Tuesday, March 15, 2011

शोध में क्या रखा है !




खबर आई कि जर्मनी की सरकार में रक्षा मंत्री कार्ल थियोडोर त्सु गुटनबर्ग साहब को अपने पद से इस्तीफा देना पड़ा। उन पर आर्थिक भ्रष्टाचार या कि यौन दुराचार जैसा कोई आरोप नहीं था, उन पर आरोप यह था कि उन्होने पीएच डी के शोध प्रबंध में नकल की थी।


शोध नहीं बल्कि शोध से प्राप्त होने वाली उपाधि ही सर्वोपरि होती है, किसी को यह भय नहीं सताता कि कभी हमारी आत्मा सवाल करेगी कि क्या तुमने वाकई शोध किया था! कुछ ज्ञान की दुनिया में वाकई इजाफा किया है! या कि कोई हिस्सा अगर गुटनबर्ग साहब की तरह पकड़ा गया तो क्या होगा!


पहले मामले का परिचय दे दिया जाय, उन्होनें 2006 में संविधान और संवैधानिक संधि: अमेरिका और यूरोपीय संघ के देशों के संविधान का विकास विशय पर अपना शोध प्रबंध लिखा था, जिस पर उन्हें 2007 मेे डॉक्टरेट की उपाधि दे दी गई थी और यह पाया गया कि उन्होने कई शोध लेखों का हुबहू इस्तेमाल किया है, गत 21 पफरवरी को उन्होने घो ाणा कर दी थी कि वे अब उस अकादमिक उपाधि का इस्तेमाल नहीं करेगे, दो दिन बाद बायरूथ विवि ने उनकी उपाधि को खारिज कर दिया था। उन पर आरोप है कि उन्होने छ: ऐसे शोध लेखों का इस्तेमाल किया जिन पर कॉपीराइट था। मुछदा इतना उछला कि जर्मनी के 51 हजार डॉक्टरल शोधार्थियों ने इसको लेकर खुला पत्र लिखा था।

ये घटना हमें चौंकाती नहीं है क्योंकि भारत में शोध की स्थितियां और इज्जत बहुत उत्साहजनक नहीं है, शायद ही कोई महफि ल हो जहां पीएचडी की उपाधि को गुणवत्ता के लिहाज से संदेह से ना देखा जाता हो, ये हालात हमारे यहां हमारे ही लोगों की चाही अनचाही गतिविधियों का नतीजा है, क्या वजह है कि समाजविज्ञान और मानविकी के प्राय: शोध हिकारत भरी नजर से देखे जाते हैं, उनमें गुणवत्ता की बात करना ही अपने आप में शोधपरक होता है। कितने ही दोस्तों, सहपाठियों और समकालीनों तथा अगली एकाधिक पीढियों के शोध की प्रक्रिया, सोच और मंतव्यों का गवाह रहा हूं, दुख होता है शोध नहीं बल्कि शोध से प्राप्त होने वाली उपाधि ही सर्वोपरि होती है, किसी को यह भय नहीं सताता कि कभी हमारी आत्मा सवाल करेगी कि क्या तुमने वाकई शोध किया था! कुछ ज्ञान की दुनिया में वाकई इजाफा किया है! या कि कोई हिस्सा अगर गुटनबर्ग साहब की तरह पकड़ा गया तो क्या होगा!

मामला इतना इक तरफा नहीं है, यहां हमें यह भी देखना होगा कि शोध के लिए उत्साहजनक परिस्थितियां देने में क्या हमारे अकादमिक संस्थान नाकामयाब नहीं रहे हैं! हालांकि ऐसा नहीं है कि यह हालात अमेरिका या अन्य विकसित देशों में आदर्श स्तर पर हों, वहां के कई शोधार्थियों के साथ सलाहकारी भूमिका में काम करते हुए जाना कि शोध उपाधि के बाद बेरोजगारी की प्रबल संभावनाओं के बावजूद भी कम से कम शोध उपाधि के समय तो अकादमिक संस्थान शोध के लिए अनुकूल परिस्थितियां बना ही रहे हैं, यहां तर्क यह दिया जा सकता है कि भारत में भी फेलोशिप्स हैं, बहुुत से संस्थान है जो अच्छा काम कर रहे हैं, पर पहली दिक्कत उनके कम होने की है, दूसरे, व्यवहारिक दिक्कतें हैं जो भारतीय परिवेश की दिक्कतें हैं। यह मेरी व्यक्तिगत राय है कि प्राय: संस्थानों को धोखे में रखे जाने की संभावनाएं बहुत हैं।

हम वापिस बडे सवाल गुणवत्ता पर फिर आते हैं, उसके लिए हमें संस्कारित होने की जरूरत महसूस होती है, हम प्राय: ऐसे क्यों संस्कारित होते हैं कि बस डिग्री की अहमियत है, या कुछ भी लिख दिया जाए, थिसिस रिजेक्ट तो होती ही नहीं हैं, जमा करवाने के बाद कौन पूछता है कि आपने क्या लिखा था आदि आदि।

एक तो यह हुआ है कि समाज में वैसे ही प्रबंध और तकनीक की वाजिब बढती अहमियत ने शोध के प्रति उत्साह को कम किया है पर जो करें उनके लिए वाजिब माहौल, वाजिब संस्कार और वाजिब हालात देने का जिम्मा किसका है! महज उच्चशिक्षा को व्यवस्थागत कारणों से गाली देना इस कलमी कवायद का मकसद नहीं हैं, गुटनबर्ग साहब के बहाने से अपने गिरेबां में झााकने और कुछ बेहतर कल की उम्मीद में रास्ता ढूंढने के लिए लालटेन को रौशन करना है।

मुझे हैरानी होती है, हमारे प्रदेश में समाजविज्ञान के अधिकांश शोध प्रबंध प्रकाशन योग्य नहीं होते, हालांकि परीक्षक महावरे के रूप में प्रकाशन की संस्तुति करते हैं, फिर क्या वजह है कि वे ज्ञान की दुनिया की जरूरत नहीं बनती, इसीलिए कोई प्रकाशक उन्हें प्रकाशित करेन का हौसला नहीं दिखाता! और मार्के की बात यह भी कि कोई डॉक्टरेट होल्डर इसलिए प्रकाशित नहीं करवाना चाहता कि इससे ज्ञान की दुनिया का भला होगा इजाफा होगा, बल्कि महज इसलिए कि प्रकाशित शोधप्रबंध किसी विवि में प्रध्यापक की नौकरी में मदद करेगा। हालाकि मुझे यह भी लगता है कि अच्छे प्रकाशक या किसी भी प्रकाशक से उसे छपवाने की कोशिश इसलिए भी शायद ना होती हो कि गुटनबर्ग साहब की तरह कुछ गड़बड़ भी हो सकती है।

अपने कई प्राध्यापक साथियों को मैं बुरा लगता हूं जब उन्हें कहता हूं कि इस पर शोध पत्र केवल इसलिए मत लिखिए कि इस विषय को तो हम जानते ही हैं और सेमिनार में पर्चा पढने का एक और सर्टिफिकेट मिल जाएगा, जब तक कि आपके शोध का विषय नहीं है और उसमे भी कुछ नया विचार या तथ्य हम नहीं दे पा रहे हैं तो। अकसर डांट और फटकार साथ में मिलती है मुझे, अपना काम करो, ज्ञान मत दो भाई।

इंशाल्लाह मेरा यह भ्रम कायम रहे कि अब भी कुछ शोध निर्देशक हैं जो उपाधि के दौरान शोधार्थी से कोई तोहफा नहीं लेते, अब भी कुछ शोध प्रबंध परीक्षक हैं जो वायवा के लिए आते हुए तोहफे के अलावा आने जाने का व्यय विवि और शोधार्थी दोनों से नहीं वसूलते।

एक तरफ तमाम उपाधियां मूल्यहीन हो रही हैं, अगर वे धनोपार्जन में सहयोगी नहीं है तो बेकार है, सोच को सुलझााने और बेहतर बनाने वाली किसी उपाधि को अनपाने की आज करिअर काउंसलर भूल के भी सलाह नहीं देता। मुझे खुशी है कि कुछ लोगों को वहम है कि नाम के आगे डॉक्टर लगाना गौरवपूर्ण है, अरे लोगो! मुझे चिकोटी काटो, यकीन नहीं हो रहा है, जबकि अंतत: विचार और ज्ञान की दुनिया में अहमियत उपाधि की नहीं नए विचार और ज्ञान के बेहतर इस्तेमाल की है। ऐसे वक्त ज्ञान का अर्थ धन कमाने की विधियां और कौशल ही रह गया हो और नए विचार का अर्थ धन कमाने के नए तरीकों से हो गया हो, नाम के आगे डॉक्टर लगाने की ऐसी मासूम शरारतें लोग क्यों करते हैं साहब! ये तो अंतत: यह जाहिर करेगी कि सबसे निठल्ला आदमी ही डॉक्टर होगा जिसे धन वैभव और सुख के साधनों से इतर केवल ज्ञान की बात और विचार सुख दे रहे हैं! संभव है शोध और उपाधियों का यह हाल पूरी दुनिया में ऐसा ही हो, खुदा ना करे कि ऐसा ही हो, ऐसा सुनने से पहले मेरे कान बहरे हो जाएं!

खैर, गुटनबर्ग साहब तो केवल एक नाम है, बेचारे नाहक बदनाम हुए हैं! ये तो शायद एक वैश्विक परंपरा का हिस्सा भर हैं, तो जश्न मनाएं कि शोध में नया शोध हो रहा है, शोध के नए आयाम सामने आ रहे हैं। वैसे शोध में क्या रखा है, कमाने के नए तरीके सोचिए, शोध तो फालतू लोगों का काम है। इसलिए मेरा अनुरोध है कि गुटनबर्ग साहब को माफ कर देना हमारा वैश्विक कर्तव्य है।

3 comments:

Kosalendradas said...

jai ho.

सुनील गज्जाणी said...

namaskaar !
bahut achche janaab !
sadhwad !

Dr. V.N. Tripathi said...

ऐसा भी सुना जाता है की परीक्षक महोदय के पास शोध प्रबंध बाद में पंहुचा और रिपोर्ट पहले ही आ गयी।
दूसरी तरफ मेरे जैसे भी होते हैं जिनकी शोध पाण्डुलिपि गुरूजी के पास अनुमोदन के लिए वर्षों तक पड़ी रहती है और जमा होने बाद बाहरी परीक्षक की रिपोर्ट भी वर्षों बाद आती है। मुझे शोध प्रबंध लिखने में चार वर्ष लगे और उसके परीक्षण में चार वर्ष से अधिक !