Monday, April 6, 2009

बहुत दिनों बाद एक कविता



शीर्षक विहीन


एक उदास सी शाम

बैठी है

बिजली के तारों पर

गुनगुनाती है कोई साठ के दशक का हिन्दी फिल्मी गीत

दूर कल्पना में गाव की एक ध्वनि सुनती है

तो टूटता है क्रम

उसी पल सड़क के कोलाहल में सूरज शाम के

कानो में आकर कहता है

कब से बैठी हो .

जाओ...

कुछ काम नहीं है क्या...?

10 comments:

संगीता पुरी said...

अच्‍छी अभिव्‍यक्ति।

radhika warthe said...

बहुत प्यारी कविता है,
आप अपने ब्लॉग पर कवितायेँ क्यों नहीं पोस्ट करते हैं?

सुनंदा घोष said...

वाह क्या कविता है. छोटी सी पर बेहद प्यारी, दिल के अन्दर तक उतर जाने वाली !

nitin shukla said...

एक शाम का ऐसा भी बिम्ब हो सकता है .कभी सोचा ही नहीं. बधाई दुष्यंत जी और शुक्रिया इसे ब्लॉग पर डालने के लिए

surjeet said...

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pallav said...

sunder

TARUN JAIN said...

bhaut khoob sir

Shama said...

Dushyant, is tasveerse mel khaatee itnee khoobsoorat abhiwyakyi!!!!
Kitneehee baar apne ghrse ye nazara dekhtee hun...raushaneese vida lenese pehle parinde istarah taaronpe ikatthe baithte hain...aur phir jjab pashchima gehraane lagtee hai, saare ek hee dishame ud jate hain...
Aur wo kanome kehneki baat...koyi behad samvedansheel kavi man aise likh sakta hai..kitna alag aur nyara pyara dhang...saral...bas jao, ab kya kaam hai tumhra...?Sawalme jawab bhee shamil hai,haina?

Rajey Sha said...

एक उदास सी शाम
बैठी है
बिजली के तारों पर
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कहां-कहां नहीं बैठती उदास शाम ?

रंजना [रंजू भाटिया] said...

उदास सी शाम ...वाकई बहुत कुछ कह गयी यह पंक्तियाँ ..शुक्रिया