Thursday, October 25, 2012

लाल सलाम तो बनता है प्रकाश झा के लिए

फिल्म इल्म -चक्रव्यूह :

फिल्म अपने पूरे मिजाज और तेवर में प्रकाश झा की फिल्म है। राजनीति की कई परतें वे राजनीति और आरक्षण में जाहिर कर चुके हैं, यहां उन्होंने माओवाद, नक्सलवाद, के साथ अप्रत्यक्ष रूप से मार्क्स, लेनिन को जेरेबहस रखा है।

अपने प्रिय अजय देवगन की जगह अर्जुन रामपाल के साथ 'चक्रव्यूह'लेकर आए प्रकाश झा को इसलिए धन्यवाद कहना चाहिए कि वे नक्सलवाद को लेकर बडी चतुरता से अपनी बात कहते हैं। सरकार और देश की बात कहते हुए आदिवासियों का पक्ष भी उसी बेबाकी से कह जाना इस फिल्म को पॉलिटिकली करेक्ट बनाता है। पूरी भव्यता के साथ उन्होंने फिल्म रची है और कहना चाहिए कि दर्शकों के लिए भरपूर मनोरंजन के साथ सार्थक सिनेमा की अपनी इमेज के मुताबिक काम को अंजाम दिया है।

बदलते आर्थिक माहौल में महान्ता नामक मल्टीनेशनल कंपनी के आगमन और पुराने कॉमरेड बाबा यानी ओमपुरी के साथ फिल्म सीन दर सीन दर्शकों के सामने उदघाटित होती है। नक्सलवाद से लडने वाले पुलिस अफसर के रूप में रामपाल से जो काम प्रकाश झा ने करवा लिया है, वह इस फिल्म को प्रामाणिकता देता है। एक्शन सीन तो अपने पेस और संपादन के कारण शानदार बन ही गए है। पुलिस अफसर के दोस्त और आंदोलनकारी युवती के रूप में अभय दयोल तथा अंजली पाटिल की भूमिकाएं और उनके बीच बनता भावनात्मक रसायन पर्दे पर एक खूबसूरत पेंटिग सा लगता है। कहानी में गुंथा हुआ कैलाश खैर की आवाज में महंगाई वाला गीत-'भैया देख लिया है बहुत तेरी सरदारी रे' अपनी लोकसंगीतीय बुनावट के कारण सिनेमा से बाहर निकलकर भी याद रहता है। नक्सली नेता राजन के रूप में मनोज वाजपेयी वैसे ही है जैसे हम उनसे और उनसे काम करवाने के लिहाज से प्रकाश झा से उम्मीद करते है।


फिल्म अपने पूरे मिजाज और तेवर में प्रकाश झा की फिल्म है। राजनीति की कई परतें वे राजनीति और आरक्षण में जाहिर कर चुके हैं, यहां उन्होंने माओवाद, नक्सलवाद, के साथ अप्रत्यक्ष रूप से मार्क्स, लेनिन को जेरेबहस रखा है। कितना कलेजा इस माध्यम में उन्होंने पुरजोर तरीके से यह बात कहने को जुटाया होगा कि भारत का विकास आजादी के बाद असमान रूप से हुआ है और विकास की रोशनी जहां नहीं पहुंची, वहां रोशनी के मीठे पोपले ख्वाब वहां पहुंचे है। अगर आप जाएंगे तो आपको भी लगेगा कि इन सालों में आदिवासी जीवन इस तरह से सिनेमा में शायद ही आया हो। यानी पूरे दस्तावेजी तरीके से पर बेशक मनोरंजन को सिनेमा की कसौटी मानते हुए। यह फिल्म संतुलित तरीके से दोनों पक्षों की बात रखते हुए सच को सच की तरह देखने का नजरिया देती है। और खास बात कि दोनों यानी सरकार और नक्सलवादियों में किसी एक का पक्ष लेते हुए कतई जजमेंटल नहीं होती। और शायद चुपके से यह बात भी कहती है कि सच दोनों के बीच में कहीं है। वैचारिक सिनेमा का पूरे कॉमर्शियल और मजेदार तरीके से आनंद लेना हो तो 'दामुल' और 'परिणति' वाले प्रकाश झा की यह फिल्म आपके लिए है।

Wednesday, October 10, 2012

'सर्वकाले सर्वदेशे'

एक वेब पत्रिका के संपादक मित्र को कविता भेजी थी, उन्होंने इसे अपने यहां प्रकाशित करने लायक नहीं माना, उनके निर्णय का सम्मान करता हूं, लिहाजा बहुत दिनों बाद ब्लॉग पर एक कविता जारी की है, मुलाहिजा फरमाएं -



प्रेम को बचा लेना साधना है
अन्यथा उड जाएगा कपूर की तरह
प्रेम को सहेजना एक कला है- जीवन की जरूरी कलाओं में से एक !
वरना बेनूर हो जाएगा सारा का सारा वजूद
और अखिल चराचर जगत में विचरण भूत योनि में जैसे कई धर्मशास्त्र कहते हैं!

प्रेम की जरूरत कब होती है दैहिक फकत
प्रेम होता है जीना साथ - कभी खयालों में, कभी हकीकत में !

जीवन के अरण्य में प्रेम के पुष्प सायास नहीं उगते
वे खरपतवार की तरह होते हैं
और ऐसी खरपतवार जो सिखाती है - रंगों की पहचान और मौसमों की अहमियत !

प्रेम का कोई अर्थशास्त्र नहीं होता, सामाजिकी भी कोई नहीं
प्रेम की राजनीति सबसे विचित्र ज्ञान !

दो जिस्मों की आदिम अकुलाहट भर नहीं होता प्रेम!

प्रेम रहता है फिर भी अपरिभाषेय सर्वकाले सर्वदेशे !

प्रेम रहता है हमेशा केवल जीने के लिए
प्रेम को पाना और जी लेना कुदरत की वह नियामत है जो कुदरत अपने बहुत प्रिय प्राणियों को उपहार में देती है।

किसी नदी में बहते हुए आ जाता है पुष्पसमूह के मध्य कोई दीप
जुगनू भर आभा से चमकता है नदी का वह छोर- आत्म मुग्ध और आत्म संतुष्ट !
वायुवेगों की चंचलताओं के बीच बचा लेना उस दीप की वो अस्मिता
चुनौती स्वरूप उपस्थित होती है
कोई निर्धन माझी लगा सकता है अपना जीवन दांव पर उसके लिए
जिसके पास नहीं होता जीवन के सिवा कुछ भी दांव पर लगाने के लिए।

जीवन में अनंत दुसाध्य कष्टों के बावजूद

प्रेम को संभव बना लेना
रहेगा सबसे बडा कौशल और सबसे बडी विजय भी, तमाम पराजयों के साथ।

प्रेम किसी निर्जन मरूस्थल का वह छोर भी हो सकता है
जहां से आगे जीवन संभव ही नहीं होता।

किसी किसान के खेत में साप्ताहिक सिंचाई के ऐसे अवसर सा हो सकता है प्रेम
जो क्षण भर की किसी चूक से किसी और के खेत को सींच दे संपूर्ण !

प्रेम रहेगा जी लेने के लिए
फिर भी हर सदी, हर देश।

Wednesday, July 25, 2012

साधारणता के नायकत्व का दुर्लभ प्रतिमान

ऐसी किस्मत कितने लोगों को मिलती है कि उनकी पहली ही फिल्म ”आखिरी खत” ऑस्कर के लिए नामांकित की गयी थी। क्या हमें नहीं मान लेना चाहिए कि अमिताभ का उदय राजेश खन्ना का अंत था और अब उनकी देह का अंत हुआ है। देह का अंत ज्यादा मायने नहीं रखता … कलाकार का जिंदा होना या मरना उसके काम से ही होता है। उनके किरदार और सिनेमा जिंदा रहेंगे, जैसे उनके सुपरस्टारडम के अंत के बाद भी अब तक जिंदा रहा है!!



पर्दे पर मोहक दिखता यह नायक कितने ही कथानकों में गुलशन नंदा (जिनके बेटे राहुल नंदा पब्लिसिटी डिजाइनर के तौर पर आज के नायकों की छवियों रचते हैं) के उपन्यासों से रचा गया था (जैसे कटी पतंग और दाग)। दबे छुपे जो बाहर आया है, उसके आधार पर कहना जरूरी है कि अराजक जीवन ने लाखों दिलों में रहने वाले नायक को केवल 69 साल की उम्र में छीन लिया … ऐसे नायक को क्या ये हक होता है कि कुछ फिल्मों की असफलता से टूटकर अपने चाहने वालों को भूलकर जीवन को अराजक बना दे? मेरी जिज्ञासा है कि वे पुरुष केंद्रित उद्योग में सितारों के चरम अराजक व्यवहार की परंपरा के सूत्रधार नहीं कहे जाने चाहिए क्या?

मुझ जैसे कितने ही लोगों की परवरिश दूरदर्शन पर शनिवार और रविवार को राजेश खन्ना की फिल्में देखकर हुई होगी और बेशक हमें उन फिल्मों का रिलीज होना और पर्दे पर देखना नसीब नहीं हुआ, पर मैंने उनकी जो एक मात्र फिल्म पर्दे पर देखी, वह थी – ”नजराना” (वो भी गुलशन नंदा की कहानी पर आधारित थी) और उसका एक गाना बहुत मशहूर हुआ था – ”मैं तेरा शहर छोड़ जाऊंगा” … वो अब जब ये दुनिया छोड़ गये हैं, याद तो वे आएंगे, बहुत आएंगे।

बेशक राजेश खन्ना ने लोकप्रियता का चरम देखा, पर मेरी राय है कि अभिनय के क्लासिक मापदंडों पर वे बहुत साधारण थे। महान उन्हें शायद ही कहा जा सकता है। इस लिहाज से साधारणता के नायकत्व का दुर्लभ प्रतिमान हैं राजेश खन्ना!

बार-बार कहा जाता है कि सिनेमा एक सामूहिक कला है। कौन असहमत होगा कि किशोर कुमार और आरडी बर्मन के बिना इस सुपर स्टार का आकार लेना मुमकिन ही नहीं था!! यानी जिन लोगों का साथ उन्हें मिला, उस लिहाज से भी वो किस्मत के शेर थे! और यह भी पुरजोर पुन: स्थापित होता है कि च्युत नायकत्व को भी सम्मान देना भारतीय परंपरा है।

जरूरी नहीं कि जीवन मूल्य किसी धर्म या परंपरा से आएं, पर वो किसी इनसान के जीवन में होने चाहिए। राजेश खन्ना के जीवन में एक ही मूल्य था – आभासी नायकत्व और उसे कायम रखना। यह ज्ञात और कुख्यात है कि घोर अराजक और विलासी जीवन राजेश खन्ना ने जिया है। क्या यह काला सच नहीं है कि वो अपने अहम और स्टारडम की कंदराओं से ताउम्र बाहर नहीं निकले। बाबू मोशाय को लेकर दिये बयान बताते हैं कि वे किस कदर आत्ममुग्ध थे, ईष्यालु थे, असहिष्णु थे। चाहे इसे गॉसिप और संघर्षशील अभिनेत्री का स्टंट कहकर खारिज कर दें, पर याद करना जरूरी है कि उन पर भी बलात्कार का आरोप लगा था और जिसे एक स्टार के मीडिया प्रबंधन के उदाहरण के तौर पर दबाने के किस्से मशहूर हैं।

ये सवाल प्राय: हमारा आधुनिक समाज व्यक्तिगत कहकर नहीं पूछेगा कि अंजू महेंद्रू से ब्रेकअप क्यों हुआ? क्यों डिंपल अलग हो गयीं? क्यों जीवन संध्या में उनकी अंतरग हुई महिला ने उनसे शादी नहीं की? पर्दे पर आदर्श रोमांटिक नायक जीवन में आदर्श प्रेमी नहीं बना, क्या समाजशास्त्रियों को नहीं सोचना चाहिए!!! ऐसे प्रेमिल परदाई नायक के लिए आहें भरने वाली, खून से खत लिखनेवाली, निर्जन स्थान पर खड़ी नायक की कार पर चुंबनों से प्रेम-कविता रचने वाली, डिंपल से विवाह पर आत्महत्या करने वाली लड़कियां अपने जीवन की प्रौढ़ अवस्था में अपनी आंखों की भीगती कौर के साथ सोचती होंगी – ”क्या वो ऐसे आभासी – कागजी नायक से प्रेम करती थी! कितना बेवकूफाना था – वो प्रेम या आकर्षण !!” यानी वास्तविक जीवन में राजेश खन्ना नहीं जानते थे कि सच्चा प्रेम रोमांस, जिम्मेदारी और प्रतिबद्धता का समेकित रूप है … या कहा जाए कि उनके लिए प्रेम रोमांस भर था!!

जब पूरा मीडिया एक फैन का सा व्यवहार कर रहा है, मेरी आपसे इल्तिजा है, मेरी टिप्पणी को मौत के बाद की गयी आलोचना नहीं, निष्पक्ष मूल्यांकन की एक कोशिश माना जाना चाहिए।

Monday, May 21, 2012

गुजरा हुआ जमाना, आता नहीं दुबारा


हर आदमी का अपना इतिहास होता है, कभी गौरवपूर्ण कि हम बार-बार चिल्लाके बताना चाहें तो कभी छुपानेलायक कि बचते रहें। यही देशों और सभ्यताओं के साथ होता है। यह परिपक्वता और सहनशीलता पर है कि हम समय के साथ हर चीज को जैसी वह थी, बिना भावुक हुए अपने स्वरूप में स्वीकारना सीख जाएं।

अतीत यूं भी सताता है, अतीत आपको कभी नहीं छोड़ता, अतीत खुद को दोहराता है, अतीत यानी इतिहास को लेकर कितने ही मुहावरे हम में से हर किसी की जुबान पर रहते हैं। मसलन, इतिहास दोहराने की बात ही सच होती तो इब्ने इंशा साहब को क्यों कहना पड़ता कि झूठ है सब तारीख हमेशा अपने को दोहराती है, अच्छा मेरा ख्वाबेजवानी थोड़ा सा दोहराए तो। कोई साठ साल पहले छपा कार्टून फिर जिंदा हो गया, यह किसी कलात्मक चीज का कालजयी होना था क्या? यकीनन नहीं, यह दरअसल परीक्षा थी, कई मायनों में परीक्षा और इसमें हम सब फेल हुए या पास यह तय करने का फैसला आप पर ही छोड़ता हूं। साधारण अर्थों में अतीत की जकडऩ में वर्तमान का आ जाना ही कह सकते हैं इसे ...पर बात इतनी सी नहीं है, बजाहिर बात इतनी सी होती तो कोई खास बात थी भी नहीं। इसके मायने और सरोकार कहीं बड़े हैं।

हमारे आसपास बहुत कुछ घटता है, सब कुछ क्या इतिहास में दर्ज होने लायक होता है, कौन दर्ज करेगा? दर्ज करनेवाला क्या वस्तुनिष्ठ रहेगा? उसके खुद के आग्रह क्या बीच में नहीं आएंगे? वह भी तो इनसान है, उसके सुख, दुख, दोस्तियां, दुश्मनियां भी तो उसके साथ ही रहेंगी। समय के साथ उसमें चाटूकारितांए और राजनीतिक जरूरतें भी शामिल हो जाती हैं और तब इतिहास इतिहास नहीं रहता, जरूरत के मुताबिक अतीत का पक्षविशेष तक सीमित कोई दस्तावेज भर ही तो रह जाता है।


इसे हम क्या कहेंगे कि जिनको कार्टून का पात्र बनाया गया था, उनकी भावनाएं तो उस वक्त आहत नहीं हुईं, अब उनके झंडाबरदारों की भावनाएं इतनी नाजुक हैं कि पूछिए मत।अगर कोई इस संसार से परे का संसार होता है तो उसमें बैठे नेहरू, अंबेडकर सोच रहे होंगे कि यार हमने तो सोचा ही नहीं, हम क्या मूर्ख ही थे। क्या इसे अतीत और प्रकारांतर से हमारे व्यवहार में सहनशीलता की घटती प्रवृति को नहीं देखना चाहिए। या तो हम यही मान लें कि अतीत को चिकना चुपड़ा धो-पोंछकर ही सामने लाया जाएगा, तो फिर वह अतीत की परिभाषा कि इतिहास यानी जैसा था से तो कहीं परे हो ही जाएगा। हालांकि हर समय में प्रायोजित इतिहास के बरक्स छोटी छोटी कोशिशें होती हैं जो झूठे इतिहासों को कठघरे में खड़ा कर देती हैं, और शायद यही डर झूठा इतिहास लिखने वालों को भी रहता है कि कहीं कोई खब्ती लेखक, कवि, पत्रकार अपने समय का सच्चा दस्तावेजीकरण कर रहा होगा, बकौल हिटलर के प्रचार मंत्री गोएबल्स -झूठ को सौ बार दोहराओ कि वह सच बन जाए, झूठा इतिहास रचने वाले बार-बार अपने तथाकथित इतिहास को अलग-अलग रूपों में रच और पेश करके उसे स्थापित करते रहते हैं।


यहां हम आपको याद दिला दें कि इतिहासकार ई एच कार ने कहा था -इतिहास अपने आप में उसके तथ्यों और उसके बीच की अंतक्रिया है, इसलिए इतिहासकार को इस बात की इजाजत दी जानी चाहिए कि वह अपने समय और पूर्वाग्रहों से सर्वथा मुक्त ना हो पाए ...और ईएच कार के इस खयाल की वजह शायद यह रही होगी कि इतिहासकार अपने वक्त की जमीन पर खड़ा होके ही अपनी आंख से अतीत को देखता-परखता है, वह उससे मुक्त कैसे हो सकता है? पर केवल भावानाएं आहत होने से वोटबैंक पर मंडराते खतरों से घबराए लोग तो इतिहासकार नहीं है और इतिहास की बुनियादी समझ भी उनमें से बमुश्किल पांच-सात लोग ही रखते होंगे।

आप सहमत होंगे कि हर आदमी का अपना इतिहास होता है, कभी गौरवपूर्ण कि हम बार-बार चिल्लाके बताना चाहें तो कभी छुपानेलायक कि बचते रहें। यही देशों और सभ्यताओं के साथ होता है। यह परिपक्वता और सहनशीलता पर है कि हम समय के साथ हर चीज को जैसी वह थी, बिना भावुक हुए अपने स्वरूप में स्वीकारना सीख जाएं। उदाहरण के तौर पर हमारे हमजाद और पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान में इतिहास पढ़ाते समय शायद यह भावना प्रबल रहती है कि वह पांच हजार साल की परंपरा के इतिहास से खुद को अलग ही दिखाए, साथ दिखाना कई राजनीतिक परेशानियों में डालता होगा। ये सहनशीनता उधर कभी आ पाएगी, दुआ तो करते हैं, पर उम्मीद जरा कम है।


इसी तरह, गांधी को लेकर समय-समय पर तथाकथित नई-नई चीजें सनसनी के रूप में पेश करने का फैशन भी रहा ही है, वह भी इतिहास को देखना है ...मैं इसे बुरा नहीं मानता, ज्ञात तथ्यों की नई व्याख्या और अज्ञात या कम ज्ञात तथ्यों को खोजना और पेश करना ही इतिहास का पुनर्लेखन होता है। किसी व्याख्या से आहत होकर यहां भी सत्य तक नहीं पहुंच सकते। यहां कहना जरूरी है कि जिन दिनों में भारतीय लोकतंत्र की प्रतीक संसद क ी पहली बैठक के साठ साल पूरे हुए हैं, लगभग उन्हीं दिनों में ऐसा वाकया होना कमाल ही नहीं उन लोगों के सठियाने का आभास देता है जिनके कांधों पर देश की लोकतांत्रिक परंपरा और करोड़ों के जनविश्वास की बड़ी जिम्मेदारी है। हमारे राष्ट्रीय नायकों के प्रति अंधमोह के स्थान पर उन्हें मानव और मानवीय कमजोरियों से युक्त प्राणी मानकर देखने की आदत और प्रवृति की अहमियत को कतई खारिज नहीं कर सकते। आखिर में शाइर निदा फाजली के शब्दों में एक गुजारिश- गुजरो जो बाग से तो दुआ मांगते चलो, जिसमें खिले है फूल वो डाली हरी रहे।
आमीन।

Wednesday, April 11, 2012

या रब वो न समझे हैं न समझेंगे मेरी बात..




पुरानी दिल्ली में बल्लीमारां की उन पोशीदा सी गलियों से तकरीबन पंद्रह सौ किलोमीटर की दूरी पर महाराष्‍ट्र में एक जगह है शोलापुर, वहां कुछ वर्दीधारी लोगों को यह इलहाम हुआ है कि चाचा का एक शेर तो इन्कलाबी है- ''मौज- ए- खूं सर से गुजर ही क्यों न जाए , आस्तान-ए-यार से उठ जाएं क्या! '', इसमें साफ- साफ तौर पर बगावत की बू आती है, बगावत भी क्या हुजूर, दहशतगर्दी की !



गालिब का एक मशहूर शेर है कि ''पूछते हैं वह कि गालिब कौन है, कोई बतलाओ कि हम बतलाएं क्या!'' आज फिर गालिब की पहचान जेरेबहस है और रात गालिब ख्वाब में आए और बोले -'मियां, मैं गालिब हूं, मेरा यकीन करो मैं आतंकवादी नहीं हूं।' माजरा आपकी निगाह में आ गया होगा, फिर भी सहाफत का तकाजा है, जरा संक्षेप में अर्ज कर दूं कि चचा गालिब के एक शेर की बिना पर किसी को आतंकवादी ठहराने का करिश्मा अंजाम दिया जा रहा है। इस शेर के आधार पर सिमी के एक कार्यकर्ता पर यह आरोप लगाया है। वह आतंकवादी है या नहीं और सिमी की गतिविधियां ठीक हैं या नहीं, यह हमारी बहस का सवाल नहीं है, उन्हें कुसूरवार या निर्दोष तो कानून साबित करेगा। पुरानी दिल्ली में बल्लीमारां की उन पोशीदा सी गलियों से तकरीबन पंद्रह सौ किलोमीटर की दूरी पर महाराष्‍ट्र में एक जगह है शोलापुर, वहां कुछ वर्दीधारी लोगों को यह इलहाम हुआ है कि चाचा का एक शेर तो इन्कलाबी है- ''मौज- ए- खूं सर से गुजर ही क्यों न जाए , आस्तान-ए-यार से उठ जाएं क्या! '', इसमें साफ- साफ तौर पर बगावत की बू आती है, बगावत भी क्या हुजूर, दहशतगर्दी की ! तो साहिब जिस शेर के मानी यह हैं कि चाहे खून की लहर ही हमारे सिर के उपर से गुजर जाए, हम तो अब ये दर, महबूब का दरवाजा नहीं छोडेंगे यानी चाहे सर कलम हो जाए ...के उन आलिमों फाजिलों ने क्या- क्या मानी निकाल लिए हैं। अरे, प्रो. सादिक साहब, गोपीचंद नारंग साहब और हिंदुस्तान के तमाम उर्दू शाइरी के तनकीदनिगारो ! आप सुन रहे हैं क्या ! इन नए वर्दीवाले आलोचकों का स्वागत कीजिए, हमारे साहित्य की नई व्याख्याएं हो रही हैं।


उर्दू और फिर पूरी दुनिया की शाइरी को इशारे का आर्ट या फन माना जाता है। इशारे में कही गई बात के मानी कई कई खुलें, यह शाइरी की ताकत मानी जाती है। पहली बात तो यह कि इस शेर के बहुत सारे मानी है नहीं.. और जो है वह बलिदान के तो हैं (चाहे प्रेमिका के लिए, देश के लिए या कौम के लिए), मारने के नहीं। यानी ठीक वैसे ही जैसे महात्मा गांधी भारत छोडो आंदोलन के समय इसी महाराष्‍ट्र में मुम्बई के अगस्त क्रांति मैदान में (जो नाम इस घटना के बाद दिया गया था) कहते हैं- 'करो या मरो '। उसमें 'मारो' शामिल नहीं था, इसका अर्थ था -आजादी की राह में आगे बढें और करना पडें तो जान दें दे।


इत्तेफाक देखिए कि हमने जहां से बात शुरू की वह शेर- ''पूछते हैं वह..'' भी इसी गजल का है। बहरहाल शाइरी की बात ना करें सियासत की कर लें, कहना चाहिए कि यह जल्दी का बयान है, कुछ वक्त बाद बयान बदल जाएंगे, फिलवक्त तो यही है। वैसे गौर करें तो चाचा गालिब का दौरे सुखन अंग्रेजों का दौर था जैसे भगतसिंह का दौर था, नजरूल इस्लाम का दौर था। हालांकि ये बात ओर है कि बहुत खुल के चाचा गालिब ने अंग्रेजों की मुखालफत कम ही की या कहें ना के बराबर ही की तो चाचा किस के खिलाफ दहशतगर्दी करते, प्रेम में प्रेमिका के लिए करते या जमाने के खिलाफ एक आम लेखक के तरह से जैसे हर लेखक बुनियादी तौर पर एंटीएस्टाब्लिशमेंट का एटीटयूड रखता है।


उन्होंने फारसी में कहा है कि ''आराइश-ए-जमाना जि बेदाद करद: अंद, हर खूं कि रेख्त गाज-ए- रू-ए-जमीं शनास'' यानी जमाने का सिंगार अत्याचार से किया गया है और जो भी खून बहाया गया है, यह धरती का अंगराग बन गया है। अफसोस भरे लहजे में ऐसा लिखनेवाला शाइर दहशतगर्दी की परस्ती कर सकता है क्या? उनके कितने ही शेर इनसान को दुनिया या कायनात का मर्कज यानी केंद्र घोषित करते हैं। कभी कभी हमें यह सोच लेना चाहिए, वैसे भी महंगाई के जमाने में यही काम बचा है जो अब भी निशुल्क संभव है, सोच की कोई इंतिहा भी नहीं होती.. तो सोचना का नुक्त- ए- नजर यह है कि चाचा गालिब को फिरकापरस्त भी नहीं कह सकते, दहशतगर्द कहना तो बहुत दूर की बात है, मैं उम्मीद करता हूं कि आप मेरी बात से इत्तेफाक रखेंगे।


वैसे मैं यह भी मान लेता हूं कि अदब यानी साहित्य के मरहले ऐसे हैं कि 'या रब वो न समझे हैं न समझेंगे मेरी बात'...यह भी चचा ने कहा था तो उनकी बातों को कौन समझता है, कौन समझेगा! चाचा को भी पता था, है ना! जाहिर सी बात है कि कहने और समझने का फासला हमारे समय में बढ रहा है यह मान लेना चाहिए पर यह हमारे वक्त की पैदाइश है, ऐसा तो हरगिज नहीं कहा जा सकता। कहने और समझने के बीच इत्मीनान से सुनने अदब और एहतराम से सुनने का बडा जरूरी मकाम है, और जीवन की आपाधापी तथा अहम के पहाड जब इतने उतिष्ठ हो जाते हैं तो चिल्लाना भी बेमानी हो जाता है, धीरे से कान में की गई फुसफुसाहट सुन जाए तो करिश्मा होगा। शेरों और कविताओं मे अपनी बात कहना उसी फुसफुसाहट जैसा है, ये सरगोशियां बेमानी ना हों आओ कुछ ऐसा करें। गालिब के ही हमशहरी दाग देहलवी के शब्दों में कहें तो 'चल तो पडे हो राह को हमवार देखकर, यह राहे शौक है सरकार देखकर।


अकसर यह भी होता है कि किसी अदीब को उसके गुजरने के बाद जाना- समझा जाता है इज्जत दी जाती है। गालिब को तो गुजरे भी जमाना हो गया, अब तो उसे हम कायदे से समझ लें पर साहिब जिस दौर से गुजर रहे हैं, वहां अपनी तहजीबो रवायत के कर्णधारों - विचारकों, चिंतकों, कवियों, लेखकों को सबसे गैरजरूरी मान लिया गया है तो बाकी सब रास्ते और मंजिलें भी तो वैसी ही होंगी। इस बात पे अगर आज फिर चचा गालिब अगर मेरे ख्वाब में आए तो माफी मांगते हुए उन्हीं के शब्दों में कहूंगा कि '' हुई मुद्दत कि गालिब मर गया पर याद आता है, वो हर एक बात पर कहना कि यूं होता तो क्या होता'' ।

Tuesday, January 24, 2012

विदाई का गीत





ए जाते हुए लम्हों जरा ठहरो...जरा ठहरो


सिगरेट के धुएं के छल्ले, कुछ खुशबूएं, कुछ मादक गंध, कुछ प्यारे से- चिकने- चुपड़े चेहरे याद रह जाएंगे, कुछ सितारे यादों में बसे रह जाएंगे, कुछ शब्द जेहन में चिपक के कुछ दिन हमसफर रहेंगे।


बेशक ये दोपहर थी, पर सांझ के कुछ बदमिजाज और जिददी साए जनवरी की धूप में शामिल होकर इतरा रहे थे, लहरा रहे थे। ये आखिरी लंच था इस साल के फेस्ट का, देख पा रहे हैं कि गोविंद निहलानी अकेले अपनी साफ शफाफ सी प्लेट में करीने से छोला- पुलाव डाल रहे हैं, उनके चेहरे के भाव उनकी फिल्मों की तरह हैं। राजस्थान में उनका बचपन गुजरा है, उत्सव के बहाने यहां होना और इन लम्हों को सहेज लेना उनके लिए मुश्किल नहीं है, सीन दर सीन एक निर्देशक की आंखों में दर्ज हो रहे हैं। मैं पूछता हूं-' आखिरी दिन है, कैसा लग रहा है?', मुस्कुराहट के सिवा कुछ नहीं कहते। बीतते लम्हों की कसक का बयान या तो आंसू करते हैं या मुस्कुराहट।

माहौल में अभिजात्यता है, गंध में कितनी देशी- विदेशी गंध शुमार हैं, इसकी गिनती बहुत मुश्किल है, गंध में एक गंध शब्दों की है, बातों की है, जो बीत गया है उसकी है, जो ठहर गया है, उसकी है। आखिरी दिन से पहले की शाम की संगीत लहरियों में पार्वती बारूआ के बाद राजस्थानी यूजन की याद नीलाभ अश्क की बातों में अब भी घुली हुई है। उनके साथ बैठे ऑस्टे्रलियन पेंटर डेनियल कॉनेल के मुंह से हिंदी में निकला- 'जयपुर चमक रहा है।' यह चमक- दमक है, इसमें महक भी है, यह वह जयपुर अब नहीं है, दिल्ली से आए छात्राओं के समूह में से एक छात्रा से बात करता हूं, पता चलता है कि उनके मन में क्या है, उनका मन है-''इसे महीने भर का होना चाहिए।'' यह इनसानी मन है, जो भरता नहीं है, भरने की कोशिश में और रीतता जाता है, प्यास बढती जाती है।

किताबों की दुकान पर मेला है, किताबें देख रहे है, खरीद रहे हैं, लगता है दुनिया बस किताबों सी सुंदर हो जाने वाली है, एक लेखक प्रकाशक गेट पर जाते हुए मिल गए, जावेद अख्तर की किताब 'लावा' के विमोचन की बेला की चमक उनकी आंखों में जिंदा है, जाते हुए उनके कदम ठिठक रहे हैं, शायद गुलजार के लफजों में 'रुके रुके से कदम, रुक के बार- बार चले'।

रूश्दी नहीं आए, नहीं बोल पाए, उनके विचार गूंजते रहे जैसे किसी भी कलमकार के होते हैं। सिगरेट के धुएं के छल्ले, कुछ खुशबूएं, कुछ मादक गंध, कुछ प्यारे से- चिकने चुपड़े चेहरे याद रह जाएंगे, कुछ सितारे यादों में बसे रह जाएंगे, कुछ शब्द जेहन में चिपक के कुछ दिन हमसफर रहेंगे। अगले साल इन्हीं दिनों तक, नए मजमें के सजने तक ये लम्हे यादों के एलबम में रह जाएंगे। सबके लबों की दुआ लौट-लौट कर आते कदमों की आहट में घुली हुई सी है कि वक्त ठहर जाए, यहीं कहीं।

Saturday, January 14, 2012

कविता जैसा कुछ


जिंदा लाशें जश्न मनाती हैं


किसी के साथ ना होने से कोई नहीं मरता
ऐसी बातें अच्छी लगती हैं पर सच्ची नहीं होतीं कि -
''जैसे मर जाएंगे हम एक दूसरे के बिना या जिंदा लाश ही हो जाएंगे हम ''
जिंदा रहते हुए मर जाना भी कोई खयाल होता है किताबों में
मर कर जिंदा रहने का जैसे
मरते हुए जिंदा रहते हुए मौत को याद करता भी एक शाइराना खयाल हो सकता है देवदास सा
देवदास का खयाल भी तो किताबी सा है !
प्रेम में जिंदा हो जाने या नई जिंदगी भर देने जैसे महान खयाल भी तो देते हैं शाइर- कवि लोग
भूल जाते है वे खुद भी कि साथ बनाता है जिंदगी को जिंदगी सा
और साथ छूटना भी जिंदगी को संभव अगर किसी तरह तो हम क्यों झूठ बोलते हैं खुद से ही कि नहीं रह पाएंगे तुम्हारे बगैर!
रह लेते हैं, जी लेते हैं, सह लेते हैं खुश भी ...और खुश भी इतने कि कभी कभी लगता है कि ये हंसी ये खिलखिलाहट तो तब भी नहीं थी जब खुश थे, साथ के अहसास के साथ दोनों !
जीना हर हाल में संभव हो जाता है, जिंदा लाशें जश्न मनाती हैं !!

Tuesday, December 6, 2011

उत्तर और दक्षिण के बीच पुल




'' वाय दिस कोलावैरी डी '' ....सामान्य अर्थो में यह एक प्रेम गीत है प्रेमिका के अस्वीकार को जानलेवा स्तर पर भोगने की अभिव्यक्ति का गीतात्मक रूप - प्रेम में रिजेक्शन या अस्वीकार का भाव देवदास में भी है, पर यहां उसका आवेग कुछ अलग है।


संभव है आप में से बहुत से लोगों ने ना सुना हो -  '' वाय दिस कोलावैरी डी '' पर यह हमारे समय की एक आवाज है जिसकी गूंज भौगोलिक विस्तार में इतनी व्यापक हो जाएगी। इसके पीछे के लोगों ने भी नहीं सोचा होगा। यह कल्पनातीत सा है कि कोई इतनी तेजी से भारतप्रसिद्ध हो जाए, इतने कम समय में पर यह हुआ है और हम इसके घटित होने के गवाह बने हैं.। तथ्यों के रूप में कहूं तो यह गीत 16 नवंबर को यूट्यूब पर जारी हुआ था और अब तक इसे एक करोड़ पांच लाख 59 हजार 994 मर्तबा सुना गया है। भाषा के बंधन तोडते हुए गाना उत्तरी भारत में भी उतना ही सुना जा रहा है, युवाओं ने उसे रिंग टोन और हैलो टयून के रूप में हाथों हाथ लिया है। इसे गाया है धनुष ने, धनुष रजनीकांत के दामाद हैं, फिल्म है तीन और फिल्म का लेखन निर्देशन धनुष की पत्नी और रजनीकांत की बेटी ऐश्वर्या आर ने किया है. यह निर्देशक के तौर पर उनकी पहली फिल्म है,  संगीतकार है - इक्कीस साल के अनिरूद्ध रविचंद्रन, गीत लिखा भी धनुष ने ही है।

सामान्य अर्थो में यह एक प्रेम गीत है प्रेमिका के अस्वीकार को जानलेवा स्तर पर भोगने की अभिव्यक्ति का गीतात्मक रूप - प्रेम में रिजेक्शन या अस्वीकार का भाव देवदास में भी है, पर यहां उसका आवेग कुछ अलग है। सामान्यतः नायक किसी भी फिल्म या नाटक में नायिका को पा ही लेता है, अस्वीकार को स्वीकार में बदलना पटकथा में नीहित होता है। इस लिहाज से कोलावैरी डी हमारे समय के स्त्री विमर्श का वह सशक्त रूप है कि अस्वीकार उसका भी अधिकार है और जबरन उसका साथ हासिल नहीं किया जा सकता, चाहे आपका प्रेम कितना भी तीव्र और प्रगाढ क्यों ना हो। उसे करूणा और तात्कालिक किसी और भाव से भी नहीं जीता जा सकता, अगर उसमें स्वतः ही प्रेम का भाव नहीं है तो कुछ नहीं हो सकता। कहने को कहा जा सकता है कि स्त्री हमेशा से इतनी आजाद तो रही ही है पर साहेब फिल्म या कथा में इतनी आजादी उसे अपवाद स्वरूप ही मिली है …. इसे इस रूप में लेना चाहिए।

महानता के खयाल को अलग रखकर एक बार जरा हम लोकप्रियता और भौगोलिक विस्तार के लिहाज से देखें तो अखिल भारतीय स्तर पर ऐसी स्वीकार्यता के कई अर्थ निकाले जा सकते हैं। सबसे बडा अर्थ क्या यह नहीं है कि शताब्दियों से अलग अलग रूप में परिभाषित किए गए उत्तर दक्षिण के भेद को एक बार फिर बहुत मजबूती से एक सांस्कमिक पहचान ने पाट दिया है, वह है संगीत। बार बार कहा गया है कि संगीत की कोई जुबान नहीं होती पर उत्तर और दक्षिण के संगीत के अंतर को हम जानते पहचानते समझते रहे हैं। लोकप्रिय संगीत के रूप में एआर रहमान हमारे पास हैं पर वे जब बॉलीवुड में होते हैं तो पूरी तरह बॉलीवुड के ही होते हैं, प्रकटतया इस प्रकार का पुल उन्होंने शायद ही बनाया हो या यह कह दिया जाए कि ऐसे पुल सायास नहीं बनते है।
ऐसा नहीं है कि इससे पहले फिल्मों में उत्तर दक्षिण के बीच पुल जैसा काम नहीं हुआ, कमला हसन की फिल्म एक दूजे के लिए आपको याद ही होगी। फिर तो ''आपडिया'' और उसके जवाब में ''जैसे सब समझ गया'' संवाद भी याद होगा! यूं सामान्यत दक्षिण भारतीय पात्र बॉलीवुड की फिल्मों में मसखरे से ही आते हुए लगते हैं।

राजनीतिक इकाई के तौर पर हम देश हैं और धीरे धीरे एक देश का भाव हम में विकसित भी हुआ है, और इसमें ऐतिहासिक रूप से भारत की विरासत का भी योगदान है कि हम देश के रूप में मानते और स्वीकार करते हैं, दक्षिण भारत सामान्यतः इडली डोसा के रूप में याद आए या हर दक्षिण भारतीय कमोबेश पहली नजर में मद्रासी लगे, यही तो सामान्यीकरण है, जो दशकों से उत्तर भारतीयों में व्याप्त है।

ये उत्तर और दक्षिण के मिलन का समय है, घोटालों के जरिए डी राजा, कनिमोझी जैसे कुछ नेता लोग उत्तर भारतीयों में जाने जाते हैं । रजनीकांत के जोक हम सब के मोबाइलों में आते-जाते हैं, सिल्क स्मिता की कहानी ''द डर्टी चिक्चर'' हमें हमारे आसपास की कहानी लग रही है, और उत्तर दक्षिण के मेल के रूप में कोलावरी का नवीन निगम का गाया वर्जन भी लोकप्रिय हो रहा है।

संदर्भ आ ही गया है तो बता दें, चेतन भगत का उपन्यास ''टू स्टेटस'' दिल्ली और तमिलनाडु के लेखक दपत्ति की कथा से प्रेरित है, चाहे उसे हम लेखकीय मानको पर खारिज ही क्यों न कर दें, इस पर विशाल भारद्वाज फिल्म भी बना रहे हैं, खुदा खैर करे!! राजस्थानी होने के नाते हम जानते हैं कि कितने ही राजस्थानी दशकों से दक्षिण में व्यवसाय कर रहे हैं, इस समय यह बढ गया है लोग नौकरी के लिए वहां जा रहे हैं... हम आपके पारिवारिक करीबी कितने ही युवा बैगलोर से लेकर चेन्नई तक हैदराबाद से लेकर दूसरे शहरों में खुशी से जीवन जी रहे हैं, सरकारी नौकरियों के अलावा ऐसा ऐच्छिक पलायन सभी संतुष्टियों नहीं तो कम से कम अधिकांश के साथ ही हो सकता है.. यह तो आप भी मानेंगे ही! हमें खुश होना चाहिए कि देश के बीच की दूरियां मल्टीपल लेवल पर कम हो रही है, समाप्त प्राय हो रही हैं, पिछली पीढी में नौकरी के नाम पर कम से कम कहा ही जाता था कि खाने से लेकर भाषा तक की दूरियां कहां जीवन को सरल सुगम होने देंगी!

भारत जैसे महादेश के लिए यह स्वाभाविक है कि हम इतने तहजीबी और भाषाई अंतरों के साथ एक ही देश में सांस लेते हैं …... विध्य के पार का भारत भी अपना ही है। आर्यो और द्रविडों का भेद अब उतना नहीं रह गया है, यह भेद अभी और कम होगा, ये संपर्क अभी और बढेगा। यकीन मानिए! आने वाले समय में बहुत प्रेम होगे और बहुत प्रेमविवाह भी, हमारे घरों में उत्तर दक्षिण का यह मेल सुबह शाम, आठो पहर महसूस होगा।

Tuesday, November 29, 2011

भला, ऐसे भी कोई जाता है !




छिन्नमस्ता नामक उपन्यास के साथ उनके पहला परिचय लेखिका के रूप में हुआ था, फिर उनकी बहुत सी कहानियां और उपन्यास पढ़े, सब हिंदी मे ही, ज्यादातर के अनुवाद पापोरी गोस्वामी के रहे है। उन्हें मैंने बताया था कि इत्तेफाक है कि हिंदी में छिन्नमस्ता जिसे प्रभा खेतान ने लिखा था, और असमी में छिन्नमस्ता लिखने वाली दोनों लेखिकाओं का स्नेहपात्र हो गया हूं तो बोलीं - किसके ज्यादा हो ? मैंने कहा -सामने कह रहा हूं पर सच है कि आप ही।


इंदिरा गोस्वामी ने कविताएं शायद ही कभी लिखी जैसे भूपेन हजारिका के लिए- ''मैं अपनी मातृभूमि की तस्वीर नहीं बना सकती तुम्हारी आवाज के बिना। ''



इंदिरा गोस्वामी यानी डॉ मामोनी रायसम गोस्वामी ऐसा नाम है जिसे भारतीय साहित्य के पाठकों के साथ उससे इतर भी बहुत बड़े वर्ग में जाना जाता रहा है, उल्फा के साथ शांति वार्ता में केंद्रीय सरकार की प्रतिनिधि के रूप में उनका नाम भारत और दुनिया भर तक पहुंचा है। उनके निधन के साथ असम से सांस्कृतिक राजदूत के तौर पर केवल कुछ दिनों के अंतराल में यह दूसरा प्रस्थान है, भूपेन हजारिका के जाने का दर्द अभी कम कहां हुआ था! एक खास बात बताएं कि इंदिरा गोस्वामी ने कविताएं शायद ही कभी लिखी जैसे भूपेन हजारिका के लिए- ''मैं अपनी मातृभूमि की तस्वीर नहीं बना सकती तुम्हारी आवाज के बिना। ''

उनसे पहली मुलाकात दिल्ली के नेहरू मैमोरियल म्यूजियम एंड लाइब्रेरी की है जो कोई दस बरस पुरानी है, जहां वे अपनी भतीजी के साथ किसी शोध सामग्री की तलाश में आ रही थीं और मैं भी। माथे पे बड़ी सी बिंदी वाला चेहरा जाना पहचाना लगा और तीसरे दिन कैंटीन में हिम्मत करके बात की, और फिर इतना स्नेह पाया कि उसके लिए मेरे पास शब्द नहीं है। उसके बाद क्योंकि तब तक वे दिल्ली विश्वविद्यालय के आधुनिक भारतीय भाषा विभाग में प्रोफेसर थी हीं, छात्रा मार्ग स्थित उनके आवास पर कई शामों को उनके सान्निध्य में यादगार बनाया, फिर जीवन ने वैसा अवसर नहीं दिया। असम और असम के साहित्य के साथ मेरा यही परिचय आज तक मेरे साथ है, उन शामों में मेरी कुछ कच्ची-सच्ची कविताओं को भी सरंक्षक भाव में हठ के साथ उनका सुनना और सराहना मुझे एक नए कवि की प्रोत्साहन के निमित्त प्रशंसा ही लगती है। फिर जब 2005 में मेरी पहली किताब यानी कविताओं का पहला संग्रह आने को हुआ, तो उन्होने स्नेह में जो लिखा उसे मैंने फ्लैप पर बड़े गर्व से अंकित किया। मैंने उनको कहा कि इतना अतिशयोक्तिपूर्ण क्यों लिखा है आपने मेरे बारे में! तो उनका जवाब था- इसे चुनौती के रूप में लो कि तुम्हें मेरे शब्दों को सच साबित करना है। और मुझे यकीन है कि कोई अतिशयोक्ति नहीं कर रही हूं। दिल्ली विवि से रिटायर हुईं तो फिर उनसे मिलना नहीं हुआ क्योंकि वे गुवाहाटी रहने लगीं।

छिन्नमस्ता नामक उपन्यास के साथ उनके पहला परिचय लेखिका के रूप में हुआ था, फिर उनकी बहुत सी कहानियां और उपन्यास पढ़े, सब हिंदी मे ही, ज्यादातर के अनुवाद पापोरी गोस्वामी के रहे है। उन्हें मैंने बताया था कि इत्तेफाक है कि हिंदी में छिन्नमस्ता जिसे प्रभा खेतान ने लिखा था, और असमी में छिन्नमस्ता लिखने वाली दोनों लेखिकाओं का स्नेहपात्र हो गया हूं तो बोलीं - किसके ज्यादा हो ? मैंने कहा -सामने कह रहा हूं पर सच है कि आप ही।

अखिल भारतीय स्तर पर लेखक के तौर पर जिनको प्रतिष्ठा मिली है, उनमें उनका नाम शामिल है, मसनल याद कीजिए अमृता प्रीतम को, महाश्वेता देवी को। भारत में ऐसी लोकप्रियता कम ही लेखकों को मिली है, यह पैन इडियन रिकग्रिशन उन्हें महत्वपूर्ण सिद्ध करता है। बहुत कम लोगों को पॄता होगा कि उन्होंने विविध भारतीय भाषओं में लिखी रामायणों की असमी में लिखी रामायण के साथ तुलना के विषय पर पीएच.डी. की थी।

इशारा भर कर देना काफी होगा कि जीवन के शुरूआती साल बहुत या कहूं कि कल्पनातीत और अविश्वसनीय रूप से कष्ट मे गुजारे पर उनसे ऊपर उठकर लगभग जैसे अल्बेयर कामू के कथन को सही साबित करते हुए कि इनसान निराशा से निकल कर फिर एक नई दुनिया का सृजन करता है। वही उनमें आध्यात्मिकता के बीज का अंकुरण भी था। असम के विख्यात संत शंकरदेव की उपासक थीं वे।

जीवन के लिए रचना और रचना के लिए जीवन के साथ दूसरों के जीवन में रचनात्मक ऊर्जा भरने का काम अद्भुत तरीके से करना उनका ऐसा गुण है जिसकी बार बार यत्र-तत्र मैंने चर्चा की है। एक सप्ताह पहले दिल्ली की यात्रा में असमी फिल्मकार दोस्त रजनी बसुमतरी ने मुझसे कहा कि वे तो मेरी मेंटर हैं, उनका मुझसे वादा किया है कि 'ठीक होकर मैं एक खास कहानी तुम्हारे लिए फिल्म के लिए लिखूंगी।' रजनी से किया उनका वादा अब अधूरा रह गया है। भारतीय साहित्य की जीवन ऊर्जा से भरपूर विरली लेखिका का जाना देश भर के लिए बड़ा सांस्कृतिक नुकसान है।

Monday, October 10, 2011

वो गंगा की नगरी, वो डिग्गियों का पानी


- एक हमशहरी

मेरी पीढी के बहुत से लोग होंगे मेरी तरह जिनके घरों में जगजीत को सुनने की जिद के कारण टू-इन-वन खरीदा गया होगा, गजल और शाइरी की ओर झुकाव पैदा किया होगा, गजल सुनने समझने और लिखने वाली एक पीढ़ी जगजीत तैयार ने की है, इससे कोई इनकार नहीं कर सकता।


जगजीत ने जग जीत लिया था, हमारे वक्त में गजलें उनसे जवान हुईं, गजल और जगजीत एक दूसरे के नाम से जाने जाते है, ये मर्तबा सदियों में किसी को हासिल होता है। उनके हमशहरी होने का कितना फख्र करता रहा हूं, यह बताना मुश्किल है, देश भर में जहां भी बैठा हूं बताते ही कि गंगानगर का हूं, जगजीत साहब के नाम से पहचाना जाता रहा हूं। बचपन से सुना कि मेरे शहर का सबसे मशहूर आदमी अगर है तो वह यही नाम था। इत्तेफाक देखिए कि उनसे अंतरंग मुलाकात भी उसी शहर की है, जहां वे बरसों बाद आए थे, कोई दसेक साल पहले, जब उस कंसर्ट को सुनने ही अपने शहर गया था, पांच सौ किमी का सफर तय करके, खयाल था कि जिंदगी कहां ले के जाएगी, पता नहीं उन्हें अपने शहर में सुनने का अवसर शायद ही कभी फिर नसीब हो, ऐसा हुआ भी। कुदरत की पटकथा ऐसी ही होती है। उन कंसर्ट में उन्होंने अपनी मशहूर गजल 'वो कागज की कश्ती' गाने के बीच मे कहा -' भुलाए नहीं भूल सकता है कोई वो गंगा की नगरी, वो डिग्गियों का पानी', तो लोगों के साथ उनकी भी आंखें नम थी अपने शहर को इस रूप में याद करते हुए।

मेरी पीढी के बहुत से लोग होंगे मेरी तरह जिनके घरों में जगजीत को सुनने की जिद के कारण टू-इन-वन खरीदा गया होगा, गजल और शाइरी की ओर झुकाव पैदा किया होगा, गजल सुनने समझने और लिखने वाली एक पीढ़ी जगजीत तैयार ने की है, इससे कोई इनकार नहीं कर सकता। जगजीत को जानने के कई नजरिए हो सकते हैं, एक घुड़दौड़ का शौकीन जगजीत थे, गंगानगर की और राजस्थान की रजवाड़ी शराब के शौकीन जगजीत थे, और बतौर गायक तो गजल,भजन, फिल्मी गीत और शास्त्रीय गायन के तमाम रूपों में उनकी याद हम सब के दिलों में पैबस्त है ही।

उन तक किसी ने पहुंचाया दिया था कि मैंने कोई अच्छा शेर कह दिया है, उसके हवाले से जयपुर में हुई आखिरी मुलाकात में बोले-' सुनाओ, तुम्हारे मुंह से सुनना है, और पूरी गजल भी दे दो, तुमसे पहली मुलाकात में कहा था कि तुम्हारी गजल गाऊँगा कभी, पर तुम्हें अपने नाम के आगे गंगानगरी लिखना होगा।' मैंने कहा- 'पा'जी शेर हाजिर है पर ऐसी गजल अभी नहीं हुई जिसे आप गाएं।' उन्होंने पंजाबी में प्यार से गाली दी, मैं मुस्कुराकर रह गया। उनके गाने लायक गजल मुझसे आज तक नहीं हुई और अब तो कभी नहीं होगी। पिछले दिनों दोस्त आशुतोष दुबे ने कहा कि जगजीत साहब पर डॉक्यूमेंट्री बना रहे हैं, उनके शहर से हो इसलिए कुछ मदद करनी होगी, जाहिर है कि मेरी ओर से मना करने का कोई कारण नहीं था, आशुतोष जगजीत के कई एलबम के वीडियो के निर्देशक रहे है।

कह देना चाहिए कि मेरे शहर का सबसे बड़ा नाम अब सिर्फ किस्सों में है, या अपनी आवाज में अमर है, कि उनके होठों से छू के अमर हो गए है जो लफ्ज, जो गजलें, जो नज्में, जो गीत।

Friday, October 7, 2011

'बिज्जी' को नोबेल ना मिलना


राजस्थान जिस वाचिक परंपरा की साहित्यिक विरासत के लिए जाना जाता है, 'बिज्जी' उसके जीवंत और स्वाभाविक प्रतिनिधि हैं। अब वैश्विक रूप से यह सिद्ध और प्रसिद्ध हो गया है कि उनकी कथाएं लोक का पुनराख्यान भर नहीं हैं, वे बिना ज्योतिषी हुए अतीत और वर्तमान के बीच पुल बनाते हुए हमें भविष्य दिखाते हैं, उस और जाने का रास्ता बताते हैं, और साथ ही हमारी वैचारिक और कथा विरासत को उस भविष्य की चुनौतियों से लडने के हथियार के तौर पर हमें सौंपते हैं।


दस साल में सातवी बार नामांकित कवि को नोबेल मिला, कोई दो राय नहीं कि वे स्वीडिश भाषा के बडे कवि हैं, और खुशी की बात यह भी है कि पोलेंड की विस्साव शिंबोस्र्का के बाद 15 साल बाद किसी कवि को नोबेल मिला है, पर हम उम्मीद में थे कि पहली बार नामांकित हमारे विजयदान देथा 'बिज्जी' को इस बार ही नोबेल मिल जाएगा, क्योंकि ऐसा कोई नियम या परंपरा नहीं है कि कोई एकाधिक बार नामांकित हो तभी उसे मिलेगा। खैर, यकीनन नोबेल के लिए नामांकित होना बडी बात है, तो हमारे गौरव का विषय भी, और बिज्जी का लेखकीय कद हमारी नजर में इससे कम भी नहीं होता कि उन्हें नोबेल नहीं मिला।

पर इस बहाने से हमें कुछ बातें करनी ही चाहिए, जो सामान्यतः या तो होती नहीं है या बहुत दबे स्वर में होती हैं। एक बडा प्यारा सा, मासूम सा तथ्य है कि पिछले दस में से सात नोबेल साहित्य पुरस्कार से सम्मानित लेखक यूरोपीय हैं। इतनी ही प्यारी सी बात यह भी है कि इस बार स्वीडन ने नोबेल अपने ही घर में रख लिया है, यानी स्वदेशी को दिया है, इससे पहले 1974 में ऐसा हुआ था, उस वक्त तो विवाद भी हुआ था क्योंकि वे दोनों लेखक उस स्वीडिश समिति के 18 सदस्यों में से थे, जो नोबेल देती है। बहरहाल, स्वीडिश समिति के बारे में अक्सर कहा जाता है कि वह बहुत आगाह रहती है कि कोई इल्जाम उनपर ना आए, शायद यही वजह थी कि स्वीडन के लोग मानने लगे थे कि टाॅमस को शायद इसीलिए नोबेल नहीं मिल रहा कि वे स्वीडन के हैं।

बिज्जी की बात करें तो पहले व्यक्तिगत होने की इजाजत लेते हुए कहूं तो भारत में जम्मू से लेकर चेन्नई और मुम्बई से लेकर बंगाल, असम सहित सुदूर इलाकों में जब भी किसी भी भारतीय भाषा के किसी भी लेखक से मिलना हुआ है, हरेक ने अलग अलग शब्दों में यही कहा - ''अच्छा राजस्थान से हो! अगली बार जब बिज्जी से मिलना हो तो तो मेरा प्रणाम जरूर कहिएगा।'' ऐसे ही एक लेखक ने कहा था- ''आपकी भाषा राजस्थानी है !'' मेरे 'जी' कहने पर वे मेरे गले लग गए - ''तो आप उसी भाषा को बोलते है, जिसमें बिज्जी लिखते हैं।'' सच कहूं तो बिज्जी के प्रति मेरा सम्मान उनके इस सम्मान से सौ गुना बढा है, बार बार छाती चैडी हुई है। जैसा कहा जाता है कि देश में बहुत लोगों ने रवींद्र बाबू की 'गीतांजलि' पढने के लिए लोगों ने बांग्ला सीखी तो जरूर एक वर्ग है जो बिज्जी को पढने को राजस्थानी सीखने की मंशा रखता है। रेगिस्तान के आखिरी कोने पर एक बरसाती नदी के इलाके में लगभग ढाई दशक पहले जहां अकेला अखबार राजस्थान पत्रिका अपने छपने के दिन बमुश्किल ही पहुंचता था, वहां बचपन गुजारते हुए लेखक के तौर पर पहला नाम जो सुना था, वह बिज्जी का ही था।

राजस्थान जिस वाचिक परंपरा की साहित्यिक विरासत के लिए जाना जाता है, बिज्जी उसके जीवंत और स्वाभाविक प्रतिनिधि हैं। अब वैश्विक रूप से यह सिद्ध और प्रसिद्ध हो गया है कि उनकी कथाएं लोक का पुनराख्यान भर नहीं हैं, वे बिना ज्योतिषी हुए अतीत और वर्तमान के बीच पुल बनाते हुए हमें भविष्य दिखाते हैं, उस और जाने का रास्ता बताते हैं, और साथ ही हमारी वैचारिक और कथा विरासत को उस भविष्य की चुनौतियों से लडने के हथियार के तौर पर हमें सौंपते हैं। यह भी बहुत अस्वाभाविक नहीं है कि कोई उन्हें बातां री फुलवारी के कारण प्यार करता है कोई सपनप्रिया या महामिलन के लिए, कोई चैधरण की चतुराई के कारण, कोई उनकी कहानियों पर हबीब तनवीर के किए नाटकों के कारण, कोई मणिकौल और अमोल पालेकर की बनाई फिल्मों के कारण। कई अकादमिक लोग उन्हें हिंदी राजस्थानी कहावत कोश के कारण बहुत इज्जत से देखते हैं, तो बहुत से लोगकोमल कोठारी के साथ रूपायन में किए अतुलनीय लोक विरासत सहेजने के काम के लिए। मुझे एक लेखक के तौर पर कहना और मानना चाहिए कि मुझ जैसे बहुतेरे लेखकों को उनकी भाषा और कथा शिल्प ईष्र्या और प्रेरणा दोनों देते हैं, फिर मैं तो कम से कम उन्हें अपनी शानदार विरासत के रूप में ग्रहण करते हुए नतमस्तक हो जाता हूं।

पर क्या इसे दुर्योग नही कहना चाहिए कि वे उस भाषा के कथाकार हैं जिसे संवैधानिक मान्यता नहीं है, बहुत संभव है कि इसीलिए उन्हें भारत का सर्वोच्च साहित्यिक सम्मान माना जाने वाला ज्ञानपीठ नहीं मिला है, पर वे इसके बावजूद देश के चोटी के साहित्यकारों में गिने जाते रहे हैं। उनका काम हाल ही के सालों में कायदे से अंग्रेजी में अनुवाद हुआ है, कथा और पेंगुइन से प्रकाशित हुआ है, मिशिगन विवि में दक्षिण एशिया अध्ययन विभाग की क्रिस्टी मेरिल के अनुवाद को ही माना जा रहा है कि बिज्जी को नोबेल के नामांकन तक पहुंचाया है। इस अनुवाद के काम में कैलाश कबीर उनके साथी रहे हैं। हालांकि यह तय बात है कि कोई पुरस्कार किसी के काम और अहमियत का पैमाना नहीं होता पर जब ऐसा कोई बडा इनाम किसी को मिलता है तो इनाम और उस व्यक्ति दोनों की गरिमा में इजाफा जरूर होता है, उस व्यक्ति के काम को और ज्यादा लोगों तक पहुंचने का बहाना और जरिया मिलता है, और हस्बेमामूल यहां अनुवाद की अहमियत फिर से साबित होती है, जिसे प्रायः हमारे लेखक हीन भाव से देखते हैं, जबकि परस्पर अनुवाद की खिडकियां खुली सांस के लिए हवाओं की तरह हैं। क्या हमें भूल जाना चाहिए कि अमता प्रीतम हिंदी और पंजाबी दोनों में उनती ही बराबर मुहब्बत से पढी और सराही गई हैं और उनका अदबी कद इसी वज्ह से अखिल भारतीय स्तर का बना है।

बिज्जी को नोबेल साहित्य ना मिलने से बिज्जी निराश नहीं हुए, दुखी भी नहीं हुए, हमें यानी विशेषकर राजस्थान और वैसे पूरे भारत के लोगों, दुनिया भर में फैले उनके पाठकों, प्रशंसकों को दुख जरूर हुआ, पर हम नाउम्मीद नहीं है ना ही इससे उनके कद और उनके प्रति हमारी नजर में सम्मान में कोई कमी ही आई है, उनका लिखा जब जब भी पढते हैं, पढंेगे, उनके प्रति सम्मान बढता जाता है, दुआ कीजिए कि वे स्वस्थ हो जाएं, दो सप्ताह पहले फोन पर उनसे बात हुई थी, उन्हें सुनने बोलने में हो रही तकलीफ साफ महसूस हो रही थी, इस नामांकन की खबर के साथ कितने हमपेशा दोस्तों ने उन्हें फोन किया, मेरी हिम्मत नहीं हुई कि उन्हें तकलीफ दूं, मिलकर दुआ करें कि वे मन का पढ-लिख पाएं, क्योंकि लेखक की सबसे बडी यातना ना लिख पाना होता है, और यह यातना वे झेल रहे हैं। संभव है उन्हें अगले किसी साल में नोबेल साहित्य मिल जाए, या अन्य कोई भारतीय लेखक ले आए, राजस्थानी को आठवीं अनुसूची में शामिल कर लिया जाए, पर इसमें किसी को भी संदेह नहीं हो सकता, और ना ही होना चाहिए कि बिज्जी भारतीय साहित्य में अपनी तरह के विरले और अदभुत लेखक हैं, नामुमकिन नहीं तो बेहद मुश्किल जरूर।

Tuesday, September 6, 2011

जगमोहन ने जिंदगी का साथ निभाया पर जिंदगी ने ?



जगमोहन मूंदडा 62 के थे उनके गुजरने की खबर नाकाबिलेयकीन थी, अभी उम्र ही नहीं थी और ऐसी कोई बीमारी भी नहीं थी, वे यूं शराबी भी नहीं थे, कई सालों से उनके मोबाइल पर एक ही हैलो टयून थी- ''हर फिक्र को धुंए में उडाता चला गया मैं जिंदगी का साथ निभाता चला गया'' उन्होनें जिंदगी का साथ भरपूर निभाया पर कम्बख्त जिंदगी ही बेवफा निकली...

उनसे किया एक पुराना साक्षात्कार बांट रहा हूं(उन्हें यही मेरी श्रद्धांजलि है) जिसमें उन्होंने अपनी जिंदगी के वरक खोलके मेरे सामने रख दिए थे
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खुशी की खोज नहीं करता, खोज में खुशी मिलती है - जगमोहन मूंदड़ा


बचपन और पढ़ाई
मेरा बचपन कलकत्ते में बीता। वहां बड़ा बाजार के ाालिस मारवाड़ी माहौल में। पहले मां और पिताजी वहीं रहते थे पर बाद में वे उस वक्त की बंबई और आज की मुंबई चले गए तो मैं अपने बड़े भाई के साथ दादा दादी के पास रहा। हम जिस बिल्डिंग में रहते थे, वहां निजी बाथरूम जैसी चीज नहीं थी,वो मुबई की चॉल जैसी जगह थी। वहां म्यूनिसिपल नल से पानी आता था हमारे नहाने और पीने के लिए। हमारे घर में कार नहीं थी, हम पब्लिक परिवहन ही इस्तेमाल करते थे हमारे रिश्तेदार पैसेवाले थे, इनकी जिंदगी देखते थे। पर हमें सिखाया गया था कि किसी से मांगना नहीं है, ईष्र्या नहीं करनी है। हमें फिल्म देखना मना था, दादी साल में एक बार कोई फिल्म दिखाती थीं। घर में कैरम खेलते थे, पर हमें जिंदगी में किफायत का पाठ पढ़ा दिया गया और पर वो वंचित किस्म के नहीं, बहुत खुशनुमा बचपन के दिन थे क्योकि हमारी जरूरतें सीमित थीं। हम खुश थे पर महत्वाकांक्षाएं तो थीं।
मारवाड़ी इलाके के सबसे बेहतरीन हिंदी स्कूल में पढ़े थे हम, फिर नवीं क्लास से अंग्रेजी मीडियम में आए। मेरे दादाजी ने बचपन से एक बात मन में डाल दी कि जिंदगी में पढ़ाई बहुत जरूरी है। इसका नतीजा था कि हम दोनों भाईयों ने पढ़ाई पर ध्यान दिया। मैं हमेशा अपनी क्लास और स्कूल में अव्वल आता था। हायर सैकण्डरी में पूरे पं.बंगाल की मेरिट में मेरा नवां स्थान था, गणित में सबसे ज्यादा नंबर आए। हमारे पिताजी चाहते थे हम दोनों भाई आईआईटी में जाएं, भाई एक साल आगे थे तो पहले परीक्षा पास करके आईआईटी मुंबई पहुचे। पहले हम लोग छुट्टियों में ननिहाल नागपुर जाते थे फिर मां पिताजी के पास तत्कालीन बंबई जाने लगे। और अगले साल मैं भी परीक्षा पास करके आईआईटी मुंबई पहुंच गया। कम से कम उम्र से भी छोटा था तो एफिडेविड देकर उम्र बढवाकर दाािला लिया, क्लास में सबसे कम उम्र का था मैं। आईआईटी में सोशल एक्सपेंशन हुआ। मिलना जुलना हुआ। अमेरिका में और ज्यादा हुआ। वैसे मुझे लगता है कि अभाव में कल्पना बहुत व्यापक होती है,इसी मेरे कल्पना के संसार में एहसास हुआ कि फेंटेसी तो होनी ही चाहिए। पर मानसिक तस्वीर साफ होनी चाहिए। फिर तेईस साल की उम्र आते आते अमेरिका से दो मास्टर्स डिग्री और पच्चीस साल की उम्र में पीएचडी कर चुका था।

पहला क्रश, प्रेम और विवाह
मेरा पहला क्रश कलकत्ता में मेरी एक बंगाली स्कूल टीचर के लिए था। उस वक्त 10-11 साल का रहा होउंगा, वैसे उस वक्त केवल घर की महिलाओं को ही जानते थे जो सब उम्र में बड़ी थीं। इस समय सामाजिक विस्तार के अवसर नहीं थे ,पैसे भी नहीं थे तो डेटिंग जैसा कुछ नहीं था। दूर के कजिंस से ही संपर्क होता था। दसवीं ग्यारहवीं क्लास की छुट्टियों में मुंबई आना होता था, तब पिताजी के मित्र की एक लड़की से मिलना होता था जो मुझे अंकल कहकर पुकारती थी, मेरी छोटी बहन की दोस्त थी, जब 1973 में अमेरिका गया वो बारह साल की थी और मैं उन्नीस-बीस का। उसके पिताजी को तब से लेकर आज तक काको जी ही कहता हूं। सब कजंस के साथ बॉबे की इस कॉनवैंट पढ़ी लड़की के लिए भी अमेरिका से चॉकलेट्स लाता था,जब भाई की शादी में आया तो देखा कि उसने अंकल कहना बंद कर दिया है, पता चला कि परिवार में साजिश,षड्यंत्र,सांठ-गांठ हो चुकी है और इस तरह छब्बीस जनवरी 1974 को हमारी शादी हो गई।

आईआईटियन बना फिल्ममेकर
मेरा मानना है कि हर इनसान को मन का काम करना चाहिए, दृष्टि में स्पष्टता हो तो देर सबेर हम वहां जरूर पहुचते हैं, मेरे दादा कहते थे कि जिंदगी में इनसान कहीं भी पहुंच सकता है और ये तालीम से संभव होता है। छुटपन में लगा ही नहीं कि फिल्म डायरेक्टर भी हो सकता हूं। 12 साल की उम्र में 'कागज के फूलÓ छुप के देखी और फिल्म की बीमारी लग गई। मन में इच्छा तो हुई पर किसी को बोला नहीं। स्कॉलरशिप से आईआईटी और अमेरिका में पढ़ाई की तो स्वतंत्र और आत्मनिर्भर होने का बोध था। पीएचडी करने के बाद कैलिफोर्निया स्टेट यूनिवर्सिटी में पढाना शुरू कर दिया जहां हते में 12 घंटे पढ़ाना होता था। लगा कि फिल्म बनाना सीखना चाहिए और 12 घंटे पढ़ाने के अलावा यूनिवर्सिटी के सिनेमा डिपार्टमेंट के सहकर्मियों से फिल्म मेकिंग सीखना शुरू कर दिया। फिर एक दिन लगा अब फिल्म बनानी चाहिए और काम के लिए लॉस एंजेलिस के स्टुडियो जा पहुंचा। पर मुझे ब्रेक नहीं मिला। अजीब सा जवाब मिला -'पीएचडी हो हमारी रिसर्च यूनिट से जुड़ जाओÓ या 'हिंदुस्तानी होकर अंग्रेजी फिल्म बनाओगे!Ó यूनिवर्सिटी की बेहतरीन नौकरी के बावजूद मेरे भीतर कुंठा सी थी। इस बीच पत्नी ने वहां से बैचलर, मास्टर्स किया। 1980 में बेटी स्मृति पैदा हुई और मैंने नौकरी छोड़ के 'सुरागÓ फिल्म शुरू कर दी-शबाना आजमी और संजीव कुमार के साथ। इसकी रिलीज पर 1982 में भारत आए फिर 'कमलाÓ शुरू की-दीप्ति नवल, शबाना और मार्क जुबेर आदि के साथ। फिल्म सेंसर ने रोक दी, इससे बड़ा आर्थिक झटका लगा था। 1983 में रिलीज के बाद वापिस अमेरिका चले गए। मैंने फिर से पढ़ाना शुरू कर दिया। फिर अमेरिका में फिल्म तकनीक बदली, वीडियोज की डिमांड पैदा हुई, सस्ती फिल्में बनानी थीं, कई स्वतंत्र निर्माता जुड़े, दो हिंदी फिल्मों के अनुभव के आधार पर अंग्रेजी फिल्में मिलनी शुरू हो गईं। अशोक अमृतराज की कंपनी के लिए एक मिलियन डॉलर में बनाई फिल्म 'नाइट आइजÓ ने तीस मिलियन से ज्यादा कमाए। और फिर पंद्रह सालों में हर साल लगभग दो फिल्में बनाईं,अमेरिका में अपना घर खरीदा, बेटी की पढाई हुई। बीच में हिंदी की एक फिल्म पूजा बेदी को लेकर बनाई विषकन्या, उसका अनुभव अच्छा नहीं रहा तो हिंदी फिल्मों का विचार ही छोड़ दिया।
1999 में राजस्थान आया, फिल्म 'थर्ड आईÓ के लिए शूटिंग लोकेशन देखने-खोजने। हालांकि मेरे पुरखे राजस्थान से ही कोलकाता गए थे पर मैं इससे पहले राजस्थान नहीं आया था,उन दिनों अखबार में खबर पढ़ी-भंवरी देवी के बलात्कार की। मैं विषय की संवेदना से जुड़ा, अपनी जड़ों से जुड़ा, बेटी बड़ी हो गई थी, मेरे विचार भी बदल गए थे और भारतीय मीडिया में जो मेरी सॉफ्ट पोर्नफिल्ममेकर की बेबुनियाद छवि थी, उसे तोडऩे के बेहतरीन अवसर के तौर पर मैंने 'थर्ड आईÓ के लिए मना करते हुए 'बवंडरÓ के लिए खुद पैसा जुटाया, जोखिम लिया, फिल्म बनाई और फिल्म दुनिया के 35 फेस्टिवल्स में दिखाई गई।

मेरा सिनेमा
मैं खुद को स्टोरी टेलर मानता हूं, ये मेरा पैशन है, मुझे फिल्में बनाने में मज़ा आता है और किसे भी माध्यम की बजाय इसमें सहज महसूस करता हूं। कई लोगों ने मेरी फिल्मों की आलोचना की उन्हें पसंद नहीं किया खालिद मोहम्मद ने 'कमलाÓ की उस साल की दस बुरी फिल्मों में गिना, फिर हमने उनकी बनायी फिल्में भी देखी। अब लोगों के ओपिनियन से जिन्दगी तय नहीं करता हूं और अपनी कमियों को अपने अन्दर स्वीकारते हुए सुधारता हूं और ऐसा ही करना चाहिए
फिल्मों को मैं टाइम पास नहीं मानता हूं, इनसे टाइम पास होता है ये सच है एक फिल्ममेकर के तौर पर मैं दर्शकों को टाइम पास के साथ सोचने का अवसर देना चाहता हूं और मेरे लिए मनोरंजन का मतलब है - दर्शकों का कहानी में शामिल हो जाना डूबना। मेरा ये भी मानना है कि केवल इंटेंशन से ही अच्छी फिल्म नहीं बनती, दर्शकों को कहानी के साथ एंगेज करना ज़रूरी निर्देशकीय खूबी मानता हूं । मेरी पसंद होती है मजबूत कथानक जिसमें से दर्शक को कुछ हासिल हो ऐसा सीखने को मिले जो पहले से पता न हो।

खाली वक्त में
फुरसत में पढता हूं। साहस पूर्ण कहानियां तो बचपन से पढता रहा हूं। वाइल्ड लाईफ के बारे में पढना पसंद रहा है, रोमांटिक किताबें भी पढता हूं । इन दिनों अनिता जैन की 'मेरिंग अनीताÓ और अद्वैत काला की 'अलमोस्ट सिंगलÓ पढ़ रहा हूं। इधर कुछ सालों से भारतीय ही अधिक पढ़ रहा हूं वैसे नॉन फिक्शन, फिल्म क्राफ्ट, जीवनियां आदि पसंद करता हूं । देव आनंद साहब की जीवनी अभी लाया हूं। इसके अलावा खाली वक्त में सुडोकू खेलता हूं । दोस्तों के बीच बैठता हूं, संगीत सुनता हूं, फिल्में देखता हूं, मारवाड़ी खाना बहुत पसंद है, घूमना बहुत पसंद है।

जिंदगी का फलसफा
जिन्दगी के हर पल को जीना ज़रूरी मानता हूं, छोटी छोटी खुशियों को सहेजता हूं .. जिन्दगी में बहुत आशावादी हूं। मुझे लगता है कि मज़ा सफऱ में है मंजिल में नहीं ..सफऱ का अंत तो सबका एक ही है । इसीलिए स्वर्ग नरक को मैं महत्वपूर्ण नहीं मानता हूं। एक चीनी कहावत जर्नी इज रिवार्ड कभी नहीं भूलता हूं। आज के हरेक पल को सकारात्मकता, अपने काम, व्यवहार, खुशी से जीना ही मेरे लिए सबसे अहम् है।
हर इंसान की तरह मेरी जिन्दगी में अच्छे बुरे दिन आये हैं, अच्छे दिनों में खुशी के पलों में बहुत्त सारे हैं जैसे मेरा आईआईटी में चयन, बेटी का जन्म, पहली फिल्म का मुहूर्त और रिलीज आदि। बुरे क्षणों में कमला का सेंसर में रुक जाना, एक साल की लड़ाई, प्रोवोक्ड को किसी राष्ट्रीय पुरस्कार और चैनल आदि के अवार्ड के लिए नोमिनेशन तक न मिलना, बवंडर को देश के बाहर बहुत अवार्ड मिले पर भारत में कोई नहीं मिला, भारत में अब तक कोई ब्लॉकबस्टर नहीं दे पाया
पर निराशा के क्षणों में कम भाग्य वाले लोगों को देखता हूं। मेरे संस्कार ऐसे हैं कि जो अपने पास है उसकी अहमियत समझो। मैं खुशी की खोज नहीं, खोज में खुशी प्राप्त करता हूं, बचपन में सुना गाना आज भी मुझे ताकत देता है और मुश्किल वक्त में रास्ता दिखाता है -' मैं जिन्दगी का साथ निभाता चला गया।'

Friday, August 12, 2011

ठेस और ठोस के बीच




फिल्म से मेरी भी असहमतियां हैं पर वे असहमतियां यह इजाजत मुझे नहीं देती कि कहूं भई फिल्म नहीं चलनी चाहिए। दूसरे, यह कोई महान फिल्म नहीं है, एक व्यवसायिक फिल्म है, कभी मेरे प्रिय निर्देशक रहे प्रकाश झा की परंपरा की भी नहीं है, कह देना चाहिए कि मैं उनसे निराश हुआ हूं, पर इस निराशा में भी उनकी फिल्म के प्रदर्शन को रोकने का पक्षधर नहीं हो सकता



पहले संक्षेप में घटनाक्रम बता दें, फिल्म के रिलीज होते होते तीन राज्य आंध्र पदेश, उत्तरप्रदेश और पंजाब 'आरक्षण' के प्रदर्शन पर प्रतिबंध लगा चुके हैं, राजस्थान में आरक्षण के लिए संघर्षरत राजपूत करणी सेना और राजस्थान सर्वब्राहमण महासभा के पदाधिकारियों का विरोध कुछ संवाद हटाकर समाप्त किया गया है और प्रकाश झा कुछ और दृश्यों को हटाने को राजी हो गए हैं, पर इधर उधर विरोध जारी है और प्रकाश झा अपने पक्ष के लिए सुप्रीम कोर्ट जा रहे हैं।

इस फिल्म को देखने के बाद मेरा यह कहना वाजिब मान लिया जाना चाहिए कि फिल्म आरक्षण को लेकर बहस छेडती है। वैसे तो, आरक्षण का मुददा ही अपने आप में इतना संवेदनशील है कि कुछ भी कहना विवाद को विषय बन सकता है, चाहे पक्ष में होइए, विपक्ष में या चुप रहिए तो भी। फिल्म में आरक्षण से जुडे सभी पहलूओं को गोया इस तरह से छू लिया गया है कि फिल्म किसी एक पक्ष को तो कतई संतुष्ट नहीं करती है..और सभी पक्ष क्या करें। इसमें प्रकाश झा की चालाकी और समझ को सलाम करना चाहिए या दूसरे शब्दों में कहें तो व्यवसायिक जरूरतों के बरक्स प्रकाश झा मजबूर थे कि इस संवेदनशील विषय पर ऐसी ही फिल्म बना पाते और धीरे-धीरे चतुराई से फिल्म को आरक्षण से हटाकर शिक्षा व्यवस्था पर चोट करती सवाल खडे करती फिल्म के रूप में याद करने लायक ही बनाते। फिल्म का मीडियम यही इजाजत देता है, ऐसा कहना शायद जल्दबाजी होगी हो, पर माफ कीजिए, यह बेशक कहा जा सकता है कि व्यवसायिक सिनेमा इसी की इजाजत देता है, किसी हद तक यह कहना ठीक हो सकता है। वैसे हमारे लोकतंत्र का बडा सच यह है कि जब कोई मसला राजनीतिक रंग अख्तियार कर ले तो इस बात की गुजाइश क्या बहुत कम नहीं हो जाती कि उसका समाधान कम वक्त में निकल जाए... ऐसा सोचना खाम खयाली भी माना जा सकता है।  यही बात आरक्षण को लेकर भी है अब जब कि प्रायः लोग मान चुके हैं कि आरक्षण सामाजिक न्याय की जरूरत है और चाहे कुछ तबकों के बेमन से ही सही इसे व्यवस्था में लागू करना तो भारतीय समाज से बढकर अब भारतीय राजनीति की बडी अपरिहार्यता है।

थोडा व्यक्तिगत होने की मोहलत लेते हुए कहूं कि मैं उस पीढी में हूं जिसने मंडल के बाद देश को बदलते और खुद को उस  बदलाव का हिस्सा बनते हुए देखा है, यह समय के साथ देखा है कि जो तबके विरोध में थे वे भी उसी पंक्ति में आकर खडे हो गए हैं  बेशक इनमें भी कुछ लोग हैं जो आर्थिक आधार पर सरकारी सुविधाओं के हकदार हैं, और बहुत हद तक शायद आरक्षण के भी।

वापिस फिल्म पर लौटें तो कहना चाहिए कि सिनेमा कथा कहने का जीवंत विजुअल माध्यम है यानी फिक्शन का । और उसे समस्त कला माध्यमों से विकसित और उन्नत कला माध्यम माना जाता है क्योंकि उसमें पेंटिंग,  साहित्य- (कहानी और कविता दोनों),  संगीत, फोटोग्राफी आदि का समावेश है। फीचर फिल्में जैसा हम सब जानते हैं कथा फिल्में होती हैं कथा में सच कितना हो यह बहस का विषय हो सकता है । वैसे भी भारत में कितने निर्देशक रियलीस्टिक सिनेमा बनाते हैं, उसमें भी राजनीतिक सिनेमा तो और भी कम। यही वजह है कि भरत में बायोपिक सिनेमा नहीं बनता है मुददों पर ही फिल्म नहीं बना सकते तो व्यक्तियों पर कैसे बना के दिखा पाएंगें... शायद यही वजहें है कि बवंडर बनाने वाले फिल्मकार दोस्त जगमोहन मूंदडा की एक राजनीतिक फिल्म रिलीज के इंतजार में हैं ...देखना होगा कि संजय पूरणसिंह चौहान जिन्होनें पिछले दिनों संजय गांधी पर फिल्म बनाने की घोषणा की है बना के प्रदर्शित कर पाते हैं कि नहीं। बहरहाल, यहां हमें प्रकाश झा को सलाम करना चाहिए उनके साहस के लिए कि वे राजनीतिक सिनेमा बना रहे हैं और लोगों तक पहुचाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं, आप उनसे सहमत है कि असहमत हैं यह बाद की बात है।

सवर्ण पात्र की आर्थिक हालत दिखाते हुए सहानुभूति पैदा करना फिल्म का वह प्रसंग है जो सवर्ण आरक्षण की मांग का परोक्ष समर्थन करता लगता है। दलित नायक सैफ के तर्क पूरी फिल्म की वह थिसिस है जो सवर्ण पात्र की पूरक थिसिस के साथ मिलकर एक मुकम्मल तस्वीर बनाते हैं। यह भी कहना जरूरी लगता है कि अमिताभ की स्थिति तो पक्ष विपक्ष के बीच फंसी सरकार की सी दिखाकर निर्देशक फेंटेसी में जैसे कई सच परोक्ष में जाहिर कर देना चाहता है।

इस लिहाज से सवाल अभिव्यक्ति का भी है पर उसका अपवाद किसी को ठेस पहुचाने की आजादी कतई नहीं होता है, इस लिहाज से मुझे नहीं लगता कि प्रकाश  झा किसी को ठेस पहुचाने का काम कर रहे हैं, राजनीतिक हितों को ठेस पहुचती है तो वह तो साहेब अभिव्यक्ति के दायरे से बाहर की बात ही कही जाएगी ना! फिल्म से मेरी भी असहमतियां हैं पर वे असहमतियां यह इजाजत मुझे नहीं देती कि कहूं भई फिल्म नहीं चलनी चाहिए।  दूसरे, यह कोई महान फिल्म नहीं है, एक व्यवसायिक फिल्म है, कभी मेरे प्रिय निर्देशक रहे प्रकाश झा की परंपरा की भी नहीं है, कह देना चाहिए कि मैं उनसे निराश हुआ हूं, पर इस निराशा में भी उनकी फिल्म के प्रदर्शन को रोकने का पक्षधर नहीं हो सकता।

आपको याद ही होगा कि हाल ही में हरियाणा व उत्तर प्रदेश के पश्चिमी भाग में 'खाप' फ़िल्म पर प्रतिबंध लगाने की मांग की गई थी और कई सिनेमा हॉल वालों ने उनके दबाव में आकर यह फ़िल्म अपने यहाँ नहीं लगाई थी। इससे पहले मधुर भंडारकर की 'ट्रैफिक सिग्नल' को हिमाचल प्रदेश में, आमिर खान की 'फ़ना' और राहुल ढोलकिया की फ़िल्म 'परज़ानिया' को तो गुजरात में प्रदेश सरकारों ने प्रतिबंधित कर ही दिया था। वैसे सोचने की बात तो यह भी है कि किताबों, चित्रों, फिल्मों पर प्रतिबंध की परंपरा से ज्यादा जरूरी क्या बहस की परंपरा नहीं होती! दरअसल हम लोग यह मान लेते हैं कि जिसके साथ खडे नहीं हो सकते, उसे जीने का अधिकार तक नहीं है, उसके साथ जीना तो मासूम सा ख्वाब है। यहां सवाल खडा हो जाता है कि तो हम विरोधियों को दुश्मन कब तक मानते रहेगे! इतना ही नहीं यह सवाल भी खडा होता ही है कि क्या हमें नहीं मान लेना चाहिए कि सेंसर बोर्ड के बेमानी होते देखने का दौर है ये ! ''आरक्षण'' चल पाती है या नहीं पर फिलहाल इतना तय है कि सेंसर का होना और चलना संदेह के घेरे में आ गया है।

Thursday, July 21, 2011

सियाह से सफ़ेद हो गयी ज़िन्दगी


हमारे समय के मशहूरोमारूफ फिल्मी गीतकार और इल्मी शाइर इरशाद कामिल से हम रूबरू हुए तो उन्होंने दिल से जो कहा, आपके सामने हाजिर है....



अपने बचपन के बारे में बताइए .

बचपन, पंजाब के एक कसबे मलेरकोटला में, दिहाड़ीदार मजदूरों के बच्चों के साथ बीता. उन्ही के साथ मिटटी भी खाई और मार भी, गुल्ली डंडे से लेकर गली क्रिकेट तक खेला. उनमें और मुझमें सिर्फ इतना सा अंतर था कि वो हर सुबह काम पे जाते थे और मैं स्कूल. उस समय यकीनन मुझे अपना काम स्कूल जाना उनसे कहीं ज़्यादा मुश्किल लगता था.


शाइराना तरबियत कैसे हुई ?


मेरा भाई जावेद जो मुझसे ५ साल बड़ा है और उससे भी ३ साल बड़ा भाई जब नए नए जवानी में कदम रख रहे थे तो अचानक उनका रुझान रूमानी शायरी की तरफ होने लगा. हालाँकि मेरे सबसे बड़े भाई सलीम को बाकायदा गीत और फ़िल्मी किस्म की कहाह्नियाँ लिखने का शौक़ था क्योंकि वो फिल्म जगत में आना चाहता था लेकिन घरेलु जिम्मेदारियों के कारण और पिता जी का सहयोग न मिलने के कारण वो आ नहीं पाया. जवान होते भाइयों के रूमानी शायरी के शौक़ ने मुझे शायरी जैसी चीज़ के प्रति थोडा उत्सुक कर दिया. उनका शौक़ तो आल इंडिया रेडियो पर 'आबशार' प्रोग्राम सुनकर ख़त्म हो गया लेकिन मुझे ये लत लग गयी.



शाइर पहले खबरनवीस हुआ और फिर फिल्मी गीतकार ये सफर कैसे मुमकिन हुआ? कब लगने लगा कि आप फिल्मी गीत लिखने के लिए पैदा हुए हैं ?


मुझे बहुत पहले एहसास हो गया था कि घडी के काँटों से बंधी ज़िन्दगी मेरे लिए नहीं है. मतलब किसी दफ्तर में ९ से ५ तक बध पाना मेरी फितरत में नहीं. इसलिए खबरनवीसी पकड़ ली क्योंकि इस काम में सारा दिन दफ्तर में नहीं बैठना पड़ता, पत्रकारिता का डिप्लोमा मेरे पास था ही. उसके अलावा समाज भी पत्रकारों को थोडा भय से देखता था/है. सारा दिन अपनी खटारा मोटर सायकल पर सड़कों से दोस्ती और शाम को एक डबल कालम रिपोर्ट, बस यही थी ज़िन्दगी. लेकिन इसके साथ साथ जो चीज़ मेरे हमकदम थी वो थी मेरी कलम जो उन दिनों बहुत कवितायेँ लिखती थी. और कभी कभार एल्बम के लिए १००-२०० में कोई गीत भी लिख दिया करती थी. हालांकि मैं अपने आप को न कभी गीतकार लगा हूँ, न कहानीकार, न नाटककार सिर्फ कलमकार लगा हूँ जो ये सभी कुछ बहुत आसानी से लिख सकता है. जो उन विधाओं में भी लिख सकता है जिनको अभी कोई नाम नहीं दिया गया.



पहली फिल्म कैसे मिली जिसके गाने आपने लिखे ? इस सफर की शुरूआत में बहुत मुश्किलें पेश आई होगी!


किसी दोस्त ने जोर डालकर संगीतकार सन्देश शांडिल्य के पास भेज दिया था, हालांकि किसी के पास काम मांगने जाना या काम करने के बाद पैसे के तकाज़े के लिए जाना मुझे कभी अच्छा नहीं लगा. उस दोस्त ने काम मांगने नहीं सिर्फ मिलने भेजा था. मैं सन्देश से मिला, सन्देश ने पूछा क्या करते हो? मैंने कहा लिखता हूँ. उसने पूछा क्या लिखते हो? मैंने कहा सब कुछ लिखता हूँ. उसने पूछा गीत लिखते हो? मैंने कहा गीत अगर कोई कहे तो वैसे ज़्यादातर ग़ज़ल लिखता हूँ. उसने कहा कुछ सुनाओ. सन्देश का इतना कहना था कि मैंने एक के बाद एक उसे अपनी २०-२५ ग़ज़लें सुना दीं. सन्देश शायद काफी प्रभावित हो गया था इसीलिए शायद उसने मुझे इम्तिआज़ अली से मिलवा दिया जो उस समय 'सोचा न था' बना रहा था. मैं और इम्तिआज़ जब मिले तो लगा ही नहीं कि हम पहली बार मिल रहे हैं. 'सोचा न था' कि मेरी पहली फिल्म मुझे इतनी आसानी से मिल जाएगी.


जिंदगी कितनी बदली फिल्मी गीतकार होने के बाद ?


सियाह से सफ़ेद हो गयी ज़िन्दगी, आम रिसाले से पुराण-वेद हो गयी ज़िन्दगी, खुली किताब से छुपा हुआ भेद हो गयी ज़िन्दगी, बहुत सी ख़ुशी और थोडा खेद हो गयी ज़िन्दगी...क्योंकि ज़िन्दगी के साथ थोडा खेद थोडा अफ़सोस थोडा गिला हमेशा रहता है इंसान को.



पंजाबी, हिंदी, उर्दू और अंग्रेजी जुबानों का इस्तेमाल रामकथानुमा गीत.. इतनी विविधता को कैसे साध लिया आपने ?

पंजाबी मेरी माँ बोली है, हिंदी स्कूल, कालेज, यूनीवर्सिटी में पी एच डी तक पढ़ी है, उर्दू मेरी दीनी जुबान है और अंग्रेजी आज के समाज में रहने की मजबूरी ने सिखा दी. हिंदी साहित्य पढने के कारण या यूँ कहिये तुलसी, सूरदास, मीरा, कबीर और छायाबाद ने सब कुछ आसन कर दिया मेरे लिए.



दूसरों के लिखे ऐसे गीत जिनको सुनकर लगता हो कि काश मैंने लिखा होता ?

वो सभी गीत जो अच्छे है और दूसरों ने लिखे हैं काश उन्हें मैंने लिखा होता.



अब इस गीतकार की दिनचर्या क्या रहती है?

सुबह मर्ज़ी से उठना, फिर बहुत देर चुपचाप बैठे रहना, फिर तैयार होकर मीटिंग्स और सिटिंग्स के लिए निकल जाना, रात को देर तक कभी काम होने के कारण और कभी नाकाम होने के कारण जागना, शब्दों और विचारों के जंगल में भटकना, कुछ लिखने की कोशिश करना फिर इस अफ़सोस के साथ सो जाना कि आज कुछ अच्छा नहीं लिख पाया और अगली सुबह फिर इस उम्मीद से जागना कि आज ज़रूर कुछ अच्छा लिखूंगा.



पुराने दोस्तों से राब्ता कायम है अभी ?

पुराने "सच के" सभी दोस्तों से वैसा ही राबता बरकरार है. न वो बदले हैं न मैं ही बदल पाया हूँ. न वो अपने पुरानेपन से बाज़ आते हैं न मैं.



अदबी शाइरी से रिश्ता बना हुआ है क्या अभी भी? उम्मीद करें कि शाइर इरशाद कामिल का कोई शेरी मजमुआ मंजरेआम पर आने वाला है ?

फ़िल्मी शायरी के साथ इल्मी शायरी बाकायदगी से जिंदा है. उर्दू मुशायरों में अक्सर शिरकत करता हूँ दो हफ्ता पहले ही हैदराबाद गया था. हिंदी कवि सम्मलेन वाले नहीं बुलाते शायद इसलिए क्योंकि मेरी हिंदी कवितायेँ समझ आ जाती हैं लोगों को इसीलिए शायद वो उन्हें मयारी नहीं समझते.



लिखने के अलावा क्या करने की ख्वाहिशें हैं?
हज़ारों खवाहिशें ऐसी कि हर खवाहिश पे दम निकले.



दस साल बाद इरशाद कामिल को किस रूप में तसव्वुर करते हैं?
दस साल बाद अगर इरशाद कामिल रहा तो इंशा अल्लाह दस कदम आगे होगा और दस गुना बेहतर इंसान होगा.



जिंदगी को कैसे देखते हैं?

ज़िन्दगी हरहाल में खूबसूरत है अगर आपको देखना आता है.



आस्तिक हैं ? क्या कभी लगा नहीं कि ''कैसा खुदा है तू ,बस नाम का है तू'' लिखने से फतवा झेलना पड सकता है ?

बेहद आस्तिक हूँ. एक मुस्लिम जमात ने इस बात पर बवाल किया भी था. लेकिन ये वो मुस्लिम जमात थी जिसने न मुस्लिम धरम को अच्छी तरह समझा था न मेरे गीत के इस बंद को, ख़ैर जिन्हें बन्दगी समझ नहीं आई उन्हें बंद क्या समझ में आएगा. मैंने लिखा था…



माँगा जो मेरा है जाता क्या तेरा है

मैंने कौन सी तुझ से जन्नत मांग ली

कैसा खुदा है तू बस नाम का है तू

रब्बा जो तेरी इतनी सी भी न चली


यानि मैंने वो चीज़ मांगी है जो मेरी है...मतलब मोहब्बत. मैंने वो चीज़ नहीं मांगी जो तेरी है...यानि जन्नत. हर इंसान अपनी मोहब्बत का मालिक है वो किसी को दे न दे, खुदा जन्नत का मालिक है वो किसी को दे न दे. अपनी चीज़ मांगने पर भी अगर न मिले तो बन्दगी का क्या मतलब?


''मिल जा कहीं समय से परे...'' जैसा दर्शन इरशाद कामिल इक्कीसवी सदी के फिल्मी गीतों में कैसे ले आते हैं?

मुश्किल बात अगर आसान भाषा में कही जाये तो आसान हो जाती है. मेरे लिए फ़िल्मी गीत आटा हैं, आटा जो पेट भरता है. साहित्य नमक है, नमक जो स्वाद बनाता है. मैं आटे में नमक बराबर साहित्य डालता हूँ फ़िल्मी गीतों में. साहित्य में दर्शन भी है और आकर्षण भी.



कोई क्यों ना प्यार करे इस मानीखेज, फलसफे से भरपूर शाइरी करने वाले शाइर को और जो उसे फिल्मों में मुमकिन बना लेता है, कोई हल्का और चलताऊ गीत आज तक उसने नहीं दिया है ??

फिल्मों में आने के बावजूद मैं समाज के प्रति लेखक की ज़िम्मेदारी को भूल नहीं पाया. मैं सिर्फ वही काम करता हूँ जिसकी वजह से मेरी नज़र नीची न हो. चलताऊ या खोखले गीत आपको शोहरत और पैसा दिलवा सकते हैं इज्ज़त और सकून नहीं.

Tuesday, June 7, 2011

रामदेव अन्ना नहीं हैं, ना ही अब बाबा हैं !


आप में से ज्यादातर लोग मुझसे सहमत होंगे कि बाबा रामदेव संत नहीं हैं, योगाचार्य हैं, जिन्होंने भारत और दुनिया में योग को एक ब्रांड बनाया है, जाहिर है कि उन्हें बेचना आता है, किसी भी आयआयएम या हावर्ड बिजनेस स्कूल के पास आउट से ज्यादा बेहतर तरीके से



बाबा की बाबागिरी जिन बादलों से घिर गई है, शायद बाबा ने भी नहीं सोचा होगा। ऐसे कोई भी नहीं सोच सकता, बेचारे बाबा क्या सोचेंगे! एक खुद को संत कहलवाने वाला व्यक्ति देश सेवा के नाम पर राजनीति करने लगता है, और राजनीतिक साधनों का इस्तेमाल करते हुए अपनी ही राजनीतिक चाल में फंस जाता है, इसे क्या कहेंगे, संत से धोखा या कि संत की कुटिल राजनीतिक चाल का पर्दाफाश होना। खैर आप दोनों ही मान सकते हैं या जो आपका दिल करे, मान लीजिए!

पहली बात तो हमें यह देखने की जरूरत है कि बाबा अन्ना नहीं है, अन्ना का कोई प्रत्यक्ष या परोक्ष साम्राज्य नहीं है, दूसरे उनकी कोई राजनीतिक महत्वाकांक्षा नहीं है, प्रकटतया उन्हें मीडिया मोह भी नहीं है, एक करोड का पुरस्कार अस्वीकार वही कर सकते थे, बाबा नहीं, मुझे लगता है कि बाबा तो अपनी योगपीठ के लिए आने वाले दान की बछिया के दांत नहीं गिनते होगे!

आप में से ज्यादातर लोग मुझसे सहमत होंगे कि बाबा रामदेव संत नहीं हैं, योगाचार्य हैं, जिन्होंने भारत और दुनिया में योग को एक ब्रांड बनाया है, जाहिर है कि उन्हें बेचना आता है, किसी भी आयआयएम या हावर्ड बिजनेस स्कूल के पास आउट से ज्यादा बेहतर तरीके से। पर मेरी मासूम जिज्ञासा के लिए क्षमा करें कि भारतीय परंपरा के मुताबिक तप वे कैसे करते होंगे, मुझे माफ कीजिएगा, संदेह है, आत्मावलोकन और तप के बीच में ही उनके योग कैंप आ जाते होगे! स्वीकारता हूं कि योग और भारतीयता के पुनरूत्थान के लिए उनकी नायकीय छवि मेरे अंदर भी रही है, पर मुझे कहने की इजाजत दीजिए कि बाबा के चेहरे पिछले दिनों में उजागर हुए हैं, उन्होंने मुझ जैसे अनेक भारतप्रेमियों के मन में उनकी छवि को भंग नहीं तो कम से कम धूमिल जरूर किया है। भारतीयता से बढ़कर हिंदूवादी सिद्ध होते चले जाना और लोगों से मिले चंदे को चंदे के रूप में भाजपा को देने की खबरों का आना उनके कद को बौना करने के लिए काफी नहीं था क्या! अब कांग्रेस के साथ गुप्त समझौता और उसकी पोल खुलने पर चिल्लाना क्या उन बलात्कारों की दर्ज रिपोर्टों जैसा नहीं है, जिसमें आपत्तिजनक अवस्था में पकडे जाने पर जबरदस्ती का इल्जाम लगा के अपने आपको पाक साफ साबित करने की कोषिष होती है।

खैर, चाहे उनकी नीयत साफ हो, वे एक बेहतर भारत चाहते हों पर इस प्रकरण से उनकी छवि को नकारात्मक नुकसान ही हुआ है, पहले तो राजनीतिक हल्कों में यह माना गया कि गैर राजनीतिक कद्दावरों में अन्ना की छवि से खुद की छवि को कमतर होता देखते हुए इस सत्याग्रह की योजना बनी। दूसरे एक उभरते जननेता चाहे राजनेता वे ना कहलाना चाहें तो उसका यूं भागने की कोशिश करना, और मूर्खतापूर्ण बयान कि उनका एनकाउंटर करने वाली थी सरकार! जबकि लोकतंत्र का थोड़ा सा भी जानकार यह दावे के साथ कह सकता है कि बाबा रामदेव को मारकर सरकार अपनी राजनीतिक आत्महत्या का इंतजाम कभी नहीं करेगी, और अगर ऐसा होता तो उन्हें सरकारी विमान से देहरादून नहीं छोडती, बीच में बाबा गायब भी हो सकते थे। ऐसा हास्यास्पद बयान बाबा की बौद्धिक छवि का घोर अवसान प्रतीत होता है।

वैसे, मेरी एक जिज्ञासा यह भी है कि जरूरत पडने पर एक बार भगवा वेश छोडने पर क्या उन्हें बाबारूप से विचलित भी नहीं मान लेना चाहिए या फिर यह मान लिया जाए कि बाबा या फिर सामान्य स्त्री जैसा कोई वेष दोनों में उन्हें कोई अंतर नहीं दिखता, ऐसा है तो मैं भारत के सारे धर्माचार्यों, शंकराचार्यों से निवेदन करता हूं कि बाबा के वेश के प्रति उनकी प्रतिबद्धता पर भी सवाल उठने चाहिए। इसकी शुरुआत शंकराचार्य स्वरूपानंद सरस्वती ने कर दी है जिन्होंने कहा है कि बाबा का साम्राज्य 11 हजार करोड रूपए का है, बाबा रामदेव को भ्रष्टाचार को खात्मे का प्रारंभ अपने घर से करना चाहिए। स्वरूपानंद का यह कहना भी मायने रखता है कि बाबा अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षा के लिए यह सब कर रहे हैं। यहां क्या उनके कार्यकर्ताओं को उनसे नहीं पूछना चाहिए कि बाबा आप रहनुमा थे, आप को तो आगे बढ के गिरफतारी देनी चाहिए थी, आप मर्दानगी छोडकर स्त्रीवेश में भाग गए, हम डंडे खाते रहे, क्या ये सच्ची रहनुमाई है! हालांकि डंडे खाकर भागने वालों में कितने उनके वैचारिक समर्थक थे, कितने योग अनुयायी और उनकी आयुर्वेदिक दवाई बेचने वाले रिटेलर, अभी कहना मुश्किल है, मेरी राय यह भी है कि अगर उनमें ज्यादातर राजनीतिक विचार के समर्थ होते तो भागते नहीं! हां, यह तय है कि राजनीतिक कार्यकर्ता तो उस भीड में न्यूनतम ही होगे वरना राजनीतिक करिअर के लिए डंडे खाकर भी अड़े रहते!

क्या बाबा से हमें नहीं पूछना चाहिए कि केवल पांच हजार लोगों के लिए योग शिविर की अनुमति लेकर भी पचास हजार की भीड़ बुलाकर उन्होंने क्या उस सरकारी अनुमति का मजाक नहीं उडाया है, फिर अगर उस भीड़ पर अगर सरकरी कार्रवाई हुई तो बाबा जी दोष केवल सरकार का ही क्यों है! और फिर कुटिल अकेले कपिल सिब्बल ही क्यों है, आप भी तो हैं! वे तो राजनेता है, उनका आचारण तो वैसा ही है जैसा आप या तमाम भारतीय मानते हैं, जिसके लिए हम उन्हें कोसते हैं, पर आपका आचरण भी वैसा ही नहीं है, क्या और आगे जाकर आपका व्यवहार और ज्यादा भारतीय लोकतांत्रिक व्यवस्था जैसा नहीं हो जाएगा! हमें बताइए कि आप उनसे अलग कैसे खड़े हैं! आपसे तो हम और पूरा देश आचारण में शुचिता की उम्मीद करते हैं। क्या ये उम्मीदें बेमानी हैं?

आखिर में, मुझे कह देना चाहिए कि लालू की चिंता वाजिब है, मुझे खुशी है कि देश को नया नेता मिल गया है जिसे देश की चिंता है, राजनीति की पहली परीक्षा उन्होंने ऊंचे दर्जे में पास कर ली है, आत्मप्रचार, मीडिया मोह, गुप्त समझौता, सरकार पर मारने का इल्जाम, मौके के मुताबिक जुबान और वेश बदलने जैसे सारे काम बाबा ने बखूबी किए हैं, नेताओं को अब इसे चुनौती मानना ही चाहिए। बेशक बाबा को बतौर हिंदुस्तानी संविधान के अनुसार राजनीति में आने का हक है, यह सोचना जनता का काम है कि योग के बहाने से वे अपनी राजनीति की नींव डाल रहे थे, ऐसे व्यक्ति को स्वीकारना चाहिए या नहीं! वे सिखा योग रहे थे, पर एजेंडा कुछ और था, और राजनेता राजनीति करते हैं, पर दरअसल कुछ और रहे होते हैं, तो रामदेव भी निश्चित ही प्रकारांतर से वहीं आके खडे हो जाते हैं, आगे से क्या भारतीय हर संत को राजनीति के रंगरूट के तौर पर नहीं देखेगे या उन्हे नहीं देखना चाहिए। हम तो इतना ही कह दें -'' वो सबसे जुदा है तो जुदा ही लगे, वो सबसे खफा है तो खफा ही लगे!'' आमीन!

Monday, May 23, 2011

''दूसरों के अंतस से जोड़ती है कविता''




इंग्रिड स्टोरहॉमेन भारत दूसरी बार आई हैं, उन्होंने तुलनात्मक साहित्य की पढ़ाई की है, दो कविता संग्रह आ चुके हैं। एक कथात्मक रिपोर्ताज लिखा है चेर्नोबिल पर, जिस पर उन्हेंं नार्वे का प्रतिष्ठित सुल्ट सम्मान प्राप्त हुआ है..
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काफी हाउस की आखिरी टेबल, जहां से स्मोकिंग जोन शुरू होता है, अपने लैपटॉप पर तेजी ग्रोवर की कविताओं का अनुवाद करते हुए थमी इंग्रिड स्टोरहॉमेन को एक सिगरेट ब्रेक की जरूरत थी। मुझे ऑफर किया तो मैंने जवाब दिया कि मैं खुशकिस्मत नहीं हूं। मेरी बात के जवाब में उनका ठहाका धुएं के छल्लों में घुल-मिलकर उस टेबल पर बिखर गया और गंध ने मुझे भी अपने आगोश में ले लिया। पड़ोस की टेबल पर कुछ किशोरों का समूह अठखेलियों, शरारतों में मुब्तिला है और अगली टेबल पर एक युवा जोड़ा जेरेबहस है। उस हंसी में शामिल था बहुत कुछ।

वह इंग्रिड हैं, भारत दूसरी बार आई हैं, उन्होंने तुलनात्मक साहित्य की पढ़ाई की है। दो कविता संग्रह आ चुके हैं, एक कथात्मक रिपोर्ताज लिखा है चेर्नोबिल पर, जिस पर उन्हें नार्वे का प्रतिष्ठित सुल्ट सम्मान दिया गया है। सुल्ट का अर्थ है- भूख। सुल्ट दरअसल नार्वे के नोबेल विजेता लेखक हाम्सुन का चर्चित उपन्यास है, जिसके नाम पर ये सम्मान दिया जाता है। वो अपने बारे में बताती हैं कि ओस्लो में छ: साल तक कॉलेज की पढ़ाई की, अब पूर्णकालिक लेखक हैं, पिछले दस साल से, चार किताबें और फिलहाल एक उपन्यास कुछ अनुवाद और कुछ छिटपुट काम में लगी हैं। नार्वे सरकार की एक राइटर फैलोशिप पर भारत आई हैं और इसके तहत एक किताब लिख रही हैं। भोपाल में कई भारतीय कवियों को वह सुन आई हैं, कोलकाता घूम लिया है, ईसाई मिशनरियों के काम, उनकी कार्य शैली और विरासत से प्रभावित हुई हैं।

वे बताती हैं कि उनका दूसरा कविता संग्रह फॉर्म आधारित कविताओं का संग्रह है अब उन्होंने भारतीय कवियों का अनुवाद भी शुरू किया है उनमें पहला नाम तेजी ग्रोवर का है। मैं उनसे पूछ बैठता हूं कि भारतीय और नार्वेजियन कविताओं में क्या अंतर पाया है तो वे सोच में पड़ गईं। मुझे लगा कि मैंने जल्दबाजी की है, जबकि इंग्रिड ने अभी भारतीय कविताओं से साक्षात्कार किया ही है, पर उसने जो जवाब दिया वह यह था -'' मुझे लगता है कि नार्वे की कविताएं ज्यादा अंतर्मुखी और राजनीतिक है। मुझे लगा कि भारतीय कवि फिजिकल कविता को ज्यादा पसंद करते हैं। हालांकि इसे मेरा शुरुआती निर्णय भी कहा जा सकता है और संभव है कि कुछ और कवियों को पढऩे के बाद मेरी धारणा पूरी तरह बदल जाए।''

इस समय मुझे महसूस होता है कि सही समय है, जब मुझे इंग्रिड से उनके पसंदीदा कवियों के बारे में और उनकी पसंदीदा कविता के बारे में पूछ लेना चाहिए, मैं पूछ लेता हूं तो वे कहती हैं -'' ग्रीक माइथोलॉजिकल कविताएं मुझे प्रिय हैं वहीं रिल्के और मारिना स्वेतायेवा भी मेरी पसंद में शामिल हैं।'' थोड़ा रुककर वह कहने लगती हैं कि दरअसल मुझे लगता है कि कविता मेरे अंतस को दूसरों के अंतस से जोड़ देती है। जब इसके बाद उन्होंने यह कहा कि उसे बौद्धिक तत्वमीमांसीय कविताएं पसंद हैं, तब मुझे लगा कि जरूर वह दर्शन की छात्रा रही हैं तो उसने कहा -'' कुछ औपचारिक, कुछ अनौपचारिक। कविता और भाषा उसे जीने के लिए जगह उपलब्ध कराते हैं, शायद मन का सा जीवन, जो अन्यथा असंभव सा हो।'' शायद सब लेखक और कवि ऐसा ही चाहते हैं, इंग्रिड फिर कहां अलग हैं। वह भी सच्ची और पक्की कवयित्री हैं।

उनकी पहली सिगरेट कब की खत्म हो चुकी थी, मुझे पता ही नहीं चला, अब इंग्रिड दूसरी के लिए व्याकुल थीं।

Saturday, May 21, 2011

2050 तक भारत का विभाजन जातीय आधार पर हो जाएगा! / बेहतर दुनिया एक असंभव ख्वाब है !


जातीय गणना की परिणति जो मुझे नजर आती है वह यह है कि किसी भी विधानसभा या संसदीय क्षेत्र में आनुपातिक रूप से कम जनसंख्या वाली जाति के लोग कभी प्रतिनिधि नहीं हो पाएंगे क्योंकि कोई राजनीतिक दल उन्हें टिकट ही नहीं देगा...
इन हालात में 2050 तक भारत को कई विभाजनों के लिए तैयार रहना चाहिए, और तब विभाजन के आधार धर्म नहीं, जातियां होंगी!



अब साधु भी जाति वाले होते हैं, हमारे समय के एक लोकप्रिय संत कैंसर का इलाज करते हैं, मगर जाति उनके नाम के साथ संत होने के बावजूद जुड़ी है, जो जातीय बोध से मुक्त नहीं हो पाए, मुझे माफ करें वे कितने संत हुए हैं, मेरी चिंता और जिज्ञासा है! यह अब सिद्ध और प्रसिद्ध है कि राजनीति की अस्तित्वमूलक जरूरत है जाति, पर दुख तब होता है जब बौद्धिक लोग आर्थिक स्थितियों के अंदाजे के लिए सामाजिक आधार की गणना को सही ठहराते हैं। मुझे क्षमा कीजिए, इतिहास का छात्र होने ने यह समझ दी है कि धर्म ने आर्थिक आधार पर समाज का बंटवारा किया और उसका आधार कर्म था और समय के साथ उसका आधार जन्म हो गया। अब अगर आर्थिक जरूरत से गणना करनी है तो आर्थिक गणना ही कर लीजिए साहेब! दूसरा यह कि मुझे समतामूलक समाजवादी समाज की कल्पना में जाति की यह निरंतरता बाधा नजर आती है, भारत के लिहाज से कहा जाए तो पूर्व वैदिक युग जिसे ऋग्वैदिक युग भी कहा जाता है, केवल कर्म आधारित वर्ण थे जो उत्तरवैदिक युग में जन्म आधारित हो गए। कहना जरूरी है कि ऋग्वैद के पुरुष सूक्त में आदि पुरुष के अंगो से वर्ण उत्पत्ति को भास शास्त्रीय आधार पर बाद में जोड़ा गया स्वीकार किया गया है।

अगर जातीय गणना को स्वीकार करने का कारण हम यह मानते हैं कि यह भारतीय समाज की कड़वी सचाई है, तो धर्म इससे पहले का सच है और धर्म के अन्यायों को भी हमें कड़वा सच मानकर स्वीकार लेना चाहिए और सामाजिक विभेद को भी मान लेना चाहिए, और उसकी निरंतरता में कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए। मुझे हैरानी के साथ दुख है कि हमखयाल वामपंथी दोस्त भी इसके समर्थन में दिख रहे हैं, ऐसी संस्थागत पैदाइश जिसका जनक धर्म है, उसे कैसे स्वीकार पा रहे हैं, फिर धर्म को भी स्वीकार करना चाहिए, क्या यह धार्मिक स्वीकार बाबा माक्र्स की सोच से विरोधाभासी नहीं है!

मुझे यह भी प्रकारांतर से लगता है कि सामाजिक सुधार की एनजीओवादी एजेंडे की जरूरत भी जातीय निरंतरता है। संभव है कि गांधी द्वारा जन्म आधारित जाति व्यवस्था का समर्थन करना उनकी भी राजनीतिक मजबूरी हो, जिसका अंबेडकर ने विरोध किया था, यह एक ऐतिहासिक सच और तथ्य है। इस जातीय गणना की परिणति जो मुझे नजर आती है वह यह है कि किसी भी विधानसभा या संसदीय क्षेत्र में आनुपातिक रूप से कम जनसंख्या वाली जाति के लोग कभी प्रतिनिधि नहीं हो पाएंगे क्योंकि कोई राजनीतिक दल उन्हें टिकट ही नहीं देगा, और फिर मतदान व्यवहार भी उत्तरोत्तर इसे प्रगाढ़ करेगा, कहिए कि क्या मैं गलत सोचता हू!

जिन लोगों की आंखों में बेहतर दुनिया का सपना अब भी झिलमिलाता है, बेहतर दुनिया का मतलब बिना हमारी रेशियल, एथ्नीकल पहचान के, समान वजूद और व्यवहार के साथ जी पाना है, उनके लिए भारत एक भौगोलिक संभावना बचा है, सेवा में सविनय निवेदन है कि अब मुझे नहीं लगता। अब भारत में जाति छोड़ो, भारत जोड़ो के नारे शायद ही कभी सुनाई दें। खुदा न करे, पर इन हालात में 2050 तक भारत को कई विभाजनों के लिए तैयार रहना चाहिए, और तब विभाजन के आधार धर्म नहीं, जातियां होंगी!

Tuesday, April 19, 2011

हर्फे जुनूँ सबकी जुबां ठहरी है



बिनायक सेन को देशद्रोही मानने से इनकार करते हुए भारत की अदालते आला का यह कहना बहुत मायने रखता है कि किसी के घर में नक्सली साहित्य मिल जाने से वह नक्सली ठीक वैसे ही नहीं हो जाता जैसे गांधी की आत्मकथा रख लेने मात्र से कोई गांधीवादी।


बिनायक सेन के बहाने कितना कुछ कहा जा सकता है ठीक वैसे ही जैसे अन्ना हजारे के बहाने। जब कभी इक्कीसवी सदी के दूसरे दशक का इतिहास लिखा जाएगा तो कहा जाएगा कि यह अन्ना और बिनायक का समय था जिसमें इरोम शर्मिला भी थी, और तीनों के साथ देश का सुलूक अलग अलग था। बिनायक सेन को लेकर भारत की अदालते आला का फैसला और उसकी भाषा दोनों ही महत्वपूर्ण हैं, आला अदालत का यह कहना बहुत मायने रखता है कि किसी के घर में नक्सली साहित्य मिल जाने से वह नक्सली ठीक वैसे ही नहीं हो जाता जैसे गांधी की आत्मकथा रख लेने मात्र से कोई गांधीवादी। इस अहम फैसले के बाद आज क्या यह नहीं सोचना चाहिए कि आजाद भारत का सबसे बडा इतिहासकार रामचंद्र गुहा और अर्थशास्त्री आद्रे बेते क्यों उनके साथ खडे थे। क्यों दुनिया भर के बुद्धिजीवियों ने उनका समर्थन किया उनमें अमत्र्य सेन जैसे दर्जनों नोबेल पुरस्कार विजेता थे।

मेरी पहली अनौपचारिक मुलाकात बिनायक सेन से कोई दस बरस पहले शायद जेएनयू के ब्रह्मपुत्रा छात्रावास में हुई थी, यह एक सार्वजनिक मुलाकात थी, जब वे मैस में बुलाए गए थे, जब मैं करोलबाग के एक सस्ते से होटल में अपने एक ब्रिटिश रिसर्च स्कॉलर दोस्त के साथ रुका था और राष्ट्रीय अभिलेखागार की अपनी तय दिनचर्या को तोडक़र दिल्ली की सर्दी में दो बसें बदलकर उन्हें सुनने पहंचा था, हालांकि ठीक-ठाक सी व्यक्तिगत मुलाकात इसके सालों बाद हाल ही कुछ महीनों पहले जयपुर में पीयूसीएल के एक आयोजन में हुई। तब तक पिछली मुलाकात धुंधली हो गई थी, देखना भर जेहन में अटका हो तो बहुत, पर अब जो चेहरा सामने था, वक्त के निशान उस चेहरे पर कुछ इस तरह से थे कि शक्ल के नक्श बदल गए थे, कि चेहरा नया सा था। मेरा बहुत मन था कि उनके नक्सली संपर्को पर उनसे तीखे सवाल करूं कि क्यों वे मासूम मनुष्यों को मारने वाले लोगों के साथ खड़े नजर आते हैं? पर मैं स्वीकार करता हूं कि उनकी मासूमियत और सहज मानवीयता ने मुझे वे क्रूर सवाल करने से रोक दिया। हालांकि बहुत से मित्र लोग सेन की इस मासूमियत के दूसरे अर्थ निकाल सकते हैं, निकालेंगे ही, और निकालना उनका लोकतांत्रिक अधिकार भी है। पर क्या यही अधिकार सेन को दिया जाता है, यकीनन नहीं! उनसे मैंने पूछा- 'क्या योजना है? कल को किस उम्मीद से देखते है?' तो उनका जवाब था- 'जी पाना और बेहतर दुनिया के लिए खड़े लोगों का साथ देने की कोशिश करना।' ..
फिर कुछ समय बाद उनकी यह गिरफ्तारी हो गई और उसके बाद जो कुछ हुआ वह सब अखबारों में दर्ज है ही।

मुझे कहने में शर्म नहीं है कि कुछ महीनों पहले जब बिनायक सेन की पत्नी और बेटी जयपुर आए तो सामाजिक कार्यकर्ता और बिनायक समर्थक उनसे मिले, उनकी भीड़ के पीछे मैं भी कहीं खड़ा था, तब भी मेरा नैतिक समर्थन उन्हें था, जब मुख्य धारा का मीडिया उनके पक्ष में खड़ा होने से कतरा रहा था या उसकी जुबान बिनायक को लेकर कमोबेश वही थी जो उसे गिरफ्तार करने वाली पुलिस की थी या तदंतर सरकार की थी।

विश्वकप जीतने के उन्माद में डूबे देश को टीआरपी ढूंढते मीडिया ने अन्ना से मिलवा दिया, क्या अजीब बात नहीं है कि जो लोग पत्रकार सरकार विरोधी होने को देशद्रोह कहते थे, अन्ना के पक्ष में खडे हो गए जबकि अन्ना भी सरकार का ही विरोध कर रहे थे। संयोग ही है कि कोई सरकार विरोधी होकर नायक हो जाता है कोई खलनायक की हद तक खड़ा कर दिया जाता है बिनायक को खलनायक की हद तक ले जरने का तार्किक आधार यह दिया गया कि वे नक्सली समर्थक हैं और नक्सली सरकार विरोधी हैं, अब सर्वोच्च न्यायालय का यह कहना कि नक्सल समर्थन भी देशद्रेह नहीं है, बहुत बहुत मायने रखता है, यह अपने आप में एक नजीर है और भारतीय लोकतंत्र की ताकत भी। हालांकि संभावना थी भी और ऐसा हुआ भी कि बिनायक को फांसी चढ़1ने की मंशा रखने वाले लोग देशद्रोह के कानून को ही बदलवाने की मांग करेगे और ऐसी आवाजें उठने लगी हैं। यह फैसला इस लिहाज से भी देखे जाने की जरूरत है कि सरकार और देश में अंतर होता है और पुलिस ट्रायल खतरनाक होता है, पुलिस की बात को अक्षरश: स्वीकारना सरकार और मीडिया देानों के लिए ठीक नहीं है, उसके आधार पर बात करें तो एक मासूम सा सामान्यीकरण करने की गुस्ताखी करने की इजाजत दें कि पुलिस की नजर में क्या हर व्यक्ति अपराधी, हर स्त्री चरित्रहीन, हर संबध अवैध संबध नहीं होता है, ऐसा पुलिस महकमे में आला अफसर दोस्तों के मुख से भी सुना है कि क्या करें यार, ना चाहते हुए भी सोच लगभग ऐसी ही हो जाती है। पुलिस से आगे बढकर, मुझे एक भारतीय के रूप में कह और स्वीकार कर लेना चाहिए कि सामान्यीकरण करने की हड़बड़ी में कितने ही गलत निष्कर्ष निकाल लिए जाते हैं हालांकि दार्शनिक भाषा में यह भी एक सामान्यीकरण ही है।

तारीख गवाह है कि दुनिया में कितने ही उदाहरण है जब दार्शनिकों, लेखकों, कलाकारों को सरकार विरोधी कहकर जेलों में डाला गया। और ऐसे मामलों में प्राय: और बार- बार यह स्थापित हुआ है कि सरकार विरोधी होने और देश विरोधी होने में अंतर होता है, तानाशाह तो अपने खिलाफ को ही देश विरोधी मान लेते हैं क्योंकि अपने आप में वहीं स्वयंभू देश होते है। निसंदेह भारत में ऐसे उदाहरण कम है सिवाय एमरजेंसी के, तो यह उदाहरणों की अनुपलब्धता बनी रहे हमें ऐसी ईश्वर से प्रार्थना और हमें आपस में ऐसी कोशिश करनी चाहिए।

उम्मीद करें कि बिनायक के बाद पुलिस हर सरकार विरोधी को नक्सल समर्थक को देशद्रोही नहीं मानेगी और पुलिस के बयान और निष्कर्ष को मीडिया के लोग अंतिम सत्य नहीं मानेगे, (जबकि हम देखते हैं किसी भी अपराध समाचार में एक ही नजरिया होता है जो कि पुलिस की नजरिया होता है ) हम भारत को एक दुनिया का सबसे बडा ही नहीं परिपक्व और बेहतर लोकतंत्र भी कह सकेगे। आखिर में बिनायक की तरह देशद्रोह के आरोप में पड़ौसी मुल्क पाकिस्तान की जेल में बंद रहे फैज अहमद फैज जिनकी इस साल पूरी दुनिया में जन्म शताब्दी मनाई जा रही है, के शब्द याद कर लें- ''अब वही हर्फे जुनूँ सबकी जुबां ठहरी है, जो भी बात निकली है, वो बात कहां ठहरी है।''

Friday, April 8, 2011

साहित्य का आउटहाउस


हिंदी की मशहूर साहित्यिक पत्रिका 'कथादेश'(अप्रेल 2011) के मीडिया वार्षिकी अंक में मेरा लेख आया है, जो मीडिया और साहित्य की परस्पर अंतरक्रिया पर है, इसे आपसे यथा रूप बांट रहा हूं,

पूर्व कथन -
अपनी बात शुरू करने से पहले कहना ठीक रहेगा कि इसे पढने के बाद संभव है कि दोनों और के दोस्त मुझ पर टूट पडे पर फिर भी कहने की जुर्रत और जरूरत है, और दूसरी बात यह कि इसे अनाधिकारिक बयान भी माना जा सकता है पर यह सब कहने की गुस्ताखी इसलिए कर पा रहा हूं कि लगभग एक दशक से अंदर- बाहर रहकर दोनों के रिश्ते और बदलती स्थितियों को देखने का मौका मिला है.. और अंग्रेजी की कहावत रीड बिटविन दी लाइंस को दोहराते कहूं तो आगे की पंक्तियों में दोनों के तरफ के दोस्त अपनी पीडाओं को महसूस करेगे, ऐसा भी मुझे विरोधाभासी रूप से लगता है...


एक मासूम सा इत्तेफाक है कि अखबारवाले साहित्य को, साहित्यकारों को या तो हीन भाव से देखते है या गालियां देते हैं और कमोबेश यही हालत दूसरी तरफ भी है. जरा पतला करके बात करूं तो हिंदी में कम लोग बचे है जो अखबारनवीसी के पेशे में पढने से सरोकार रखते हैं, यहां पढने से तात्पर्य साहित्य से है या साहित्य से इतर नॉन फिक्शन गंभीर लेखन
से भी, मुझे माफ कीजिए, वो जमाना हवा हुआ जब साहित्यकार और पत्रकार भाई- भाई होते थे, कहा जाता था कि साहित्यकार पत्रकार का बडा भाई होता है... हुआ करता होगा साहिब, हिंदी में तो अब उत्तरोत्तर छोटा भाई महाभाई बन गया है और बडा भाई उसका मुखापेक्षी निरीह बुजुर्ग.

बहरहाल मीडिया के दोस्तों में जाहिर तौर पर लोक-लिहाज में थोडा बहुत सम्मान अब भी साहित्यकार और साहित्य का बचा हुआ है, इसे आंख की शर्म भी कह सकते हैं,

हालांकि मेरा मानना है कि पत्रकार का साहित्य या इससे इतर पढना बहुत जरूरी नहीं है पर इसके दो फायदे होते हैं, एक तो संवेदना को बनाए रखने में, दूसरा भाषा के निरंतर विकास में वह पढना मदद करता है...मुझे कहने में कोई परहेज नहीं है कि साहित्य से दूरी ने उन्हें संवेदनारहित बनाया है..और शायद हमारे समय की कॉर्पोरेट पत्रकारिता की जरूरत यह है भी तो इस लिहाज से यह जस्टीफिकेशन भी इसे हासिल है , तो पढना गैरजरूरी होना गैरवाजिब ठहराए वह तो पागल ही कहलाएगा.

अब इसे क्या कहेगे कि पत्रकारों की निगाह में पल्प साहित्य लिखनेवाले लेखक सच्चे और आइकननुमा साहित्कार हैं, तो बेस्टसेलर को उम्दा लेखन का मानक मानने वालों में अखबार के लोग सबसे पहले हैं, यह नजरिया साहित्य से जुडी खबर को अखबार में जगह से जुडा है क्योंकि प्रकारांतर से वहीं लेखक जो पत्रकार साहब की जानकारी में है, अखबार की खबर में जगह पाएगा. मुझे खुशी होती है जब कोई कहता है कि उसने इन दिनों यह किताब पढी है (और ऐसे अवसर दुर्लभ ही होते हैं) वरना प्रायः उनके लिए आज भी साहित्य का मतलब या तो प्रेमचंद है या फैशन के बतौर चेतन भगत. ..और मुझे हमेशा याद रहता है कि किसी भी कारण से पत्रकारों पर पडने वाली गालियां मेरे उस पेशे के भाईयों पर पडने वाली गालियां है जिससे मुझे दाल रोटी मिलती है.

अपनी आत्मा पर हाथ रखकर पूछिए कि क्या यह पिछले दशक की देन नहीं है कि अखबार में काम करने वाला पत्रकार यानी रिपोर्टर यर डेस्क वाला व्यक्ति अगर साहित्य के पास भी फटकता है तो गुनाहगार है, यहां तक कि इस अहसास को जन्म देने वाली कि मियां अगर इतना ही पढने लिखने का शौक था तो इस पेशे में आने की जरूरत ही क्या थी! और तुरंत यूं भी खारिज किया जा सकता है कि आपको खबर लिखनी क्या आएगी, और एक वक्त था जब माना जाता था कि आप लेखक है तो खबर भी अच्छी लिखेगे, मेरे पास एकाधिक उदाहरण है कि धर्मयुग आदि में प्रकाशित कहानियों के आधार पर बहुत से युवाओं को बडे समूहों में पत्रकारिता की नौकरी मिली और वे कालांतर में बडे नामी पत्रकार साबित हुए

अब जरा दूसरी तरफ का रुख कर लें, साहित्यकारों का वर्ग प्रायः अखबार के लोगों को मूर्ख मानकर अपना अहं तुष्ट करता है और उनमें खबर या इतर छपास की आकांक्षा या जरूरत ना हो तो शायद वे बात ही ना करें, इसके लिए मूर्ख से मूर्ख को भी वे महान पत्रकार और साहित्य संवेदना सम्पन्न कहने से नहीं चूकते.वे अक्सर गाली देते पाए जाते है कि अखबारों में साहित्य की जगह कम हो रही है मैं भी सहमत हूं, तथ्यात्मक तौर पर यह कहना सही है पर कोई संपादक को कहने की जुर्रत नहीं करता कि आप ऐसा नहीं करते, हमेशा यही कहा जाता है कि 'आप तो समझते है आपके हाथ बंधे है पर जो कर सकते हैं, वह ऐसा होना रोक नहीं रहे हैं ' और यह कहना उनके लिए भी ठीक ऐसा ही होता है जिनके लिए वे कहते है कि वे ऐसा कर सकते हैं पर कर नहीं रहे हैं .... जबकि मेरा तो यह मानना है कि साहित्य का छौंक पूरे अखबार में हो पर वह उसे गरिष्ठ ना बनाए कि केवल साहित्कारों का अखबार(साहित्यिक पत्रिका या शोध जर्नल जैसा कुछ होकर ) बनकर रह जाए और लोग उल्टी गिनती शुरू कर दें ..

मुझे गालियां दी जाती होगी, दी भी जाएंगी कि मुझे दुख नहीं होता कि अखबारों में साहित्य की तयशुदा जगहें कम हो रही हैं, पहली बात तो यह कि ये चिंताएं केवल साहित्यकारों की चिंताएं है, दूसरे, हिंदी के उन अध्यापकों की चिंताएं है प्रकारांतर से जिनके पांडित्यपूर्ण लेख छपने की जगहें नहीं बची हैं...दूसरे जब साहित्य को बचाने की जिम्मा हमारे पूरे समाज ने ही भुला दिया है, हम अपने बच्चों का साहित्य पढने के संस्कार नहीं देते, समझ-विचार और सरोकार की बजाय धन, सफलता और पता नहीं किन किन चीजों के ख्वाब दिखाते हैं तो अखबार से क्यों उम्मीद करें ? उन्हें क्यों ठेकेदार बनाते हैं, मेरी मान्यता है कि पब्लिक आइकन के तौर पर लेखकों को देखना समाज ने पहले छोडा, मीडिया ने बाद में, बेशक मीडिया की जिम्मेदारी कम नहीं है और आप मुझे कह सकते हैं कि ''तू भी है इस गुनाह में बराबर का शरीक अपने किस्से औरों को सुनाता क्या है ''

और कहना लाजिम है कि अखबार में साहित्य की उपस्थिति मुझे भी सुख देती है, वज्ह ये कि प्रकारांतर से मैं भी इसी जमात में हूं क्योंकि पत्रकारिता करते हुए भी हमेशा यह माना है कि जीवन का लक्ष्य तो अंततः स्वतंत्र लेखक के बतौर जीना संभव बनाना है

वैसे, मेरी निगाह में जिंदगी के दूसरे हिस्सों- विज्ञान, दर्शन (धर्म से इतर) जैसी बहुत सी चींजें अखबारों से गायब है, ले दे के जाने माने लोगों की दिनचर्या और राजनीतिक उठापटक, कुछ खेल कुलमिलाकर यही तो अखबार है इनदिनों ..बदलते समय में, मुझे हैरानी है कि हिंदी के साहित्यकारों को यह नहीं दिखता कि केवल नई किताबों पर सूचनात्मक और कहीं कहीं समीक्षात्मक टिप्पणियों के अलावा अंग्रेजी मीडिया भी कहां साहित्य छापता है तो साहित्य का बचना और उसका भविष्य अखबार पर निर्भर करता है, ऐसी कोई गलतफहमी मुझे जरा भी नहीं है जिन्हे है, उनके लिए मेरी शुभकामनाएं ही हो सकती है, वे भी मददगार होगी, मुझे संदेह है.

और आखिर में बस इतना ही कि अदब को अखबार और व्यापार दोनों ही ना बनाया जाए, वहीं यह भी कि अखबार को अदब भी नहीं बनाया जाए, पर दोनों में दोस्ती रहे, आवाजाही बनी रहे ...और व्यापार भी चलता रहे.

Saturday, April 2, 2011

इतिहास की मौत के दिनों में





इस देश में अब इतिहास की जरूरत नहीं बची है, उसकी जगह प्रशस्तिमूलक जीवनियां और मिथकशास्त्र पढाए जाने चाहिए, और ऐतिहासिक शोध में लग रहे धन और उर्जा को नष्ट होने से बचाना चाहिए...



गांधी को लेकर फिर एक किताब और लेखक चर्चा में है। महान इनसान पर ऐसे लांछन शुक्र है कि अब भी लोगों को दुखी करते हैं, खासकर जब उन दुखी लोगों में ज्यादातर लोगों का प्राथमिक आदर्श सच नहीं है और बात ऐसे महान इनसान की हो रही है जो सच के पैरोकार के रूप में मशहूर रहा है, वैसे सच का आदर्श निरपेक्ष ही होना चाहिए या होता है, सापेक्ष नहीं। गांधी खुद भी अगर होते तो तो शायद शायद क्या कम से कम मुझे तो यकीन ही है कि वे ऐसा व्यवहार नहीं करते।

सवाल पुलित्जर से सम्मानित पत्रकार लेखक जोसेफ लेलीवेल्ड की किताब ''ग्रेट सोल - महात्मा गांधी एंड हिज स्टृगल विद इंडिया'' में उनकी समलैंगिता की ओर इशारे का है हालांकि लेखक ने एक बयान में इसका खंडन किया है कि मेरी किताब में उन्हें समलैंगिक बताया गया है..

यहां यह बताना जरूरी है कि गांधी जी के पोते गोपाल कृष्ण गांधी के एक ताजा लेख में ऐसी अंध भावुकता का ना होना बहुत सुखद है, क्या कीजिएगा अगर उन्हे गांधी जी पर ऐसे गैरभावुक लेख के लिए देश निकाला दे दिया जाए... ताजा खबर यह है कि इस किताब के बाद सरकार का रूख है कि कौमी प्रतीकों के साथ राष्ट्रपिता के अपमान पर भी सजा होगी(बजाय इसके कि इतिहासकारों का एक समूह उस किताब में प्रस्तुत तथ्यों की प्रामाणिकता और ऐतिहासिकता जांचता), तो ऐसे में मेरी बुनियादी स्थापना और निजी विचार है कि अब इतिहास को विषय और अनुशासन के तौर पर समाप्त कर देना चाहिए, क्योकि जब ऐतिहासिक सच की तलाश से बडा सवाल अपमान को रोकना हो जाएगा, वहां इतिहास के जिंदा बचने की संभावना क्षीणतम ही होगी।

याद कीजिए कुछ समय पहले एक ऐतिहासिक मसले पर न्यायालय का फैसला देश की आस्था के आधार पर आया था तो इतिहासकारों के बडे वर्ग ने इतिहास के साथ इस बलात्कार (यह शब्द मैं दे रहा हूं, क्षमा करें), पर सामूहिक चिंता जताई थी।

फर्ज कीजिए कि या मान ही लीजिए कि मेरे दादा अपने जीवन की अनगिन उपलब्धियों के साथ, एक दिन मुझे पता चले कि बलात्कारी भी थे, मेरी नजर में वे गिर जाएंगे और मुझे तुरंत लीपापोती करनी चाहिए और उन प्रमाणों को नष्ट करने में अपना सबकुछ दांव पर लगा देना चाहिए कि यह सच यह राज जाहिर ना हो और मेरी और प्रकारांतर से सब मुझे या मेरे दादा को जानने वालों की नजर में उनकी प्रतिष्ठा बची रहे, बहुत सभव है कि आप सहमत होगे कि मुझे ऐसा ही करना चाहिए और तमाम सबूतों को नष्ट करके मुझे मान लेना चाहिए कि दादाजी की छवि मैंने बचा ली है और वे महान बने रहेगे और कभी वैसा सबूत दुबारा नहीं मिलेगा जैसा मैंने नष्ट कर दिया है....पर मेरी राय है कि इतनी सहिष्णुता तो हम में अवश्य ही होनी चाहिए कि अपने पूर्वजों को इनसान मानकर उनकी मानवीय कमजोरियों और उससे जुडी बातों को हम उसी भाव से स्वीकार कर लें जिस भाव से उनपर गर्व करने वाली बातों को स्वीकार करते हैं, और इस स्वीकार के साथ उनका इनसान होना खारिज ना करें।

इतिहास के साथ जुडाव ने यह समझ बनाई है कि तथ्य मिलें और प्रमाण हों तो कुछ भी प्रिय अप्रिय स्वीकार करना ही चाहिए वहा भावुकता का सवाल नहीं है, पुनः कहना चाहिए कि इस किताब से उपजे विवाद के मददेनजर भी ऐतिहासिक नजरिए से तथ्यों कर परीक्षण सबसे पहली प्राथमिकता होनी चाहिए थी होनी ही चाहिए !

मेरी समझ में यह नहीं आता कि अब तक जो बाते जाहिर और सिद्ध हुई है जिनसे गांधी के व्यक्तिगत जीवन के बारे में वह पता चलता है जो उनकी देश के पिता के बतौर सम्मानीय होने में बाधक हो सकती थीं! क्या वाकई उनसे अंतर आया है या आना चाहिए? आजादी के आंदोलन की उनकी भूमिका एक नेता की भूमिका थी और व्यक्ति के तौर पर गांधी की भूमिका अलग मसअला नहीं है क्या? सुभाष, भगतसिंह, चौरी चौरा, पूना पैक्ट और भारत का विभाजन लगातार उनकी चर्चा और आलोचना के विषय रहे हैं, पर मेरा मानना है कि कोई भी मसअला, बहस, कुलमिलाकर देश की आजादी में उनके योगदान को कमतर नहीं कर सकते, ऐसा ही मेरा मानना उनके व्यक्तिगत जीवन को लेकर है !

बहरहाल ताजा बहस पर लौटते हैं, अगर यह विधेयक बन जाता है तो पारित होकर लागू हो जाता है तो, अब फिर वही सवाल खडा है कि क्या महान लोगों को क्रमश: देवता बनाकर आस्था का प्रश्न ही बनाता है, उन्हें हम ऐसे व्यक्ति हाड़ - मांस के इनसान के तौर पर देख और मान नहीं सकते जिन्होने मानव इतिहास में उपस्थित होकर अपनी मानवीय कमजोरियों के साथ महान काम किए...पर महान इनसान को सम्मान देते हुए उसे सामान्य व्यक्ति के रूप में खारिज करना क्यों जरूरी है, दूसरा अगर व्यक्ति के बतौर उसकी कुछ ऐसी छवियां प्रकट हो जाएं जो उसकी महान छवि में तनिक निषेध आरोपित करती हों और सप्रमाण हो तो क्या हमारी परंपरागत छवि की निरंतरता के लिए उन नए ऐतिहासिक तथ्यों को कूडेदान में डाल इेना चाहिए और उन खोजी व्यक्ति को जेल में! अगर ऐसा करना ही महान व्यक्तियों के प्रति हमारे सम्मान को निरंतरता दे सकता है तो मेरा बहुत विनम्र सा निवेदन है कि इस देश में अब इतिहास की जरूरत नहीं बची है, उसकी जगह प्रशस्तिमूलक जीवनियां और मिथकशास्त्र पढाए जाने चाहिए, और ऐतिहासिक शोध में लग रहे धन और उर्जा को नष्ट होने से बचाना चाहिए,. एक गलती देशद्रोही का खिताब दिलवा सकती है, उम्र भर की अकादमिक या वैचारिक दुनिया की प्रतिष्ठा को नेस्तनाबूत कर सकती है।