
स्लमडॉग मिलिनेयर और ऑस्कर पर अमिताभ बच्चन तक की राय इस तरह बदली कि दुनिया उगते सूरज को सलाम करती है। मैं न तो डॉग शब्द की मीमांसा करने जा रहा हूँ ना भारत की छवि पर कोई स्यापा कर रहा हूँ कि भारत की बुराई से ही पुरस्कार मिलते हैं॥चाहे साहित्य हो या सिनेमा .पहली बात तो यह कि क्या कहानी,उसका लेखक और परिवेश,अभिनेता,गीत संगीत और तकनीकी स्तर पर ढेर सारे लोगों के जुड़ जाने के बाद भी सिर्फ इस आधार पर इसे भारतीय फिल्म होने से खारिज कर देना ठीक है कि इसके निर्माता निर्देशक भारतीय नहीं हैं.देखिये , बेशक साहित्य और सिनेमा जिन्दगी से बनते हैं और जिन्दगी इनसे मुतासिर होती है पर यकीनन धागे सी दूरी है इनकी जिन्दगी से...दोनों बिम्ब के माध्यम हैं सौ फीसदी सच दिखाना न साहित्य का काम है न सिनेमा का ...जैसे अतीत का सच इतिहास की विषय वास्तु है न कि ऐतिहासिक फिक्शन की ...एक बार हम मान लें स्लम डॉग में अतिरेक में भारत की बुराई को दिखाकर महान बनने की चेष्टा की गयी है तो कहूंगा कि जौहरों, चोपडाओं बडजात्यों के बौलीवुड में जो कुछ दिखाया जाता है क्या वो सच होता है पंजाब से बचपन से जुडाव रहा है ... वहाँ की नदियों का पानी पीकर और उससे सींचे खेतों का अन्न खाकर बड़ा हुआ हूँ . लोकप्रिय सिनेमा का पंजाब मुझे कहीं भी असली पंजाब नहीं लगता ..गुलज़ारनुमा कोशिश अपवाद स्वरुप ही होती हैं और जो दिखता है उसे मैं पंजाब में ढूंढता रहता हूँ . एक दिन मित्र फिल्मकार दीपक महान कह रहे थे कि भला हो भारतीय दम्पतियों की सूझबूझ का वरना कश्मीर में बर्फ पर नाचते गाते जोडों को देखकर फिर वास्तविक जिन्दगी में न पाकर तलाक़ देते देर न लगे कि मेरी पत्नी या पति वैसा नहीं लग रहा है ये है हमारा सिनेमा ,मेरा निवेदन ये है कि साहित्य और सिनेमा में जिन्दगी को यथारूप में न तो तलाश करना चाहिए न ये मुमकिन है . कहना चाहिए कि लोकप्रिय सिनेमा और डॉक्यूमेंट्री के बीच में यथार्थ के करीब का है सार्थक या समांतर सिनेमा..हाँ कभी भी इस हाशिये की सिनेमाई दुनिया का कोई उत्पाद भी लोकप्रिय हो जाता है या कभी इसका उलटा भी ..वो विरले हैं जो लोकप्रिय सिनेमा या साहित्य रचते हुए सार्थक बना जाएँ जिन्दगी के कड़वे सच से रूबरू करवादें
हाल में आई देव डी मुझे ब्रिलिएंट फिल्म लगी अनेक लोगों को फिल्म की भाषा को लेकर आपत्ति थी ..वो अपनी जगह गलत नहीं है पर जिस युवा वर्ग की वो फिल्म है ये उनकी भाषा है उनका जीवन है उनके समय का जीवन है , उन इत्रों से कहूंगा यकीन न आये तो २० से पचीस की उम्र के अपने भाई बहनों भतीजों के एसएमएस, ई मेल, चेट की भाषा एक दिन चोरी से पढने का नैतिक अपराध कर लें और ये भी कि जो कहे वो करें और जो करें वो ही जाहिर करें ये साहस भी उस पीढी में मिलेगा..हम भारतीय प्रतिकार की बजाय कड़वा घूँट पीने को महान मानते हैं ..बुरे के खिलाफ बोलने की बजाय चुप रहना...ये लगभग वैसे ही है जैसे सडांध मारते रिश्तों को जीना जीते रहना और मरने की हद तक जीनाखैर सिनेमा और साहित्य के वो बिम्ब जो यकीनन जिन्दगी से उठते हैं फिल्मकार या साहित्यकार की आंख ही जिन्हें देखती है और हम वाह कह उठते हैं इसकी वजह शायद ये होती है कि हम उसे उस तरह से नहीं देख पाते हैं...जैसे रवीन्द्रनाथ ठाकुर के पात्र मैं हर बंगाली में ढूंढता हूँ पर निराश होता हूँ वो अच्छे प्यार होते होते हैं हो सकते हैं पर रबीन्द्रनाथ के पात्रों से नहीं लगते...दोष न रबीन्द्रनाथ का है न इन बंगाली मित्रों का .फर्क माध्यम का है और उसके क्राफ्ट का है और गरज ये कि हम सिनेमा और साहित्य को और कलाओं के लिए ये मान लें कि यकीनन ये जिन्दगी से है पर जिन्दगी की छायाप्रति न है और न ही हम में से कोई चाहेगा कि ये हो जाये फिर उनकी खूबसूरती रह जायेगी क्या?
आखिर में सूफियत के दो मिसरे-
रही परदे में न अब वो पर्दानशीं,
एक पर्दा सा बीच में था सो न रहा ...