Saturday, November 24, 2007

मैंने तसलीमा को देखा है-एक


तसलीमा जी ,येही कहना ठीक लग रहा है ,वरना दुनिया सिर्फ तसलीमा कहती है चाहे उनमे आलोचक हों या समर्थक या प्रशंसक .वो मेरे शहर जयपुर में आयी और बेआबरू होकर उन्हें यहाँ से रूखसत होना पडा ,जिस शहर के साथ लगभग पिछ्ले डेढ़ दशक से वाबस्ता हूँ , इस शहर से बेपनाह मुहब्बत भी करता हूँ शायद इतनी कि कोई अपने महबूब से भी क्या करे , पहली बार शर्मिन्दगी महसूस हुई ,तसलीमा को अरसे से पसंद करता हूँ , गाहे बगाहे थोडा बहुत पढा भी है उनका लिखा ।

कोई साल भर गुजरा होगा इसी शहर में वो आयी थीं , प्रभा दीदी यानी प्रभा खेतान के बेटे संदीप भूतोरिया उन्हें लाये थे , किसी शिक्षा से जुडे कार्यक्रम की लौन्चिंग पर ,प्रभा दीदी से बात हुई , संदीप जी का मोबाइल नंबर लिया और अपनी प्रिय लेखिका से मिलने के सपने बुन ने लगा था ,पत्रिका की वर्षा जी ने मोका दिया कि उनके लिए तसलीमा साक्षात्कार कर लूं ,ह्रदय से आभारी हूँ उनका ,खैर राजपूताना शेरेटन की लोबी में उनसे मिला , बेहद सौम्य ,मृदु भाषी ,चेहरे पे बंगाली तेज प्रबुद्ध्ता ,शायद पर्पल कलर की साडी में थीं वो , उनकी वो भंगिमा आज भी स्मरति पर अंकित है ,एक बारगी विश्वास नही हुआ मैं तसलीमा नसरीन के साथ हूँ , उन्होने जैसे ही हाथ आगे बढाया ,उस हाथ की छुअन ने विश्वास करने का आधार दिया मुझे , उनसे हुयी मुलाक़ात कल आपसे शेयर करूंगा

4 comments:

डॉ दुर्गाप्रसाद अग्रवाल said...

दुष्यंत जी, एक बडी लेखिका तसलीमा के साथ जैसा सुलूक किया गया उससे हम शर्मिन्दगी के अलावा कुछ और महसूस कर ही नहीं सकते. क्या इस प्रदेश में सरकार नाम की कोई चीज़ है भी सही? क्या कोई निर्णय होता भी है? एक पल कोई बयान, दूसरे पल कोई और बयान. अगर एक औरत को आप सुरक्षा नहीं दे सकते तो काहे की सरकार चला रहे हैं? या फिर इतना साहस तो रखें कि कहें कि हम अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता में कोई विश्वास नहीं रखते, या कि तसलीमा की सुरक्षा पश्चिमी बंगाल सरकार या केन्द्र सरकार की चिंता का विषय है. कुछ साफ तो कहें! लेकिन नहीं. हम साफ कैसे कह सकते हैं? हमारे तो अनेक मुंह हैं जो परस्पर विरोधी बयान देने के लिए काम में आते हैं.

Basant Arya said...

आपके ब्लाग पर आया. अच्छा लगा. अब लगातार आता रहूंगा.

Shwet said...

aapka blog achcha lga, Talimaji se aapki mulaqaat ke bare mein jaanne ki utsuk,hun maine unki likhi koi kitaab tho nahi adhi lekin yeh avshya janna chaungi ki itni bdi lekhika vastav mein kaisi hai.....

गौरव सोलंकी said...

दुष्यंत जी, आप सौभाग्यशाली हैं कि आपको उनसे मिलने का मौका मिला।
कल के दुर्भाग्यपूर्ण शुक्रवार के बाद मुझे भी अपने देश पर शर्म आ रही है, जहाँ तस्लीमा को माफ़ी माँगनी पड़ी।
मैंने भी कुछ लिखा है, पढ़िएगा।
http://merasaman.blogspot.com/2007/12/blog-post.html