Wednesday, April 21, 2010

एक कविता सा कुछ



कविता लिखना इतना अनायास होता है कि खुद मैं बहुत बार हैरानी करता हूं और फिर यह यकीन भी पुख्ता हो जाता है कि कविता दरअसल इलहाम होती है ऐसी ही एक ताजा इलहामी कविता पेशे नजर है
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बुझे से दिन और उदास शामें
बिखरे सपने हैं
उजाड से आशियाने में
जैसे टूटी हांडी में दबा रखती थी कुछ बीज मेरी दादी
दस घडों वाले परिंडे के कोने में

मुझे सहानुभूति की जरूरत नहीं है
पर छुपाना भी तो नहीं आता है मुझे

सच कह रहा हूं
छुपाने की नाकामयाब कोशिशों में
बहुत खत्म हुआ हूं मैं, मेरे दोस्त

शाम ढल ही जाती है
सुबह हो ही जाती है
उम्र बीत ही जाती है

छूटे हुए रिश्ते और बिछडा हुआ प्रेम
तात्कालिक याद से हट जाते हैं कुछ वक्त बाद
जीना संभव बनाने के लिए
या
जीना संभव हो ही जाता है

हांडियां कई बंधी है
बीज जिनके बेकार हो गए हैं
दिन मेरे बुझ गए हैं
और शामें बेतरह उदास
क्या किसी हांडी में छुपाके मिटटी में दबा दिया गया है
उनका कुछ हिस्सा हमेशा के लिए।

Painting by Tim Parish

5 comments:

संजय भास्कर said...

बहुत सुन्दर रचना । आभार

ढेर सारी शुभकामनायें.

SANJAY KUMAR
HARYANA
http://sanjaybhaskar.blogspot.com

फारूक आफरीदी said...

ये कविता मुझे बहुत होंट करती है.
आप ठीक कहते हैं .कविता इल्हाम से ताल्लुक रखती है.आपकी यह कविता बड़ी खूबसूरत बन पड़ी है. मुबारकां

वन्दना अवस्थी दुबे said...

छूटे हुए रिश्ते और बिछडा हुआ प्रेम
तात्कालिक याद से हट जाते हैं कुछ वक्त बाद
जीना संभव बनाने के लिए
या
जीना संभव हो ही जाता है
बहुत सुन्दर कविता है दुष्यंत जी. बधाई.

अखिलेश शुक्ल said...

Yeh kavita saa bahot kuch hai. dil ko chou lane wali bhavana. badhai

seema said...

itni sunder jaise neeli pahadiyon par dheeme utarta akela baadal