Friday, January 1, 2010

जुबानें ज्ञान की खिडकियां है ज्ञान नहीं


माफ कीजिए अंग्रेजी के वेदप्रकाश शर्मा या सुरेंद्रमोहन पाठक यानी चेतन भगत हिंदी के अखबारों में गर्व से लिख रहे हों तो जुबान के नाम पर नए दशक का व्यवहार और संसार हमारे सामने खुलकर नहीं आ जाता क्या!

गुजरते साल की आखिरी शाम ताजा धुले लिहाफ में कालिंगवुड की 'द आइडिया आफ हिस्ट्री' का पाठ करते हुए( दो सालों के संधिकाल में इतिहास पढने से बेहतर मुझे कुछ नहीं लगता) जो चीज बार बार ध्यान भंग कर रही थी, वह थी गली के तात्कालिक उत्सव पंडालों से उठती पंजाबी गीतों की आवाज। सुबह उठा तब भी हरभजन मान का गाया पंजाबी गीत कहीं बज रहा था। यह इस शहर का मिजाज मुझे मालूम नहीं होता। जब राजस्थान के एक मात्र पंजाबी इलाके से आए मुझ किशोर के लिए सुखद होते हुए भी पंद्रह साल पहले इस शहर में पंजाबी गीत लगभग वैसा ही था जैसा कोई तमिल तेलुगू गीत आज भी होता हो।
क्या यह वैश्विक भाषाई बहुलतावाद की एक झलक नहीं है। इसे जरा विस्तार देकर देखें तो जब आंध्र फिर भाषा के नाम पर उबल रहा है और दूसरी तरफ पाउलो कोएलो दुनिया की आधी से ज्यादा जुबानों में पढे जा रहे हों, दूर क्यों जाएं हिंदी के उदय प्रकाष दुनिया की दो दर्जन भाषाओं में पढे जा रहे हों और माफ कीजिए अंग्रेजी के वेदप्रकाश शर्मा या सुरेंद्रमोहन पाठक यानी चेतन भगत हिंदी के अखबारों में गर्व से लिख रहे हों तो जुबान के नाम पर नए दशक का व्यवहार और संसार हमारे सामने खुलकर नहीं आ जाता क्या! चेतन भगत की ताजा किताब टू स्टेटस कहीं टू लेंग्वेजेज होती तो! या होनी चाहिए थी!
इसका सीधा साधा मतलब यह है कि जुबान की दादागिरी का वक्त भी अब खत्म हो गया है जैसे तथाकथित रूप से पांडित्य और विद्वता की भाषाई दादागिरी का पर्याय संस्कृत और पढे लिखे होने की जुबानी पहचान अंग्रेजी रही है, अब नहीं है, प्रबंधन की पाठशालाओं में कई जुबानें सिखाई जा रही हैं यानी तय है कि केवल अंग्रेजी से काम नहीं चलेगा। यह लगभग वैसा ही होगा जब आप दक्षिण भारत में जाते हैं तो विज्ञापनों पर जुबान और चेहरे दोनों बदल जाते हैं। तो बाजार की जुबान हमारी जुबान और हमारी जुबान बाजार की। यही कारण है कि बदलती दुनिया में अंग्रेजी के बावजूद हिंदी के व्यापक फैलाव से लोग हैरत में है। किताबों और अखबारों का बाजार झूठ तो नहीं बोलता। और मैं बाजार के इस स्वरूप का नकारात्मक नहीं मानता, क्योकि इसमें अहित तो किसी का नहीं है, ना जुबानों का ना उन्हें बोलने वाले लोगों का।
जाहिर है कि ज्यादा जुबानें जानना अब बड़ी जरूरत है। मल्टीलिंग्वल कल्चर का युग प्रारंभ हो गया है, वैसे भी जैसा कभी मेरे दादाजी ने बचपन में मुझे कहा था कि बेटा, ज्ञान और कौशल का रास्ता जुबानें बनाती हैं, जुबानों की खिड़की से हम वहां पहुचते हैं, बस जुबान की यही और इतनी सी अहमियत है, यानी जुबान ज्ञान का विकल्प तो नहीं ही होती। आइए, नए साल में हम भी कोशिश करें कुछ जुबानें और जानें, कुछ खिड़कियां और खोलें ज्ञान की।

3 comments:

डॉ दुर्गाप्रसाद अग्रवाल said...

मुझे लगता है कि यह टिप्पणी हड़बड़ाहट में लिखी गई है, इसलिए बहुत सारी बातें ओवरलैप कर गई हैं. मेरा अनुरोध है कि इसे थोड़ी फुर्सत में दुबारा लिखें और थोड़े विस्तार से लिखें, तभी बातें सही तरह से खुल सकेंगे.
वैसे, आपने जो मुद्दे उठाये हैं वे बहुत ही महत्वपूर्ण हैं. मुझे यह बात भी बहुत अच्छी लगी कि आप आवेश में आकर बाज़ार को गालियां नहीं दे रहे हैं, जैसा कि हम लोग अक्सर कर जाते हैं. मुझे इस टिप्पणी को विस्तर में पढ़ने का बेसब्री से इंतज़ार रहेगा.

परमजीत बाली said...

आप ने बहुत बढ़िया विचारणीय पोस्ट लिखी है। लेकिन
अग्रवाल जी की बात पर भी ध्यान दे...धन्यवाद।

'' अन्योनास्ति " { ANYONAASTI } / :: कबीरा :: said...

मैं आपकी बात कुछ हद तक ही समझ पाया हूँ , यहाँ पर दुर्गा जी की टिप्पणी से सहमत हूँ कि आप को अपनी बात जरा और स्पष्ट ढंग से कहनी थी ,आप के उल्लिखित लेखक आखिर हैं तो मूलतः हिंदी के हितो बाज़ार नहीं तय करता किसी भाषा का विकास जब कोइ भाषा नियमों के मकड़ जाल में जकड़ी जाती है [ सख्त व्याकरण या ग्रामर में ] तो वह जनसामान्य से दूर हो कर मृतप्राय हो जाती है जिस अंग्रेजी कि बात आप कर रहे हैं वह ब्रिटिश अंग्रेजी स्वयं प्रति-वर्ष अन्य भाषाओँ के शब्दों से समृद्ध हो रही ,जबकि दूसरी ओर उसी अंग्रेजी की स्पेलिंग नियम जाने अनजाने बदल रह है , janta स्वयं use अपनी सुविधानुसार लिख रही है यही भाषा के विकास - प्रवाह का नियम है , बाजार केवल प्रवाह को विभिन्न क्षेत्रों की ओर मोड़ता भर है वैसे इस बात से तो मैं सहमत हूँ की दोचार भाषाएँ और सही सिखाने में कोइ बुराई नहीं है ,| रही भाषा की दादागिरी की बात तो यह आधुनिक भाषाओँ के विषय में तो चल सकता है परन्तु संस्कृत के विषय में नहीं उसकी दादागिरी तो चलती ही रहे गी अनंत कल तक अगर ऐसा न होता तो संस्कृतमें एक ही विषय के प्राचीन ज्ञान पर आज भी कई कई टीकाएँ या कमेंट्रीयां न लिखी जा रही होती ,वह भी अलग - अलग भाव प्रगट करते हुए ,'' एक ही शब्द ' मरुत 'के पाँच-पाँच भावार्थ या निर्वचन न कहे जाते वह भी एक ही ' नियम आधार : निरुक्त ', से ही और यही बाध्यता मुझे आप से सहमत होने को बाध्य भी करती है कि कुछ और भाषाएँ सीखने में कोइ बुराई नहीं है और यही बात विरोध करने को बाध्य करता है कि भाषाओँ कि दादागिरी नहीं चलेगी यह प्राचीन संस्कृत में उपलब्ध ज्ञान पर नहीं lagu होता |

वैसे आधुनिक भाषाएँ भी badalao के daur से guzar रही हैं jase ' ur lek apun ko vao -vao hoti' . ukt lekhakon ka angreji men likhana bhi badhyata hi thi vahan se hi rokada milata tha han ab kuch kuch halat badlen hain yahan par bhi rokada milane laga hai par unhi lekhakon ko jo angreji se ayat kar ke laye ja rahe hai ; sidhe hindi valon ko utanana nahi milata |