Saturday, May 10, 2008

चेन्नई मेरी चेन्नई

थार से समंदर तक .....

माफी चाहता हूँ कि बहुत दिन बाद लिख पा रहा हूँ इस बहाने पहली बार सही रूप में अंदाजा हुआ कि मेरे इस भडास निकालने के ज़रिये को कितने लोग स्नेह भाव से पढ़ते हैं ,उन तमाम मित्रों ने फोन करके कहा कि यार बहुत दिन होगये गोली दिए हुए अब तो लिख दो कि क्या गुल खिलाये चेन्नई में ,ये किस जिज्ञासा के कारण था ये वो जानें पर जिन्होंने कभी मेरा ब्लॉग देखा भी होगा ये एहसास मुझे नहीं था ,खैर हाजिर हूँ ,चेन्नई से लौटने के दो हफ्ते बाद चेन्नई की यादों में फ़िर एक बार॥

चेन्नई यानी- साई ,मित्रा ,कविता,हेमा,सपना, हरिक्रिशन, श्रीलेखा,किट,पद्माजी ,वेंकटेश ,लैण्ड मार्क और हिगिन बोथम वाली बुक शौप्स और मरीना बीच ...कितना कुछ तैर रहा है आँखों के आगे ...चेन्नई यूं दूसरी बार गया था साल भर पहले इसी तरह के प्रोग्राम में गया था ,वो यादें थी ही ,इस बार जाते हुए दिल्ली से किसी शायर के लफ्जों में कहूं तो 'मेरे महबूब की दिल्ली ' से तमिलनाडु एक्सप्रेस के थर्ड ऐ सी में जाने का ख्याल भी यूं ही आ गया चलो लालू की सेवाओं का जायजा ले लिया जाए ,

१४ की शाम को ट्रेन थी ,जे एन यू में सुधीर से मिलने की इच्छा बहुत दिनों से थी तो सोचा चलो कुछ पहले चल के उस माहौल में जी लूँ जो मेरा अधूरा ख्वाब है ॥सुधीर से मिलने में हमेशा ये छदम इच्छा रहती ही हैं ॥और इसे वो भी जानता है कि जे एन यू उसके 'दुष्यंत भैया' की कमजोरी है ॥खैर चेन्नई के इस सफर में २८ घंटे की यात्रा में में उतार से दक्षिण पूरा हिन्दुस्तान देखना बहुत रोमांचक रहा ,एक दशक इतिहास पढने आधे दशक तक पढ़ने के दौरान जिस भारतीय विविधता का किताबी ज्ञान लिया उसे महसूस किया ये पिछली बार महसूस नही हुया क्योंकि वो गो एयर की एक दुखद विमान यात्रा थी जिसमे दिल्ली एयर पोर्ट से रात ९ बजे उड़कर साडे ग्यारह बजे चेन्नई पहंचाने वाले विमान ने अल सुबह तीन बजे उड़कर पाच बजे चेन्नई की धरती पर उतारा था ,पूरी रात कैसे बीती होगी कल्पना कर सकते हैं ..इस बार शायद एक वजह तो यही थी कि सस्ती विमान यात्रा से ट्रेन अच्छी
खैर ,वास्तविक भारत दर्शन का लुत्फ़ तो आप यकीनन रेल की यात्रा में ही उठा सकते हैं

...चेन्नई के रास्ते में बाला पंडीयान से मुलाक़ात भी दिलचस्प रही ,इन महोदय से प्रभावित हुए बिना नहीं रह सका, वे एक एनजीओ से जुड़े हुए हैं जो किशोरों और युवकों को जीवन मूल्यों के प्रति सजग और सक्रिय करने में लगा हुआ है और देश भर में उसके चेप्टर है यहाँ तक कि जयपुर में भी,बाला से पूछा जयपुर में कब से काम कर रहा है डेढ़ दशक के प्रवास में आज तक सुना नहीं ,, उनसे बतियाते और रविंदर कालिया की किताब ग़ालिब छूटी शराब तथा दर्जन भर हिन्दी अंग्रेजी की मेग्जीनों के साथ सफर गुजारा ,इस्मत चुग़ताई का नोवल 'जिद्दी 'अनपढा ही वापिस आ गया, हाँ जग सुरैया की 'कलकता ऐ सिटी रिमेम्बर्ड ' ज़रूर आधी पढ़ पाया चेन्नई को वर्क-शॉप के अलावा सुबह शाम ही देख सकता था ,


१५ की शाम पहुचा १६ को पूरे दिन फुरसत थी १७ से वर्क-शॉप थी लिहाजा एक लेखक होने का वहम पालने वाला व्यक्ति शहर को एक्सप्लोर करने निकल पडा, भरी गरमी में, अपने शहर गंगानगर की गरमी को याद दिलाने वाली गर्मी ...अपनी साथी मित्रा के शब्दों में 'बर्निंग होट',जहाँ ठहराया गया वहाँ एसी कमरा देने की व्यवस्था अज्ञात कारणों से हमारे लिए नहीं थी..यूं मेरा घर भी ए सी नहीं है पर जयपुर में ज़रूरत भी महसूस नहीं हुई ..वाह मेरे प्यारे जयपुर ..जहाँ का मौसम हमेशा प्यारा होता है ,इस बार तो यहाँ भी गरमी भयानक है ....सेंतोमे चर्च और मरीना बीच देखने का मन बनाया सेंतोमे का इम्प्रेशन ये था कि जीसस का एक शिष्य यहाँ आया ,इम्प्रेशन इसलिए कि सेंतोमे की जगह माउन्ट पर सेंट थॉमस चर्च पहुँच गया वहाँ पहुँचने का किस्सा भी खासा दिलचस्प है आप भी खिलखिलायेंगे , खिलखिलायें ना भी तो मुस्कुराए बिनातो हरगिज नहीं रहेंगे ..उसकी बात कल करूंगा..



6 comments:

cartoonist ABHISHEK said...

pyare DUSHYANT
JAIPUR MAIN MOUSAM CHOUD
SAB KUCHH PYARA HAI...
OONT KI KUBAD KI TARAH HAI
YAHAN KA MOUSAM!

alok said...

आगे के लिखे की प्रतीक्षा रहेगी.

PD said...

चेन्नई के बासिंदा का सलाम कबूल करें.. :)

डॉ दुर्गाप्रसाद अग्रवाल said...

अपने पहली किश्त इतनी छोटी क्यों लिखी? और धारावाहिक करने की क्या ज़रूरत थी? एक साथ लिख देते तो हमें तडपाने का सुख नहीं मिलता इसलिए? जल्दी लिखो. सब्र नहीं हो रहा है.

डॊ. कविता वाचक्नवी said...

खूब घूमें, खूब यात्रा-संस्मरण लिखें. अच्छा लगा.

Anonymous said...

kya baat hai sir bahut ghoom rahe ho aur pel rahe ho blog pe..yaa jalaane ke liye