
Wednesday, July 8, 2009
इनसान परेशान यहां भी है, वहां भी

Tuesday, June 30, 2009
आज तीस जून है

आज तीस जून है ...
तीन साल पूरे हो गए हैं एक घटना को ...पर जो अब भी ताजा है
वक्त को गुजरना है लम्हों को सहना है और दिल को तड़पना है ...
वो खुश होंगे .आज उन्हें दुनिया की सबसे बड़ी उपाधि मिलने की पूर्व पीठिका बननी है ..फिर उपाधि मिलना औपचारिकता मात्र होगी ..खुश हूँ मैं..लाजिम है ...
दिन , अगर ऊपर वाला है तो वो ही तय करता है ..कब क्या होना है ..
मैं तो चाहता था.आज इस शहर में ना होऊं..पर फिर भी रह गया...शायद दिमाग मुझे कहीं ले जाना चाहता था और दिल रोकना....रुक गया हूँ.. ..
Thursday, June 25, 2009
आलोक श्रीवास्तव की आमीन का सफर मुसलसल जारी
कुछ लोगों की सृजनात्मकता से ईर्ष्या होती है , उनमे पहली पंक्ति में हैं - भाई आलोक श्रीवास्तव ..उनकी शायरी के पहले मजमुए 'आमीन' का दिग्विजय अभियान जारी है ...पूरी खबर के लिए एक क्लिक तो कर ही लें...
Monday, June 15, 2009
सौ साल की गवाही में एक किताब
आज एक किताब के बहाने उसके समय पर बात कर रहा हूं। पंद्रह साल पहले, पहली बार जब मेरा हिंद स्वराज नाम की किताब से राब्ता कायम हुआ था, गांधी को तार्किक रूप से समझना और उनके प्रति अपनी अगाध भक्ति के तार्किक आधार खोजना शुरू कर रहा था, उस वक्त किताब की उम्र जाहिर है 85 साल की थी। इस साल समय की रेत घड़ी में जब इस किताब को सौ साल हो रहे हैं, इस किताब की अहमियत मुझे लगता है कि बहुत बढ़ गयी है, जैसा गांधी इस किताब की भूमिका में कहते हैं कि यह द्वेष धर्म की जगह प्रेम सिखाती है, हिंसा की जगह आत्म बलिदान को रखती है, पशु बल से टक्कर लेने के लिए आत्म बल को खड़ा करती है। दरअसल ये किताब भारत की दशा और बेहतरी के लिए मॉडल प्रस्तावित करती है हालांकि वे खुद कहते हैं कि हिदुस्तान अगर प्रेम के सिद्धांत को अपने धर्म के एक सक्रि य अंश के रूप में स्वीकारे तो स्वराज स्वर्ग से हिन्दुस्तान की धरती पर उतरेगा लेकिन मुझे दु:ख के साथ इस बात का भान है कि ऐसा होना दूर की बात है। ये अक्षरश: सच है आज भी, उस निर्मम समय में जब जाति, धर्म, क्षेत्रीयता और वंशवाद राजनीति में स्वीकार प्राय: हो गए हैं।हिंद स्वराज के सौ साल एक तरह से भारत के बदलाव के सौ साल हैं, इन सौ सालों ने गांधी का अप्रतिम, अकल्पनीय और अद्भुत नेतृत्व तो देखा ही, साथ ही क्रमश: बढ़ती साम्प्रदायिकता, देश का विभाजन और विभाजित देश का विभाजन भी, गांंधी की हत्या, समाजवादी लोकतंत्र के सपने का बुना जाना और आंशिक सफलता के बाद उसका बिखर जाना, कांग्रेस के एकनिष्ठ राज, पतन और फिर क्षेत्रीय ताकतों का उद्भव और पुन: कांग्रेस का उदय, पंजाब और कश्मीर का जलना, गांंधी के ही गुजरात में सांप्रदायिकता के तांडव, उत्तर पूर्व के संकट, घोटालों के चरम, आतंकवाद और इंदिरा तथा राजीव की हत्याओं के दौर जैसी स्थितियों के बीच बनते, बिगड़ते, उभरते, उलझते, सुबकते, सुलगते मुल्क को भी देखा है। तो इन तमाम स्थितियों की गवाह किताब को इस लिहाज से देखा जाना जरूरी है कि ये किताब भारत के बनने और उसके बाद लगातार होती भूलों और चूकों, सायास चालाकियों, छद्म-अदृश्य राष्ट्रद्रोहों के आलोक में हमारे देश के गुनाहगारों की करतूतों का अतीत में रहस्योद्घाटन करती है और जैसे आज सौ साल बाद आके हर हिंदुस्तानी से कहती है कि इस गुनाह में तुम भी बराबर के शरीक हो और ये वो प्रेमपूर्ण हिदुस्तान नहीं है जिसकी कल्पना गांधी बाबा जैसे आजादी के लिए लडऩे वाले लोगों ने की थी और वो सपने अभी अधूरे हैं। गांधी बाबा जब इसमें लिखते हैं कि अगर हिदू मानें कि सारा हिंदुस्तान सिर्फ हिंदुओं से भरा होना चाहिए तो यह एक निरा सपना है। मुसलमान अगर ऐसा मानें कि उसमें सिर्फ मुसनमान ही रहें तो उसे भी सपना समझिए तब बाबरी मस्जिद का ढांचा नहीं ढहा था, गुजरात नहीं जला था। और जब इस किताब में गांधी बाबा कहते हैं कि उसने सच्ची शिक्षा पाई है जिसका मन कुदरती कानूनों से भरा है और जिसकी इंद्रियां उसके बस में हैं, जिसके मन की भावनाएं बिल्कुल शुद्ध हैं, जिसे नीच कामों से नफरत है और जो दूसरों को अपने जैसा मानता है, ऐसा आदमी ही सच्चा शिक्षित माना जाएगा। तो क्या इसे संसार के समस्त नीतिशास्त्रों का निचोड़ नहीं माना जाना चाहिए। क्या आधुनिक झंडाबरदार तथाकथित राष्ट्रवादी इस किताब में दिए स्वदेशाभिमान के अर्थ को ग्रहण करेंगे कि स्वदेशाभिमान का अर्थ मैं देश का हित समझता हूं, अगर देश का हित अंग्रेजों के हाथ होता हो, तो मैं आज अंग्रेजों को झुककर नमस्कार करूंगा।
मेरी राय में तमाम अतिशयोक्तियों से बचते हुए कहा जाय तो भी यह किताब भारतीय परिप्रेक्ष्य में बेहतर जीवन, बेहतर समाज, बेहतर राष्ट्र और फिर बेहतर दुनिया का सहज और व्यावहारिक रास्ता बताने वाली बेहतरीन किताबों मे से एक है और उन विरासतों में से भी है जिन्हें बचाना बहुत जरूरी है।
Monday, June 8, 2009
तारीख लिखो तो ऐसे लिखो
ये पुस्तक समीक्षा कतई नहीं है न ही व्यक्ति परिचय है, किताब के बहाने व्यक्ति और व्यक्ति के बहाने किताब पर भी बात नहीं है। सच पूछें तो इन दिनों एक किताब ने नींद हराम कर रखी है, किताब है झुरावौ जिसका शाब्दिक अर्थ है विलाप, और मैं सचमुच विलाप की अवस्था में हूं। एक इतिहास का विद्यार्थी एक अल्पज्ञात से ऐतिहासिक प्रसंग को जब साहित्य में जीवंत देखता है तो शायद ऐसा ही होता हो । ऐसी ही अनुभूति मुझे कुछ बरस पहले झारखंड मे रहने वाले राकेश कुमार सिंह के उपन्यास जो इतिहास में नहीं है से गुजरते हुए भी हुई थी जिसे उसके बाद जामिया मिलिया से जुड़े रहे इतिहासकार सुधीर चन्द्र ने मुझसे अनौपचारिक बातचीत में कुछ यूं बयां किया था कि साहित्य में नामों के अलावा सब सच होता है और एक हद तक इतिहास में केवल नाम॥।
झुरावौ राजस्थानी और हिन्दी के जाने माने लेखक चन्द्रप्रकाश देवल की कविता कृति है। इसमें आउवा में विक्रमी संवत 1643 यानी 1586 ईस्वी में हुए जिस धरने को केंद्र में रखकर कवितायें रची हैं वो दरअसल सामंतवाद के खिलाफ आत्मसम्मान और प्रतिकार का प्रतीक है, और जिसे गांधी के सत्याग्रहों और बिजोलिया के सत्याग्रह की पूर्व पीठिका के रूप में देखा जा सकता है। ऐसा नहीं कि ये धरना इतिहास में अज्ञात है। सूर्यमल्ल मिश्रण, श्यामलदास, विश्वेश्वरनाथ रेउ, मुहता नैणसी इस घटना से परिचित हैं पर इसे मानवीय संवेदना की उंचाइयों तक झुरावौ ही पहुंचाती है अचम्भित करने की हद तक। ये इस घटना का जादू है, उस संवेदना का भी जिसने धरने की पृष्ठभूमि रची और अंतत कवि के कवित्व का भी। पहली कविता मीठी सी पीड़ा की आरंभिक पंक्तियां तिलिस्मी हैं - बेटा ! /कमरे की उत्तर दिशा वाली खिड़की मत खोल /यह आउवा की और खुलती है। या संग्रह की अंतिम कविता की अंतिम पंक्तियां- मैं अपने होने और न होने के मध्य /उद्विग्न सा /नया आउवा तलाशता हूं /वह दूर तक मुझे /कहीं दिखाई नहीं देता।
राजस्थान के इतिहास प्रसंगों को साहित्य की विषय वस्तु बनाकर इस से पहले भी फिक्शन में उमेश शास्त्री और आनंद शर्मा के रस कपूर, यादवेन्द्र शर्मा चन्द्र के एकाधिक में से जनानी ड्योढी जैसे महत्वपूर्ण काम हुए तो हरिराम मीणा के धूणी तपे तीर जैसे हादसे भी रचे गए हैं पर कविता में झुरावौ अनोखा है और कविता तथा इतिहास के एक साथ दुर्लभ निर्वहन के साथ। इतिहास के साथ साहित्य के रिश्ते को लेकर मुझे लगता है कि बड़ा ही नाजुक रिश्ता है, कब कहां चूक हो जाए और पता भी ना चले और जब रसायनशास्त्री (राकेश कुमार सिंह और चंद्रप्रकाश देवल) साहित्य और इतिहास की कैमिस्ट्री को भरपूर निभाते हैं तो ईष्र्या-सी होती है। झुरावौ जैसी एक इतिहास आधारित साहित्यिक कृति से गुजरते हुए ये आभास होना लाजमी है कि वर्तमान की पीठ पर सवार होकर अतीत से भविष्य की यात्रा करना इंसानी आदत हो जाये तो हमारी बहुत-सी समस्याएं शुरू होने से पहले खत्म हो जाएं।
खुशामदीद !
इधर, युवा शायर धूप धौलपुरी की शायरी का पहला मजमुआ जज्बात की धूप हाल ही मंजरे आम पर आया है, फिल्मी लबोलहजे के इस शायर के अदबी मेयार की बानगी देखिए-
बादल से कहते हैं तुम ना बरसो मेरे आंगन में,
आंखों में, सावन के जैसी फिर भी झड़ी लग जाती है।
हमने बसा ली अपनी बस्ती दूर तुम्हारे शहरों में,
फिर भी न जाने कब ये बस्ती शहरों से मिल जाती है।
Friday, May 15, 2009
इस दौर के लिए अफ़सोस भी..शुकराना भी

Thursday, April 23, 2009
एक वादे का पूरा होना
जो लिख पाया आलोक भाई के बार बार इसरार के बाद.... पेशे नज़र है ......
आम चुनाव उर्फ ऐसा देश है मेरा
नहीं, ये किसी विशेषज्ञ की राय नहीं है, राजनीतिक राय तो हरगिज नहीं. आप चाहें तो इसे एक आम आदमी के नोट्स मान सकते हैं.
बुनियादी परन्तु सतही बात से शुरू करुं तो राजस्थान में लोकसभा की 25 सीटें हैं, जिन पर 7 मई को मतदान होगा.पिछले लोकसभा चुनाव में 21 पर भाजपा जीती थी तो 4 पर कांग्रेस. इस बार भाजपा और कांग्रेस हर बार की तरह सभी सीटों पर चुनाव लड़ रहें हैं. बसपा की हवा इसलिए निकली हुई है कि सभी 6 विधायकों ने सत्तारूढ कांग्रेस में जाने का हाल ही में निर्णय ले लिया.
खैर ये तो हुई सामान्य बात, अब कुछ अलग ढंग से देखा जाये, अपनी चार यात्राओं का सन्दर्भ लूंगा. एक महीने में अपने गृह क्षेत्र की दो यात्रायें, एक यात्रा मारवाड़-पाली क्षेत्र की और एक साल भर पहले की दक्षिण राजस्थान के आदिवासी क्षेत्र की.
मेरा गृह क्षेत्र है उत्तरी राजस्थान यानी गंगानगर और हनुमानगढ़ ..पाकिस्तान की सीमा से तकरीबन 15 किलोमीटर दूर अपने खेतों को छूने की हसरत से गया. कोई पिछले ढाई दशक से जब से होश संभाला है, इस गाँव और खेत के मंजर को देखते आया हूँ. लोग कहते हैं बहुत कुछ बदला है. मुझे पता है, बदला तो बहुत कुछ...ऊँटों की जगह ट्रेक्टर आ गए. पहले फोन घरों में आये फिर हाथों में मोबाइल आ गए. पढी लिखी बहुंए आ गयी, हर घर में कम से कम एक दोपहिया फटफटिया ज़रूर है.
कोई साढे तीन दशक पहले मेरे गाँव से तीन किलोमीटर दूर के पृथ्वीराजपुरा रेलवे स्टेशन से जो अंग्रेजों के जमाने का है; से मेरी मां दुल्हन के रूप में ट्रेन से उतरकर ही इस गांव तक आयी थी. मेरे बचपन में गाँव तक शहर से बस जाती थी, कोई पांच बसें. यही पांच वापिस लौटती थीं, सब की सब बंद हो गयी हैं. अब सिर्फ टेंपो चलता है, बिना किसी तय वक्त के, जब भर दिया तो चल दिया...!
बचपन में जहां मेरे गाँव में बीड़ी और हुक्के के अलावा कोई चार पांच लोग शराब पीते होंगे, अब तरह-तरह के नशे युवाओं की जिन्दगी में शामिल हैं, जिन्होंने उन शराबियों को तो देवता-सा बना दिया दिया है. और ये हालत कमोबेश आसपास के हर गाँव की है. हमने तरक्की के कितने ही रास्ते तय किये हैं!
मेरे पिता गाँव के जिस सरकारी प्राथमिक स्कूल में पढ़कर गाँव के पहले स्नातक, पहले स्नातकोतर और फिर पहले ही गजेटेड हुए, दसेक साल पहले वो मिडिल हो गया था. पर अब उसमें बच्चे नाम को हैं. मुझे कोई आश्चर्य नहीं होगा अगर आने वाले दो चार सालों में वो बंद हो जाये. सुना है उसमें मास्टर सरप्लस हैं. ये भी तरक्की है कि नाम के अंग्रेजी या पब्लिक स्कूलों में कम पढ़े-लिखे मास्टरों के पास बच्चों को भेजकर गाँव खुश है.
नरेगा है पर गाँव में भूख भी है. स्कूल है, पढाई है पर बेरोजगारी भी है. नयी पीढी ने खेत में हाथ से काम करना बंद कर दिया है , तीजिये चौथिये पान्चिये से ही काम होता है. भारत चमकता है जब सफ़ेद झक्क कुरते पायजामे में पूरे गाँव के लोग दिखते हैं. किसी की इस्त्री की क्रीज कमजोर नहीं है..अद्भुत अजीब से आनंद हैं .. कागजी से ठहाके हैं...भविष्य कुछ भी नहीं पता. एक और बदलाव आते देखा है छोटे किसानों की ज़मीनों को कर्ज निपटाने के लिए बिकते और फिर उनको मजदूर बनते भी देखा है.. मुहावरे में कहूं तो कर्ज निपटाने में जमीन निपट गई और अब खुद भी कब निपट जाए, कौन जानता है? कर्ज से मुक्ति की चमक उनकी ऑंखों में ज्यादा है या कि ऑंखों के कोरों से कभी आंसू बनके टपकता अपनी ज़मीन जाने का दर्द बड़ा है ..मैं सोचता रहता हूँ.. वो भी आजादी का मतलब ढूंढते हैं शायद.
मध्य राजस्थान का मारवाड़ का इलाका यूँ तो बिजी जैसे लेखक के कारण स्मृतियों में है पर इन सालों में कई बार जाना हुआ है... पाली के एक इंटीरियर इलाके में किसी पारिवारिक कारण से जाता हूँ. दूर तक हरियाली का नामों निशान नहीं. चीथड़ों में लोग दीखते हैं. जीप का ड्राईवर कहता है- साब यहाँ का हर गरीब सा दिखने वाला करोड़पति है..विश्वास नहीं होता. वो कहता है-हर घर से कोई न कोई मुंबई, सूरत या बैंगलोर नौकरी करता है...यहाँ खेती तो है नहीं साहब...!
मुझे उसकी बात कम ही हजम होती है..क्योंकि मुनव्वर राणा का शेर कभी नहीं भूलता कि बरबाद कर दिया हमें परदेश ने मगर, मां सबसे कह रही है बेटा मजे में है दूर तक..या तो ये ड्राइवर उसी थव से कह रहा है या कि अपने लोगों की बेचारगी-मुफलिसी का मजाक नहीं बनने देता. दरअसल सच तो ये ही है ना कि दूर तक बियाबान है.
किसी हड्डी की लकड़ी-सी काया पर ऊपर रखी हुई लोगों की आंखें किसी परदेसी की जीप का शोर सुनकर चमकती है..मैं उसमें साठ साल की आजादी का मतलब ढूंढता हूँ. जिस नज़दीक के रेलवे स्टेशन मारवाड़ जंक्शन पर उतरता हूँ और फिर जहाँ से वापसी में जोधपुर के लिए ट्रेन लेता हूँ, उसके अलावा कोई साधन नहीं है, ये भी बताया जाता है. कुल मिलाकर एक अलग भारत पाता हूँ.. जो जयपुर में बैठकर सचिवालय में टहलते, कॉफी हाउस में अड्डेबाजी करते, मॉल्स में शॉपिंग करते, हर हफ्ते एक न एक फिल्मी सितारे को शूटिंग, रिबन काटने, किसी की शादी या अजमेर की दरगाह के लिए जाते हुए की खबर पढते हुए सर्वथा अकल्पनीय है.
एक साल पहले बांसवाड़ा के घंटाली गाँव में आदिवासी संसार को देखने के अभिलाषा में गया था. सामाजिक कार्यकर्ता और कम्युनिस्ट नेता श्रीलता स्वामीनाथन मेरी होस्ट थीं.
इलाका जितना खूबसूरत लोग उतने ही पतले दुबले मरियल... अल्पपोषण के शिकार...खेती नाममात्र को..आय का कोई जरिया नहीं..भाई आलोक तोमर की किताब एक हरा भरा अकाल के सफे जैसे एक-एक कर ऑंखों के सामने खुल रहे थे..कालाहांडी का उनका शब्दचित्र अपने राजस्थान में सजीव होते पाया. हरियाली वाह...अति सुन्दर पर लोगों का जीवन...बेहद मुश्किल .. हालाँकि जीने की आदत डाल लेना इंसानी खासियत भी है और मजबूरी भी, इंसान इन क्षणों में भी मुस्कुराने के अवसर खोज लेता है.
मुझे इतने मुस्कुराते चेहरे मिले...पता नहीं इस अपेक्षा में कि कोई सरकार से जुड़ा आदमी होगा, कोई मदद करेगा. फिर लगा इस तरह तो साठ साल में बहुत लोग आये होंगे, बहुत मिथक खुशफहमियां टूटी होंगी...फिर भी कुछ है कि मुस्कुराहटें अब भी हैं. उन में कुछ लोगों से बात की. कुछ की आंखें पढने की कोशिश की..कुछ ने जो कहा उनमे से जो नहीं कहा उसे खोजकर पढना चाहा तो लगा...जिसे अंग्रेजी वाले टु रीड बिटवीन द लाइंस कहते हैं. उन्हें अब भी नेताओं से उम्मीदें है..लोकतंत्र से उम्मीदें हैं..ये ही बस लोकतंत्र की जीत है क्या...क्या कि उससे उम्मीदें अब भी हैं.
ये चेहरा सारे राजस्थान का होगा, ये सोचना शायद बहुत गलत नहीं होगा, पूरे भारत का सच भी यह हो सकता है. बस स्थानीय अंतरों को एक बार अलग रख लें तो...आपके आसपास भी थोड़े बहुत साहित्यिक-से डिटेल्स के फर्क को छोड़ दें तो..और दूसरा ये न माने कि चमकते महानगरीय भारत और तकनीकी क्रांति..मंदी से पहले की कॉर्पोरेट चमक और हाल ही की सरकारी कर्मचारियों की छठे वेतन आयोग की चमक से हम नावाकिफ हैं या उसे कम महत्वपूर्ण मानते हैं..पर उस चकाचौंध में हम जिस भारत की तस्वीर को बिलकुल नज़र अंदाज कर देते हैं..उसे देखकर मेरी अनुभूतियों के तिलमिला जाने के बयानबध्द करने की कोशिश को आप चाहे जैसे देख सकते हैं पर इस वक्त जबकि अपनी जाति के लिए भाजपा से लड़ने वाले बैंसला भाजपा में शामिल हो गए हैं... पर उनका शामिल पार्टी में बवाल मचाये हुए है और उस आन्दोलन के जातीय चरित्र को छोड़ते हुए जिस नायक का चेहरा मैंने उभरते देखा महसूस किया था वो अब मेरी नज़रों में धूमिल सा हो रहा है.
जाति धर्म..इलाके..और संबंधों ने हमेशा की तरह टिकटों का फैसला किया है और ये हर दल में हुआ है...देश और जमीन के लिए बुनियादी बदलावों के नाम पर कुछ होना एक मासूम सा ख्वाब है शायद. मुझ समेत हर किसी को अपने परिवार, अपने बच्चों, अपने करिअर की पड़ी है. चुनाव से देश की तकदीर बदलेगी,सभव है आपको इस बार लगता हो, हम ऐसा होने की दुआ करें.. दुआ ही कर सकते हैं..क्या वाकई सिर्फ दुआ ही कर सकते हैं? …..!!! इस चुनाव में हम गांधी के अंतिम व्यक्ति या अंतिम भारतीय की भी जीत हो…जय हो.
Monday, April 6, 2009
बहुत दिनों बाद एक कविता
Wednesday, March 25, 2009
तू ज्योंदा रहे मेरे शहर

आज सुबह उठा तो मेरे शहर -जो है भी और नहीं भी यानी श्री गंगानगर से एक एसएमएस ने बेहतर दिन की दुआ दी. ये आज खास इसलिए कि शहर बहुत याद आया ..हालाँकि वो दिन शायद ही हो जब मुझे उस शहर की याद न आती हो .. यूँ मेरे बचपन की स्म्रतियों में हनुमानगढ़ जिले का पीलीबंगा इलाका जो उस वक्त श्रीगंगानगर जिले का ही भाग था ..है तो किशोरपन की यादें भी उसके आसपास से ही है पर सिर्फ पॉँच साल की गंगानगर की रिहायश ने मुझे उस शहर का बना दिया है जितना पंद्रह साल की रिहायश ने जयपुर को नहीं बनाया खैर वो सुबह वाला सन्देश बाँटते हुए उस शहर को याद कर रहा हूँ -
रेलवे रोड दे नजारे ना हुँदै
मटका चौक दे इशारे ना हुँदै
जे गोदारा कोलेज दियां कुडियां ते सारे गंगानगर दे मुंडे आवारा ना हुँदै
रोनक लगदी ना दुर्गा मंदिर रोड ते गुरुनानक स्कूल विच हुस्न दे पवाडे ना
हुँदै खालसा कोलेज रोड वी सोणा ना होंदा
जे जीन टॉप ते लक दे हुलारे ना हुँदै
पंजाबी ना समझ पाने वाले मित्रों से क्षमा सहित
Sunday, March 15, 2009
तिब्बत का दर्द अपना भी है...

Thursday, March 5, 2009
प्रभु जोशी - तुम चन्दन हम पानी
कलम पर पढ़ें
जाने माने चित्रकार और कथाकार प्रभु जोशी के काम और शख्सियत पर मेरी एक टिप्पणी -जो कल पत्रिका के इंदौर संस्करण में प्रकाशित हुई है
Sunday, March 1, 2009
रही परदे में न अब वो पर्दानशीं .....

स्लमडॉग मिलिनेयर और ऑस्कर पर अमिताभ बच्चन तक की राय इस तरह बदली कि दुनिया उगते सूरज को सलाम करती है। मैं न तो डॉग शब्द की मीमांसा करने जा रहा हूँ ना भारत की छवि पर कोई स्यापा कर रहा हूँ कि भारत की बुराई से ही पुरस्कार मिलते हैं॥चाहे साहित्य हो या सिनेमा .पहली बात तो यह कि क्या कहानी,उसका लेखक और परिवेश,अभिनेता,गीत संगीत और तकनीकी स्तर पर ढेर सारे लोगों के जुड़ जाने के बाद भी सिर्फ इस आधार पर इसे भारतीय फिल्म होने से खारिज कर देना ठीक है कि इसके निर्माता निर्देशक भारतीय नहीं हैं.देखिये , बेशक साहित्य और सिनेमा जिन्दगी से बनते हैं और जिन्दगी इनसे मुतासिर होती है पर यकीनन धागे सी दूरी है इनकी जिन्दगी से...दोनों बिम्ब के माध्यम हैं सौ फीसदी सच दिखाना न साहित्य का काम है न सिनेमा का ...जैसे अतीत का सच इतिहास की विषय वास्तु है न कि ऐतिहासिक फिक्शन की ...एक बार हम मान लें स्लम डॉग में अतिरेक में भारत की बुराई को दिखाकर महान बनने की चेष्टा की गयी है तो कहूंगा कि जौहरों, चोपडाओं बडजात्यों के बौलीवुड में जो कुछ दिखाया जाता है क्या वो सच होता है पंजाब से बचपन से जुडाव रहा है ... वहाँ की नदियों का पानी पीकर और उससे सींचे खेतों का अन्न खाकर बड़ा हुआ हूँ . लोकप्रिय सिनेमा का पंजाब मुझे कहीं भी असली पंजाब नहीं लगता ..गुलज़ारनुमा कोशिश अपवाद स्वरुप ही होती हैं और जो दिखता है उसे मैं पंजाब में ढूंढता रहता हूँ . एक दिन मित्र फिल्मकार दीपक महान कह रहे थे कि भला हो भारतीय दम्पतियों की सूझबूझ का वरना कश्मीर में बर्फ पर नाचते गाते जोडों को देखकर फिर वास्तविक जिन्दगी में न पाकर तलाक़ देते देर न लगे कि मेरी पत्नी या पति वैसा नहीं लग रहा है ये है हमारा सिनेमा ,मेरा निवेदन ये है कि साहित्य और सिनेमा में जिन्दगी को यथारूप में न तो तलाश करना चाहिए न ये मुमकिन है . कहना चाहिए कि लोकप्रिय सिनेमा और डॉक्यूमेंट्री के बीच में यथार्थ के करीब का है सार्थक या समांतर सिनेमा..हाँ कभी भी इस हाशिये की सिनेमाई दुनिया का कोई उत्पाद भी लोकप्रिय हो जाता है या कभी इसका उलटा भी ..वो विरले हैं जो लोकप्रिय सिनेमा या साहित्य रचते हुए सार्थक बना जाएँ जिन्दगी के कड़वे सच से रूबरू करवादें
हाल में आई देव डी मुझे ब्रिलिएंट फिल्म लगी अनेक लोगों को फिल्म की भाषा को लेकर आपत्ति थी ..वो अपनी जगह गलत नहीं है पर जिस युवा वर्ग की वो फिल्म है ये उनकी भाषा है उनका जीवन है उनके समय का जीवन है , उन इत्रों से कहूंगा यकीन न आये तो २० से पचीस की उम्र के अपने भाई बहनों भतीजों के एसएमएस, ई मेल, चेट की भाषा एक दिन चोरी से पढने का नैतिक अपराध कर लें और ये भी कि जो कहे वो करें और जो करें वो ही जाहिर करें ये साहस भी उस पीढी में मिलेगा..हम भारतीय प्रतिकार की बजाय कड़वा घूँट पीने को महान मानते हैं ..बुरे के खिलाफ बोलने की बजाय चुप रहना...ये लगभग वैसे ही है जैसे सडांध मारते रिश्तों को जीना जीते रहना और मरने की हद तक जीनाखैर सिनेमा और साहित्य के वो बिम्ब जो यकीनन जिन्दगी से उठते हैं फिल्मकार या साहित्यकार की आंख ही जिन्हें देखती है और हम वाह कह उठते हैं इसकी वजह शायद ये होती है कि हम उसे उस तरह से नहीं देख पाते हैं...जैसे रवीन्द्रनाथ ठाकुर के पात्र मैं हर बंगाली में ढूंढता हूँ पर निराश होता हूँ वो अच्छे प्यार होते होते हैं हो सकते हैं पर रबीन्द्रनाथ के पात्रों से नहीं लगते...दोष न रबीन्द्रनाथ का है न इन बंगाली मित्रों का .फर्क माध्यम का है और उसके क्राफ्ट का है और गरज ये कि हम सिनेमा और साहित्य को और कलाओं के लिए ये मान लें कि यकीनन ये जिन्दगी से है पर जिन्दगी की छायाप्रति न है और न ही हम में से कोई चाहेगा कि ये हो जाये फिर उनकी खूबसूरती रह जायेगी क्या?
आखिर में सूफियत के दो मिसरे-
रही परदे में न अब वो पर्दानशीं,
एक पर्दा सा बीच में था सो न रहा ...
Saturday, January 17, 2009
मेरा भी है कश्मीर

एक हफ्ते से मैं कश्मीर मय हूँ हालाँकि जिस काम से वाबस्ता हूँ उसके तहत कश्मीर अंक की योजना मेरे जेहन में तभी से आकार लेने लगी थी जब उमर अब्दुल्ला के नेतृत्व में वहाँ निजाम बदलने की ख़बर आयी ॥कश्मीर में निजाम का सिर्फ़ चेहरा बदला है या वाकई कुछ बदलाव आयेगा ये फैसला तो वक्त ही करेगा पर मेरे हम लोग के कश्मीर अंक की पृष्ठभूमि में ये परिवर्तन था और फ़िर प्रेमचंद गांधी जी के विशेष सहयोग के साथ इस अंक को मूर्त रूप दे पाया।बचपन का कश्मीर याद आ रहा है जब तब लगभग अनजान से कुपवाडा का बशीर गंगानगर के गांवों में शॉलें बेचने आता था मुझे आज भी याद है कि काउ ओप रेतिव की चेतक छाप कॉपी में आखरी पन्ने पे बशीर का पता लिख रख लिया था और जब बड़ा हुआ और कश्मीर और कुपवाडा को जन तब तक चेतक चाप कॉपी किसी रद्दी वाले के यहाँ पहुचकर लिफाफा बन चुकी होगी ॥पर आज भी वो नोस्टाल्जिया का कश्मीर और बचपन का बशीर मेरी यादों में है ... ॥मशहूर डोगरी लेखिका पद्मा सचदेव जी का अपार स्नेह मुझ पर रहा है कश्मीर अंक की योजना के साथ ख्याल आया उनसे लिखवा लूँ पर उनकी तबीयत ठीक नहीं थी फ़िर उनके सुझाव पर चंद्रकांता जी से लिखवाया ,पद्मा जी ने ख़ुद चंद्रकांता जी को फोन करके कहा कि दुष्यंत का फोन आयेगा तो ऐसे प्रकरण मुझ जैसे के लिए ज़मीन से उछलने के लिए काफी हैं.....और चंद्रकांता जी ने मेरे लिए लिखा भी और चमन लाल सप्रू जी से खाने पर लिखवाया भी ....और नाटकीय तरीके से अग्निशेखर जी ने लिखा या कहूं बोला ...जिस दिन वो जम्मू में बैठकर लिखनेवाले थे उन्हें बहुत ज़रूरी काम से दिल्ली आना पडा और फ़िर वे लगातार सफर में रहे पर उनकी कश्मीर पर मुहब्बत और मेरा इसरार या मुझ पर स्नेह कि लिखना और कहना ज़रूर चाहते थे ॥तय किया कि फ़ोन पे मुझे बोलेंगे और मैं रिकॉर्ड करके आलेख तैयार कर लूँगा बुधवार शाम से मुझे जयपुर में दिल्ली की सी सर्दी ने जकड लिया खैर किसी तरह उनके नागपुर से जयपुर की ट्रेन पकड़ने से पहले उन्हें फोन पर पकड़कर मैंने तफसील से बात की ..पर फ़िर मेरी तबीयत अभी संभली नहीं थी ..एक बार सोच लिया यार जाने दो सिर्फ़ चंद्रकांता जी के आलेख को कवर बना लूंगा जब काया ही ठीक नहीं तो किस कायनात की बात कर रहा हूँ ..गांधी जी ने पूछा बात हुई? मैंने कहा कि उन्होंने लिखा तो नहीं पर बात हो गयी उसे ख़ुद ही लिखना है पर मैं लिख नहीं पा रहा हूँ ..खैर मन हुआ और लिखा और इत्तेफकान और उनके यायावरी के मिजाज की वजह से शुक्रवार की सुबह अग्निशेखर शहर में थे वे प्रसिद्द मूर्तिकार हिमा कौल से मिलने आए थे जो यहाँ राष्ट्रीय आयुर्वेदिक संस्थान में अपना इलाज करवा रही हैं ..अग्निशेखर जी उनके लिए कह रहे थे जिन हाथों ने लोहा पत्थर तोडा उन्हें शिथिल देखकर बहुत पीड़ा होती है और ये वाजिब भी है,ये मेरी अग्निशेखर जी पहली मुलाक़ात थी बेहद आत्मीयता और स्नेह से मुलाकात हुई और उनके साथ फिलहाल जयपुर निवासी कश्मीरी गायक वीर कौल से भी ..उनकी पहाडी मासूमियत और बेलागपन..क्या कहने ..दो दिन इन दो कश्मीरियों के साथ और एक पूरा हफ्ता कश्मीर को महसूस करते बीता..पूरे चार पेज के कश्मीर अंक में ..दो कश्मीरियों के साथ में... उन दोनों के लहजे और जुबां में उनके दिल का दर्द साफ देखा सुना सूंघा और महसूस किया जा सकता था ...वीर जी जब अपना एल्बम याद प्योम मुझे दिया और अपने मोबाईल से उस एल्बम का एक गीत सुनाया तो उस आवाज का दर्द मुझे अनबोला कर गया इन दिनों जितना अनबोला रहा हूँ ,शायद ही रहा होऊं..सियासत और आंकडों से इतर संवेदना और संस्कृति के स्तर पर कश्मीर को महसूस करना इस हफ्ते की सबसे बड़ी यादगार घटना हो गयी है और पत्रकारिता के मेरे करियर में इसे याद रखूंगा कल अग्निशेखर जी को जम्मू के लिए विदा करते समय भी मन भारी था और उस वक्त लगभग चुप सा मैं.. ..मैं मौन वक्त के खेल को देख समझने की चेष्टा कर रहा था ...उन्हें ये एहसास नहीं होगा कि इस कश्मीर अंक ने उनके इस फ़ोन और व्यक्तिश सानिध्य के साथ मेरे भीतर कितना और क्या बदलाव पैदा किया है।हालाँकि ये मानता हूँ की यकीनन मुझसे पहले भी कश्मीर पर केंद्रित काम हुए होंगे और मुझसे बेहतर भी होंगे पर यहाँ सिर्फ़ मैं कश्मीर को लेकर अपनी अनुभूतियाँ आपसे बाँट रहा हूँ
Monday, December 15, 2008
बधाई पल्लव
प्रिय मित्र पल्लव को भारतीय भाषा परिषद् कोलकाता की तरफ़ से राष्ट्रिय युवा साहित्यिक पुरस्कार दिए जाने की घोषणा हुई है ॥एक प्यारे इंसान की अनथक मेहनत और समर्पण का सम्मान है ये..सफर की शुरुआत भर है..यकीन मानिए..अभी कई गढ़ टूटेंगे .. ये भोर की पहली किरण है ..उजाले अभी होने हैं..रोशनी से आंखे चुंधिया ना जाए कहीं..
फिलहाल आत्मीय शुभकामनाएं भाई पल्लव को
पूरी ख़बर यहाँ है
Tuesday, December 9, 2008
ये काला दिन है जब केवल जाट ही किसान है

फ़िर हम बड़े हुए इतिहास को ओढा बिछाया तो अंग्रेजों के ज़माने को पढ़ते हुए पता चला कि फार्मर और पीजेंट नाम के दो शब्द होते हैं जो बताते हैं कि ज़मीन किसी की,खेती कोई और करता है.. मेरा जन्म गंगानगर का है सरसब्ज इलाका ..और मेरा ननिहाल हरियाणा में है मेरा ननिहाल देवीलाल की बेटी का ससुराल है लिहाजा ..बचपन में किसान राजनीति के पुरोधा देवीलाल को करीब से देखा है...किसान राजनीति के सबसे बौद्धिक और प्रभावी नेता चरण सिंह के इलाके की लडकी से पहला सर्व विदित और दो तरफा प्रेम हुआ,उसके मुंह और अपने अध्ययन अनुभव के आधार पर कह सकता हूँ कि इन दोनों किसान नेताओं ने कभी जाट पहचान की बात नहीं की ,किसान की बात की..उसके नाम पर वोट मांगे..ऐनक का निशान होगा मुख्यमंत्री किसान होगा के नारे अब भी देवीलाल का बेटा देता है ...क्योंकि देवीलाल ने कहा था..'लोक राज लोक लाज से चलता है' तो लोकलाज तो जाति के आधार पे बाँटने की बात को स्वीकार कर ही नहीं सकती है ...
अब मुद्दे की बात पे आ जायें किसी जाति के मुख्यमंत्री बनने की मांग कितनी अलोकतांत्रिक है ...कल लोकतंत्र की जीत की बात पे बल्लियों उछल रहा था मैं ...आज कांग्रेस के उस अप्रत्यक्ष से प्रत्यक्ष मुख्यमंत्री पद के उमीदवार को इस बात पे खारिज किया जाता है कि कि जाट ही मुख्यमंत्री होना चाहिए ..जाति की राजनीति का हश्र नाथूराम मिर्धा से राजाराम मील और सुरेश मिश्रा से भंवरलाल शर्मा तक सब का हम देख चुके हैं...
सीमा प्रहरी सैनिक के कल्याण के लिए पद्मश्री पाने वाला कैसे राष्ट्र हित पर जाति हित को बड़ा ठहरा सकता है ये भी सोचनीय है ...एक हद तक भारतीय समाज का चरित्र जातिवादी है और रहेगा पर राजनीति समाज से चले तो परिणाम भयावह होंगे ..कहीं न कहीं इसमें वसुंधरा के बोए बीजों का फल है ..वरना उनसे पूछे कि जब यहाँ जाट को सीएम बनने को लामबंद हो तो अगले चुनाव में गैर जाट मतदाता के सामने कैसे वोट मांगेगे ..? क्या शर्म नहीं आयेगी.? .क्या अपनी सीट भी निकाल लेंगे अगर इस आधार पर सारे गैर जाट उनके ख़िलाफ़ लामबंद हो जाए ..?अगर खेती करने वाले को ही किसान कहा जाए तो बेहतर है किसी दलित तीजिये पान्चिये चौथिये को मुख्यमंत्री के लिए नामित किया जाना चाहिए और इस आधार पर तो बी एस पी के 6 विधायक भी साथ आ जायेंगे...जाति के नाम पे लड़वाने के लिए वसुंधरा को कटघरे में खडा करने वाले ये कोनसा सदभाव फैला रहे हैं ..मेरी समझ से बाहर है ..पर इतना समझ में आता है कि बचपन का पाठ नए अर्थ ले रहा है किसान मतलब सिर्फ़ जाट चाहे वो खेती करे या नहीं..
Monday, December 8, 2008
वसुंधरा की हार जनता की जीत है

राजस्थान की पहली महिला मुख्यमंत्री इस मायने में भी पहली थी कि जनता के बीच अपने को मुख्यमंत्री बनाने के लिए निर्लज्जता से वोट मांगे ..शायद उन्हें शर्म आती थी कि वो सिर्फ़ भाजपा के लिए वोट मांगे..इतना अहम् भगवान् दुश्मन को भी न दे॥
Sunday, November 23, 2008
एक कहानी यह भी
Thursday, November 6, 2008
रसिक अफसर
प्रेमचंद की एक कहानी बरसों पहले पढी थी- रसिक संपादक॥कुछ दिनों से ऐसी ही एक कहानी मेरे जेहन में है उसमे एक जगह आकर रुक गया हूँ..आपकी मदद चाहता हूँ..थोड़ी फिल्मी लग सकती है हो भी सकती है..ऐसा हो तो मेरी नज़र में ये मेरी ताकत है कमजोरी नहीं है ..
ये कहानी एक उपन्यास का रूप भी ले सकती है ॥कहानी के और भी एंगल है जो मेरे दिमाग में शक्ल पा चुके हैं..कहानी का लब्बो लुआब और मेरी समस्या आपके सामने हाजिर है
दरअसल ये कहानी अफसर की भी नहीं है ..एक पत्रकार का रोजनामचा भी है..पुरूष की लम्पटता की तस्वीर सा भी है..पर नारा नहीं जो नारीवाद को स्थापित करता हो..अफसर जो एक पत्रकार का पसंदीदा कवि रहा है. कहानी दिल्ली की मान रहा हूँ.पटना लखनऊ भोपाल या जयपुर की मानने में भी बुराई नहीं है ..तो कहानी इस तरह है की इन्टरनेट का जमाना है एक सोशल नेट्वर्किंग की साईट फेसबुक (या कोई और भी हो सकती है ),के ज़रिये अफसर एक अपने से लगभग आधी उम्र की सुखद वैवाहिक जीवन जी रही महिला को दोस्ती का प्रस्ताव देते हैं .ख़ुद कवि हैं ..महिला साहित्य प्रेमी तो प्रभावित करने की चेष्टा उसे अनुवादिका बनाने के प्रस्ताव से शुरू होती है..असफल होने पर सुन्दरता की तारीफ़ और मॉडल बनाने का प्रस्ताव की फोटोग्राफी मेरा शौक है..फ़िर लगातार मनाही पर लगातार प्रयास.. कुछ और प्रोजेक्ट्स का चुग्गा ..सब की मनाही पर..-अधिकार पूर्वक करना होगा..मैं तुमसे करवाउंगा..तुम मेरी मिस सूजी ..एक नया सेल नम्बर सिफ तुम्हारे लिए सूजी ...जब से देखा है आगोश में लेके सोता हूँ जैसे महालम्पट प्रवचन..और श्लीलता के तमाम दायरों को लांघती फेंटेसी का बखान... डांट पर किसी भी कीमत पर हासिल करने की धमकी ..महिला अपने पारिवारिक मित्र पत्रकार से पीडा बाँटती है ..सारे रिकार्डेड फोन्स सुनाती है जो प्राकृतिक रूप से उसके अतिआधुनिक फ़ोन में रिकॉर्ड होते हैं ..वो हतप्रभ रह जता है ..अपने पसंदीदा कवि के इस विघटन से चकित ..दुखी भी..अगले पल संभालता है फ़ोन काल्स को लेता है ..कॉपी करता है महिला लगभग पागल होने के कगार पर आ जाती है ..पुरूष की अतिशय निर्लज्ज लम्पटता का उसके जीवन में ये प्रथम साक्षात्कार है ..
पर अब कहानी रुक सी जाती है कहानी आगे कैसे बढे
१- पत्रकार क्या करे -कवि रसिक अफसर की सार्वजनिक पिटाई जो अधिक व्यवहारिक और सर्वप्रचलित तरीका है ,दिखाया जाए
२-पत्रकार क्या करे अपने मीडिया हाउस के ज़रिये फ़ोन काल्स का उदघाटन और वाह वाही॥बड़ी पदोन्नति ।प्राप्त करे या किसी चैनल को बेच कर बड़ी सनसनी खडी करते हुए उसके वैवाहिक जीवन को तहस नहस होने के कारण आत्महत्या करने को विवश होता दिखाया जाए
३-महिला की पीडित होकर आत्महत्या दिखाए और दुष्प्रेरण के लिए अफसर को उम्रकैद दिखाई जाए
४-महिला के हाथों रसिक अफसर का मर्डर दिखाया जाए
५-या रसिक को स्वत शर्म से आत्महत्या करते हुए दिखाया जाए
६-कहानी का अन्य कोई विकास भी सम्भव है क्या?
Monday, October 20, 2008
परिकथा में मेरी कहानी

मैंने देखा मेरे खयालों में बफ़ सी जमी है जो यकीनन इस शहर की खासियत नहीं है, कॉफी हाऊस से निकलकर जेएलएन मार्ग से झालाना डूगरी का पथरीला पहाड दिखता है, जहा हमेशा एक पीली जर्द खामोशी रहती है, पर इस पर मानसून के महीनों में हरियाली की चादर फैलती है या फिर बारिश से पहले और उसके बाद बादलों के झुंड बर्फ सा मंजर बनाते हैं। मैं उसी बर्फ की चादर में खुद को लपेटता हुआ, लिपटा हुआ महसूसता हूँ..... खयालों की बर्फ में इक तन्हा खयाल सा मैं। ये इतवार की उनींदी दोपहर थी, वैसे इन दिनों मेरे लिए इतवार या वर्किंग डे में कोई फ़र्क नहीं है, कॉफी हाऊस में भी ऐसा कोई फर्क नहीं होता, ये कॉफी हाऊस यूं ही गुलजार रहता है, कभी-कभार उठने वाले कहकहों-ठहाकों से कॉफी हाऊस की खामोशी टूटती है, सिगरेट के धुंए से सराबोर आबोहवा में किसी की खुशबू की आहट बाकी थी। कभी कभी एक पल खुद को बेखयाली में महसूस करता हूँ पर अगले ही पल बेखयाली में एक खयाल बादल के टुकड़े की तरह जेहन में दाखिल हो जाता है। बिना आहट के चुपचाप.... दबे पाव - झलमिलाती मुस्कुराहट वाली उस चश्मीश का एक मीठा-नमकीन-सा खयाल।
मैं उसके खयालों में गुम हूँ, आज वो अभी तक दिखाई क्यों नहीं दी, दरमियाने कद की çस्लम टि्रम सी थोड़ी सांवली सी, अपनी पोनी टेल में सुंदर-सुंदर रंग बिरंगे क्लचर इस्तेमाल करने वाली, चश्मीश, हल्की लिपिस्टक में, नहीं..... नहीं..... लिपिस्टक नहीं शायद चिपिस्टक ही इस्तेमाल करती होगी वो। पिछली बार जब मैं आया था तो मुझे इसी टेबल पर मिली थी वो अपने उसी लिबास में थी, सांगानेरी प्रिंट का शर्ट, फेडेड सी जीन्स और गले में स्टॉल, उसी अदा के साथ, हमेशा ऐसा नहीं होता कि वो मुझे यहीं मिले, कभी मैं पहले आ जाता हूँ तो कभी वो पहले। मैं हमेशा अकेला नहीं होता, या कहूँ अक्सर अकेला नहीं होता, उस दिन भी ऐसा ही था, मैं अकेला नहीं था, ठीक और दिनों की तरह..... मेरे साथ कोई लड़की नहीं थी..... अक्सर नहीं होती..... चंपू किस्म का हूँ ना मैं..... इसलिए..... चलिए छोडि़ये..... इस फ्रस्ट्रेशन को..... मेरे साथ बैठे अल्ट्रा मॉडर्न टाईप के आशीष ने कहा था जो कई बार इस टेबल पर मेरे साथ बैठा है - मेरे अकेलेपन को तोड़ते हुए, हा¡..... तो उसने कहा था..... `यार जरूर तुम्हारे किसी पिछले जन्म की प्रेमिका है ये.....´ कह के उसने ठहाका लगाया। मैं `मे-बी´ कहकर चुप हो गया। चुप..... नहीं..... चुप नहीं शायद सोच में गुम। इसी सोच में कि क्या वाकई आशीष सही कह रहा है मुझे यकायक पुनर्जन्म में विश्वास होने लगा.... फिर लगा नहीं....। चलिये छोडि़ये उस दिन की बात.... आज का दिन कुछ अलग सा है..... लगता है बारिश होगी..... बादलों ने डेरा डाल दिया है..... ठंडी हवायें बारिश का संदेशा देने आ रही हैं बार-बार....., बदन में हल्की सिहरन का कारण बनती हैं.....। बारिश में भीगती बॉलीवुड की सांवली सलोनी नायिका मेरे जेहन में कतई नहीं है....। लिखते वक्त तो है पर उस वक्त नहीं थी।
साथ वाली टेबल पर एक कपल यंग कपल..... आ के बैठ गया है लड़की गुस्से में नजर आती है..... `कितनी बार कहा है अगर लेट हो रहे हो तो इन्फॉर्म कर दिया करो..... कितनी देर हो गई इंतजार करते-करते बेवकूफों की तरह, पता है तुम्हें संडे को घर से बड़ी मुश्किल से निकलना होता है, रोज-रोज वही बहाने, कितना मुश्किल होता है उन्हें प्रभावी बनाना, फिर ऊपर से तुम्हारी लेटलतीफी..... तुम लड़कों को तो कोई फर्क नहीं पड़ता.....´ लड़का सॉरी-सॉरी करते हुए खिसियाता है, प्लीज-प्लीज कहते इधर-उधर देखता है- `देखो यार, अब बस भी करो, सॉरी बोला ना- देखो सब देख रहे हैं- अच्छा लगता है क्या ऐसे।´ मेरी तर$फ वो दोनों अजीब तरीके से देखने लगे, वे थोड़ा कूल हुए..... आपस में और लड़की की आवाज का वोल्यूम भी कम हुआ..... पर..... मुझे लगा मेरी उपस्थिति उन्हें खटक रही थी, मैं कुछ नहीं कर सकता था, मैं बस अपनी नजर फेर सकता था कि मेरी नजरें उनके एकांत में दखल पैदा ना करें, कभी-कभी अनायास जाती न$जर शायद उन्हें तकलीफ दे रही थी। मैंने अपने आपको मोबाइल में उलझाने की कोशिश की, यह सोचकर कि इन्हें डिस्टब न करूँ और मेरा वक्त भी गुजर जाए। मेरे मोबाइल में बैलेंस नहीं था कि कॉल कर सकू, दो-चार पुराने एसएमएस मल्टी रेसीपेंट के ऑप्शन में जाके दोस्तों को फारवर्ड मार दिये। अगर ये एयरटेल वाले सुनील भारती मित्तल 36 रू. में एक हजार एसएमएस का पैक ना दें तो मेरे जैसों का तो सारा पब्लिक रिलेशन गड़बड़ा जाये। इनबॉक्स पढ़ने लगता हूँ, फिर कुछ एसएसएस को गैरजरूरी मानते हुए, हालांकि एसएमएस जरूरी होते ही कहां हैं, डिलीट करने लगता हूँ, फिर लगता है..... उफ..... किस अजीब काम में लग गया, इतने में आहट हुई, देखा कुछ नहीं था.... कोई नहीं था, मन का भ्रम था, मैं उस कपल पर से ध्यान पूरी तरह हटाने की कोशिश में था।
उन्हें सप्रयास और किंचित असफलतापूर्वक भूलकर मैं अकेला था, गालिबन कई दिनों के बाद, पता नहीं, याद नहीं..... पिछली बार कब अकेला था यहाँ , अकेला भी अकेला कब होता हूँ, बकौल आशीष - मेरी पूर्व जन्मों की प्रेमिका भी तो यहीं होती है, कभी सशरीर तो कभी इस तरह से खयालों में कि वो आज क्यों नहीं है यहाँ , अक्सर जब वो यहा मिलती है..... तो आज क्यों नहीं है, इसी आवृत्ति और एक ही समय में साथ होने को मेरे दार्शनिक मित्र आशीष ने आग और धुंए के सत्कार्यवादी संबंध से जोड़ते हुए मुझे उसके पिछले जन्म का प्रेमी और उसे मेरी प्रेमिका घोषित कर दिया था, अक्सर अब मित्रों के समूह में मेरी पहचान का नया सूत्र यही था- नया आई कार्ड- `कॉफी हाऊस वाली का पूर्व जन्म का प्रेमी´। कभी-कभी या कहूँ प्राय: परिहास का विषय भी..... `आजकल तो अपने चंपू भी गर्लफ्रेंड वाले यानी प्रेमी मजनूं-फरहाद-रांझा के अवतार..... यार बैलगाड़ी वाले प्रेमी..... जैट विमान वाले नहीं..... बोले तो कबूतरों के जरिये प्रेम पत्र..... नो एसएमएस...... नो ई-मेल जस्ट फीमेल..... नो चैटिंग-नो डेटिंग..... डायरेक्ट सेटिंग..... फिर मेरी तरफ मुखातिब होकर..... यार कबूतर आया कि नहीं? रामनिवास गार्डन से एक कबूतर हायर करें तेरे लिए। अरे पोपट..... बता भी दे..... मेरे चंपू..... चल-चल शरमा मत..... कॉफी हाऊस की उसी टेबल पर एन्जॉय करेंगे- ट्रीट पक्का - हम लोग देंगे यार- हमारी दोस्ती एंवे ही थोड़ी है..... पक्के दोस्त हैं..... जल्दी बता..... फिर क्या प्रोग्राम है..... चट मंगनी पट ब्याह या बस फ्लर्ट का इरादा है..... बोल-बोल.....।´
इतने में अधेड उम्र के वेटर ने आके मुझे जगाया, सामने की टेबल अभी खाली थी, साथ वाली टेबल पर बैठा कपल जा चुका था, कथई आंखों वाली लड़की पंजाबन लग रही थी, लड़का भी ठीक-ठाक सा था, पता नहीं क्यूं लगा मैच सही नहीं था, खैर अपने को क्या..... आदमी की फितरत होती है इतना सोच ही लेता है, बिना जरूरत के, औरतें भी सोच लेती होंगी, इसलिए यहा¡ आदमी को दोनों सेंस यानी मेल-फिमेल दोनों में लिया जाए..... ठीक है ना.....।`सा´ब क्या लेंगे, चाय या कुछ और।´ मैं अक्सर चाय लेता हू, कभी-कभार कुछ ओर..... कुछ ओर यानी मसाला डोसा..... या फिंगर चिप्स या..... वेज पकौड़ा, दैट´ज ऑल..... जबसे ये नौकरी छूटी है, `कुछ और´ `कुछ नहीं´ में बदल चुका है। `बस चाय यार, कोई आने वाला है, बाकी ऑर्डर उनके आने के बाद।´ वेटर `जी साब´ कह के चला जाता है, मुझे हमेशा लगता है कि वो मुझे, मेरी हालत को भांप गया है जब भी मुझे ये याद आता है, मैं उससे नजरें नहीं मिला पाता..... इधर-उधर देखते हुए `बस चाय´ कह देता हूँ या पानी पीते हुए जल्दी से कह देता हू - ताकि वो चला जाये और मुझे नजर ना मिलानी पड़े। वैसे भी मुझे लगता है इस कॉफी हाऊस में चाय अच्छी होती है कॉफी से ज्यादा। कभी भूले बिसरे अगर इस कॉफी हाऊस के साउथ इंडियन मैनेजर इस कहानी को पढ़ें तो उनसे गुजारिश है कि मुझे नौसिखिया कॉफी टेस्टर मानकर माफ कर दें....., आपको नहीं लगता व्यक्ति जरूरत से आविष्कार करता है, सिद्धांतों का भी। कॉफी हाऊस की चाय को बेहतर बताना भी ऐसा ही वैचारिक आविष्कार हो सकता है। वैसे भी जॉब छूटने के बाद एक अजीब सा प्रेम करते हुए - सामने की टेबल वाली लड़की से..... इस तरह चाय को एन्जॉय करने का लुत्फ़ शब्दों में कहाँ बयान हो सकता है, गीता पर हाथ रखकर सच बोलने की कसम खाकर भी मुमकिन नहीं लगता, मैं भी देखिये कैसी जुरत कर रहा हू, जाहिर है नाकामयाब सी कोशिश है यह.....। हो सकता है आपको जाहिर ना लगे या कामयाब सी लग जाए।
मेरी प्रेमिका - देखिये मेरा दुस्साहस कोई बात ना चीत और कह रहा हू¡ पे्रमिका..... खैर..... वो अभी तक नहीं आयी थी..... वेटर चाय ले आया..... आज कुछ जल्दी ले आया..... हमेशा इतनी जल्दी नहीं लाता..... उसे पता है चाय यहा बैठने का बहाना होती है..... इसलिए इतनी जल्दी नहीं लाता वो..... इतनी देर में एक ओल्ड एज कपल मेरे सामने वाली टेबल पर जी..... हांजी..... ठीक उसी सामने वाली टेबल पर आकर जम गया..... मुझे गुस्सा आया..... यहीं आना था इन्हें..... इतना लंबा चौड़ा कॉफी हाऊस है..... यही टेबल मिली है इन्हें बैठने के लिए..... बूढे, खूसट..... घर में चैन नहीं पड़ता इनको - घर में चैन नहीं पड़ता तो जाएं ना मंदिरों में - सत्संग में - कॉफी हाऊस में क्या कर रहे हैं - कॉफी हाऊस में आ ही गए तो यही टेबल मिली बैठने के लिए..... `स्साले´ मेरे मुह से निकल गया अनायास..... इन सहायक क्रियाओं के प्रयोग से बचता हू¡ पर गाहे बगाहे निकल ही जाती है, कई बार तो धांसू इम्प्रेशन भी पड़ता है..... हालांकि मेरी वोकेब बड़ी सॉलिड है इस मामले में, जाहिर है मुझे इतना शरीफ यानी बेवकूफ ना माना जाये और ना ये बात कहकर मैं इतना शरीफ बनने की कोशिश कर रहा हूँ। दोस्त लोग कहते हैं इस वोकैब को जंग लग जाएगी, इस्तेमाल करते रहा कर, छोडि़ये भी..... कहाँ उलझा दिया - मैंने अपनी प्रेम कहानी को, माना बोल्ड नहीं है नई सदी की फिल्मों या टीवी सीरियलों की तरह, फिर भी आपको इतनी फुर्सत कहाँ होगी मेरी उल-जुलूल बकवास सुनने की..... आपने इतनी देर में पता नहीं कितनी हैल्पंग वब्र्स मेरे लिए बोल दी होंगी या कहूँ नवाज दिया होगा मुझे - भद्दी-भद्दी उपाधियों से- छ: से लेकर मा बहनों तक की, है ना।
तभी ओल्ड एज कपल में पता नहीं किस बात पर नोक-झोंक हुई और वे बिना कुछ लिए-खाए-पिये उठ खड़े हुए, मुझे लगा यूं ही भला बुरा कहा- कितने अच्छे हैं..... अंकल-आंटी को ईश्वर लंबी उम्र दे, उनका प्यार बनाये रखे। लड़ाई से प्यार बढ़ता है, है ना? प्यार तो वैसे भी जन्मों के लिए होता है, जैसे..... मेरा, बार-बार दोहराने से कहते हैं झूठी बातें सच होने लगती हैं, मेरा पढ़ाकू दोस्त आशीष कहता है, हिटलर का प्रचार मंत्री था - गोयबल्स, कहता था - झूठ को सौ बार दोहराओ तो सच बन जाता है, मुझे भी यकीन होने लगा था - मेरे प्रचार मंत्री आशीष के पुन: पुनश्च आस्था-श्रद्धा चैनल टाइप प्रवचन से..... कि वो मेरी प्रेमिका है..... मेरे पिछले जन्मों की।
तभी देखता हू¡ एक कपल यानी प्यार करने वाले पंçछयों का जोड़ा, कॉफी हाऊस में कोई भी टेबल खाली न पाकर निराश लौट रहा है, अब मैं तार्किक रूप से सन्तुष्ट हो जाता हूँ, उस बुजुर्ग कपल के प्रति मैं सम्मान और आदर से भर जाता हू¡, कतिपय शमिदगी के साथ। कई बार मुझे लगता है इस कॉफी हाऊस को लव-बर्ड्स के लिये रिजर्व कर देना चाहिए - फिर मैं और मेरी उस प्रेमिका- पिछले जन्म वाली का क्या होगा? अरे हम भी तो लव-बर्ड्स ही हैं, क्या हुआ जो एक टेबल पर साथ नहीं बैठते।..... तभी..... मैं सोचता हूँ..... आशीष ने कहा था- आ जाऊगा..... इतनी देर में तो आ ही जाना चाहिए था, उसे..... हमेशा ऐसा ही करता है- तभी मेरे जनता मोबाइल यानी नोकिया 1100 की स्क्रीन की लाइट चमकती है, साइलेंट मोड पर है, देखता हू¡ एक एसएमएस है आशीष का- क्या टैलीपेथी है, जनता मोबाइल नाम भी तो उसी ने दिया है, जैसे वो मारूति 800 को जनता कार कहता है- एसएमएस देखता हू¡-i cant cum,actully i am busy wid ... sorry yaar..dont mind,njoy with ur pichhale janamwalee' फिर किसी गलफ्रेंड के साथ फंस गया लगता है, वैसे मैं उसके स्त्री विषयक ज्ञान का कायल हूँ हर बार कोई न कोई स्त्री विषयक सूक्ति, मनोवैज्ञानिक या दूसरे किसी प्रकार का तथ्य या विचार वो जरूर शेयर करता है, देखिये ना पिछले बार उसने कहा था- शादी से पहले लड़कियां कभी बैलेंस नहीं होतीं या तो बेहद भोली या बेहद चालाक- या बहुत इमोशनल या फिर.....। पता नहीं कितना सच पर उसकी तार्कक प्रस्तुति उसके वाक्य को एक तथ्य सा रिलायबल बना देती हैं, ठीक ओशो की तरह, ओशो का अवतार- आशीष..... उसके तको के आगे मेरे पास कोई तर्क नहीं होता अक्सर। हो भी तो भोथरा-सा नजर आता है - पिद्दी सा..... मैं उसे अपनी जुबान तक नहीं लाता, क्योंकि उस तर्क की तार्किक हार, लगता है, पहले से ही निश्चित होती है। बहुत बार अपनी ही बात, सूक्ति, सिद्धांत से यू टन ले लेता है, और उसका कमाल देखिये कि दोनों बार उसकी बात तार्किक , अपीलिंग और अकाट्य होती है फिर से ठीक ओशो की तरह। इस बार कह रहा था- `यार एक किताब हाथ लगी - मन्मथनाथ गुप्त की लिखी `स्त्री पुरूष संबंधों का रोमांचकारी इतिहास,´ क्या किताब है यार, सीमोन द बूवा की सैकिंड सैक्स के बाद यही किताब है जिसने मुझे हिला के रख दिया।´ मुझे लगा पुस्तक समीक्षा लंबी चलेगी, जल्दी निपटाने के लिए बोला -`इसकी कोई खास बात बताओ जल्दी से, `यार शुरू में मार्क्स का एक कोट है बहुत प्यारा।´`क्या है ?´`मार्क्स कहता है - जिसे इतिहास का थोड़ा बहुत ज्ञान है, वह जानता है कि स्त्री जीवन के खमीर के बिना महान सामाजिक परिवर्तन असंभव हैं। सच्ची बात तो ये कि सुंदरियों (असुन्दरियों सहित) की सामाजिक स्थिति से समाज की उन्नति को सही तरीके से नापा जा सकता है।´ तुरत-फुरत मैंने उसकी बात को अपने प्रेम से जोड़ लिया था और अपनी प्रेमिका से किसी महान सामाजिक परिवर्तन की कल्पना करने लगा था। अरे यार! मैं बार-बार फ्लैश बैक में क्यूं चला जाता हूँ, ये बॉलीवुड वालों ने भी देखिये ना कितनी आदत बिगाड़ दी है..... अब तो स्टार प्लस वाले भी वैसे ही हो गये हैं..... खैर..... मैं देखता हूँ सामने वाली टेबल पर कोई आ चुका हूँ..... अरे वही तो है मेरी पूर्व जन्म की.....। उसके भीगे बाल बताते हैं कि बारिश में अटक गई थी वो, या हो सकता है भटक गई हो। अब बारिश को गालिया¡ देने लगा, बारिश की वजह से नहीं आ पाई वो, इतनी देर.....। यहाँ तो नहीं हो रही बारिश..... जरूर उस तरफ हो रही होगी, जहाँ ये रहती है या जहाँ से आ रही है.....। मेरे मन ने आशीष की तरह सत्यकार्यवादी निष्कर्ष निकालने शुरू कर दिये। मैं आज दृढ़ निश्चय कर चुका था, आज उससे बात करू¡गा। वो कौन है, क्या करती है? इस वक्त यहा क्यों होती है? (ये नहीं पूछूगा कि मैं जब भी यहा¡ होता हूँ तो उसी वक्त यहाँ क्यों होती है, क्योंकि अगर वो मुझसे ये सवाल पूछे तो मेरे पास भी इस बात का कोई जवाब कहा है?) मैं हिम्मत करता हूँ। `एक्सक्यूज मी, आपसे दो मिनट बात कर सकता हूँ।´ पता नहीं चंपू में कहाँ से हिम्मत और सलीका आ गया। `श्योर´, इतना-सा कहते हुए साथ वाली सीट पर बैठने के लिए इशारा करती है। ये मेरी छोटी सी कामयाबी आगे के लिए मुझ में हौंसला भर देती है।`आप यहाँ किसी जॉब में है ?´`नहीं´`तो!´`व्हाय आर यू इंटरेस्टेड ?´ `बस यू ही´`......´`कहा¡ रहती हैं ?´`व्हाय आर यू इंटरेस्टेड ?´`बस यू ही´`......´`आपको बुरा लग रहा है, तो जाने दीजिए, थैंक्स एनी वे´ ये कहते हुए मुझे लगता है मेरे हौंसले की हवा निकल गई है.....।मैं झेंप मिटाने की कोशिश करते हुए उठ कर चलताहूँ तो आवाज आती है- `ऐ मिस्टर´ खिलखिला कर हंसती है-`अरे, हा¡ तुमसे कह रही हूँ´ मैं पीछे मुड़ता हूँ और बैठने के लिए कहती है। `पहले दोस्ती करोगे फिर बताउंगी ´ मैं हिचकिचाता हूँ, वो हाथ बढाती है - हैंड शेक के लिए। मैं सकुचाता हूँ - कहती है -`अरे चंपू´ मैं हतप्रभ देखता हूँ और हाथ आगे बढ़ा देता हूँ। सोचता हूँ, इसे मेरा निकनेम चंपू कहाँ से पता चला। फिर जवाब भी तुरंत बन जाता है..... लगता हू ना इसलिए.....। `आय एम शालिनी, आर्टिस्ट बाई प्रोफेशन एण्ड हॉबी टू´ पन्द्रह साल पहले अपने हसबैण्ड के साथ आई थी यहाँ लंदन में रहती हूँ, ही इज नो मोर, हर साल जाती हूँ एक बार जहाँ मैं उसके साथ गई थी, इस कॉफी हाऊस में बहुत वक्त गुजारा हमने साथ।´`बहुत प्यार करती थीं उन्हें! अब भी करती हूँ क्या हुआ जो वो नहीं हैं फिजिकली, इस कॉफी हाऊस में हमारी पहली मुलाकात हुई थी, ही वाज फ्रेंच, ए जर्नलिस्ट बाई प्रोफेशन, वी केम हेयर मैनी टाइम्स, बिफोर एण्ड आफ्टर मैरिज, सो इटस व्हेरी पार्ट ऑफ माई लाइफ।´मैं उसे नजर भर देखता हूँ , वो स्तब्ध देखती है। मैं चौंक जाता हूँ.... मेरी नजरें झुक जाती हैं जैसे कोई अपराध करते हुए रंगे हाथ पकड़ लिया गया होऊं।`बट लैट मी नो समथिंग एबाउट यू मिस्टर´ `सुधीर, जनलिस्ट बाय प्रोफेशन बट विदाउट जॉब जस्ट नाऊ, नए जॉब की तलाश में हूँ । दैट´ज वाय आय कांट ऑफर यू मोर दैन ए कप ऑफ टी।´`जर्नलिस्ट `हूह´, रुकती है फिर कहती है - `इतना सच क्यों बोलते हो, जवानी में इतना सच नहीं बोलते, फेकों..... लम्बी-लम्बी उड़ान भरो दैटज लाइफ इन यंग एज, सुधीर। नैवर से विदाउट जॉब, एट लीस्ट टू द गल्र्स। ओके.....´उसका मोबाइल बजता है, बिपटोन के साथ वो अपने आर्टिस्टिक से हैंडबैग की मोबाइल पॉकेट से मोबाइल निकालती है। स्क्रीन चमक रही थी, एसएमएस था पता नहीं किसका और क्या.....। इस मोबाइल ने भी ना देखिये..... हमारी प्राइवेसी और सुकून के वक्त को अतीत का किस्सा बना दिया है, छूत की ऐसी बीमारी कि एक बार लगे तो फिर पीछा न छोड़े। संचार क्रांति..... माइफुट। वो एसएमएस पढते ही जाने का मूड बना लेती है उसके हाव-भाव से अन्दाजा लगाता हूँ.....।`फिर बैठते है, यू आर इंटरेस्टंग गाय टू चैट विद, योर टी नेक्ट टाइम श्योर। आई मस्ट गो नाऊ, सी यू बॉय´ इतना कहते हुए वो उठकर चली जाती है। मैं अपने से तकरीबन 15 साल बड़ी अपनी पिछले जन्म की प्रेमिका को निहारता हूँ जो अपने इस जन्म के प्रेमी की यादों में यहाँ आती है।कॉफी हाऊस अब भी वैसा ही है, वहीं है, इंच भी नहीं खिसका, माहौल वैसा ही है, चिर युवा कॉ$फी हाऊस, कुछ ठहाके, सिगरेट का धुंआ..... अपने में गुम बेपरवाह वेटर और उनसे भी ज्यादा बेपरवाह यहाँ आने वाले लोग..... बारिश का मौसम है, बारिश का माहौल भी है, यहा¡ बारिश नहीं हुई। हल्का अंधेरा पसर चुका है, वो मेरे जेह्न पर काबिज होने की फि़राक में है। वो जा चुकी है, उस टेबल पर मैं अकेला हू¡। जिस टेबल पर अक्सर बैठी मेरी उस प्रेमिका - अब तो उसका नाम भी है - शालिनी, तो शालिनी को, अजीब तरीके से, निहारता हूँ - या कहू घूरता हूँ। मैं देखता हूँ, महसूसता हूँ - मेरे भीतर बहुत कुछ बदल चुका है..... बहुत कुछ बदलने की प्रक्रिया मे है..... सोचता हूँ¡ शहर में बारिश हुई है, बारिश में नहाया जयपुर बहुत खूबसूरत दिखेगा..... बदला-बदला..... साफ-शफ्फाफ.....। मैं उठकर अपनी उसी टेबल पर आ जाता हूँ, उस सामने वाली टेबल की ओर देखता हूँ, मैं अपनी नजर को खुद देखने की.... असफल कोशिश भी करता हूँ.... टेबल अब भी वैसी है..... बिल्कुल वैसी..... गोल पूर्णमाशी के चांद सी..... अपने आसपास घटित होने वाली घटनाओं से निलिप्त-सी, साक्षी भाव से स्थिर.... वेटर फिर मेरे पास आता है। वो कुछ बोले इससे पहले उससे कह देता हूँ - `एक चाय´।
Wednesday, October 1, 2008
कैसे चुप रहूँ

पहली बात तो ये कि ये कहीं अकेले में नहीं कहा गया.सारा ने जाहिर तौर पर कोई शिकायत नहीं की कि ये बदतमीजी है ..बहुत सम्मानपूर्ण तरीके से तारीफ़ की गयी है..खैर..दूसरी तरफ़ देखें फतवा आया है..लाल मस्जिद से..फतवा कोई दे.. ग़लत है..व्यक्तिगत सोच की स्वतंत्रता की अस्वीकृति है..वर्शाजी कहती है कि ये हिमाकत है ज़रदारी मियाँ कि जैसे किसी जूनियर आर्टिस्ट ने ऐश्वर्या रॉय को कुछ बोल दिया हो यहाँ तो आलम ये है कि फिलहाल ज़रदारी ऐश्वर्या की तरह हैं..निर्वाचित राष्ट्रपति हैं.यानी एक राष्ट्राध्यक्ष और वो अलास्का प्रान्त की गवर्नर और उप राष्ट्रपति पद की उम्मीदवार. तो मेरे ख़याल में ये जूनियर सीनियर की बात नहीं है..प्रशंसा के लिए ज़रूरत भी नहीं है..वैसे थोडा पतला करें तो दिलीप साब तो बहुत सीनियर थे जब उन्होंने सायरा से निकाह किया या कि प्यार अलग बात है..चलो एक बार मान लिया...हाँ मजाक में ये कह सकते हैं..ज़रदारी को अपने पद के मुताबिक महिला चुननी चाहिए थी..अपने से हीन महिला को चुनना स्तर के अनुरूप नहीं है..यहाँ मुझे पुरूष लम्पटता के पैरोकार का आरोप भी सहना पड़ सकता है मैं जानता हूँ॥
अब क्या आसिफ ज़रदारी बशीर बद्र को याद कर रहे होंगे..कि ये नए(पुराने) मिजाज का शहर (देश) है ज़रा फासले से मिला करो.. दरअसल न ये सवाल नए पुराने का है न जूनियर सीनियर का..ये सवाल फतवे का है..मैं तो कहूंगा कि ज़रदारी बाकी जिन्दगी में जैसे भी हों..भ्रष्ट हों..बेईमान हों..लम्पट हों..पर ये एक्ट तो जाहिरा तौर पर सार्वजानिक और मर्यादित सम्मान पूर्ण है..हमें क्या याद नहीं आता अमेरिका और रूस के राष्ट्राध्यक्ष एक दूसरी की पत्नियों को किस करते हैं वो भी फ्रेंच किस तो.. क्या उसे काउंटर पार्ट्स के बीच का सामान्य व्यवहार कहेंगे..इसे विषयांतर कहकर भी पल्ला नहीं झाड़ सकते...वो फ्लर्ट है!
साफगोई और तार्किक बेबाकी वाले इंसान की वैचारिक गिरावट की आहट सुन रही है..खुदा ना करे ऐसा हो..वर्षा जी सुन रही हैं क्या?
Wednesday, September 24, 2008
प्रभा खेतान का जाना

फ़िर कुछ वक्त बाद उनका उपन्यास पीली आंधी और छिन्मस्ता पढ़ डाले फ़िर रहा नही गया और लेखिका को पत्र लिख दिया ..जवाब आया जिसकी उम्मीद नहीं की थी मैंने..लंबा पत्र मिला खुशी हुई कि उन्हें मेरा ख़त पाके खुशी हुई थी..हमवतनी का ख़त अपनी किताबों पर..लगभग मुग्ध भाव का ख़त.फ़िर ये सिलसिला ही चला ..पर एक बात जो पहले ही ख़त में लिखी .दिल को छू गयी..दरअसल ये मेरी दुविधा का निराकरण था .मैंने कहा कि संबोधन क्या दूँ .उम्र में मां समान है.. और लेखन के कारण श्रद्धानवत हूँ ही ..मेडम कहना औपचारिक लग रहा है ..नम लेकर बात करना बदतमीजी तो उन्होंने कहा कि प्रभा दीदी कह सकते हो और आखिर में 'सस्नेह प्रभा दीदी' के शब्द आज भी मेरे मन पर अंकित हैं..
फ़िर फ़ोन पर अनेक बार बात हुई उन्हें खुशी हुई कि उनके अनुवाद से प्रेरित होकर महिला अध्ध्ययाँ में पीएच डी कर रहा हूँ..वो इस बात पे भे बहुत खुश थी कि मैं दर्शन का विद्यार्थी रहा हूँ और स्त्री विमर्श में इतिहास में काम कर रहा हूँ.. जब मैंने अपने विषय से जुड़े दो प्रकाशित शोध आलेख भेजे थे तो उन्होंने उन्हें शब्दश पढ़कर जिज्ञासाएं रखी थीं..उनके दार्शनिक प्रश्नों ने मुझे चोंकाया और मार्गदर्शित किया था ..
वो बहुत उत्सुक थीं कि छप के आने दो ज़रूर पढूंगी ..वो मेरा शोध किताब के रूप में आने के लिए अभी प्रकाशक के पास प्रकाशनाधीन है काश उन्हें ये सुख दे पाता..पिछले साल जब तसलीमा नसरीन जयपुर आयीं थी तो प्रभा दीदी के पुत्र संदीप भूतोडिया आए तो उनके साथ ही तसलीमा से मिला तो प्रभा जी के बारे में संदीप और तसलीमा जी से बातें हुई थीं ..अज तक रूबरू मिलने का मोका नहीं मिला पर किसी के विचारों से मिल के लगता ही नहीं कि उनसे मिला नहीं था.. हर बार फोन पर वही अपनापन..स्नेह और एक सवाल इन दिनों क्या पढ़ रहे हो..
उनका जाना बहुत अस्वाभाविक लग रहा है ..सोचा था उनके हाथों मेरी शोध पुस्तक का लोकार्पण होता...हर बार जब भी फोन करता था तो ये ज़रूर पूछती थीं कि कब आ रही है!
अब वो पूछना नहीं होगा.. मेरे शोध की प्रथम प्रेरणा पुस्तक की अनुवादिका का अवसान मेरे लिए बहुत बड़ा झटका है..
Tuesday, September 2, 2008
अलविदा कैसे कहें आउटलुक हिन्दी को...

आउट लुक का सितम्बर अंक आ गया है...गौर करें सितम्बर अंक..नज़र कई देर ठिठकी रही सितम्बर पर..समझ गए होंगे मैं क्या कह रहा हूँ..बस इतना सा कि आउट लुक हिन्दी अब साप्ताहिक नहीं रही मासिक कर दी गयी है....आलोक मेहता जी के नयी दुनिया चले जाने के बाद इस परिवर्तन की उम्मीद नहीं थे..हालाँकि आशीष ने अपने ब्लॉग हल्ला पर ऐसा संकेत दिया था..मुझे अफवाह लगी थी ..अपने भीतर एक जलजला उठते पाया ॥
साहित्यिक पत्रिकाएं न चले ये किसी हद तक समझ में आता है॥मैंने भी एक साहित्यिक त्रैमासिकी के चार अंक निकाले हैं तो कुछ ख़बर है..किन स्थितियों का सामना करना पड़ता है..मसलन लेखक पत्रिका और सम्पादक को अभूतपूर्व और महान बतादेंगे पर एक प्रति खरीद कर पढने में तकलीफ होती है वो तो फ्री में ही मिलनी चाहिए..अंक ना आए जिसमे उनकी रचना शामिल है तो पचास बार फ़ोन करलेंगे पर अंक ना आने की मजबूरी न समझेंगे ना जान ने की चेष्टा करेंगे.. हंस कथादेश की उपस्थिति आश्चर्यजनक है ही॥अब तो परिकथा भी उन्हें टक्कर देने लगी है चाहे दोमाही है फ़िर भी..खुदा करे ये सिलसिला कायम रहे..
फ़िर साप्ताहिक की बात पर लोटें ...हिन्दीकी साप्ताहिकी चलना दूभर हो गया है क्या ..दिनमान धर्मयुग साप्ताहिक हिंदुस्तान सहारा समय के बाद अब आउट लुक भी...अपनी आँखों के सामने जैसे एक पत्रिका ..आउटलुक यानी समग्र दृष्टिकोण को मरते देख रहा हूँ...
पत्रकारिता के पेशे में हूँ..और जब आउटलुक शुरू हुई थी शायद अक्टूबर २००२ की बात है ..उस वक्त से इंडिया टुडे को खरीद कर नहीं पढा ...छ साल में ये दिन आ गया ..जबकि हिन्दी बुद्धिजीवियों में चर्चा रही है मैगजीन की ..खैर बहुत बार दोहराए जाने वाले बशीर के शेर को फ़िर गायें..कुछ तो मजबूरियाँ रही होंगी..वरना यूँ कोई बेवफा नहीं होता...
एक सवाल ज़रूर जेहन में उठता है कि इंडिया टुडे तकरीबन १०पेजों के साथ क्षेत्रीय संस्करण निकाल पा रहे हैं !!!!
आउटलुक के अवसान की इस पूर्व संध्या पर क्या कहूं ..मन भारी है
दुआ करें कि ऐसा ना हो ..आमीन..आउटलुक फ़िर से साप्ताहिक हो जाए..
Tuesday, August 26, 2008
अब के हम बिछड़े तो....

अहमद फ़राज़ नहीं रहे .....
यकीनन एक बड़ा शायर ..हिन्दुस्तान का या कि पकिस्तान का....नहीं पूरे बर्रे सगीर का ...नहीं ...अदब की दुनिया का एक बड़ा शायर ..लफ्जों से बगावत करता ...
हिन्दुस्तान और पकिस्तान दोनों ही मुल्कों में एक से प्यारे शायर ..वे भारत लगातार आते रहते थे और खास तौर पर बनारस से उनका खासा लगाव था यहां के मुशायरो में वे लगातार हिंदुस्तान और पाकिस्तान की एक जैसी विरासत का हवाला देते थे और एक लंबी मुलाकात में उन्होंने यह भी कहा था कि जिस दिन भारत और पाकिस्तान का संगीत और साहित्य मिल जाएगा उस दिन फौजों की जरूरत नहीं रहेगी। अपनी जिंदगी अपनी शर्तों पर जीने वाले फ़राज़ साब के बारे में दिलचस्प बात यह है कि हिंदुस्तान की फिल्में बहुत पसंद करने के बावजूद कई बार कहने पर भी उन्होंने भारतीय फिल्मों के लिए कोई गीत नहीं लिखा। हालाँकि उनकी कई गजलें फिल्मों में ली गई और खासी मकबूल हुई थी।
बतौर अकीदत कुछ शेर उनके गुनगुना लें ...
अब के हम बिछड़े तो शायद कभी ख़्वाबों में मिले
जैसे तरह सूखे हुए फूल किताबों में मिले
दूंढ उजड़े हु्ए लोगों में वफ़ा के मोती
ये ख़ज़ाने तुझे मुमकिन है ख़राबों में मिलें
तू ख़ुदा है न मेरा इश्क़ फ़रिश्तों जैसा
दोनों इंसाँ हैं तो क्यों इतने हिजाबों में मिलें।
या कि एक दूसरी ग़ज़ल के कुछ शेर --
अब और क्या किसी से मरासिम बढ़ाये हम
यह भी बहुत है तुझको अगर भूल जाएँ हम
सहरा ऐ जिन्दगी में कोई दूसरा न था
सुनते रहे हैं आप ही अपनी सदायें हम
इस जिन्दगी में इतनी फरागत किसे नसीब
इतना न याद था कि तुझे भूल जाएँ हम
तू इतने दिल जुदा तो न थी ऐ शबे फिराक
आ तेरे रास्ते में सितारे लुटाएं हम
वो लोग अब कहाँ हैं जो कल कहते थे फ़राज़
है है खुदा न कर्दा तुझे भी रुलाएं हम
मरासिम- सम्बन्ध ,फरागत-चैन ,दिल जुदा -उदास दिल,शबे फिराक -जुदाई की रात,खुदा न कर्दा -खुदा न करे
Saturday, July 26, 2008
उदय जी को बधाई

आत्मा इतनी थकान के बाद
एक कप चाय मांगती है
पुण्य मांगता है पसीना और आंसू पोंछने के लिए
एक तौलिया
कर्म मांगता है रोटी और कैसी भी सब्जी
ईश्वर कहता है सिरदर्द की गोली ले आना
आधा गिलास पानी के साथ
और तो और
फ़कीर और कोढ़ी तक बंद कर देते हैं
थक कर भीख मांगना
दुआ और मिन्नतों की जगह
उनके गले से निकलती है
उनके ग़रीब फेफड़ों की हवा
चलिए मैं भी पूछता हूं
क्या मांगूं इस ज़माने से मीर
जो देता है भरे पेट को खाना
दौलतमंद को सोना हत्यारे को हथियार
बीमार को बीमारी] कमज़ोर को निर्बलता
अन्यायी को सत्ता
और व्यभिचारी को बिस्तर
पैदा करो सहानुभूति
मैं अब भी हंसता हुआ दिखता हूं
अब भी लिखता हूं कविताएं
(१९९८)
Saturday, July 5, 2008
तेरी खुशबू से सारा शहर रोशन

इतने दिनों बाद फ़िर से मुखातिब हूँ ..इस बीच बड़ी बात ये हुई है कि तीस जून गुज़री ...मेरी जिन्दगी में तीस जून इस बार इस लिहाज से ज़्यादा ख़ास थी कि ख़ुद मैंने ये तय किया कि इस दिन को इतना याद करूं कि भूलने ना पाऊं...तीस जून २००६ से २००८ तक इस दिन के मायने बहुत बदले हैं....ये जाहिर तौर पर निहायत जाती मसला है पर ...
तो इस बार शहर को एक बार फ़िर से देखा महसूस किया... ख़ास जगहों को महसूस किया ..हवाओं की खुशबू को देखने और दृश्यों की सुन्दरता को सूंघने की कोशिश की ,
कई घंटे बिरला मन्दिर के प्रथम मंजिल वाले छोटे से घास के मैदान में तकरीबन दस अलग अलग बिन्दुओं पर अलग अलग एंगल में बैठ कर ना जाने क्या क्या कुछ याद किया॥
डेढ़ घंटा बुक वर्ल्ड के सामने केन्टीन में गुजरा..टिफिन में से खाना खाया ...
राजापार्क की उस ज्यूस शॉप से ज्यूस पीना नहीं भूला ...
वहाँ उस परचून वाले अंकल से बिना ज़रूरत कई चीज़ें उठा लाया...
बुक वर्ल्ड मेंजान बूझकर बिना किताब लिए वक्त गुजारा बिना प्रमोद जी और रजनीश जी बात किए चुपचाप... ख़ुद से लगातार बात करते... चुपचाप...
शहरकी सड़कों पर बिना काम भटका....न्यू गेट से त्रिपोलिया तक चौडा रास्ता पैदल घूमा ...
रात को स्टेच्यु सर्किल बैठा...जैसे आधी रात किसी को सिंधी केम्प छोड़ना है ,उस वक्त तक समय गुजारना है ......फ़िर से टिफिन से खाना खाया वहाँ बैठ कर और फ़िर नेस केफे के स्टॉल से कॉफी पी..हमेशा की तरह अच्छी नहीं लगी..बनावटी मुस्कराहट के साथ पूरी की,जैसे कोई देख रहा हो...फ़िर खिसियानी हँसी चोरी पकडी जाने के बाद और वही स्वर कानों में - 'जब अच्छी नहीं लगती तो क्यों सिर्फ़ कंपनी देने के लिए पीते हो '.....कई देर तक गूंजता रहता है...फ़िर स्टेशन के पास वाले उस ढाबे से बिना ज़रूरत स्टफ्फड आलू की सब्जी खरीद लाया जैसे अभी कहीं यात्रा पर निकल रहा होऊं .......
सोचता हूँ क्या यूँ अपने ब्रेक अप के दिन को याद करना बेमानी और अजीब नहीं है ..है तो है ...
कुछ दोस्त कहते हैं दो साल हो गए पता ही नहीं चला यार ...
मुझे पता है दो साल दो युग से गुजारे हैं....हर दिन एक उम्मीद में ढला है हर सुबह एक आस में जागा हूँ ...
गालिब कभी नहीं भूलते मुझे कहते हुए -
' मुहब्बत में नहीं है फर्क जीने और मरने का
उसी को देखकर जीते हैं जिस काफिर पे दम निकले '
Monday, June 23, 2008
जियो गौरव !!!

गौरव सोलंकी एक युवा कविता का उम्दा नाम है,पर इतनी चौंकाने वाली कविता भी उसने लिख दी होगी ,ये मेरे लिए अचरज की बात है..उस पे बहुत प्यार लाड आया है॥
आप से बाँट रहा हूँ॥
मुलाहिजा फरमाएं और इस बालक को दुआएं और आशीर्वाद दें...
अधूरा नहीं छोड़ा करते पहला चुम्बन
अधूरा नहीं छोड़ा करतेपहला चुम्बन,
जब विद्रोह करती हों,
फड़फड़ाती हों
निर्दोष होठों की बाजुएँ
नहीं बना करते अंग्रेज़,
नहीं कुचला करते उनकी इच्छाएँ
सन सत्तावन के गदर की तरह।
ऊपर पंखा चलता है।
आओ नीचे हम
रजनीगन्धा के फूलों से
छुरियाँ बनाकर
काट डालें अपने चेहरे,
तुम मेरा
मैं तुम्हारा
या तुम मेरा,
मैं अपना!सिपाहियों को मिला है
आदेश भीड़ को घेरने का,
बेचारे सिपाहियों ने चला दी हैं
बेचारी छुट्टी भीड़ पर
बेचारी छोटी छोटी गोलियाँ।
फिर मत कहना
कि अपनी मृत्यु का दिन
मालूम होते हुए भी
मैंने नहीं किया था
तुम्हें सावधान कि
तुम अपना खिलंदड़पना छोड़कर
सोच सको
भावुक होने के विकल्प के बारे में भी।
क्या पता
कि अधूरे छूटे हुए पहले चुम्बन
बन जाते हों आखिरी
इसलिए मन न हो, तो भी
अधूरा नहीं छोड़ा करते
किसी का पहला चुम्बन।
नब्बे साल बाद सच होते हैं
मंगल पाण्डे के शाप।
Saturday, June 21, 2008
अपने शहर की याद में...
मेरा वो स्कूल डी ऐ वी स्कूल ..नंवी से बारहवीं तक के चार साल ऐसा स्कूल जहाँ सिर्फ़ लड़के थे..लड़कियों को निहारने को लंबा जाना पड़ता था ,अपनी उस नयी हीरो रेंजर साईकिल पर लड़कियों के स्कूल के रस्ते से होकर जाना..,,विशेषकर सरकारी गर्ल्स स्कूल की बालिका को देखने के लिए एक नुक्कड़(पूर्व मंत्री मरहूम प्रो.केदार के घर का नुक्कड़ ) पर साईकिल पर सवार सवार लगभग ६० डिग्री झुकाकर पाँव नीचे लगाकर चार बजकर अट्ठावन मिनट का इंतज़ार, मैं ये वक्त इसलिए नहीं भूलता कि ये मेरा पहला ' क्रश ' ,या पहला प्यार (!)था...कि शाम की पारी में उसके स्कूल था और मैं अपनी छुट्टी के बाद एक झलक के लिए उस वक्त का इन्तेज़ार करता था,वक्त भी ऐसा कि घड़ी मिला लें ,हालांकि हुआ कुछ भी नहीं -'जो बात दिल में थी दिल में घुट के रह गयी ,उसने पूछा भी नहीं और मैंने बताया भी '.....झलक तक महदूद रही,हिम्मत ही नहीं पडी
जब हिम्मत हुयी तब तक बहुत कुछ बदल चुका था..और चीज़ें दिल की बजाय दिमाग से तय होना शुरू हो गयीं कम से कम उन मोहतरमा की तरफ़ से..तब करारा थपड नुमा जवाब मिला जो उन्होंने अपनी सहेलियों के सामने दिया- 'इन साहब को मैंने तो कह दिया आप भी कह दें कि ज़रा आईना देख लें...फ़िर क्या था रफी के गाने 'तू जिसे चाहे तेरा प्यार उसी का हक है' को गाते हुए जिन्दगी में आगे बढ़ लिए..ये सोचते हुए कि चलो लेखक को अपनी जिन्दगी में सुनाने को किस्सा तो मिल गया.उसके बाद फ़िर वो मोहतरमा मुझे कई साल बाद सादुलपुर चुरू में सवारी गाडी में यात्रा करते हुए मिली ,जो हिसार से आ रही थी , दो बच्चे ,मध्यमवर्गीय जीवन स्थितियों के बीच पसीने से तरबतर ,एकबारगी उसे पहचाना नहीं फ़िर उसकी उन आँखों ने याद दिला दिया...
हालाँकि उसने मुझे नहीं देखा..अच्छा ही हुआ ..मेरा देखने का भाव अलग था..एक मां को देखा जो अपने बच्चे को पानी पिलाने के लिए ट्रेन से उतरी है जल्दी में कि कही ट्रेन ना चल दे , ये दिलवाले दुल्हनिया ले जायेंगे वाली यूरोपियन ट्रेन नहीं थी ....
मुझे उस पर इस रूप में देखकर पहले से ज़्यादा प्यार आया...
हम आप अपने शहर को यूँ भी याद कर सकते हैं ,
है ना.....
Monday, June 16, 2008
अपने शहर में आए हैं मुसाफिर की तरह
इस बार सिर्फ़ दो दिन के लिए गया आज सुबह लौटा हूँ गालिबन उसी ट्रेवल्स की बस से जिस से १९ जुलाई १९९४ को पहली बार जयपुर आया था ,पर इन १४ सालों में कितना कुछ बदल गया, लोग बदले , सपने बदले, जीने के तौर तरीके बदले॥ और मैं भी बहुत बदल गया नहीं बदली नहीं छूटी तो उस शहर की याद जो शायद अब नोस्टेल्जिया में है और रहेगा, शहर जो अब स्म्रतियों में है , वहाँ वाकई वजूद में नहीं है, जैसे मेरा गाँव और वो तमाम चीज़ें अब उस तरह से नहीं हैं..हालांकि वक्त के साथ चीज़ें बदलती हैं और बदलनी भी चाहिए..ये कहते हैं कुदरत का नियम है ॥ मेरे दादा पंजाब के गाँव पंचकोसी से यहाँ बीकानेर राज में पटवारी होकर आए और यहीं बस गए ..बताते हैं तीन पीढी पहले मेरे पुरखे चुरू के किसी गाँव सोम्सीसर से पंचकोसी गए थे ,ठहराव नहीं है। शायद जिन्दगी रुकने का नाम है भी नहीं ,ये भी संक्रमण का दौर है,मैं फिर नयी ज़मीन की तलाश में हूँ, क्या मिल चुकी है ख़ुद मुझे पता नहीं ,पता है भी तो यकीन नहीं ..
अपने शहर से अपनी आँखों में मां पिता के निरंतर थके से दो चेहरे लाया हूँ ,पंजाबियत की खुशबू वाला शहर है तो गुरदास मान,हरभजन मान के गीतों की एम् पी ३ लाया हूँ ,दोस्त अब वहाँ मिलते नहीं अपनी जिन्दगी में गुम है ,इसलिए उनसे शिकायत भी नहीं ,शिकायत नहीं ये भी शिकायत की वजह हों सकती है ,कि क्यों नहीं है ..ये दर्द का दरिया है..जो अभी बहेगा ॥
गुलाम अली की ग़ज़ल का मत्तला गूंजता रहा -हम तेरे शहर में आए है मुसाफिर की तरह ,पर बदले हुए मिसरे के साथ -
हम अपने शहर में आयें हैं मुसाफिर की तरह....
Tuesday, June 10, 2008
और वो पकडी गई ! ! ! !
चल तो पड़े हो राह को हमवार देखकर !!!Tuesday, June 3, 2008
बाजी इश्क की बाजी है

Friday, May 30, 2008
रेत से उठती आग

राजस्थान बिहार हो गया है ,इसलिए नहीं कि बीमारू राज्यों में और पिछड़ रहा है,राजस्थान यूपी हो गया है इसलिए नहीं कि मायावती अपने हस्तमेघ यज्ञ की तैयारी कर रही हैं ,आरक्षण का सुंदर सपना एक कुरूप संसार का निर्माण कर रहा है ,हम जातीय संघर्ष के कगार पर खड़े हैं ,गुर्जरों को आरक्षण की घोषणा होते ही मीणा युद्ध की दुन्दुभि बजा देंगे ,तीन दिन पहले ठीक ग्यारह बजे जब दफ्तर में अपना काम शुरू कर रहा था एक एसएमएस ने विचलित कर दिया ,एक अज्ञात नंबर से था वसुन्धरा राजे की प्रशंसा करते हुए गुर्जरों के आरक्षण के ख़िलाफ़ और उनके 'देशद्रोहात्मक 'कार्यों की आलोचना करते हुए कहा गया कि दुश्मन का दुश्मन दोस्त..यानी ...इस नासमझी को क्या कहें जब हमें जातियाँ परस्पर दुश्मन नज़र आने लगी हैं॥
आरक्षण से बात शुरू करें जब 1932 में मेकडोनाल्ड अवार्ड जिसे कम्युनल अवार्ड भी कहा गया , के तहत सिख, मुस्लिम और दलित आरक्षण की बात आयी तो गांधी बाबा ने पूना जेल में आमरण अनशन शुरू कर दिया जिसके बाद भीमराव अम्बेडकर और गांधी के बीच पूना समझौता हुआ गांधी बाबा ने कम्युनल अवार्ड से ज़्यादा आरक्षण दलितों को दिया पर मूल भावना ये रही की हमें अंग्रेज क्यों लड़वायें या हम आपस में तय कर लें.यानी सोहार्द कायम रहे ,चाहे इस बात के लिए गांधी बाबा की आलोचना कर लें कि वो जन्म आधारित जाति व्यवस्था के समर्थक है पर जातीय सौहार्द तो उनके दर्शन के मूल में है ही ।
चलिए अब इतिहास से वर्तमान में आ जायें मंडल से जो सकारात्मक मिला जो मिला पर आग लगी सब झुलसे पर राजस्थान कमोबेश अछूता रहा ,अब बात करें जाट आरक्षण आन्दोलन की ,सामाजिक आर्थिक आधार पर जाटों का बहुत बड़ा वर्ग सरकारी मदद का हक़दार था और है ,जिस तरह बाकी जातियों में भी है पर जो मुहिम शुरू हुयी उसके नतीजे जाट आन्दोलन के मुखियाओं विशेषकर माननीय ज्ञानप्रकाश पिलानिया ने भी नहीं सोचे होंगे ,
किस तरह सत्ता को विचलित कर आरक्षण हासिल किया जाए और उसके लिए किसी भी हद तक चले जायें पर इस रास्ते में आपस की लड़ाई को कैसे रोकें..हित तो टकरा रहे हैं यकीनन टकरा रहे हैं ,जाटों की राजपूतों से एक परम्परागत टकराव की स्थिति रही है ,राजपूतों के आरक्षण आन्दोलन के मूल में भी ये बात रही होगी ,ब्राह्मण भी कूद पड़े..पर आरक्षण का लड्डू किस किस को मिले ,एस टी का लड्डू ही फिलहाल झगडे की जड़ है, ओ बी सी के लड्डू के लिए मूल ओ बी सी और जाटों के बीच का द्वंद्व भी याद कर लीजिये।
अब देखिये ना सरकार भी दोराहे पे है या कहे इधर कुआ उधर खाई ,गुर्जरों को दे तो मीणा नाराज़ ,नहीं दे तो गुर्जर नाक में दम किए हुए ही हैं ,इस पहलू को नज़र अंदाज़ कर दें जो मुमकिन नहीं ,तो ज़रा सोचिये राजस्थान का क्या हश्र होना है एक शांत प्रदेश की छवि तो बम धमाकों से क्षत विक्षत हो चुकी है ,और जत्तीय संघर्ष की यूपी बिहार की तथाकथित छवि का संस्करण बनना क्या हमे चुपचाप सहन करना चाहिए,देखना चाहिए,क्या आने वाले समयों में जातीय चेतना और नहीं बढेगी , अल्पसंख्यक जातियों में असुरक्षा का बोध नहीं जागेगा जैसा मुस्लिमों में गाहे -बगाहे सुनने को मिलता है और फ़िर लामबंद होने को 'हमारी जाति खतरे में है' के नारे बुलंद नहीं होंगे..आमीन नहीं कहूंगा ,खुदा ना करें ऐसा हो क्योंकि ये दर्द और आशंका एक राजस्थानी होने के नाते नहीं है क्योंकि हमारे आसपास कितने ही लोग हैं जो राजस्थान के अमन और शान्ति के माहौल के कारन यहाँ खुश हैं चाहे वे मूलत कहीं और से हैं , एक बार यहाँ आए और फ़िर यहीं के होकर रह गए तो फ़िर जन्मना और कर्मणा दोनों रूपों में राजस्थानी लोगों के चिंता करने का समय है,मुझे कुछ बरस पहले का एक कथन याद आ रहा है जो विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के वर्तमान अध्यक्ष सुखदेव थोराट का है ,जब वे इस पद पर नहीं थे , उन्होंने एक लेख में कहा था कि 'भारत में आर्थिक स्तर पर जाति व्यवस्था ख़त्म हो चुकी है और सामाजिक स्तर पर इसका ख़त्म होना लगभग नामुमकिन है'..राजस्थान के हालत भी यही जाहिर करते हैं ना सिर्फ़ कायम है और रहेगी, इसमें बुराई भी नहीं है पर सवाल तो आपसी सौहार्द का है, क्या उसे हम बचाए रख पाएंगे!.
Wednesday, May 28, 2008
माजरत के साथ

Saturday, May 17, 2008
तसलीमा नसरीन की एक कविता

Who cares if I am sitting here alone
No one and I don't give a damn
Because I am what I am
I am alone,I am no one
Just an eccentric minority
by himself on a bench
Doing nothing with
everything on my mind
And still the world around
me continues to go by
While I linger in this meditation
Feeling as though I would
lose my mind at any moment
Only my solitude is here by my side
Only my solitude is helping me to cope with myself.
Wednesday, May 14, 2008
जीओ जयपुर हजारों साल

ग़ालिब का एक मिसरा है - न होता मैं तो क्या होता
सोचा तो ये था कि चेन्नई के यात्रा संस्मरणनुमा भडास प्रकरण को पूरा करूंगा पर अपने शहर को यूं आतंकवाद के जद में घिरा पाकर स्तब्ध हूँ ,कल शाम से अनबोला सा हूँ ,मेरा शहर भी अब मुम्बई की तरह हादसों का शहर हों गया और ये कहते कोई गर्वानुभुति नही हों रही है। डेढ़ दशक से जिस शहर की आबो हवा में साँस ले रहा हूँ ,जो साँस की तरह है ,लाख बुराई कर लूँ,इसके बिना जीने की कल्पना नहीं कर पाता...उस शहर की शान्ति और खुशहाली को नज़र लग गयी ,अगर शहर के लोग माफ़ करें तो कहूंगा ख़ुद हमारी ही नज़र तो कहीं नहीं लग गई -राजस्थानी में कहावत है- 'सराही खिचडी दांत लागे ',या 'सरायो टाबर बिगड़ ज्यावे' इस दर्दनाक शर्मनाक हादसे ने जहाँ सरकार की नाकाबलियत को जाहिर किया वहीं शहर की एकता जिन्दादिली और मानवीयता से भी हमारा परिचय करवाया है ...
कल शाम ऑफिस में था राजस्थान पत्रिका के कार्टूनिस्ट अभिषेक भइया से लगभग उसी वक्त जब ये धमाके हो रहे थे फ़ोन पर बतिया रहा था तो वो मेरे ब्लॉग की पिछली पोस्ट में जयपुर के मौसम को प्यारा बताने पर असहमति जताते हुए कह रहे थे ' जयपुर में मौसम को छोड़कर सब अच्छा है,प्यारा है ',...वाकई ,पर अब एक दाग लग गया है इस चाँद में ...
अपने तकरीबन डेढ़ दशक के जयपुर प्रवास में कभी अपनी माँ को सिर्फ़ यह और इस तरह कहने के लिए फ़ोन नहीं किया कि 'मैं ठीक हूँ, कोई चिंता ना करें ' ...शुक्र है यहाँ से ५०० किलोमीटर दूर बैठी मेरी माँ ने तब तक (तकरीबन ८ बजे )टीवी नहीं ऑन किया था.. और पापा इवनिंग वॉक पर गए हुए थे ... वरना वो टीवी के सामने ही होते और...!!!
कव्वाल दोस्त फरीद साबरी आज कह रहे थे 'दुष्यंत भाई इस शहर को अमन पसंद ,शांत मानते रहे है,मुम्बई ना बसकर यहाँ रहकर कम कमाया, पर सुकून से रहे ...पर ये क्या हो गया ऐसे हादसे का तो कभी ख्याल ही नहीं आया...अल्लाह सबको सलामत रखे ',उन्होंने एक शेर सुनाया -'घर से निकलो नाम पता जेब में रखकर ,हादसे चेहरे की पहचान मिटा देते हैं...'
एक बात और बांटना चाहता हूँ कि मुझे अपने होने की खुशी का एहसास या कहूं दुनिया में थोडा बहुत ज़रूरी होने का एहसास भी इस दिन हुआ ,ये काला दिन मेरे लिए सुबह से ख़ास था,अपने जन्म दिन के दिन अपने शहर को इस तरह के हादसे में घिरा हुआ देखना किस तरह की फीलिंग दे सकता है, कल्पना करें..ख़ुद को कोसा भी..पर सुबह से शाम साढ़े सात बजे तक जितने लोगों ने याद नहीं किया , उसके बाद याद करने वालों की तादाद कहीं ज़्यादा थी ,इतने कम तकरीबन दो घंटे के अंतराल में इतने फ़ोन मुझे अब तक की इकतीस साल की जिन्दगी में कभी नहीं आए ..सब कुशल क्षेम पूछने के लिए ..कोई सेलिब्रिटी नही बना पर जो फीलिंग हुई उसे क्या नाम दूँ..भारत के हर कोने से कालीकट से जम्मू ,शिलोंग ,महाराष्ट्र ,गुजरात ,कोलकाता, हैदराबाद ,बेंगलोर ,दिल्ली,गोहाटी ,अम्बाला ,ग्वालियर, यहाँ तक कि निर्मम मानी जाने वाली फ़िल्म इंडस्ट्री के मित्रों ने भी कुशलता की जानकारी ली, कोपेनहेगन ,लंदन,कुवैत, केलिफोर्निया, मेसाचुसेट्स , टोरंटो ,दुबई तक से फ़ोन आए तो इस स्नेह और मुहब्बत से मेरी हालत क्या हो गयी कैसे बयान करूं ,मैं झुक गया ...पर कुछ दोस्तों और मेरी उम्मीद के मुताबिक एक फोन नहीं आया ...मुक्कमल जहाँ नहीं मिलता ..छोडिये ना ...'उसकी दुआएं हमेशा साथ चलती हैं,मैं तन्हाई में भी तनहा नहीं होता..'
Monday, May 12, 2008
चेन्नई मेरी चेन्नई -2
तो माजरत के साथ फ़िर हाजिर हूँ,सेंतोमे की जगह मेरा सेंट थॉमस चर्च पहुँचना ही अव्वल तो मेरे बेवकूफ बनने की दास्तान है पर मेरा वहाँ पहुचना दिलचस्प इस मायने में है कि एक हादसा पेश आया , चलिए सिलसिलेवार सुनाता हूँ
इग्मोर से लोकल ट्रेन पकड़ने को सेंट थॉमस पहुचाने के लिए सबसे बेहतर बताया गया, चेटपेट से ऑटो लिया यहाँ पहला हादिसा पेश आया ऑटो वाले भाई को अंगरेजी नहीं आती थी और मुझे तमिल का एक अक्षर ..महान भारत की महान विविधता ...गुलज़ार की 'खामोशी' से संजय लीला भंसाली की 'ब्लेक' तक की सारी फिल्मों के अपने ज्ञान और अनुभव का इस्तेमाल करते हुए किसी तरह मैं उसे इग्मोर चलने को तैयार कर पाया,हालांकि अभी भी मुझे ख़ुद पे या उस पे विश्वास नहीं था कि मैंने उसे ठीक से समझा दिया याकि उसे ठीक से समझ में आगया ,और वो मुझे वहाँ पहुंचा देगा जहाँ मुझे जाना है...इग्मोरे पहुच कर जान में जान आयी और उसे तीस रुपये देकर मैं स्टेशन में दाखिल हुआ ,पता चला सेंट थॉमस जाने के लिए गिनडी तक ट्रेन है , ५ रुपये का टिकट लिया और सवार हो गया ,दिल्ली की मेट्रो और मुम्बई की लोकल से अलग ,बिल्कुल अलग सा माहौल ...चौथा या पांचवां स्टेशन गिनडी आया ,थोड़ी धक्का मुक्की हुयी ...भीड़ में पसीने की बदबू थी और उसका विशेष दक्षिण भारतीय फ्लेवर ...जिसकी कतई आदत नहीं थी ॥उस से बचकर निकालना एक यातना से निकलने जैसे ही था...उतरा ,चार कदम चला था कि भारतीय रेल के अधिकारिओं ने एक बिना टिकट यात्री तो धर दबोचा ,वो उत्तर भारतीय लग रहा था ॥और वो मैं था ...टिकट प्लीज़ ,सुनते ही पूरी सभ्यता से रुका और अपनी पॉकेट में हाथ डाला देखता हूँ टिकट नहीं है ,वो महोदय बोले ज़रा आराम से कर लें ॥मैंने तुरत फुरत सारी पॉकेट चेक कर डाली , मैंने उसे कहा सर मैंने टिकट ली थी पर मुझे नहीं पता वो कहाँ चली गयी ...उसने कहा आपके पास टिकट होनी चाहिए और नहीं है .. मैंने अति विनम्रता से कहा-'ठीक है टिकट तो नहीं है आप चार्ज कर सकते हैं 'मुझे विनम्रता में भलाई नज़र आयी ...उस व्यक्ति ने कहा अन्दर आ जाईये और ट्रेक के साथ के हाल नुमा कमरे की और इशारा किया.. अन्दर बैठे व्यक्ति ने रसीद बनानी शुरू की तो वह व्यक्ति जो मुझे अन्दर लाया था ने फ़िर मुझे मौका दिया कि मैं इत्मीनान से चेक कर लूँ ... मैंने चेक मेरी किसी पॉकेट में टिकट नहीं थी और अपने वोलेट को भी मैं बहुत तसल्ले से देख चुका था...मैंने सब निकाल एक टेबल नुमा जगह पर रख दिया मेरी हालत देखने लायक थी ऑफिसर ने कहा -लाईये २५६ रुपये ,मैंने लगभग अनसुना किया और कहा- एक मिनट और उस कमरे से बाहर निकला, पहला व्यक्ति मेरे साथ इस तरह चल रहा था जैसे मैं कोई जघन्य अपराधी हूँ ..मैंने देखा टिकट नीचे पडा था ..मुझे चैन आया..उस व्यक्ति ने कहा आप सौभाग्यशाली हैं...अन्दर व्यक्ति ने पूछा आप कहाँ से आए हैं मैंने कहा -इग्मोर॥उसने अगला सवाल दागा ताकि कन्फर्मं कर पाये कि वो मेरी ही टिकट है, मैंने कहा -पाँच रुपये का है ', टिकट दरअसल टिकट दिखाने की हडबडी में मेरी जींस की पिछली पॉकेट से वोलेट निकालते हुए नीचे गिर गया था ,जो वोलेट से चिपक गया था , जवाब आया-'आप जा सकते हैं ',और मुझे छोड़ दिया गया..ऐसे हादसे की कभी कल्पना नहीं की थी ,पर बाद में याद करके बड़ा मज़ा आया
आज इतना ही ....
Saturday, May 10, 2008
चेन्नई मेरी चेन्नई
थार से समंदर तक .....माफी चाहता हूँ कि बहुत दिन बाद लिख पा रहा हूँ इस बहाने पहली बार सही रूप में अंदाजा हुआ कि मेरे इस भडास निकालने के ज़रिये को कितने लोग स्नेह भाव से पढ़ते हैं ,उन तमाम मित्रों ने फोन करके कहा कि यार बहुत दिन होगये गोली दिए हुए अब तो लिख दो कि क्या गुल खिलाये चेन्नई में ,ये किस जिज्ञासा के कारण था ये वो जानें पर जिन्होंने कभी मेरा ब्लॉग देखा भी होगा ये एहसास मुझे नहीं था ,खैर हाजिर हूँ ,चेन्नई से लौटने के दो हफ्ते बाद चेन्नई की यादों में फ़िर एक बार॥
चेन्नई यानी- साई ,मित्रा ,कविता,हेमा,सपना, हरिक्रिशन, श्रीलेखा,किट,पद्माजी ,वेंकटेश ,लैण्ड मार्क और हिगिन बोथम वाली बुक शौप्स और मरीना बीच ...कितना कुछ तैर रहा है आँखों के आगे ...चेन्नई यूं दूसरी बार गया था साल भर पहले इसी तरह के प्रोग्राम में गया था ,वो यादें थी ही ,इस बार जाते हुए दिल्ली से किसी शायर के लफ्जों में कहूं तो 'मेरे महबूब की दिल्ली ' से तमिलनाडु एक्सप्रेस के थर्ड ऐ सी में जाने का ख्याल भी यूं ही आ गया चलो लालू की सेवाओं का जायजा ले लिया जाए ,
१४ की शाम को ट्रेन थी ,जे एन यू में सुधीर से मिलने की इच्छा बहुत दिनों से थी तो सोचा चलो कुछ पहले चल के उस माहौल में जी लूँ जो मेरा अधूरा ख्वाब है ॥सुधीर से मिलने में हमेशा ये छदम इच्छा रहती ही हैं ॥और इसे वो भी जानता है कि जे एन यू उसके 'दुष्यंत भैया' की कमजोरी है ॥खैर चेन्नई के इस सफर में २८ घंटे की यात्रा में में उतार से दक्षिण पूरा हिन्दुस्तान देखना बहुत रोमांचक रहा ,एक दशक इतिहास पढने आधे दशक तक पढ़ने के दौरान जिस भारतीय विविधता का किताबी ज्ञान लिया उसे महसूस किया ये पिछली बार महसूस नही हुया क्योंकि वो गो एयर की एक दुखद विमान यात्रा थी जिसमे दिल्ली एयर पोर्ट से रात ९ बजे उड़कर साडे ग्यारह बजे चेन्नई पहंचाने वाले विमान ने अल सुबह तीन बजे उड़कर पाच बजे चेन्नई की धरती पर उतारा था ,पूरी रात कैसे बीती होगी कल्पना कर सकते हैं ..इस बार शायद एक वजह तो यही थी कि सस्ती विमान यात्रा से ट्रेन अच्छी
खैर ,वास्तविक भारत दर्शन का लुत्फ़ तो आप यकीनन रेल की यात्रा में ही उठा सकते हैं
...चेन्नई के रास्ते में बाला पंडीयान से मुलाक़ात भी दिलचस्प रही ,इन महोदय से प्रभावित हुए बिना नहीं रह सका, वे एक एनजीओ से जुड़े हुए हैं जो किशोरों और युवकों को जीवन मूल्यों के प्रति सजग और सक्रिय करने में लगा हुआ है और देश भर में उसके चेप्टर है यहाँ तक कि जयपुर में भी,बाला से पूछा जयपुर में कब से काम कर रहा है डेढ़ दशक के प्रवास में आज तक सुना नहीं ,, उनसे बतियाते और रविंदर कालिया की किताब ग़ालिब छूटी शराब तथा दर्जन भर हिन्दी अंग्रेजी की मेग्जीनों के साथ सफर गुजारा ,इस्मत चुग़ताई का नोवल 'जिद्दी 'अनपढा ही वापिस आ गया, हाँ जग सुरैया की 'कलकता ऐ सिटी रिमेम्बर्ड ' ज़रूर आधी पढ़ पाया चेन्नई को वर्क-शॉप के अलावा सुबह शाम ही देख सकता था ,
१५ की शाम पहुचा १६ को पूरे दिन फुरसत थी १७ से वर्क-शॉप थी लिहाजा एक लेखक होने का वहम पालने वाला व्यक्ति शहर को एक्सप्लोर करने निकल पडा, भरी गरमी में, अपने शहर गंगानगर की गरमी को याद दिलाने वाली गर्मी ...अपनी साथी मित्रा के शब्दों में 'बर्निंग होट',जहाँ ठहराया गया वहाँ एसी कमरा देने की व्यवस्था अज्ञात कारणों से हमारे लिए नहीं थी..यूं मेरा घर भी ए सी नहीं है पर जयपुर में ज़रूरत भी महसूस नहीं हुई ..वाह मेरे प्यारे जयपुर ..जहाँ का मौसम हमेशा प्यारा होता है ,इस बार तो यहाँ भी गरमी भयानक है ....सेंतोमे चर्च और मरीना बीच देखने का मन बनाया सेंतोमे का इम्प्रेशन ये था कि जीसस का एक शिष्य यहाँ आया ,इम्प्रेशन इसलिए कि सेंतोमे की जगह माउन्ट पर सेंट थॉमस चर्च पहुँच गया वहाँ पहुँचने का किस्सा भी खासा दिलचस्प है आप भी खिलखिलायेंगे , खिलखिलायें ना भी तो मुस्कुराए बिनातो हरगिज नहीं रहेंगे ..उसकी बात कल करूंगा..
Saturday, May 3, 2008
मरीना बीच पर कुछ पल
Thursday, January 31, 2008
Wednesday, January 30, 2008
Thursday, January 10, 2008
मेरे साहिर से कहो

अब मुझे आज़ाद करे
तसलीमा ,बेनजीर और अब किरण बेदी ....भारतीय उपमहाद्वीप की सांस्कृतिक एकता को इस मायने में सलाम करने को जी चाहता है कि सियासी सरहदों के बावजूद यहाँ तस्लीमाओं, बेनजीरों,किरण बेदियों, आंग सान सू कियों ,मेघा पाटकरों के साथ एक सा सुलूक होता है !क्या अद्भुत समानता है !क्या बुनियादी लोकतंत्र है !क्या मजाल कि रत्ती भर भी इधर का उधर हों जाये ?मुझे कात्यायनी की कविता याद आती है -
"जब भी नज़र डालती हूँ /इस अँधेरे विस्तार पर कौंधती है अनगिन रोशनियाँ /फैलती हुई/चमकदार धब्बों मी बदलती हुई /अनगिनत मानावाकृतियाँ दीखती हैं क्षितिज पर /सुनाई पड़ती हैं /बस आवाजें ही आवाजें ॥"
कोलाहल के बीच गूंजते सन्नाटे की धुन जिन कानों तक पहुचती हैं ,वी भी आखिरकार बहरे से क्यों हों जाते हैं ,येही सवाल यहाँ खडा होता है बरगद की तरह .सवाल और भी खडे होते हैं जो जवाब मांगते हैं -क्यों अरूसा आलम को सरहद पार के किसी विपरीत लिंगी विधर्मी से दोस्ती का हक नही हैं ?क्यों जगजाहिर काबिल महिला पुलिस अफसर को मातहत और अपेक्षाकृत रूप से कमज़ोर अफसर के सामने बौना कर दिया जाता है?क्यों मीडिया वालों और आम आदमी को जान और अस्मिता बचने को दर दर भटकती तसलीमा के चेहरे का विषाद नजाए नहीं आता ?क्यों ये पढा और छपा जाना ज़रूरी है कि उसने जयपुर मी अपने पुरुष मित्र के साथ एक ही कमरे में रात गुजारी ?ये सारे सवाल हमें खुद से पूछने चाहिऐ , इतना ही नही लगे हाथ यह सवाल भी हमें अपने आप से पूछना लाजमी है सरपंच पति आज भी सरपंच से ज़्यादा ताक़तवर क्यों है?क्यों हमारे बहुत से घरों में आज भी मताव्पूर्ण मसलों पर औरतों की राय को 'औरत की राय 'कह्का खारिज कर दिया जाता है?क्यों किसी भी प्रभावी ,मताव्पूर्ण या लोकप्रिय महिला का कद चुपके से आँख दबाकर आखिरी हथियार के रूप में उसके चरित्र पर सवालिया निशान लगाकर बौना कर देने का 'मर्दाना 'काम अक्सर अंजाम दिया जाता है ?
बड़ी मासूम से विडम्बना ये है जनाब कि इन सवालों के वजहात से भी हम अच्छे से वाकिफ हैं और कमाल ये भी है कि इन सवालों के जवाब इन सवालों में ही छुपे हैं.ये जानते हुए कि मुठ्ठी भर लोग अक्सर खुद से पूछते हैं, ये सवालों की सौगात आप सब जवाबों के जानकारों के नाम परवीन शाकिर के शब्दों के साथ -
"उसकी मुठ्ठी में बहुत रोज़ रहा मेरा वजूद,
मेरे साहिर से कहो अब मुझे आज़ाद करे ."
Friday, December 21, 2007
आलोक श्रीवास्तव

सच्चा शायर
कुछ समय पहले आलोक श्रीवास्तव नाम के ग़ज़लकार से रूबरू कराया था. याद करें- बाबूजी ग़ज़ल के हवाले से बचपन पर बात हुई थी. आज आलोक श्रीवास्तव और उनके पहले, ग़ज़ल संग्रह 'आमीन' की बात करूंगा. आलोक जितने प्यारे और सच्चे शायर हैं उतने ही प्यारे इंसान भी हैं. सच कहूं तो उनसे मिलने के बाद मेरे लिए यह तय कर पाना मुश्किल हो गया कि आलोक शायर ज़्यादा अच्छे हैं या इंसान. बहरहाल मैं इस जद्दोजहद से खुद को आजाद करता हूँ. क्योंकि 'आमीन' मंज़रे-आम पर है जिसमें सिमटा कलाम आलोक की उम्र से आगे की बात करता है.
अपनी उम्र के दूसरे ग़ज़लकारों में सर्वाधिक लोकप्रिय इस शायर की रचनाएं साहित्य की प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में अर्से से शाया हो रही हैं. यहां, मुलाहिजा फरमाएं आलोक की सबसे ज़्यादा पढ़ी और गुनगुनाई जाने वाली अम्मा ग़ज़ल के चंद शेर-
चिंतन, दर्शन, जीवन, सर्जन, रूह, नज़र, पर छाई अम्मा,
बाबूजी गुज़रे, आपस में सब चीज़ें तक़्सीम हुई, तब
घर में झीने रिश्ते मैंने लाखों बार उधड़ते देखे,
आलोक नज्में, गीत और दोहे भी इतनी ही महारत से कहते हैं, मुझे हैरानी यह होती है कि आलोक कितनी ख़ूबसूरती और सादगी से ज़िंदगी का फ़लसफ़ा बयां करते हैं. वो रिश्तों को केज़ुअली नहीं लेते बल्कि उसके हर पहलू को ताक़त बनाते हैं जिससे ज़िंदगी रोशन होती नज़र आती है, बजाहिर आलोक उम्मीद के शायर हैं, उनके क़लम में ज़िंदगी की धड़कन है और वो भी सौ फ़ीसदी पोज़िटिव-
मैं ये बर्फ़ का घर पिघलने न दूंगा,
अगर आप हिंदुस्तान के नौजवान लहजे की अच्छी शायरी पढ़ने का शौक़ रखते हैं तो आमीन ज़रूर पढ़ें. शायरी नहीं पढ़ते तब तो आमीन और भी पढ़ें, मेरा दावा है कि आप शायरी को अपनी ज़िंदगी में शामिल किये बिना नहीं रह पाएंगे, 'आमीन' नाम की यह ख़ूबसूरत किताब राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित हुई है, और पुस्तक पर कमलेश्वर और गुलज़ार की भूमिका इस बात का सबूत हैं कि आपने जो किताब उठाई है, वो एक अच्छे और सच्चे नौजवान शायर का दीवान है.
Friday, December 7, 2007
मैंने तसलीमा को देखा है- तीन

मैंने उनसे पूछा कि अगर तसलीमा से कहा जाये तो वह अपने जीवन का पुनर्लेखन कैसे करना चाहेंगी? तो उनका जवाब था कि बस मैंने जिया,समस्याएं झेलीं,मुझे अच्छे बुरे अनुभव हुए ,दोस्त मिले,फतवे मिले ,धमकियां मिलीं, .लिखने के कारण मुझसे कुछ लोग प्यार करते हैं तो कुछ नफ़रत भी करते हैं। जो मैंने अपने जीवन में किया मुझे उसका कोई अफ़सोस नहीं है .मैं महिला अधिकारों के लिए लिख रही थी ,लड़ रही थी,उसी वक्त मेरी माँ पीड़ित रही,मैं उनके दर्द को नहीं समझ पाई,उनकी देखभाल नही कर पाई,अगर री राईट कर पाती तो उनकी मदद करती,उनका ज्यादा सम्मान करती ।इस वक्त वो लगभग रूआसी हों गयी थीं,उन्होने पानी पीया ।
भाई दिनेश ने पूछा लज्जा से आज तक तसलीमा में क्या बदलाव आये? उनका जवाब ये था कि मैं बहुत परिपक्व हुयी हूँ ,शुरू से हीई कट्टरपन के खिलाफ थी, अब ये सोचती हूँ कि ये सब अब भी क्यों है,ये क्यों बढ़ रहा है?अब समस्याओं को ज्यादा गहराई से देख रही हूँ.अब गुस्सा नहीं आता, शांत हूँ,पहले चिल्लाती थी .अब मेरे लेखन में ज्यादा गहराई आयी है।
अब दिनेश भाई फॉर्म में आ गए थे ,शुरू में थोडा हिचकिचा रहे थे ,अगला सवाल भी उन्होने ही दागा -लेखन के अलावा क्या करती हैं? बोलीं -पढ़ती हूँ ,पेंटिंग्स बनाती हूँ ,दोस्तों से चैट करती हूँ,घूमती हूँ,लेखन एक मात्र काम नही है मेरा ।
दिनेश जी अगला सवाल उनके पसंदीदा लेखकों को लेकर था, जिसके जवाब में उनका कहना था कि बंगाली में शोमती चटोपाध्याय और कुछ युवा लेखक भी ,जबकि गोर्की ,लियो तोल्स्तोय ,ग्राहम ग्रीन और कुछ भारतीय लेखक।
अब तस्लीमाजी से हमने पूछा कि आप कैसी दुनिया का सपना देखती हैं? वो जैसे शून्यमें झाँकने लगीं ,फिर बोलीं-ऐसी सुन्दर दुनिया जहाँ महिलाएं अत्याचार और उत्पीडन से मुक्त हों,समाज धर्मनिरपेक्ष हों,सब में मानवता और प्रेम हों,सबको बिना लिंगभेद समान रुप से आगे बढ़ने के अवसर मिले.हर लेखक की अपनी दुनिया होती है,एक वो जिसमे वो जीता है,दूसरी वो जिसका वो सपना देखता है, ये मेरी वो दुनिया है जिसका सपना देखती हूँ। फ़िर उनकी पिछली और आगामी किताबों के बारे में उनसे बातें हुईं ,तकरीबन घंटा भर का साथ न भूलने लायक।
आज वो जिस पीडा में हैं , वो साथ ज्यादा याद आ रहा है ,मेरे मित्रों को ये तकलीफ है कि उन्होने किताब से वो हिस्सा हटाने की घोषणा की ,उनके मन में तसलीमा जी के प्रति सम्मान मे कमी आ गयी है, जबकि मुझे ख़ुद पे शर्म आयी कि मैं उस व्यवस्था का हिस्सा हूँ जिसने तसलीमा जी को विवश किया इस के लिए ,खैर अपना अपना नजरिया है.
Tuesday, December 4, 2007
एक अर्ज़
एक फिल्म पर कुछ विचार

खैर, इस के बावजूद फ़िल्म ठीक-ठाक है और कुर्दियों वाला हिस्सा सचमुच अच्छा बन पड़ा है। उसमें से दो बातें न भूलने लायक है। मुख्य चरित्र का बूढ़ा पिता एक जगह कहता है कि रसूल ने कहा था कि मुझमें कोई इच्छा नहीं। उन्होने कहा कि ज़िन्दगी कुछ नहीं एक खाली घर है जिसके दो दरवाज़े हैं; आप एक से भीतर आते हैं और दूसरे से निकल जाते हैं।
फिर एक दूसरी जगह वही बूढ़ा एक लघु कथा बताता है कि दो लोग लड़ रहे थे। किसी ने पूछा कि खुदा किस की तरफ़ है? जवाब मिला कि खुदा हमेशा जीतने वाले के साथ होता है। जो जीतेगा, खुदा उसी की तरफ़ है।
Wednesday, November 28, 2007
मैंने तसलीमा को देखा है -दो

Saturday, November 24, 2007
मैंने तसलीमा को देखा है-एक

कोई साल भर गुजरा होगा इसी शहर में वो आयी थीं , प्रभा दीदी यानी प्रभा खेतान के बेटे संदीप भूतोरिया उन्हें लाये थे , किसी शिक्षा से जुडे कार्यक्रम की लौन्चिंग पर ,प्रभा दीदी से बात हुई , संदीप जी का मोबाइल नंबर लिया और अपनी प्रिय लेखिका से मिलने के सपने बुन ने लगा था ,पत्रिका की वर्षा जी ने मोका दिया कि उनके लिए तसलीमा साक्षात्कार कर लूं ,ह्रदय से आभारी हूँ उनका ,खैर राजपूताना शेरेटन की लोबी में उनसे मिला , बेहद सौम्य ,मृदु भाषी ,चेहरे पे बंगाली तेज प्रबुद्ध्ता ,शायद पर्पल कलर की साडी में थीं वो , उनकी वो भंगिमा आज भी स्मरति पर अंकित है ,एक बारगी विश्वास नही हुआ मैं तसलीमा नसरीन के साथ हूँ , उन्होने जैसे ही हाथ आगे बढाया ,उस हाथ की छुअन ने विश्वास करने का आधार दिया मुझे , उनसे हुयी मुलाक़ात कल आपसे शेयर करूंगा
Friday, November 9, 2007
कुछ दिल से
अपने होंसलों और क्षमताओं से बढ़कर सपने भी गुनाह नहीं होते क्या ?
सपनों के इस ब्लैक होल में मुमकिन है कितना कुछ
समा जाये -सुख,चैन, नींद,रिश्ते ..... और भी बहुत कुछ ,
जब हम वक्त के साथ बीते गुजरे पर तन्हाई में नज़र सानी करते हैं तो
हाथों से फिसलती रेत दिखती है ,जो आँखों के कोरों को चुपचाप भिगो जाती है
फिर हम चुपके से अपने आँखों को इसे सुखाते हैं जैसे कोई देख भी ले तो लगे
जैसे आंख मेकुछ में कुछ गिर गया था जिसे निकाल रहे हैं
दरअसल ये करते हुए हम खुद को धोखा दे रहे होते हैं.
Tuesday, November 6, 2007
एक ताज़ा पढी किताब पर कुछ नोट्स

द्वारा सोफोक्लीज़
अनुवाद रणवीर सिंह
पंचशील प्रकाशन, जयपुर,
अस्सी रुपये,
पृ 52, 2007
जिस सूचना क्रांति या कहें सूचना विस्फोट के युग में हम जी रहे हैं वहाँ थियेटर की भूमिका बहस का मुद्दा हो सकती है पर जब तक जीवनधारा प्रवाहित है, कलाओं की अहमियत में इजाफा ही होना है और थियेटर भीकतई इसका अपवाद नहीं है। रंगकर्मी जेड़ी अश्वथामा के शब्द याद आतें हैं जब वो कहते हैं कि ''थियेटर सिनेमा और टीवी से अलग विधा है। आज जब हम टीवी और सिनेमा के युग में जी रहे हैं तो थियेटर की भूमिका और जरूरत टीवी और सिनेमा से अनेक समानताओं के बावजूद एक अलग और महत्वपूर्ण स्तर पर कायम है।'' यूनान को दुनिया में थियेटर के जनक देशों में एक माना जाता है और सोफोक्लीज (496-406 ईपू) ग्रीक थियेटर का दूसरा महान नाटककार था, उसके सौ नाटकों में से संप्र
