Tuesday, September 6, 2011

जगमोहन ने जिंदगी का साथ निभाया पर जिंदगी ने ?



जगमोहन मूंदडा 62 के थे उनके गुजरने की खबर नाकाबिलेयकीन थी, अभी उम्र ही नहीं थी और ऐसी कोई बीमारी भी नहीं थी, वे यूं शराबी भी नहीं थे, कई सालों से उनके मोबाइल पर एक ही हैलो टयून थी- ''हर फिक्र को धुंए में उडाता चला गया मैं जिंदगी का साथ निभाता चला गया'' उन्होनें जिंदगी का साथ भरपूर निभाया पर कम्बख्त जिंदगी ही बेवफा निकली...

उनसे किया एक पुराना साक्षात्कार बांट रहा हूं(उन्हें यही मेरी श्रद्धांजलि है) जिसमें उन्होंने अपनी जिंदगी के वरक खोलके मेरे सामने रख दिए थे
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खुशी की खोज नहीं करता, खोज में खुशी मिलती है - जगमोहन मूंदड़ा


बचपन और पढ़ाई
मेरा बचपन कलकत्ते में बीता। वहां बड़ा बाजार के ाालिस मारवाड़ी माहौल में। पहले मां और पिताजी वहीं रहते थे पर बाद में वे उस वक्त की बंबई और आज की मुंबई चले गए तो मैं अपने बड़े भाई के साथ दादा दादी के पास रहा। हम जिस बिल्डिंग में रहते थे, वहां निजी बाथरूम जैसी चीज नहीं थी,वो मुबई की चॉल जैसी जगह थी। वहां म्यूनिसिपल नल से पानी आता था हमारे नहाने और पीने के लिए। हमारे घर में कार नहीं थी, हम पब्लिक परिवहन ही इस्तेमाल करते थे हमारे रिश्तेदार पैसेवाले थे, इनकी जिंदगी देखते थे। पर हमें सिखाया गया था कि किसी से मांगना नहीं है, ईष्र्या नहीं करनी है। हमें फिल्म देखना मना था, दादी साल में एक बार कोई फिल्म दिखाती थीं। घर में कैरम खेलते थे, पर हमें जिंदगी में किफायत का पाठ पढ़ा दिया गया और पर वो वंचित किस्म के नहीं, बहुत खुशनुमा बचपन के दिन थे क्योकि हमारी जरूरतें सीमित थीं। हम खुश थे पर महत्वाकांक्षाएं तो थीं।
मारवाड़ी इलाके के सबसे बेहतरीन हिंदी स्कूल में पढ़े थे हम, फिर नवीं क्लास से अंग्रेजी मीडियम में आए। मेरे दादाजी ने बचपन से एक बात मन में डाल दी कि जिंदगी में पढ़ाई बहुत जरूरी है। इसका नतीजा था कि हम दोनों भाईयों ने पढ़ाई पर ध्यान दिया। मैं हमेशा अपनी क्लास और स्कूल में अव्वल आता था। हायर सैकण्डरी में पूरे पं.बंगाल की मेरिट में मेरा नवां स्थान था, गणित में सबसे ज्यादा नंबर आए। हमारे पिताजी चाहते थे हम दोनों भाई आईआईटी में जाएं, भाई एक साल आगे थे तो पहले परीक्षा पास करके आईआईटी मुंबई पहुचे। पहले हम लोग छुट्टियों में ननिहाल नागपुर जाते थे फिर मां पिताजी के पास तत्कालीन बंबई जाने लगे। और अगले साल मैं भी परीक्षा पास करके आईआईटी मुंबई पहुंच गया। कम से कम उम्र से भी छोटा था तो एफिडेविड देकर उम्र बढवाकर दाािला लिया, क्लास में सबसे कम उम्र का था मैं। आईआईटी में सोशल एक्सपेंशन हुआ। मिलना जुलना हुआ। अमेरिका में और ज्यादा हुआ। वैसे मुझे लगता है कि अभाव में कल्पना बहुत व्यापक होती है,इसी मेरे कल्पना के संसार में एहसास हुआ कि फेंटेसी तो होनी ही चाहिए। पर मानसिक तस्वीर साफ होनी चाहिए। फिर तेईस साल की उम्र आते आते अमेरिका से दो मास्टर्स डिग्री और पच्चीस साल की उम्र में पीएचडी कर चुका था।

पहला क्रश, प्रेम और विवाह
मेरा पहला क्रश कलकत्ता में मेरी एक बंगाली स्कूल टीचर के लिए था। उस वक्त 10-11 साल का रहा होउंगा, वैसे उस वक्त केवल घर की महिलाओं को ही जानते थे जो सब उम्र में बड़ी थीं। इस समय सामाजिक विस्तार के अवसर नहीं थे ,पैसे भी नहीं थे तो डेटिंग जैसा कुछ नहीं था। दूर के कजिंस से ही संपर्क होता था। दसवीं ग्यारहवीं क्लास की छुट्टियों में मुंबई आना होता था, तब पिताजी के मित्र की एक लड़की से मिलना होता था जो मुझे अंकल कहकर पुकारती थी, मेरी छोटी बहन की दोस्त थी, जब 1973 में अमेरिका गया वो बारह साल की थी और मैं उन्नीस-बीस का। उसके पिताजी को तब से लेकर आज तक काको जी ही कहता हूं। सब कजंस के साथ बॉबे की इस कॉनवैंट पढ़ी लड़की के लिए भी अमेरिका से चॉकलेट्स लाता था,जब भाई की शादी में आया तो देखा कि उसने अंकल कहना बंद कर दिया है, पता चला कि परिवार में साजिश,षड्यंत्र,सांठ-गांठ हो चुकी है और इस तरह छब्बीस जनवरी 1974 को हमारी शादी हो गई।

आईआईटियन बना फिल्ममेकर
मेरा मानना है कि हर इनसान को मन का काम करना चाहिए, दृष्टि में स्पष्टता हो तो देर सबेर हम वहां जरूर पहुचते हैं, मेरे दादा कहते थे कि जिंदगी में इनसान कहीं भी पहुंच सकता है और ये तालीम से संभव होता है। छुटपन में लगा ही नहीं कि फिल्म डायरेक्टर भी हो सकता हूं। 12 साल की उम्र में 'कागज के फूलÓ छुप के देखी और फिल्म की बीमारी लग गई। मन में इच्छा तो हुई पर किसी को बोला नहीं। स्कॉलरशिप से आईआईटी और अमेरिका में पढ़ाई की तो स्वतंत्र और आत्मनिर्भर होने का बोध था। पीएचडी करने के बाद कैलिफोर्निया स्टेट यूनिवर्सिटी में पढाना शुरू कर दिया जहां हते में 12 घंटे पढ़ाना होता था। लगा कि फिल्म बनाना सीखना चाहिए और 12 घंटे पढ़ाने के अलावा यूनिवर्सिटी के सिनेमा डिपार्टमेंट के सहकर्मियों से फिल्म मेकिंग सीखना शुरू कर दिया। फिर एक दिन लगा अब फिल्म बनानी चाहिए और काम के लिए लॉस एंजेलिस के स्टुडियो जा पहुंचा। पर मुझे ब्रेक नहीं मिला। अजीब सा जवाब मिला -'पीएचडी हो हमारी रिसर्च यूनिट से जुड़ जाओÓ या 'हिंदुस्तानी होकर अंग्रेजी फिल्म बनाओगे!Ó यूनिवर्सिटी की बेहतरीन नौकरी के बावजूद मेरे भीतर कुंठा सी थी। इस बीच पत्नी ने वहां से बैचलर, मास्टर्स किया। 1980 में बेटी स्मृति पैदा हुई और मैंने नौकरी छोड़ के 'सुरागÓ फिल्म शुरू कर दी-शबाना आजमी और संजीव कुमार के साथ। इसकी रिलीज पर 1982 में भारत आए फिर 'कमलाÓ शुरू की-दीप्ति नवल, शबाना और मार्क जुबेर आदि के साथ। फिल्म सेंसर ने रोक दी, इससे बड़ा आर्थिक झटका लगा था। 1983 में रिलीज के बाद वापिस अमेरिका चले गए। मैंने फिर से पढ़ाना शुरू कर दिया। फिर अमेरिका में फिल्म तकनीक बदली, वीडियोज की डिमांड पैदा हुई, सस्ती फिल्में बनानी थीं, कई स्वतंत्र निर्माता जुड़े, दो हिंदी फिल्मों के अनुभव के आधार पर अंग्रेजी फिल्में मिलनी शुरू हो गईं। अशोक अमृतराज की कंपनी के लिए एक मिलियन डॉलर में बनाई फिल्म 'नाइट आइजÓ ने तीस मिलियन से ज्यादा कमाए। और फिर पंद्रह सालों में हर साल लगभग दो फिल्में बनाईं,अमेरिका में अपना घर खरीदा, बेटी की पढाई हुई। बीच में हिंदी की एक फिल्म पूजा बेदी को लेकर बनाई विषकन्या, उसका अनुभव अच्छा नहीं रहा तो हिंदी फिल्मों का विचार ही छोड़ दिया।
1999 में राजस्थान आया, फिल्म 'थर्ड आईÓ के लिए शूटिंग लोकेशन देखने-खोजने। हालांकि मेरे पुरखे राजस्थान से ही कोलकाता गए थे पर मैं इससे पहले राजस्थान नहीं आया था,उन दिनों अखबार में खबर पढ़ी-भंवरी देवी के बलात्कार की। मैं विषय की संवेदना से जुड़ा, अपनी जड़ों से जुड़ा, बेटी बड़ी हो गई थी, मेरे विचार भी बदल गए थे और भारतीय मीडिया में जो मेरी सॉफ्ट पोर्नफिल्ममेकर की बेबुनियाद छवि थी, उसे तोडऩे के बेहतरीन अवसर के तौर पर मैंने 'थर्ड आईÓ के लिए मना करते हुए 'बवंडरÓ के लिए खुद पैसा जुटाया, जोखिम लिया, फिल्म बनाई और फिल्म दुनिया के 35 फेस्टिवल्स में दिखाई गई।

मेरा सिनेमा
मैं खुद को स्टोरी टेलर मानता हूं, ये मेरा पैशन है, मुझे फिल्में बनाने में मज़ा आता है और किसे भी माध्यम की बजाय इसमें सहज महसूस करता हूं। कई लोगों ने मेरी फिल्मों की आलोचना की उन्हें पसंद नहीं किया खालिद मोहम्मद ने 'कमलाÓ की उस साल की दस बुरी फिल्मों में गिना, फिर हमने उनकी बनायी फिल्में भी देखी। अब लोगों के ओपिनियन से जिन्दगी तय नहीं करता हूं और अपनी कमियों को अपने अन्दर स्वीकारते हुए सुधारता हूं और ऐसा ही करना चाहिए
फिल्मों को मैं टाइम पास नहीं मानता हूं, इनसे टाइम पास होता है ये सच है एक फिल्ममेकर के तौर पर मैं दर्शकों को टाइम पास के साथ सोचने का अवसर देना चाहता हूं और मेरे लिए मनोरंजन का मतलब है - दर्शकों का कहानी में शामिल हो जाना डूबना। मेरा ये भी मानना है कि केवल इंटेंशन से ही अच्छी फिल्म नहीं बनती, दर्शकों को कहानी के साथ एंगेज करना ज़रूरी निर्देशकीय खूबी मानता हूं । मेरी पसंद होती है मजबूत कथानक जिसमें से दर्शक को कुछ हासिल हो ऐसा सीखने को मिले जो पहले से पता न हो।

खाली वक्त में
फुरसत में पढता हूं। साहस पूर्ण कहानियां तो बचपन से पढता रहा हूं। वाइल्ड लाईफ के बारे में पढना पसंद रहा है, रोमांटिक किताबें भी पढता हूं । इन दिनों अनिता जैन की 'मेरिंग अनीताÓ और अद्वैत काला की 'अलमोस्ट सिंगलÓ पढ़ रहा हूं। इधर कुछ सालों से भारतीय ही अधिक पढ़ रहा हूं वैसे नॉन फिक्शन, फिल्म क्राफ्ट, जीवनियां आदि पसंद करता हूं । देव आनंद साहब की जीवनी अभी लाया हूं। इसके अलावा खाली वक्त में सुडोकू खेलता हूं । दोस्तों के बीच बैठता हूं, संगीत सुनता हूं, फिल्में देखता हूं, मारवाड़ी खाना बहुत पसंद है, घूमना बहुत पसंद है।

जिंदगी का फलसफा
जिन्दगी के हर पल को जीना ज़रूरी मानता हूं, छोटी छोटी खुशियों को सहेजता हूं .. जिन्दगी में बहुत आशावादी हूं। मुझे लगता है कि मज़ा सफऱ में है मंजिल में नहीं ..सफऱ का अंत तो सबका एक ही है । इसीलिए स्वर्ग नरक को मैं महत्वपूर्ण नहीं मानता हूं। एक चीनी कहावत जर्नी इज रिवार्ड कभी नहीं भूलता हूं। आज के हरेक पल को सकारात्मकता, अपने काम, व्यवहार, खुशी से जीना ही मेरे लिए सबसे अहम् है।
हर इंसान की तरह मेरी जिन्दगी में अच्छे बुरे दिन आये हैं, अच्छे दिनों में खुशी के पलों में बहुत्त सारे हैं जैसे मेरा आईआईटी में चयन, बेटी का जन्म, पहली फिल्म का मुहूर्त और रिलीज आदि। बुरे क्षणों में कमला का सेंसर में रुक जाना, एक साल की लड़ाई, प्रोवोक्ड को किसी राष्ट्रीय पुरस्कार और चैनल आदि के अवार्ड के लिए नोमिनेशन तक न मिलना, बवंडर को देश के बाहर बहुत अवार्ड मिले पर भारत में कोई नहीं मिला, भारत में अब तक कोई ब्लॉकबस्टर नहीं दे पाया
पर निराशा के क्षणों में कम भाग्य वाले लोगों को देखता हूं। मेरे संस्कार ऐसे हैं कि जो अपने पास है उसकी अहमियत समझो। मैं खुशी की खोज नहीं, खोज में खुशी प्राप्त करता हूं, बचपन में सुना गाना आज भी मुझे ताकत देता है और मुश्किल वक्त में रास्ता दिखाता है -' मैं जिन्दगी का साथ निभाता चला गया।'

1 comment:

Dr.Nidhi Tandon said...

अच्छा लगा पढ़ कर..!!