मुझे आगे बैठकर मूवी देखने से माइग्रेन हो जाता है, फिर अब रेस्त्रा मे, मै खुद को निरोज को अफोर्ड करने की स्थिति मे नही महसूस करता, इसलिए कॉफी हाउस कह दिया, उसे इस पर ऐतराज भी नही होगा..... वैसे भी पिछली बार शोभिता ने बिल पे किया था, इस बार तो मुझे ही पे करना पड़ेगा, कायदे से। मुझे वो दिन बड़ा मनहूस लगा, खुद पर गुस्सा आया जब ऐसा नियम बनाया था कि अल्टरनेटिवली पे किया करेगे। अभी साढ़े तीन बजे है, आधे घटे का वक्त लगेगा एम.आई.रोड़ वाले इडियन कॉफी हाऊस तक पहुँचने मे, भूख भी लगी है, चलो पहले कुछ खा लेता हूँ, सोचता हूँ और इस बीच एक घटा भी गुजर जाएगा। पास के एक मिडिल क्लास से दिखने वाले रेस्त्रा मे घुसता हूँ, वहाँ का माहौल खुशनुमा है, कुछ जोड़े इधर-उधर बैठे है, उनकी नजदीकियाँ झुझलाहट सी पैदा करते है, एक दूसरे मे डूबे हुए ज्यादा है, बतियाते हुए कम। मै उनसे नजर हटाकर खुद मे डूबने की कोशिश करता हूँ, वेटर से इडली साभर मगवाता हूँ और आज का अखबार भी जिससे कुछ वक्त गुजार पाऊँ। वेटर पानी ला कर रख देता है और अखबार भी। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'स्साब इडली साभर मे थोड़ा टेम लगेगा।' &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'ओके ' कहते हुए मै अखबार मे सिर डाल देता हूँ। थोड़ी देर बाद अखबार की खबरो से बोर हो जाता हूँ, हालाकि स्पोर्टस पेज को पूरा चाट डालना मेरी आदत मे शुमार है और आज सुबह से अखबार नही पढ़ा था, पढऩा तो दूर देखा तक नही था....., इसके बावजूद आज स्पोर्ट्स पेज पर भी मन नही लगा और अखबार को बदकर उठाकर रख दिया। मै सोचने लगा..... मुझे लगा जब सोचने की प्रक्रिया होनी ही है तो इसे निर्बाध होने दूँ, क्यो रोकूँ। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सोचते-सोचते न जाने कब मुझे झपकी आ जाती है, वेटर आकर जगाता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'स्साब-स्साब इडली ठडी हो गई, कब से रखी पड़ी है, जल्दी खाइए नही तो खराब हो जाएगी।' &lt;br /&gt;लगता है यहाँ के वेटर्स को आदत पड़ गई है कस्टमर्स को सर्व करके डिस्टर्व न करने की, इससे कपल्स को सुविधा होती होगी ना। मै देखता हूँ सवा चार बज चुके है, मै इडली जो लगभग ठडी हो चुकी थी, उसे छोड़ते हुए, बिना टिप दिये बिल पे करते हुए शोभिता से मिलने के लिए वहाँ से निकल पड़ता हूँ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; मै भूल गया था कि आज बाइक नही थी  मेरे पास, इन दिनो बस मे सफर करता हूँ, पैसे बचाने के लिए, वहा भी कडक्टर से एसटी यानी स्टूडेट बोलकर किराया बचाने की कोशिश करता हू, अगर कभी आई कार्ड माग ले तो सारी जेबे टटोलकर कह देता हू कि घर भूल आया हू आज। शुक्र है..... सीटीएस की बस मिल गई मुझे बाहर आते ही। थैक गॉड..... ज्यादा इतजार नही करना पड़ा। &lt;br /&gt;मै कॉफी हाउस पहुँचता हूँ देखता हूँ शोभिता आ चुकी है। एम्ब्रोयडरी वाले वाइट कुर्ते और ब्ल्यू डेनिम मे है, गले मे क्रोशिये से बुने ग्रे स्टॉल मे अच्छी लग रही है बहुत। प्राय: पोनिटेल मे होती है, आज खुले बालो के साथ, ये बदलाव भी प्यारा लग रहा है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'निखिल, तुम लेट हो। टाइम देखो..... सवा पाँच हो गए है, डू यू नो मुझे आए पूरे बीस मिनट हो गए है।' &lt;br /&gt; वो ऐसे डाट रही थी, जैसे डाटने से 20 मिनट वक्त पीछे खिसक जाएगा.....&lt;br /&gt;'स्सॉरी, लेट्स गो इन साइड ' कहकर उसके प्रवाह को तोडऩे की चेष्टा करता हूँ। हम अदर घुसते है, देखता हूँ वहाँ काफी भीड़ है, पर हमे एक टेबल मिल जाती है - फैमिली टेबल।&lt;br /&gt;'सो, शोभिता, हाउ आर यू ?&lt;br /&gt;'मै ठीक हूँ, बट यू ? ' &lt;br /&gt;'फाइन, ऐसे कैसे पूछ रही हो।' &lt;br /&gt;मैने अपने आपको सभालते हुए कहा।&lt;br /&gt;'आई नो, तुम ठीक नही हो इसलिए।' &lt;br /&gt;'मतलब?' &lt;br /&gt;'निखिल, अपनी किसी भी पीड़ा को बाटोगे तो वह कम होगी । लगता होगा कि उसे जानकर मै दुखी होऊगी, ऐसा नही है निखिल, और है भी तो बुरा क्या है ये सोच के जरूरी चीजे शेयर करने से बचोगे क्या ? इस रिलेशनशिप को यू तो नही लिया जाना चाहिए ना। अगर ऐसे हम एक दूसरे से छुपाएगे तो हमारे रिश्ते का मतलब ही क्या है? निखिल, वी आर फॉर ईच अदर आफ्टर ऑल' &lt;br /&gt;'कहना क्या चाहती हो, शोभिता' &lt;br /&gt;'इसीलिए बुलाया है मैने, मुझे पता चला है, यू हैव लॉस्ट योर जॉब, दैन व्हाय आर यू लाइग एड हाइडिग इट फ्रॉम मी, यार....., यू विल गैट अनदर जॉब यार, इसमे इतना परेशान होने की क्या बात है ? ' &lt;br /&gt;'.....'&lt;br /&gt;'तुम भी ना बस..... '&lt;br /&gt;'.....'&lt;br /&gt;'ज्यादा मासूम बनने की कोशिश मत करो, बेवकूफ लग रहे हो, माई क्यूट एड फूल लव.... ' &lt;br /&gt;अब मै एक बच्चे की तरह था, जिसकी चोरी पकड़ ली गई हो और डाटने के बाद पुचकार रही हो.... ये सोचते हुए कि अब ज्यादा डाटा तो ये रो पड़ेगा।&lt;br /&gt;'हे लुक एट मी, चीअर अप, क्या खाओगे ? मै आर्डर दूँ !..... एड डोट वरी, तुम पे नही करोगे, एड ओये मेल इगो, मै भी कोई अमीरजादी नही हूँ, समझे, मै भी नही दूगी, यार.... ' &lt;br /&gt;'..... ' &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'वी वील शेयर इट, ओ के और हाँ, निरोज नही कॉफी हाउस! इतनी बेवकूफ चिरकुट नही हूँ, समझे, मेल इगो, जाने दो, खैर..... चीअरअप..... स्माइल..... क्लिक ' &lt;br /&gt;वो दोनो हाथो को फैलाकर किसी फिल्म डायरेक्टर की तरह मूव करती है और बीच मेसे झाकती हुई अपनी गर्दन को 30 डिग्री के कोण मे हिलाती है, मानो मेरी खिसियानी मुस्कुराहट को स्टिल कैमरे मे कैद कर रही हो। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वो लगातार बोल रही थी और मै दूसरी तरफ लगातार चुप..... मेरी उससे नजर मिलाने की हिम्मत नही हो रही थी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;थोड़ी ही देर मे हिम्मत जुटाकर मै शोभिता के चेहरे को अपलक देखता हूँ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'एड डोट फील सॉरी, ओके ' शोभिता कहती है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ओवल शेप चेहरे मे नीबू सी गोल-गोल आखे, उस पर जैसे बहुत कोशिश से चिपकाया हुआ नाक कि चिपकाने मे जरा सी गलती बड़ी सजा दिलाएगी। उसके नाक की यह खूबसूरती मुझमे ऊपर वाले के हाथ चूमने की इच्छा पैदा कर देती है, तभी वो नाक के नीचे की बाये किनारे से शुरू कर उगली ऐसे पार करवाती है जैसे नाक को अडर लाइनकर रही हो, वो जब भी ऐसे करती है, मुझे अहसास हो जाता है कि वो अब कुछ खास बोलने वाली है.....&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मै मुस्कुरा भर देता हूँ, ये झेप थी या कुछ और मै नही जानता, शायद झेप ही हो, मेरे जानने, न जानने से क्या फर्क पड़ता है। पर मै काफी कुछ राहत महसूस कर रहा था पर राहत का कारण निश्चित रूप से सिर्फ बिल शेयर करना नही था।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/777405477924605622-3772289778253742753?l=dr-dushyant.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://dr-dushyant.blogspot.com/feeds/3772289778253742753/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=777405477924605622&amp;postID=3772289778253742753' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/777405477924605622/posts/default/3772289778253742753'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/777405477924605622/posts/default/3772289778253742753'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://dr-dushyant.blogspot.com/2010/05/blog-post_04.html' title='कहानी - प्रेम की उप-कथा'/><author><name>DUSHYANT</name><uri>http://www.blogger.com/profile/00269010495016554374</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_N8y3Z3aRBB0/S9bM9k9LOYI/AAAAAAAAAZs/tXTU43tzans/S220/dusht.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_N8y3Z3aRBB0/S9_uh1vixuI/AAAAAAAAAag/l2aOWgZ47CE/s72-c/love.bmp' height='72' width='72'/><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-777405477924605622.post-7705378078647723868</id><published>2010-05-01T21:54:00.000-07:00</published><updated>2010-05-01T22:01:12.561-07:00</updated><title type='text'>समय जब लिखता है इतिहास</title><content type='html'>&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_N8y3Z3aRBB0/S90GNPvp9pI/AAAAAAAAAaM/14GnDuQOYGk/s1600/Gandhi_JK.jpg"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 267px; height: 400px;" src="http://1.bp.blogspot.com/_N8y3Z3aRBB0/S90GNPvp9pI/AAAAAAAAAaM/14GnDuQOYGk/s400/Gandhi_JK.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5466532347332130450" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;blockquote&gt;हाल ही एक किताब आई है- गांधी: नेक्ड एम्बिशन, जो ब्रिटिश लेखक जेड एडम्स ने लिखी है, इसमें गांधी के यौन व्यवहार पर खुलकर बात की गई है।&lt;/blockquote&gt; &lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ऑस्टे्रलिया के गांधीवादी दोस्त अब्बास रजा अल्वी का ई-मेल आया, उनकी चिंता वाजिब है।  दरअसल एक किताब आई है जो ब्रिटिश लेखक जेड एडम्स ने लिखी है- गांधी: नेक्ड एम्बिशन। जेड एडम्स फिलहाल लंदन विश्वविद्यालय के स्कूल ऑफ एडवांस स्टडी के अंग्रेजी अध्ययन विभाग में रिसर्च फेलो हैं, उन्हें हम द डायनेस्टी- गांधी नेहरू स्टोरी, टोनी बेन जैसी  किताबों के लिए जानते हैं। कहा जा रहा है कि इस नई किताब में गांधी के यौन व्यवहार पर खुलकर बात की गई है, अल्वी को यह खबर वहां के एक अखबार में मिली, वे इसलिए भावुक हुए कि कुछ लेखक सस्ती लोकप्रियता के लिए गांधी पर कीचड़ उछाल रहे हैं। फिर तो कई ईमेल के जरिए यह लिंक देश भर से जाने अनजाने लोगों से बार-बार आया, सभी राष्ट्रपिता की छवि को लेकर बहुत चिंतित प्रतीत हुए। दरअसल, गांधी पर इस तरह की यह पहली किताब नहीं है, जैसे हंसराज रहबर ने भी कभी गांधी बेनकाब लिखी थी। इतिहास के विद्यार्थी के तौर पर मेरा मानना है कि भावुकता से ज्यादा महत्वपूर्ण तथ्य या वह स्रोत हैं जिन के आधार पर निष्कर्ष निकाले गए हंै। और व्यक्ति कोई भी हो, कोई भी ऐतिहासिक निर्णय तो आखिरकार व्यक्ति की बजाय तथ्य से तय होगा और ऐसा होना भी चाहिए। एक बात और मेरी समझ से बाहर है कि क्या महान लोगों को हमें सामान्य मानवीय कमजोरियों से ऊपर मान लेना चाहिए? क्या यह सच नहीं है कि स्थूल भावुकता हमें कहीं नहीं ले जाती, तर्क और तथ्यों के आलोक में निपजी भावुकता यकीनन स्थाई और सहज हो सकती है। मान लीजिए, अतीत में मेरे बुजर्गो ने कुछ मानवीय कमजोरियों के वशीभूत कुछ बुरा काम किया तो मुझे उसे उसी सहजता से क्यों नहीं स्वीकार करना चाहिए जितना अच्छे कामों को स्वीकारते हुए गौरवान्वित होता हूं। इसी तरह, गांधी मेरे प्रिय व्यक्तित्वों में से हैं और अगर कोई ऐतिहासिक तथ्य गांधी में कुछ मानवीय कमजोरियों को सिद्ध भी कर दें तो उनके पिछली सदी में हमारे सबसे महत्वपूर्ण और सर्वकालिक महान व्यक्ति होने का तथ्य और उनका महान काम कमतर तो नहीं हो जाएंगे?&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/777405477924605622-7705378078647723868?l=dr-dushyant.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://dr-dushyant.blogspot.com/feeds/7705378078647723868/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=777405477924605622&amp;postID=7705378078647723868' title='4 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/777405477924605622/posts/default/7705378078647723868'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/777405477924605622/posts/default/7705378078647723868'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://dr-dushyant.blogspot.com/2010/05/blog-post.html' title='समय जब लिखता है इतिहास'/><author><name>DUSHYANT</name><uri>http://www.blogger.com/profile/00269010495016554374</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_N8y3Z3aRBB0/S9bM9k9LOYI/AAAAAAAAAZs/tXTU43tzans/S220/dusht.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_N8y3Z3aRBB0/S90GNPvp9pI/AAAAAAAAAaM/14GnDuQOYGk/s72-c/Gandhi_JK.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-777405477924605622.post-398312723787901947</id><published>2010-04-26T00:10:00.000-07:00</published><updated>2010-04-28T02:49:20.321-07:00</updated><title type='text'>ऑरकुट भर आकाश है, ट्विटर भर संसार</title><content type='html'>&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_N8y3Z3aRBB0/S9U-Ia92iUI/AAAAAAAAAZk/2jPhlU4Vrtk/s1600/net.jpg"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 400px; height: 300px;" src="http://3.bp.blogspot.com/_N8y3Z3aRBB0/S9U-Ia92iUI/AAAAAAAAAZk/2jPhlU4Vrtk/s400/net.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5464342037282588994" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;blockquote&gt;इस नई चौपाल ने नई बहस, नई आजादी, नई चुनौतियों को जन्म दिया है, कोई भी नया संचार माध्यम अच्छे के साथ बुरी संभावनाओं को भी अपने भीतर लिए हुए होता है, तो यह चौपाल भी इसका कतई अपवाद नहीं है और इसमें कुछ नया भी नहीं है। अब यह तो यकीनन इस्तेमाल करने वाले पर ही है कि वह किसी माध्यम को कैसे अपनाता है जैसे विषयांतर होने की आजादी लेते हुए कहूं तो, लगभग सवा सदी से गांव के अकेले मेरे ब्राह्मण परिवार और पढे लिखे भी यानी ज्ञानपिशाच परिवार ने धर्म का इस्तेमाल रचनात्मक कम और अपने स्वार्थवश ज्यादा किया तो इसमें धर्म का क्या दोष? &lt;/blockquote&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; मार्च के आखिरी दिन की शाम ढल गई थी, मेरे विवाह की अफवाह से ऑरकुट, फेसबुक, ट्विटर और बज पर हंगामा था, थोड़ी सी देर के वक्फे में आश्चर्यजनक रूप से तकरीबन डेढ़ सौ लोगों तक अफवाह पहुंच गई और सुबह तक एसएमएस, फोन, ईमेल से और व्यक्तिश: शुभकामना, बधाई, आश्चर्य और तानों का मिश्रित सिलसिला रहा, मेरी हालत जिंदगी में कभी इतनी एम्बे्रसिंग नहीं हुई, ये दरअसल पहली अप्रेल की पूर्व संध्या पर एक मित्र का मजाक था पर इस प्रकरण से जाती तौर पर सोशल नेटवर्किंग की ताकत का एहसास मुझे गहरे तक हो गया। अब इसे जरा व्यापक स्तर पर देखने की कोशिश करें तो शशि थरूर और ललित मोदी की ट्विटरिंग से दुनिया में भूचाल अभी थमा नहीं है, थरूर की महिला मित्र सुनंदा पुष्कर के तथाकथित फेसबुक अकाउंट पर की गई टिप्पणियां भी चर्चा में रही हैं, कुलमिलाकर नतीजा यह है कि ऑरकुट, फेसबुक ट्विटर के नाम तद्भव रूप में गांव की चौपाल पर बैठे लोगों यानी सोशल नेटवर्किंग से लगभग नावाकिफ लोगों की जुबान पर आ गए हैं और गोया इस कदर कि पड़ौसी की बात हो रही हो। और कम्प्यूटर से जुड़ा शायद ही कोई शख्स होगा जो किसी ना किसी सोशल नेटवर्किंग पर ना होगा, मेरी जानकारी में तो नहीं ही है, आप भी याद करके देखिए क्या आपके परिचय में कोई ऐसा है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सैद्धांतिकी की स्तर पर दो समाजशास्त्रीय शब्दों से मेरा नजदीक का संबंध रहा है, वे हैं- समाजीकरण और सामाजिक अंतर्कि्रया। आज इस वेबजालीय उठापटक की बात करते हुए इन दोनों शब्दों की अनुगूंज हमारे पास महसूस हो रही है। मूल वजह ये है कि किसी भी जीव का अपना समाज होता है और उसकी अपनी समाजीकरण की एक खास प्रक्रिया भी होती है, साथ ही पारस्परिक अंतर्कि्रया उसका बुनियादी स्वभाव होता है, हां ये जरूर है कि अंतक्र्रिया किस स्तर पर और किस जरिए से हो, प्राय: सामाजिक अंतक्र्रिया समान रुचि या किसी अन्य सामान्य आधार जैसे कि लिंग, पेशा, जाति, धर्म या क्षेत्रीय पहचान के इर्दगिर्द होती है, मुझे यह कह देना चाहिए कि सोशल नेटवर्किंग से ये तमाम दायरे छोटे या गौण हो गए हैं यानी क्या समाजविज्ञानियों के लिए यह चिंतनीय आहट नहीं है कि इससे सदियों पुराने समाजशास्त्रीय मिथक टूट रहे हैं या गड्डमड्ड हो रहे हैं। आप अपने या किसी दोस्त के सोशल नेटवर्किंग साइट के प्रोफाइल में फे्रंड्स नेटवर्क को खंगालिए, तो पता चलेगा कि सोशल नेटवर्किंग ने हमारी मित्रताओं या परिचय को विविधता का असीम विस्तार दिया है, यही कारण है कि मीडिया से जुड़े होने के कारण मैं सोशल नेटवर्किंग को पत्रकारों के लिए तो स्वर्ग ही मानता हूं, लिहाजा जनसंपर्क की अथाह संभावना और विविध जीवन स्थितियों तथा कार्यक्षेत्रों ने जो वर्चुअल अनुभव का संसार रचा है, उसे गूंगे का गुड़ ही कहना चाहिए। एकांत और अकेलेपन के संत्रास से गुजरती दुनिया को सोशल नेटवर्किंग ने जुडऩे का, खुद को जाहिर करने का जो व्यापक अवसर और विकल्प दिया है, उससे जाहिर होता है कि मनुष्य स्वभावत: जुडऩा चाहता है, पर उसके जुडऩे की सीमा और स्वरूप वह खुद तय करना चाहता है, और इसमें कोई बुराई भी नहीं है। व्यक्तिश: या आवाज के जरिए मोबाइल की संचार क्रांति ने आजादी तो दी थी पर यह अतिवादी आजादी कि सीमा वह खुद तय करे, यह मुमकिन नहीं हो पाया था जो कि सोशल नेटवर्किंग ने संभव कर दिया। सोचकर देखिए कि ऑरकुट पर स्के्रप छोडऩे, फेसबुक की वॉल पर या बज पर कुछ विचार बांटने, ट्विटर पर 140 शब्द लिखने, या किसी भी सोशल नेटवर्किंग साइट पर फोटो शेयर करने के बाद किसी दोस्त की अच्छी या बुरी प्रतिक्रिया पर यह जरूरी नहीं कि आप जवाब दें और फिर यहां सब इतनी तेजी से भी घटता है कि ठहराव की कोई गुंजाइश नहीं होती। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बेशक, इस नई चौपाल ने नई बहस, नई आजादी, नई चुनौतियों को जन्म दिया है, कोई भी नया संचार माध्यम अच्छे के साथ बुरी संभावनाओं को भी अपने भीतर लिए हुए होता है, तो यह चौपाल भी इसका कतई अपवाद नहीं है और इसमें कुछ नया भी नहीं है। अब यह तो यकीनन इस्तेमाल करने वाले पर ही है कि वह किसी माध्यम को कैसे अपनाता है जैसे विषयांतर होने की आजादी लेते हुए कहूं तो, लगभग सवा सदी से गांव के अकेले मेरे ब्राह्मण परिवार और पढे लिखे भी यानी ज्ञानपिशाच परिवार ने धर्म का इस्तेमाल रचनात्मक कम और अपने स्वार्थवश ज्यादा किया तो इसमें धर्म का क्या दोष? और इसी तरह जैसे, मेरे कितने ही परिचित मुस्लिम परिवार दो वक्त की हक की रोटी और खौफेखुदा और नेकनीयत के साथ जिंदगी बसर कर रहे हैं तो उसी मजहब के कुछ सरफिरे लोग जेहाद का खूनी खेल खेलते हैं, तो यही बात सौ फीसदी सोशल नेटवर्किंग पर भी लागू होती है, यहां भी सरफिरे हैं, यहां भी स्वार्थी लोग हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बहरहाल, हमारे समय का कमाल यह है कि दुनिया सिमट गई है, सिमटी भी इतनी कि खुद सिमटने की क्रिया भी शरमा जाए, निदा फाजली के दोहे को तोड़ मरोडऩे को दिल कर रहा है, निदा से माफी चाहता हूं- छोटा करके देखिए जीवन का विस्तार, ऑरकुट भर आकाश है, ट्विटर भर संसार। आप इससे असहत हो सकते हैं क्या? अगर ऐसा है तो जरा खोलकर बताने की इजाजत दीजिए, सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर जितना लोग खुद को, अपने विचार और इच्छाओं को बांट रहे है, उसे देखकर हैरानी होती है, इतना कुछ इस धरती के इनसानों के सीनों में घुट रहा था, जो जाहिर हो रहा है, गुस्सा, प्यार, नफरत, तारीफें, या अपनी पसंद के गाने वेबसाइट्स के लिंक्स, क्या- क्या कुछ नहीं है जो लोग बांट रहे हैं, बांटने की खुशी के समंदर ठाठें मार रहे हैं, नफरतें जाहिर हो रही है तो मन का गुबार निकल रहा है, यह दबा रहता तो कितनी आत्महत्याएं हो सकती थीं, तनाव और कुंठा के मारे लोग कितने और हो सकते थे? इतना ही नहीं, सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर चंद लफ्जों में लोगों का सेंस आफ ह्यूमर देखिए, जनाब हमें तो हैरानी होती है।  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;और एक बात देखने लायक है कि सोशल नेटवर्किंग साइट्स अब सिर्फ दोस्ती का जरिया नही हैं, केवल मन के गुबार निकालने का वाइज नहीं है, प्रमोशन का बड़ा जरिया भी है, हमारे फिल्मी दुनिया से जुड़े दोस्त फिल्म का ग्रुप बनाकर भावी फिल्म के लिए माहौल बना रहे हैं, लिटरेरी एजेंसी अपनी गतिविधियों की जानकारी दे रही है, एक गायक दोस्त प्रचार में लगा है, प्रकाशक अपनी किताबों का प्रचार कर रहे हैं, और मुझे कम से कम इन सब में कोई बुराई भी नजर नहीं आती है और इससे यह तो जाहिर है ही कि यह हम पर है, इसे किस तरह लेते हैं, किस तरह इसका इस्तेमाल करते हैं, हमारी सोच अगर सकारात्मक है तो हमें उसकी उड़ान के लिए यह अनंत आकाश देता ही है। जाहिर सी बात है कि यह खुला मंच है, सबके लिए है, और अपने स्वरूप में बेहद लोकतांत्रिक भी है। हर माध्यम की अपनी चुनौतियां होती है, इसकी चुनौतियों पर विजय पाने के तरीके और रास्ते खोज लें, अभीष्ट तो यही है, इसकी आलोचना से कुछ हासिल होना नहीं है और इससे वापसी का रास्ता तो अब बंद ही मानिए।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/777405477924605622-398312723787901947?l=dr-dushyant.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://dr-dushyant.blogspot.com/feeds/398312723787901947/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=777405477924605622&amp;postID=398312723787901947' title='5 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/777405477924605622/posts/default/398312723787901947'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/777405477924605622/posts/default/398312723787901947'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://dr-dushyant.blogspot.com/2010/04/blog-post_26.html' title='ऑरकुट भर आकाश है, ट्विटर भर संसार'/><author><name>DUSHYANT</name><uri>http://www.blogger.com/profile/00269010495016554374</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_N8y3Z3aRBB0/S9bM9k9LOYI/AAAAAAAAAZs/tXTU43tzans/S220/dusht.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_N8y3Z3aRBB0/S9U-Ia92iUI/AAAAAAAAAZk/2jPhlU4Vrtk/s72-c/net.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>5</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-777405477924605622.post-9210164774020452698</id><published>2010-04-21T03:33:00.000-07:00</published><updated>2010-04-21T03:45:51.944-07:00</updated><title type='text'>एक कविता सा कुछ</title><content type='html'>&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_N8y3Z3aRBB0/S87W6bLfgaI/AAAAAAAAAZc/YKueTHaBGys/s1600/tree-of-life-web.jpg"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 400px; height: 400px;" src="http://1.bp.blogspot.com/_N8y3Z3aRBB0/S87W6bLfgaI/AAAAAAAAAZc/YKueTHaBGys/s400/tree-of-life-web.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5462539697263706530" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;blockquote&gt;कविता लिखना इतना अनायास होता है कि खुद मैं बहुत बार हैरानी करता हूं और फिर यह यकीन भी पुख्ता हो जाता है कि कविता दरअसल इलहाम होती है ऐसी ही एक ताजा इलहामी कविता पेशे नजर है&lt;/blockquote&gt;-&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बुझे से दिन और उदास शामें&lt;br /&gt;बिखरे सपने हैं &lt;br /&gt;उजाड से आशियाने में &lt;br /&gt;जैसे टूटी हांडी में दबा रखती थी कुछ बीज मेरी दादी &lt;br /&gt;दस घडों वाले परिंडे के कोने में &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुझे सहानुभूति की जरूरत नहीं है &lt;br /&gt;पर छुपाना भी तो नहीं आता है मुझे &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सच कह रहा हूं &lt;br /&gt;छुपाने की नाकामयाब कोशिशों में &lt;br /&gt;बहुत खत्म हुआ हूं मैं, मेरे दोस्त &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शाम ढल ही जाती है &lt;br /&gt;सुबह हो ही जाती है &lt;br /&gt;उम्र बीत ही जाती है &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;छूटे हुए रिश्ते और बिछडा हुआ प्रेम &lt;br /&gt;तात्कालिक याद से हट जाते हैं कुछ वक्त बाद &lt;br /&gt;जीना संभव बनाने के लिए &lt;br /&gt;या &lt;br /&gt;जीना संभव हो ही जाता है &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हांडियां कई बंधी है &lt;br /&gt;बीज जिनके बेकार हो गए हैं &lt;br /&gt;दिन मेरे बुझ गए हैं &lt;br /&gt;और शामें बेतरह उदास &lt;br /&gt;क्या किसी हांडी में छुपाके मिटटी में दबा दिया गया है &lt;br /&gt;उनका कुछ हिस्सा हमेशा के लिए। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;Painting by Tim Parish &lt;/strong&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/777405477924605622-9210164774020452698?l=dr-dushyant.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://dr-dushyant.blogspot.com/feeds/9210164774020452698/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=777405477924605622&amp;postID=9210164774020452698' title='5 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/777405477924605622/posts/default/9210164774020452698'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/777405477924605622/posts/default/9210164774020452698'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://dr-dushyant.blogspot.com/2010/04/blog-post.html' title='एक कविता सा कुछ'/><author><name>DUSHYANT</name><uri>http://www.blogger.com/profile/00269010495016554374</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_N8y3Z3aRBB0/S9bM9k9LOYI/AAAAAAAAAZs/tXTU43tzans/S220/dusht.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_N8y3Z3aRBB0/S87W6bLfgaI/AAAAAAAAAZc/YKueTHaBGys/s72-c/tree-of-life-web.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>5</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-777405477924605622.post-2236180343022250956</id><published>2010-03-09T22:05:00.000-08:00</published><updated>2010-03-10T03:33:46.942-08:00</updated><title type='text'>आठ मार्च, मेरी कच्ची रेखाएं और जाहिद अबरोल साहब की एक नज्म</title><content type='html'>&lt;blockquote&gt;&lt;strong&gt;आठ मार्च मैं भूलकर भी नहीं भूलता, 9 साल पुराने एक ऐसे ही आठ मार्च की याद, और अपने बनाए एक कच्चे से पर सच्चे से रेखाचित्र को बांट रहा हूं&lt;/strong&gt; &lt;/blockquote&gt;- &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_N8y3Z3aRBB0/S5c3Fy31IcI/AAAAAAAAAZU/Zb272IOaNoo/s1600-h/page-.jpg"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 400px; height: 321px;" src="http://2.bp.blogspot.com/_N8y3Z3aRBB0/S5c3Fy31IcI/AAAAAAAAAZU/Zb272IOaNoo/s400/page-.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5446882847022719426" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;blockquote&gt;लगे हाथ, पंजाब के मशहूर शाइर जाहिद अबरोल साहब की नज्म भी मुलाहिजा फरमाइए जो अंबाला में रहने वाले मेरे दोस्त शिवनंदन बाली ने साढे तीन साल पहले, मेरे ब्रेक-अप के बाद सुनाई थी-&lt;/blockquote&gt;  &lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जब मैं नन्हा सा बच्चा था&lt;br /&gt;मेरी मां ने इक दिन मुझसे &lt;br /&gt;एक पहेली पूछी थी-&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;एक डाल पे पांच कबूतर &lt;br /&gt;एक शिकारी ने गोली से &lt;br /&gt;एक कबूतर मार गिराया &lt;br /&gt;बोलो कितने बचे कबूतर! &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैंने नन्हीं सी उंगली पर&lt;br /&gt;गिनकर चार कहा था लेकिन&lt;br /&gt;मो ने मुझको समझाया था&lt;br /&gt;एक कबूतर के मरने से &lt;br /&gt;बाकी के सब भाग गए हैं &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आज तुम जीवन के वीराने पथ पर &lt;br /&gt;मुझे अकेला छोड चले हो,&lt;br /&gt;एक खुशी दम तोड रही है &lt;br /&gt;बाकी खुशियों का क्या होगा! &lt;br /&gt;वही पहेली आज मैं तुमसे पूछ रहा हूं -&lt;br /&gt;जो मेरी मां ने मुझसे पूछी थी,&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक डाल पे पांच कबूतर &lt;br /&gt;एक शिकारी ने गोली से &lt;br /&gt;एक कबूतर मार गिराया,&lt;br /&gt;एक खुशी दम तोड रही है &lt;br /&gt;बाकी खुशियों का क्या होगा!&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/777405477924605622-2236180343022250956?l=dr-dushyant.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://dr-dushyant.blogspot.com/feeds/2236180343022250956/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=777405477924605622&amp;postID=2236180343022250956' title='3 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/777405477924605622/posts/default/2236180343022250956'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/777405477924605622/posts/default/2236180343022250956'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://dr-dushyant.blogspot.com/2010/03/blog-post_09.html' title='आठ मार्च, मेरी कच्ची रेखाएं और जाहिद अबरोल साहब की एक नज्म'/><author><name>DUSHYANT</name><uri>http://www.blogger.com/profile/00269010495016554374</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_N8y3Z3aRBB0/S9bM9k9LOYI/AAAAAAAAAZs/tXTU43tzans/S220/dusht.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_N8y3Z3aRBB0/S5c3Fy31IcI/AAAAAAAAAZU/Zb272IOaNoo/s72-c/page-.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-777405477924605622.post-6242411068678237413</id><published>2010-03-07T01:00:00.000-08:00</published><updated>2010-03-07T01:00:06.743-08:00</updated><title type='text'>मित्थल मौसी का परिवार पुराण यानी जब समय हमारा बोलता है...</title><content type='html'>&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_N8y3Z3aRBB0/S5In3xcf2sI/AAAAAAAAAZM/AbM2IDfZO9c/s1600-h/pp.jpg"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 261px; height: 400px;" src="http://3.bp.blogspot.com/_N8y3Z3aRBB0/S5In3xcf2sI/AAAAAAAAAZM/AbM2IDfZO9c/s400/pp.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5445458738563504834" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;blockquote&gt;&lt;strong&gt;  &lt;br /&gt;इससे गुजरना अनायास अपने अतीत और एक अनुशासन के तौर पर इतिहास से गुजरना है, मुकम्मल तरीके से, अंदर गहरे तक उतरते, डूबते हुए, कभी हंसते हुए, कभी मुस्कुराते हुए तो कभी रोते हुए। हार्पर हिंदी ने इसे छापा है, उनके साहस को सलाम करना पड़ेगा क्योकि यह किसी नामचीन महिला की आत्मकथा नहींं है,&lt;/strong&gt;&lt;/blockquote&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आज विश्व महिला दिवस से एक दिन पहले एक महिला की आत्मकथा की बात करें तो यकीनन कोई बड़ी बात नहीं मानी जाएगी। पर एक आत्मकथा अगर खतों के रूप में हो तो पहली नजर में अचरज होना लाजमी है और इस रूप में चाहे वह पुरुष की हो या महिला की। मित्थल मौसी का परिवार पुराण एक अलग किस्म की आत्मकथा है, जाहिर है कि अपनी भंाजी टीटू को लिखे खतो के जरिए है पर वह अपने समय जिसका फैलाव चाहे अनचाहे एक सदी तक है, का इतिहास है, एक औपन्यासिक रचना का सा सुख देती इस किताब को पढते हुए मुझे इतिहास के विद्यार्थी के तौर पर बहुत हिचक हुई कि इसे कैसे इतिहास कहा जाए। जब इसे पूरा करके उठा तो लगा कि यह तो सौ फीसदी इतिहास है और इसे आत्मकथा के फॉरमेट में लिखा गया है। &lt;br /&gt;कहने को यह मित्थल मौसी के शब्दों में मित्थल मौसी के परिवार की कथा है, पर दो ऐतिहासिक शैक्षणिक संस्थाओं अजमेर की सावित्री पाठशाला और जयपुर के महारानी कॉलेज की नींव पडऩे की कथा से लेकर अपने समय के नामचीन लोगों के प्रसंगों तक कथा साधारण कायस्थ परिवार की कथा से आगे  अपने समय का इतिहास हो जाती है जैसे महात्मा गांधी, सरोजनी नायडू, सुमित्रानंदन पंत, हरिवंशराय बच्चन (जिनसे मित्थल की सगाई होने वाली थी), मिर्जा इस्माइल, मानसिंह और उनकी तीसरी पत्नी गायत्री देवी, विश्वमोहन भट की मां, सितार वादक विलायत खान और तबला वादक गुदई महाराज, मोहनलाल सुखाडिय़ा जैसे लोग जो समाचार की तरह नहीं बल्कि पात्र की तरह कथा में आते है। इनको भूल भी जाएं तो साधारण परिवार की कथा बीसवी शताब्दी के भारत का सामाजिक वस्तुनिष्ठ और फस्र्ट हैंड अनुभव हमारे सामने रखते हुए बड़े फलक का निर्माण करती है। लखनऊ, बनारस, इलाहाबाद सहित उत्तर प्रदेश तथा अजमेर, जयपुर, उदयपुर सहित राजस्थान और मघ्यप्रदेश के अनेक शहरों तथा दिल्ली में घूमती हुई कथा कब देशव्यापी रूप ले लेती है, पता ही नहीं चलता। &lt;br /&gt;स्त्रीविमर्श के फैशननुमा दौर में कहना जरूरी है कि मित्थल मौसी का परिवार पुराण किसी नारीवादी नारे की तरह नहीं है, पिछले कुछ समय में आई हिंदी आत्मकथाओं से सर्वथा अलग इसलिए भी है कि पुरुष संदर्भश: आता है,वह भगवान नहीं है तो उसकी आलोचना नहीं है, शोषण का प्रलाप नहीं है। पति का जिक्र भी मित्थल मौसी यानी मिथिलेश मुखर्जी बहुत अनिवार्य स्थितियों में केवल संदर्भवश ही करती है। इसमें पुरुष साधारण रूप में ही हमारे सामने आते है, किसी भी अतिशयोक्ति के रूप में कहीं नहीं। पूर्वा याज्ञिक कुशवाहा के संपादन में यह किताब पठनीय है, सुरुचिपूर्ण है, नई विधा सी होते हुए भी शुरू से आखिर तक बांधे रखती है। इससे गुजरना अनायास अपने अतीत और एक अनुशासन के तौर पर इतिहास से गुजरना है, मुकम्मल तरीके से, अंदर गहरे तक उतरते, डूबते हुए, कभी हंसते हुए, कभी मुस्कुराते हुए तो कभी रोते हुए। हार्पर हिंदी ने इसे छापा है, उनके साहस को सलाम करना पड़ेगा क्योकि यह किसी नामचीन महिला की आत्मकथा नहींं है, पर वैसे देखा जाए तो स्व.मिथिलेश मुखर्जी तो जीवंतता से कथा कहने वाली हैं, इसका मुख्य पात्र तो समय है, जो महिलाओं का, पुरुषों का, सबका है, वही इसको इतना महत्वपूर्ण बनाता है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/777405477924605622-6242411068678237413?l=dr-dushyant.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://dr-dushyant.blogspot.com/feeds/6242411068678237413/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=777405477924605622&amp;postID=6242411068678237413' title='4 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/777405477924605622/posts/default/6242411068678237413'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/777405477924605622/posts/default/6242411068678237413'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://dr-dushyant.blogspot.com/2010/03/blog-post.html' title='मित्थल मौसी का परिवार पुराण यानी जब समय हमारा बोलता है...'/><author><name>DUSHYANT</name><uri>http://www.blogger.com/profile/00269010495016554374</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_N8y3Z3aRBB0/S9bM9k9LOYI/AAAAAAAAAZs/tXTU43tzans/S220/dusht.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_N8y3Z3aRBB0/S5In3xcf2sI/AAAAAAAAAZM/AbM2IDfZO9c/s72-c/pp.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-777405477924605622.post-4889044408588813218</id><published>2010-02-15T22:53:00.000-08:00</published><updated>2010-03-08T21:07:16.674-08:00</updated><title type='text'>संस्कृति मीमांसा में मेरी प्रेम कविताएँ</title><content type='html'>&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_N8y3Z3aRBB0/S3pPt4YxWHI/AAAAAAAAAZE/yrdrBG45C0k/s1600-h/love234.jpg"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 400px; height: 398px;" src="http://1.bp.blogspot.com/_N8y3Z3aRBB0/S3pPt4YxWHI/AAAAAAAAAZE/yrdrBG45C0k/s400/love234.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5438747149652285554" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;                                        painting by alfred gokel,courtesy -google &lt;br /&gt; &lt;br /&gt;&lt;blockquote&gt; &lt;strong&gt;राजाराम भादू &lt;/strong&gt;जी के संपादन में िनकल रही &lt;strong&gt;संस्कृति मीमांसा &lt;/strong&gt;के जनवरी-फरवरी अंक में मेरी उन १०४ में से बारह कविताएँ चुनकर छापी हैं जॊ दरअसल मेरे प्रेम में टूटन के बाद दूसरे प‌क्ष की ऒर से हैं. &lt;br /&gt;छपने की कहानी जरा इस तरह है कि  ये  १०४ कविताएँ उनकॊ आलॊचकीय नजर से पढने के लिए दी तॊ बॊले - 'छापने के लिए क्यों नहीं है, वजह बताऒगे! बडी कीमत में बेचॊगे क्या !'  मैंने कहा - मुझे लगता है कि ये निजी हैं इसीलिए तीन साल से लिखी पडी हैं तॊ बॊले - 'ऐसा नहीं है और मैं इनकॊ छाप रहा हूं' &lt;br /&gt;तॊ ये छपकर सामने हैं ....&lt;/blockquote&gt; &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;1&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;क्यों तुम मेरे सपनों में आते हो&lt;br /&gt;आधी रात उठकर बैठ जाती हूँ&lt;br /
