Tuesday, August 11, 2009

दोराहे को समझने की जद्दोजहद में

मीरा कान्त की किताब 'उर्फ़ हिटलर '

ये किताब यहूदियों पर हिटलर के जुल्मो सितम, उसके प्रचार मंत्री गोएबल्स के उन्मादी कारनामों को महसूस कराती हुई बीच बीच में असली भारत को निम्न मध्यमवर्गीय कथा के जरिये पेश करती है ....

मीरा कांत के दो साल पहले आए उपन्यास उर्फ़ हिटलर को को पढना बड़ा ही विचित्र रहा है। दो कहानियों को सामानांतर पढने जिसमे एक इतिहास से है, की लालसा ने इस किताब को खरीदने को मजबूर किया था। शुरू में बहुत आनंद नहीं आया बावजूद इसके कि मीरा कान्त को बतौर लेखक पसंद करता रहा हूं।पेंग्विन ने इसे क्यों छापा ये सवाल उठता रहा, फिर सवाल के जवाब मिलते गए धीरे धीरे, एक ही सवाल के कई जवाब। शालिनी के रूप में लगभग आत्मकथात्मक तरीके से मीरा कान्त आद्योपांत उपस्थित हैं।

भारत सरकार की एक अफसर के तौर पर वो जर्मनी के मुख्तलिफ शहरों में घूमती हुई हिटलर की नाजी जर्मनी को याद करती हैं। यहूदियों पर उसके जुल्मो सितम, उसके प्रचार मंत्री गोएबल्स के उन्मादी कारनामों को महसूस कराती हुई बीच बीच में असली भारत को निम्न मध्यमवर्गीय कथा के जरिये पेश करती हैं॥शुरू शुरू में ये कथा बहुत सामान्य लगती है, बाद में लगता है की इसका ये सामान्य यानी आम होना ही ख़ास बात है। एक बात जो महसूस होती है वो ये कि जर्मनी और हिटलर इतिहास रूप में तो उपस्थित होते हैं पर कथानक के रूप में स्वयं पात्र बनते नहीं दीखते, जिसकी उम्मीद मैं शुरू से आखिर तक करता हूं। भारतीय निम्न मध्यमवर्गीय जीवन का कोलाज तो अपने सामान्य स्वरूप में बहुत ख़ास बन गया है पर ऐतिहासिकता केवल ऐतिहासिक बन कर ख़ास के रूप में बहुत आम सी हो गयी है। कथानक की चर्चा करके आपके पाठकीय आनंद को नहीं छीनूंगा, जिस समय में जी रहे हैं वहां नितांत एकांत जीना संभव नहीं है चाहे वो हर रविवार को गूंजती कबाड़ी की आवाज हो या ओबामा का कोई भाषण, इसी में से जीने की सूरत निकलती है क्योंकि टीवी सेरियल के घटनाक्रम से, विधानसभा और संसद की बेहूदगियों और बद्तमीजियों से, इस शहर या उस शहर के हादसों से दूसरे देश या जगह की मंदी से निरपेक्ष जीना ना मुमकिन है क्योंकि हम मीडिया वालों ने सबको हमेशा बाखबर रखने का बीडा उठाया है तो हर छोटी से छोटी बात हम आप तक पहुंचानी है चाहे वो जरुरी हो या न हो। ये जीवन का द्वंद है और उर्फ़ हिटलर भी उसी द्वंद का एक साहित्यिक प्रतिरूप है जिसे पढ़ लेना चाहिए अपने समय और जीवन को बेहतर जीने में मदद मिलेगी ये मेरा विश्वास है।

4 comments:

अर्शिया अली said...

परिचित कराने का आभार.
{ Treasurer-T & S }

prithvi said...

चलिए आपने सुझाया है तो पढकर देखते हैं.. आभार.

pallav said...

is kitab ko padhne ka man tha,ab aapne aur bhadka diya. bhijwao sathi.

इष्ट देव सांकृत्यायन said...

अच्छा परिचय कराया है. अब पढ़कर देखते हैं.