Friday, January 22, 2010

गुनगुनी धूप में सर्द सचाइयां


जयपुर की सुहानी सुबह में देश का मशहूर और बेहतरीन अदाकार खुद पर लिखी किताब पर बात कर रहा था और साथ थी किताब की लेखक और उनकी पत्नी नंदिता पुरी, दोनों से मुखातिब नमिता भेद्रे। शुरूआत बहुत अनौपचारिक सी, ओम पुरी अपनी सीट से उठकर नंदिता के पास आकर माइक चेक करते हैं, इतने करीब से कि अपनी पत्नी के सांस महसूस कर सकें। दोनों के सांसो की मिलीजुली आवाज होटल डिग्गी हाउस के खुले लान में सांय सांय गूंजती हैं। नंदिता ने कहा कि ठीक है अब आप अपनी जगह बैठ सकते हैं, ओम अपनी जगह बैठे तो नमिता ने कहा कि ओम की इच्छा तो वहां से हटने की नहीं है पर सामने फेमिली आडियंस है।
पहला सवाल यह था कि क्या किताब अनलाइकली हीरो पर विवाद प्रचार के लिए था तो नंदिता ने कहा कि नहीं, मैं तो हैरान थी, मुझे तो धक्का लगा था, यह वो हिस्सा नहीं था जो हमने प्रकाशक के साथ मिलकर अखबारों और पत्रिकाओं के लिए चुने थे। जब यही सवाल ओम से किया गया तो उनका कहना था हां, यह था पर हमारी ओर से नहीं प्रकाशक की ओर से, उसकी भूमिका के बगैर कैसे वह हिस्सा मीडिया के पास चला गया! इस वक्त पत्नी नंदिता के चेहरे भाव देखने लायक थे। पति पत्नी एक ही बात पर अलग अलग थे। बातों बातों में जब ओम ने कहा कि जब मैं ड्रामा स्कूल में था बीस साल का था तो नंदिता चार साल की थी तो नंदिता के चेहरे भाव मुस्कुराहट में कुछ लजाने के थे और लान में आगे से पीछे तक गूजता हुआ एक कहकहा था ।
ओम ने कहा कि लोगों ने पूछा कि क्या मुझे अपने सेक्स जीवन को यूं बताना चाहिए था, मेरी नजर में जीवनी का मतलब क्योकि किसी इनसान को संपूर्णता में देखना चाहिए उसकी उपलब्धियां, कमजोरियां, खूबियां सब कुछ आना चाहिए। उनसे जब नमिता ने कहा कि आप अच्छे अदाकार है फिर सिंह इज किंग जैसी कैसी कैसी फिल्में कर रहे हैं ! तो आराम की मुद्रा में बैठे ओम ने दोनों हाथ पावों के बीच बांधे और लगभग कमर को आगे बैड करते हुए सिर झुका कर कहा कि नमिता आय एम सारी आई वर्कड इन सिंह इज किंग! फिर अपनी मुद्रा में वापिस आए और बोले अपनी आरभिक फिल्मों के पारिश्रमिक का ब्योरा दिया और बोले कि जब पेंतालीस का हुआ तो लगा कि परिवार है और बुढापा आएगा, मेरे पास कुछ नहीं है और मैं कमर्शियल फिल्मों की ओर मुडा। जैसे फिएट चलाता था तो लोग कहते थे बेहतर कार से रेट अच्छा मिलता है तो मैं कहता था यार मेरे लिए घर जरूरी है कार से पहले।
उनसे जब पूछा गया कि तो क्या आपको लगता है आपकी किस्म की फिल्में बनती नहीं रोल नहीं होते! तो बोले कि रोल भी है, फिल्मे भी हैं पर वो बच्चन साहब ले जाते हैं, दोनों के बाल ग्रे हैं, दोनो की आवाज भी अच्छी है और दोनों की अदाकार भी। मैं चाहता हूं उनके पास इतना काम आए कि वो कहें कि जाओ सात बंगला चले जाओ, तो कुछ काम मुझे मिले, उन्होंने याद किया कि अमिताभ की वजह से उन्हें अर्द्धसत्य मिली जो उनके लिए लाटरी थी। कमर्शियल करने के बाद फिर अपने मन का काम करने का जरिया उनके लिए ब्रिटिश सिनेमा बना जिसके लिए उनका मानना है कि वे आर्ट सिनेमा बनाते है, और हालीवुड वाले कमर्षियल।
जब उनकी पत्नी नंदिता पुरी ने कहा कि सिनेमा के लोग आत्म मुग्ध होते हैं तो नमिता ने पूछा कि क्यो ओम भी है! तो नंदिता ने कहा माइल्डली। नमिता ने कहा कि सिनेमा भी अब क्लोज होता जा रहा है यानी परिवार केंद्रित सा। क्या उन्हे लगता है कि कोई नया आदमी उसमं घुस कता है तो बोले कि परिवार मदद करता है पर अंततः अपनी प्रतिभा से ही स्थापित होते हैं , असफल के उदाहरण हमारे पास हैं ही, बाहर वाले ष्षाहरूख है जो हिट हैं नंबर वन हैं। और जैसे बीए करते ही दुकानदार बेटे को कहता है बैठना शुरू करदे यहां भी है।
ऐसे ही चुटीले सवाल जवाब और हसीं मजाक में अनौपचारिक बातचीत के बाद नंदिता ने किताब का अंश पढना शुरू कर दिया- ओम का जन्म अंबाला में हुआ, जो पंजाब में था अब हरियाणा में है, जन्म का दिन निश्चित नहीं है.....
गुनगुनी धूप अब कुछ तीखी होने लगी थी।

3 comments:

sanjeev said...

padh kar achcha laga.

पृथ्‍वी said...

सुंदर .. थोड़ा और आगे बढाते तो और बेहतर रहता. वैसे भी इस तरह की बातें और कहां पढने को मिल सकती हैं. अखबार व टीवी वाले भाई तो सन सना सन सनसनी में डूबे हैं.

ramkumar singh said...

thank god...u wrote new post...ab ek vivaad ko to aaraam milaa....