
लगभग हर नियमित दर्शक-श्रोता की स्मृति में कोई ना कोई सत्र सकारात्मक रूप से अंकित ना हुआ हो, किसी न किसी लेखक से संवाद, दर्शन या पास में बैठने का अनुभव गौरवमिश्रित खुशी का वाइज नहीं बना हो, ऐसा मुझे नहीं लगता, तो क्या इसे कम बड़ी जमीनी उपलब्धि माना जाना चाहिए?
सबसे पहली बात तो यह कि मैं ना तो जयपुर साहित्य उत्सव के आयोजकों में से हूं और ना ही प्रतिभागी लेखकों में। पर पिछले पांच सालों से लगातार एक पाठक-लेखक के तौर पर दर्शक रहा हूं और पत्रकार के तौर पर अखबार, टीवी और मैगजीन के लिए कवर भी किया है। इत्तेफाक यह है कि मुझे हर बार इसके विरोध में उठती आवाजें समर्थन के तर्कों के सामने गौण लगती हैं। वजह यह है कि व्यक्तिगत रूप से मुझे यह उत्सव परंपरागत रूप से प्राप्त दयनीयता के बोध से मुक्ति देते हुए साहित्य को एक गरिमा और लोकप्रिय मुहावरे में ग्लैमर प्रदाता दिखता है।
आलोचकों की जुबान के जरिए साहित्य और साहित्यकारों को मिलती यह गरिमा और ग्लैमर की चुभन ही तो प्रकट नहीं हो रही? पिछले साल इस आयोजन के बाद डेली न्यूज - हमलोग के लिए लिखते हुए हिंदी की प्रसिद्ध कथाकार गीतांजलि श्री ने प्रतिभागी लेखक के तौर पर अपने अनुभवों को बांटते हुए जो कहा था, आज मुझे याद आ रहा है कि यह बड़े अदब से अदब की बात करना है और हिंदी वालों को इससे सीखने की जरूरत है। गीतांजलि श्री की इस बात से कोई असहमत भी हो सकता है क्या? खैर, पहली बात, इस बार के आयोजन में पिछले दो सालों की तरह मीडिया में नकारात्मक खबर बनाने का काम नहीं हुआ, उसके कारण को शब्द देने की जरूरत नहीं जान पड़ती। दूसरी खास बात यह कि लगभग हर नियमित दर्शक-श्रोता की स्मृति में कोई ना कोई सत्र सकारात्मक रूप से अंकित ना हुआ हो, किसी न किसी लेखक से संवाद, दर्शन या पास में बैठने का अनुभव गौरवमिश्रित खुशी का वाइज नहीं बना हो, ऐसा मुझे नहीं लगता, तो क्या इसे कम बड़ी जमीनी उपलब्धि माना जाना चाहिए? मैं व्यक्तिगत रूप से चार सत्रों नंदिता पुरी-ओमपुरी की नमिता भेंदे्र से बातचीत, फैज अहमद फैज की यादगार वाला सत्र और अशोक वाजपेयी के साथ यतींद्र मिश्र के सत्रों को बहुत महत्वपूर्ण मानता हूं। आयोजन की गंभीरता पर सवालिया निशान लगाने वाले दोस्त, ज्ञानपीठ से सम्मानित नाटककार एवं अभिनेता गिरीश कर्नाड वाले अद्भुत व्याख्यानात्मक सत्र को भूल कर ही यह कह सकते हैं, जिसमें उनका विस्तृत अध्ययन, शोधपरक नजरिया क्या आयोजन की चकाचौंध वाली, फिल्मी ग्लैमर वाली छवि के बरक्स जोरदार जवाब नहीं था?
फैज वाला सत्र क्या ऐतिहासिक क्षण नहीं था जब उनकी बेटी सलीमा हाश्मी के सामने जावेद अख्तर फैज से अपनी अविश्वसनीय किंतु सत्य किस्म की पहली मुलाकात नोस्टेल्जिक और पटकथा लेखक के हुनर से मिलाते हुए लोगों से बांट रहे हैं कि कैसे वे मुंबई में एक मुशायरे में भाग लेने आए फैज से मिलने ठर्रा पीकर आत्मविश्वास से, बिना टिकट लोकल ट्रेन में अंधेरी से मरीन ड्राइव की यात्रा करके गए, बिना परिचय के ही रात होटल में उनके ही कमरे में गुजारी थी और सुबह-सुबह कुलसुम सायानी की प्रेस कॉन्फे्रेस के बीच इजाजत लेकर चुपके से अजनबीके रूप में ही निकल आए थे। जावेद साहब के इस संस्मरण साझा करने के बाद शबाना आजमी और पाकिस्तान से आए अली सेठी फैज साहब की नज्मों का सुंदर पाठ किया और नोबल पुरस्कार प्राप्त साहित्यकार पाब्लो नेेरूदा और फैज की मित्रता के अंतरंग क्षण स्क्रीन पर फिल्म के रूप मेंं दिखाए गए।
बहरहाल, यकीनन पूरा आयोजन एक मजमा था, बेहतरीन मजमा। जिसके लिए पटना से आए कवि पद्मश्री रवींद्र राजहंस ने व्यक्तिगत क्षणों में मेला ठेला कहा, यह कहते हुए कि मेले में बहुत गंभीर विमर्श की अपेक्षा नहीं की जा सकती, मैं उनसे सहमत होते हुए जोडूंगा कि मेले का कोई सत्र आपको कुछ भी छोटी सी वैचारिक उलझन, खुशी या प्रेरणा दे दे तो क्या उस मेले को खारिज किया जा सकता है?
अब मुझे पत्रकार की भूमिका में आना चाहिए, बुद्धिजीवियों की राय कानों में पड़ी कि ऐसे आयोजनों से लोकतांत्रिक संस्थाओं का पतन होता है, बात तो सही है, बात में तर्क है और दमदार भी है, तो क्या किया जाए? या तो से आयोजन सरकारी स्तर पर हों जैसा लगभग सफल किस्म का मॉडल राजस्थान हिंदी ग्रंथ अकादमी ने पुस्तक पर्व के रूप में (कतिपय स्वाभाविक आंरभिक कमियों के बावजूद) हाल ही हमारे सामने रखा। दूसरी बात यह कि जब साठ साल के गणतंत्र के जश्न में डूबे देश के लोगों के सामने कुछ लोग अपनी मेधा, मेहनत और विजन से एक सफल किस्म का लोकप्रिय (चाहे उसे गंभीरता में साधारण ही क्यो ना कह दिया जाए) आयोजन खड़ा करते हैं, तो उसे विरोध के लिए विरोध की मुद्रा में खारिज करने का काम भी होगा ही, पर होना नहीं चाहिए।
ऐसा नहीं है कि इस आयोजन में किसी तरह की निराशा नहीं हुई, कमियां नहीं दिखीं, मसलन राजस्थानी का सत्र फीका सा रहा तो पीड़ा हुई और लगा कि क्या इससे अधिक क्षेत्रीय और भाषाई भागीदारी का तर्क कमजोर नहीं होता और अपने ही लोग समयबद्ध रूप से रोचक सत्र नहीं बना पाए तो आयोजकों को क्या दोष दें? वहीं, अभिजात्यता और चकाचौंध को हम मान भी लें तो क्या पूरे आयोजन में लोकतांत्रिकता के अनूठे अवसर यादगार नहीं बनाते? याद कीजिए, गुलजार नज्में पढ़ रहे हैं, जावेद अख्तर सामने बैठ कर सुन रहे हैं, ओमपुरी को बैठने की जगह नहीं मिलती पर बिना शिकवा किए, बिना झल्लाए लगभग मध्य में खड़े सुन रहे हैं और जब माइक गड़बड़ाता है तो आवाज के लिए कहते हैं, यहां तक तो आवाज आ रही है। तो साहित्यिक आयोजन को आसमान की उंचाइयों तक ले जाने वाले इसके सूत्रधार संजोय रॉय मंच के पास नीचे जमीन पर बैठकर ही नज्म सुनें तो इसे क्या कहेंगे? एक आयोजन सिर्फ इसलिए कि वह सरकारी नहीं है, अंग्रेजी के वर्चस्व वाला है, आलोचना करें, यह भूलकर कि पूरी दुनिया और कम से कम एशिया में जयपुर की पहचान के साथ एक सार्थक सी, प्रकटतया गंभीर विषय साहित्य को जोड़ रहा है और वह भी बड़े मर्तबे के साथ, तो यह गौरवपूर्ण नहीं तो संतोषजनक जरूर है। और साहित्य से सिनेमा और संगीत जुड़ कर कोई गुनाह कर रहे हैं क्या?
इसे आप क्या कहेंगे कि वसुंधरा राजे सिंधिया प्रतिलिपि पत्रिका के दलितों पर केंद्रित ताजा अंक को खरीद रही हैं, यानी साहित्य के बहाने विविध क्षेत्रों के लोग एक साथ जुट रहे हैं और पारस्परिक संवाद के अवसर सुलभ हो रहे हैं। और शाम को भोजन के समय की अनौपचारिकताओं एवं आत्मीयताओं की अहमियत को तो शाम के गवाह लोग ही जान सकते हैं। और लगभग एक हफ्ते बाद जब मैं मैसूर में ऐसे ही एक आयोजन-पांचवें अंतरराष्ट्रीय काव्योत्सव में काव्यपाठ कर रहा होऊंगा, तो यकीन मानिए पांच साल के जयपुर साहित्य उत्सव को अपनी स्मृति और चेतना में एक निकष के रूप में रखते हुए वहां जयपुर की सी अपेक्षाएं करूंगा, तो जयपुर के इस आयोजन को लेकर हम सबकी या कम से कम मेरी शिकायतें तथा नुक्ताचीनी और भी गौण नहीं हो जाएंगी क्या?
28 जनवरी 2010 को डेली न्यूज के संपादकीय पेज पर अग्र लेख