Friday, April 8, 2011

साहित्य का आउटहाउस


हिंदी की मशहूर साहित्यिक पत्रिका 'कथादेश'(अप्रेल 2011) के मीडिया वार्षिकी अंक में मेरा लेख आया है, जो मीडिया और साहित्य की परस्पर अंतरक्रिया पर है, इसे आपसे यथा रूप बांट रहा हूं,

पूर्व कथन -
अपनी बात शुरू करने से पहले कहना ठीक रहेगा कि इसे पढने के बाद संभव है कि दोनों और के दोस्त मुझ पर टूट पडे पर फिर भी कहने की जुर्रत और जरूरत है, और दूसरी बात यह कि इसे अनाधिकारिक बयान भी माना जा सकता है पर यह सब कहने की गुस्ताखी इसलिए कर पा रहा हूं कि लगभग एक दशक से अंदर- बाहर रहकर दोनों के रिश्ते और बदलती स्थितियों को देखने का मौका मिला है.. और अंग्रेजी की कहावत रीड बिटविन दी लाइंस को दोहराते कहूं तो आगे की पंक्तियों में दोनों के तरफ के दोस्त अपनी पीडाओं को महसूस करेगे, ऐसा भी मुझे विरोधाभासी रूप से लगता है...


एक मासूम सा इत्तेफाक है कि अखबारवाले साहित्य को, साहित्यकारों को या तो हीन भाव से देखते है या गालियां देते हैं और कमोबेश यही हालत दूसरी तरफ भी है. जरा पतला करके बात करूं तो हिंदी में कम लोग बचे है जो अखबारनवीसी के पेशे में पढने से सरोकार रखते हैं, यहां पढने से तात्पर्य साहित्य से है या साहित्य से इतर नॉन फिक्शन गंभीर लेखन
से भी, मुझे माफ कीजिए, वो जमाना हवा हुआ जब साहित्यकार और पत्रकार भाई- भाई होते थे, कहा जाता था कि साहित्यकार पत्रकार का बडा भाई होता है... हुआ करता होगा साहिब, हिंदी में तो अब उत्तरोत्तर छोटा भाई महाभाई बन गया है और बडा भाई उसका मुखापेक्षी निरीह बुजुर्ग.

बहरहाल मीडिया के दोस्तों में जाहिर तौर पर लोक-लिहाज में थोडा बहुत सम्मान अब भी साहित्यकार और साहित्य का बचा हुआ है, इसे आंख की शर्म भी कह सकते हैं,

हालांकि मेरा मानना है कि पत्रकार का साहित्य या इससे इतर पढना बहुत जरूरी नहीं है पर इसके दो फायदे होते हैं, एक तो संवेदना को बनाए रखने में, दूसरा भाषा के निरंतर विकास में वह पढना मदद करता है...मुझे कहने में कोई परहेज नहीं है कि साहित्य से दूरी ने उन्हें संवेदनारहित बनाया है..और शायद हमारे समय की कॉर्पोरेट पत्रकारिता की जरूरत यह है भी तो इस लिहाज से यह जस्टीफिकेशन भी इसे हासिल है , तो पढना गैरजरूरी होना गैरवाजिब ठहराए वह तो पागल ही कहलाएगा.

अब इसे क्या कहेगे कि पत्रकारों की निगाह में पल्प साहित्य लिखनेवाले लेखक सच्चे और आइकननुमा साहित्कार हैं, तो बेस्टसेलर को उम्दा लेखन का मानक मानने वालों में अखबार के लोग सबसे पहले हैं, यह नजरिया साहित्य से जुडी खबर को अखबार में जगह से जुडा है क्योंकि प्रकारांतर से वहीं लेखक जो पत्रकार साहब की जानकारी में है, अखबार की खबर में जगह पाएगा. मुझे खुशी होती है जब कोई कहता है कि उसने इन दिनों यह किताब पढी है (और ऐसे अवसर दुर्लभ ही होते हैं) वरना प्रायः उनके लिए आज भी साहित्य का मतलब या तो प्रेमचंद है या फैशन के बतौर चेतन भगत. ..और मुझे हमेशा याद रहता है कि किसी भी कारण से पत्रकारों पर पडने वाली गालियां मेरे उस पेशे के भाईयों पर पडने वाली गालियां है जिससे मुझे दाल रोटी मिलती है.

अपनी आत्मा पर हाथ रखकर पूछिए कि क्या यह पिछले दशक की देन नहीं है कि अखबार में काम करने वाला पत्रकार यानी रिपोर्टर यर डेस्क वाला व्यक्ति अगर साहित्य के पास भी फटकता है तो गुनाहगार है, यहां तक कि इस अहसास को जन्म देने वाली कि मियां अगर इतना ही पढने लिखने का शौक था तो इस पेशे में आने की जरूरत ही क्या थी! और तुरंत यूं भी खारिज किया जा सकता है कि आपको खबर लिखनी क्या आएगी, और एक वक्त था जब माना जाता था कि आप लेखक है तो खबर भी अच्छी लिखेगे, मेरे पास एकाधिक उदाहरण है कि धर्मयुग आदि में प्रकाशित कहानियों के आधार पर बहुत से युवाओं को बडे समूहों में पत्रकारिता की नौकरी मिली और वे कालांतर में बडे नामी पत्रकार साबित हुए

अब जरा दूसरी तरफ का रुख कर लें, साहित्यकारों का वर्ग प्रायः अखबार के लोगों को मूर्ख मानकर अपना अहं तुष्ट करता है और उनमें खबर या इतर छपास की आकांक्षा या जरूरत ना हो तो शायद वे बात ही ना करें, इसके लिए मूर्ख से मूर्ख को भी वे महान पत्रकार और साहित्य संवेदना सम्पन्न कहने से नहीं चूकते.वे अक्सर गाली देते पाए जाते है कि अखबारों में साहित्य की जगह कम हो रही है मैं भी सहमत हूं, तथ्यात्मक तौर पर यह कहना सही है पर कोई संपादक को कहने की जुर्रत नहीं करता कि आप ऐसा नहीं करते, हमेशा यही कहा जाता है कि 'आप तो समझते है आपके हाथ बंधे है पर जो कर सकते हैं, वह ऐसा होना रोक नहीं रहे हैं ' और यह कहना उनके लिए भी ठीक ऐसा ही होता है जिनके लिए वे कहते है कि वे ऐसा कर सकते हैं पर कर नहीं रहे हैं .... जबकि मेरा तो यह मानना है कि साहित्य का छौंक पूरे अखबार में हो पर वह उसे गरिष्ठ ना बनाए कि केवल साहित्कारों का अखबार(साहित्यिक पत्रिका या शोध जर्नल जैसा कुछ होकर ) बनकर रह जाए और लोग उल्टी गिनती शुरू कर दें ..

मुझे गालियां दी जाती होगी, दी भी जाएंगी कि मुझे दुख नहीं होता कि अखबारों में साहित्य की तयशुदा जगहें कम हो रही हैं, पहली बात तो यह कि ये चिंताएं केवल साहित्यकारों की चिंताएं है, दूसरे, हिंदी के उन अध्यापकों की चिंताएं है प्रकारांतर से जिनके पांडित्यपूर्ण लेख छपने की जगहें नहीं बची हैं...दूसरे जब साहित्य को बचाने की जिम्मा हमारे पूरे समाज ने ही भुला दिया है, हम अपने बच्चों का साहित्य पढने के संस्कार नहीं देते, समझ-विचार और सरोकार की बजाय धन, सफलता और पता नहीं किन किन चीजों के ख्वाब दिखाते हैं तो अखबार से क्यों उम्मीद करें ? उन्हें क्यों ठेकेदार बनाते हैं, मेरी मान्यता है कि पब्लिक आइकन के तौर पर लेखकों को देखना समाज ने पहले छोडा, मीडिया ने बाद में, बेशक मीडिया की जिम्मेदारी कम नहीं है और आप मुझे कह सकते हैं कि ''तू भी है इस गुनाह में बराबर का शरीक अपने किस्से औरों को सुनाता क्या है ''

और कहना लाजिम है कि अखबार में साहित्य की उपस्थिति मुझे भी सुख देती है, वज्ह ये कि प्रकारांतर से मैं भी इसी जमात में हूं क्योंकि पत्रकारिता करते हुए भी हमेशा यह माना है कि जीवन का लक्ष्य तो अंततः स्वतंत्र लेखक के बतौर जीना संभव बनाना है

वैसे, मेरी निगाह में जिंदगी के दूसरे हिस्सों- विज्ञान, दर्शन (धर्म से इतर) जैसी बहुत सी चींजें अखबारों से गायब है, ले दे के जाने माने लोगों की दिनचर्या और राजनीतिक उठापटक, कुछ खेल कुलमिलाकर यही तो अखबार है इनदिनों ..बदलते समय में, मुझे हैरानी है कि हिंदी के साहित्यकारों को यह नहीं दिखता कि केवल नई किताबों पर सूचनात्मक और कहीं कहीं समीक्षात्मक टिप्पणियों के अलावा अंग्रेजी मीडिया भी कहां साहित्य छापता है तो साहित्य का बचना और उसका भविष्य अखबार पर निर्भर करता है, ऐसी कोई गलतफहमी मुझे जरा भी नहीं है जिन्हे है, उनके लिए मेरी शुभकामनाएं ही हो सकती है, वे भी मददगार होगी, मुझे संदेह है.

और आखिर में बस इतना ही कि अदब को अखबार और व्यापार दोनों ही ना बनाया जाए, वहीं यह भी कि अखबार को अदब भी नहीं बनाया जाए, पर दोनों में दोस्ती रहे, आवाजाही बनी रहे ...और व्यापार भी चलता रहे.

3 comments:

चौपटिया ROCKS said...

sahi kaha

Anonymous said...

सौ-सौ टके की बात है भाई...!!

आलोक
www.raviwar.com

बाबूलाल गढ़वाल "मंथन" said...

sundar post achaa laga..