Friday, August 12, 2011

ठेस और ठोस के बीच




फिल्म से मेरी भी असहमतियां हैं पर वे असहमतियां यह इजाजत मुझे नहीं देती कि कहूं भई फिल्म नहीं चलनी चाहिए। दूसरे, यह कोई महान फिल्म नहीं है, एक व्यवसायिक फिल्म है, कभी मेरे प्रिय निर्देशक रहे प्रकाश झा की परंपरा की भी नहीं है, कह देना चाहिए कि मैं उनसे निराश हुआ हूं, पर इस निराशा में भी उनकी फिल्म के प्रदर्शन को रोकने का पक्षधर नहीं हो सकता



पहले संक्षेप में घटनाक्रम बता दें, फिल्म के रिलीज होते होते तीन राज्य आंध्र पदेश, उत्तरप्रदेश और पंजाब 'आरक्षण' के प्रदर्शन पर प्रतिबंध लगा चुके हैं, राजस्थान में आरक्षण के लिए संघर्षरत राजपूत करणी सेना और राजस्थान सर्वब्राहमण महासभा के पदाधिकारियों का विरोध कुछ संवाद हटाकर समाप्त किया गया है और प्रकाश झा कुछ और दृश्यों को हटाने को राजी हो गए हैं, पर इधर उधर विरोध जारी है और प्रकाश झा अपने पक्ष के लिए सुप्रीम कोर्ट जा रहे हैं।

इस फिल्म को देखने के बाद मेरा यह कहना वाजिब मान लिया जाना चाहिए कि फिल्म आरक्षण को लेकर बहस छेडती है। वैसे तो, आरक्षण का मुददा ही अपने आप में इतना संवेदनशील है कि कुछ भी कहना विवाद को विषय बन सकता है, चाहे पक्ष में होइए, विपक्ष में या चुप रहिए तो भी। फिल्म में आरक्षण से जुडे सभी पहलूओं को गोया इस तरह से छू लिया गया है कि फिल्म किसी एक पक्ष को तो कतई संतुष्ट नहीं करती है..और सभी पक्ष क्या करें। इसमें प्रकाश झा की चालाकी और समझ को सलाम करना चाहिए या दूसरे शब्दों में कहें तो व्यवसायिक जरूरतों के बरक्स प्रकाश झा मजबूर थे कि इस संवेदनशील विषय पर ऐसी ही फिल्म बना पाते और धीरे-धीरे चतुराई से फिल्म को आरक्षण से हटाकर शिक्षा व्यवस्था पर चोट करती सवाल खडे करती फिल्म के रूप में याद करने लायक ही बनाते। फिल्म का मीडियम यही इजाजत देता है, ऐसा कहना शायद जल्दबाजी होगी हो, पर माफ कीजिए, यह बेशक कहा जा सकता है कि व्यवसायिक सिनेमा इसी की इजाजत देता है, किसी हद तक यह कहना ठीक हो सकता है। वैसे हमारे लोकतंत्र का बडा सच यह है कि जब कोई मसला राजनीतिक रंग अख्तियार कर ले तो इस बात की गुजाइश क्या बहुत कम नहीं हो जाती कि उसका समाधान कम वक्त में निकल जाए... ऐसा सोचना खाम खयाली भी माना जा सकता है।  यही बात आरक्षण को लेकर भी है अब जब कि प्रायः लोग मान चुके हैं कि आरक्षण सामाजिक न्याय की जरूरत है और चाहे कुछ तबकों के बेमन से ही सही इसे व्यवस्था में लागू करना तो भारतीय समाज से बढकर अब भारतीय राजनीति की बडी अपरिहार्यता है।

थोडा व्यक्तिगत होने की मोहलत लेते हुए कहूं कि मैं उस पीढी में हूं जिसने मंडल के बाद देश को बदलते और खुद को उस  बदलाव का हिस्सा बनते हुए देखा है, यह समय के साथ देखा है कि जो तबके विरोध में थे वे भी उसी पंक्ति में आकर खडे हो गए हैं  बेशक इनमें भी कुछ लोग हैं जो आर्थिक आधार पर सरकारी सुविधाओं के हकदार हैं, और बहुत हद तक शायद आरक्षण के भी।

वापिस फिल्म पर लौटें तो कहना चाहिए कि सिनेमा कथा कहने का जीवंत विजुअल माध्यम है यानी फिक्शन का । और उसे समस्त कला माध्यमों से विकसित और उन्नत कला माध्यम माना जाता है क्योंकि उसमें पेंटिंग,  साहित्य- (कहानी और कविता दोनों),  संगीत, फोटोग्राफी आदि का समावेश है। फीचर फिल्में जैसा हम सब जानते हैं कथा फिल्में होती हैं कथा में सच कितना हो यह बहस का विषय हो सकता है । वैसे भी भारत में कितने निर्देशक रियलीस्टिक सिनेमा बनाते हैं, उसमें भी राजनीतिक सिनेमा तो और भी कम। यही वजह है कि भरत में बायोपिक सिनेमा नहीं बनता है मुददों पर ही फिल्म नहीं बना सकते तो व्यक्तियों पर कैसे बना के दिखा पाएंगें... शायद यही वजहें है कि बवंडर बनाने वाले फिल्मकार दोस्त जगमोहन मूंदडा की एक राजनीतिक फिल्म रिलीज के इंतजार में हैं ...देखना होगा कि संजय पूरणसिंह चौहान जिन्होनें पिछले दिनों संजय गांधी पर फिल्म बनाने की घोषणा की है बना के प्रदर्शित कर पाते हैं कि नहीं। बहरहाल, यहां हमें प्रकाश झा को सलाम करना चाहिए उनके साहस के लिए कि वे राजनीतिक सिनेमा बना रहे हैं और लोगों तक पहुचाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं, आप उनसे सहमत है कि असहमत हैं यह बाद की बात है।

सवर्ण पात्र की आर्थिक हालत दिखाते हुए सहानुभूति पैदा करना फिल्म का वह प्रसंग है जो सवर्ण आरक्षण की मांग का परोक्ष समर्थन करता लगता है। दलित नायक सैफ के तर्क पूरी फिल्म की वह थिसिस है जो सवर्ण पात्र की पूरक थिसिस के साथ मिलकर एक मुकम्मल तस्वीर बनाते हैं। यह भी कहना जरूरी लगता है कि अमिताभ की स्थिति तो पक्ष विपक्ष के बीच फंसी सरकार की सी दिखाकर निर्देशक फेंटेसी में जैसे कई सच परोक्ष में जाहिर कर देना चाहता है।

इस लिहाज से सवाल अभिव्यक्ति का भी है पर उसका अपवाद किसी को ठेस पहुचाने की आजादी कतई नहीं होता है, इस लिहाज से मुझे नहीं लगता कि प्रकाश  झा किसी को ठेस पहुचाने का काम कर रहे हैं, राजनीतिक हितों को ठेस पहुचती है तो वह तो साहेब अभिव्यक्ति के दायरे से बाहर की बात ही कही जाएगी ना! फिल्म से मेरी भी असहमतियां हैं पर वे असहमतियां यह इजाजत मुझे नहीं देती कि कहूं भई फिल्म नहीं चलनी चाहिए।  दूसरे, यह कोई महान फिल्म नहीं है, एक व्यवसायिक फिल्म है, कभी मेरे प्रिय निर्देशक रहे प्रकाश झा की परंपरा की भी नहीं है, कह देना चाहिए कि मैं उनसे निराश हुआ हूं, पर इस निराशा में भी उनकी फिल्म के प्रदर्शन को रोकने का पक्षधर नहीं हो सकता।

आपको याद ही होगा कि हाल ही में हरियाणा व उत्तर प्रदेश के पश्चिमी भाग में 'खाप' फ़िल्म पर प्रतिबंध लगाने की मांग की गई थी और कई सिनेमा हॉल वालों ने उनके दबाव में आकर यह फ़िल्म अपने यहाँ नहीं लगाई थी। इससे पहले मधुर भंडारकर की 'ट्रैफिक सिग्नल' को हिमाचल प्रदेश में, आमिर खान की 'फ़ना' और राहुल ढोलकिया की फ़िल्म 'परज़ानिया' को तो गुजरात में प्रदेश सरकारों ने प्रतिबंधित कर ही दिया था। वैसे सोचने की बात तो यह भी है कि किताबों, चित्रों, फिल्मों पर प्रतिबंध की परंपरा से ज्यादा जरूरी क्या बहस की परंपरा नहीं होती! दरअसल हम लोग यह मान लेते हैं कि जिसके साथ खडे नहीं हो सकते, उसे जीने का अधिकार तक नहीं है, उसके साथ जीना तो मासूम सा ख्वाब है। यहां सवाल खडा हो जाता है कि तो हम विरोधियों को दुश्मन कब तक मानते रहेगे! इतना ही नहीं यह सवाल भी खडा होता ही है कि क्या हमें नहीं मान लेना चाहिए कि सेंसर बोर्ड के बेमानी होते देखने का दौर है ये ! ''आरक्षण'' चल पाती है या नहीं पर फिलहाल इतना तय है कि सेंसर का होना और चलना संदेह के घेरे में आ गया है।

Thursday, July 21, 2011

सियाह से सफ़ेद हो गयी ज़िन्दगी


हमारे समय के मशहूरोमारूफ फिल्मी गीतकार और इल्मी शाइर इरशाद कामिल से हम रूबरू हुए तो उन्होंने दिल से जो कहा, आपके सामने हाजिर है....



अपने बचपन के बारे में बताइए .

बचपन, पंजाब के एक कसबे मलेरकोटला में, दिहाड़ीदार मजदूरों के बच्चों के साथ बीता. उन्ही के साथ मिटटी भी खाई और मार भी, गुल्ली डंडे से लेकर गली क्रिकेट तक खेला. उनमें और मुझमें सिर्फ इतना सा अंतर था कि वो हर सुबह काम पे जाते थे और मैं स्कूल. उस समय यकीनन मुझे अपना काम स्कूल जाना उनसे कहीं ज़्यादा मुश्किल लगता था.


शाइराना तरबियत कैसे हुई ?


मेरा भाई जावेद जो मुझसे ५ साल बड़ा है और उससे भी ३ साल बड़ा भाई जब नए नए जवानी में कदम रख रहे थे तो अचानक उनका रुझान रूमानी शायरी की तरफ होने लगा. हालाँकि मेरे सबसे बड़े भाई सलीम को बाकायदा गीत और फ़िल्मी किस्म की कहाह्नियाँ लिखने का शौक़ था क्योंकि वो फिल्म जगत में आना चाहता था लेकिन घरेलु जिम्मेदारियों के कारण और पिता जी का सहयोग न मिलने के कारण वो आ नहीं पाया. जवान होते भाइयों के रूमानी शायरी के शौक़ ने मुझे शायरी जैसी चीज़ के प्रति थोडा उत्सुक कर दिया. उनका शौक़ तो आल इंडिया रेडियो पर 'आबशार' प्रोग्राम सुनकर ख़त्म हो गया लेकिन मुझे ये लत लग गयी.



शाइर पहले खबरनवीस हुआ और फिर फिल्मी गीतकार ये सफर कैसे मुमकिन हुआ? कब लगने लगा कि आप फिल्मी गीत लिखने के लिए पैदा हुए हैं ?


मुझे बहुत पहले एहसास हो गया था कि घडी के काँटों से बंधी ज़िन्दगी मेरे लिए नहीं है. मतलब किसी दफ्तर में ९ से ५ तक बध पाना मेरी फितरत में नहीं. इसलिए खबरनवीसी पकड़ ली क्योंकि इस काम में सारा दिन दफ्तर में नहीं बैठना पड़ता, पत्रकारिता का डिप्लोमा मेरे पास था ही. उसके अलावा समाज भी पत्रकारों को थोडा भय से देखता था/है. सारा दिन अपनी खटारा मोटर सायकल पर सड़कों से दोस्ती और शाम को एक डबल कालम रिपोर्ट, बस यही थी ज़िन्दगी. लेकिन इसके साथ साथ जो चीज़ मेरे हमकदम थी वो थी मेरी कलम जो उन दिनों बहुत कवितायेँ लिखती थी. और कभी कभार एल्बम के लिए १००-२०० में कोई गीत भी लिख दिया करती थी. हालांकि मैं अपने आप को न कभी गीतकार लगा हूँ, न कहानीकार, न नाटककार सिर्फ कलमकार लगा हूँ जो ये सभी कुछ बहुत आसानी से लिख सकता है. जो उन विधाओं में भी लिख सकता है जिनको अभी कोई नाम नहीं दिया गया.



पहली फिल्म कैसे मिली जिसके गाने आपने लिखे ? इस सफर की शुरूआत में बहुत मुश्किलें पेश आई होगी!


किसी दोस्त ने जोर डालकर संगीतकार सन्देश शांडिल्य के पास भेज दिया था, हालांकि किसी के पास काम मांगने जाना या काम करने के बाद पैसे के तकाज़े के लिए जाना मुझे कभी अच्छा नहीं लगा. उस दोस्त ने काम मांगने नहीं सिर्फ मिलने भेजा था. मैं सन्देश से मिला, सन्देश ने पूछा क्या करते हो? मैंने कहा लिखता हूँ. उसने पूछा क्या लिखते हो? मैंने कहा सब कुछ लिखता हूँ. उसने पूछा गीत लिखते हो? मैंने कहा गीत अगर कोई कहे तो वैसे ज़्यादातर ग़ज़ल लिखता हूँ. उसने कहा कुछ सुनाओ. सन्देश का इतना कहना था कि मैंने एक के बाद एक उसे अपनी २०-२५ ग़ज़लें सुना दीं. सन्देश शायद काफी प्रभावित हो गया था इसीलिए शायद उसने मुझे इम्तिआज़ अली से मिलवा दिया जो उस समय 'सोचा न था' बना रहा था. मैं और इम्तिआज़ जब मिले तो लगा ही नहीं कि हम पहली बार मिल रहे हैं. 'सोचा न था' कि मेरी पहली फिल्म मुझे इतनी आसानी से मिल जाएगी.


जिंदगी कितनी बदली फिल्मी गीतकार होने के बाद ?


सियाह से सफ़ेद हो गयी ज़िन्दगी, आम रिसाले से पुराण-वेद हो गयी ज़िन्दगी, खुली किताब से छुपा हुआ भेद हो गयी ज़िन्दगी, बहुत सी ख़ुशी और थोडा खेद हो गयी ज़िन्दगी...क्योंकि ज़िन्दगी के साथ थोडा खेद थोडा अफ़सोस थोडा गिला हमेशा रहता है इंसान को.



पंजाबी, हिंदी, उर्दू और अंग्रेजी जुबानों का इस्तेमाल रामकथानुमा गीत.. इतनी विविधता को कैसे साध लिया आपने ?

पंजाबी मेरी माँ बोली है, हिंदी स्कूल, कालेज, यूनीवर्सिटी में पी एच डी तक पढ़ी है, उर्दू मेरी दीनी जुबान है और अंग्रेजी आज के समाज में रहने की मजबूरी ने सिखा दी. हिंदी साहित्य पढने के कारण या यूँ कहिये तुलसी, सूरदास, मीरा, कबीर और छायाबाद ने सब कुछ आसन कर दिया मेरे लिए.



दूसरों के लिखे ऐसे गीत जिनको सुनकर लगता हो कि काश मैंने लिखा होता ?

वो सभी गीत जो अच्छे है और दूसरों ने लिखे हैं काश उन्हें मैंने लिखा होता.



अब इस गीतकार की दिनचर्या क्या रहती है?

सुबह मर्ज़ी से उठना, फिर बहुत देर चुपचाप बैठे रहना, फिर तैयार होकर मीटिंग्स और सिटिंग्स के लिए निकल जाना, रात को देर तक कभी काम होने के कारण और कभी नाकाम होने के कारण जागना, शब्दों और विचारों के जंगल में भटकना, कुछ लिखने की कोशिश करना फिर इस अफ़सोस के साथ सो जाना कि आज कुछ अच्छा नहीं लिख पाया और अगली सुबह फिर इस उम्मीद से जागना कि आज ज़रूर कुछ अच्छा लिखूंगा.



पुराने दोस्तों से राब्ता कायम है अभी ?

पुराने "सच के" सभी दोस्तों से वैसा ही राबता बरकरार है. न वो बदले हैं न मैं ही बदल पाया हूँ. न वो अपने पुरानेपन से बाज़ आते हैं न मैं.



अदबी शाइरी से रिश्ता बना हुआ है क्या अभी भी? उम्मीद करें कि शाइर इरशाद कामिल का कोई शेरी मजमुआ मंजरेआम पर आने वाला है ?

फ़िल्मी शायरी के साथ इल्मी शायरी बाकायदगी से जिंदा है. उर्दू मुशायरों में अक्सर शिरकत करता हूँ दो हफ्ता पहले ही हैदराबाद गया था. हिंदी कवि सम्मलेन वाले नहीं बुलाते शायद इसलिए क्योंकि मेरी हिंदी कवितायेँ समझ आ जाती हैं लोगों को इसीलिए शायद वो उन्हें मयारी नहीं समझते.



लिखने के अलावा क्या करने की ख्वाहिशें हैं?
हज़ारों खवाहिशें ऐसी कि हर खवाहिश पे दम निकले.



दस साल बाद इरशाद कामिल को किस रूप में तसव्वुर करते हैं?
दस साल बाद अगर इरशाद कामिल रहा तो इंशा अल्लाह दस कदम आगे होगा और दस गुना बेहतर इंसान होगा.



जिंदगी को कैसे देखते हैं?

ज़िन्दगी हरहाल में खूबसूरत है अगर आपको देखना आता है.



आस्तिक हैं ? क्या कभी लगा नहीं कि ''कैसा खुदा है तू ,बस नाम का है तू'' लिखने से फतवा झेलना पड सकता है ?

बेहद आस्तिक हूँ. एक मुस्लिम जमात ने इस बात पर बवाल किया भी था. लेकिन ये वो मुस्लिम जमात थी जिसने न मुस्लिम धरम को अच्छी तरह समझा था न मेरे गीत के इस बंद को, ख़ैर जिन्हें बन्दगी समझ नहीं आई उन्हें बंद क्या समझ में आएगा. मैंने लिखा था…



माँगा जो मेरा है जाता क्या तेरा है

मैंने कौन सी तुझ से जन्नत मांग ली

कैसा खुदा है तू बस नाम का है तू

रब्बा जो तेरी इतनी सी भी न चली


यानि मैंने वो चीज़ मांगी है जो मेरी है...मतलब मोहब्बत. मैंने वो चीज़ नहीं मांगी जो तेरी है...यानि जन्नत. हर इंसान अपनी मोहब्बत का मालिक है वो किसी को दे न दे, खुदा जन्नत का मालिक है वो किसी को दे न दे. अपनी चीज़ मांगने पर भी अगर न मिले तो बन्दगी का क्या मतलब?


''मिल जा कहीं समय से परे...'' जैसा दर्शन इरशाद कामिल इक्कीसवी सदी के फिल्मी गीतों में कैसे ले आते हैं?

मुश्किल बात अगर आसान भाषा में कही जाये तो आसान हो जाती है. मेरे लिए फ़िल्मी गीत आटा हैं, आटा जो पेट भरता है. साहित्य नमक है, नमक जो स्वाद बनाता है. मैं आटे में नमक बराबर साहित्य डालता हूँ फ़िल्मी गीतों में. साहित्य में दर्शन भी है और आकर्षण भी.



कोई क्यों ना प्यार करे इस मानीखेज, फलसफे से भरपूर शाइरी करने वाले शाइर को और जो उसे फिल्मों में मुमकिन बना लेता है, कोई हल्का और चलताऊ गीत आज तक उसने नहीं दिया है ??

फिल्मों में आने के बावजूद मैं समाज के प्रति लेखक की ज़िम्मेदारी को भूल नहीं पाया. मैं सिर्फ वही काम करता हूँ जिसकी वजह से मेरी नज़र नीची न हो. चलताऊ या खोखले गीत आपको शोहरत और पैसा दिलवा सकते हैं इज्ज़त और सकून नहीं.

Tuesday, June 7, 2011

रामदेव अन्ना नहीं हैं, ना ही अब बाबा हैं !


आप में से ज्यादातर लोग मुझसे सहमत होंगे कि बाबा रामदेव संत नहीं हैं, योगाचार्य हैं, जिन्होंने भारत और दुनिया में योग को एक ब्रांड बनाया है, जाहिर है कि उन्हें बेचना आता है, किसी भी आयआयएम या हावर्ड बिजनेस स्कूल के पास आउट से ज्यादा बेहतर तरीके से



बाबा की बाबागिरी जिन बादलों से घिर गई है, शायद बाबा ने भी नहीं सोचा होगा। ऐसे कोई भी नहीं सोच सकता, बेचारे बाबा क्या सोचेंगे! एक खुद को संत कहलवाने वाला व्यक्ति देश सेवा के नाम पर राजनीति करने लगता है, और राजनीतिक साधनों का इस्तेमाल करते हुए अपनी ही राजनीतिक चाल में फंस जाता है, इसे क्या कहेंगे, संत से धोखा या कि संत की कुटिल राजनीतिक चाल का पर्दाफाश होना। खैर आप दोनों ही मान सकते हैं या जो आपका दिल करे, मान लीजिए!

पहली बात तो हमें यह देखने की जरूरत है कि बाबा अन्ना नहीं है, अन्ना का कोई प्रत्यक्ष या परोक्ष साम्राज्य नहीं है, दूसरे उनकी कोई राजनीतिक महत्वाकांक्षा नहीं है, प्रकटतया उन्हें मीडिया मोह भी नहीं है, एक करोड का पुरस्कार अस्वीकार वही कर सकते थे, बाबा नहीं, मुझे लगता है कि बाबा तो अपनी योगपीठ के लिए आने वाले दान की बछिया के दांत नहीं गिनते होगे!

आप में से ज्यादातर लोग मुझसे सहमत होंगे कि बाबा रामदेव संत नहीं हैं, योगाचार्य हैं, जिन्होंने भारत और दुनिया में योग को एक ब्रांड बनाया है, जाहिर है कि उन्हें बेचना आता है, किसी भी आयआयएम या हावर्ड बिजनेस स्कूल के पास आउट से ज्यादा बेहतर तरीके से। पर मेरी मासूम जिज्ञासा के लिए क्षमा करें कि भारतीय परंपरा के मुताबिक तप वे कैसे करते होंगे, मुझे माफ कीजिएगा, संदेह है, आत्मावलोकन और तप के बीच में ही उनके योग कैंप आ जाते होगे! स्वीकारता हूं कि योग और भारतीयता के पुनरूत्थान के लिए उनकी नायकीय छवि मेरे अंदर भी रही है, पर मुझे कहने की इजाजत दीजिए कि बाबा के चेहरे पिछले दिनों में उजागर हुए हैं, उन्होंने मुझ जैसे अनेक भारतप्रेमियों के मन में उनकी छवि को भंग नहीं तो कम से कम धूमिल जरूर किया है। भारतीयता से बढ़कर हिंदूवादी सिद्ध होते चले जाना और लोगों से मिले चंदे को चंदे के रूप में भाजपा को देने की खबरों का आना उनके कद को बौना करने के लिए काफी नहीं था क्या! अब कांग्रेस के साथ गुप्त समझौता और उसकी पोल खुलने पर चिल्लाना क्या उन बलात्कारों की दर्ज रिपोर्टों जैसा नहीं है, जिसमें आपत्तिजनक अवस्था में पकडे जाने पर जबरदस्ती का इल्जाम लगा के अपने आपको पाक साफ साबित करने की कोषिष होती है।

खैर, चाहे उनकी नीयत साफ हो, वे एक बेहतर भारत चाहते हों पर इस प्रकरण से उनकी छवि को नकारात्मक नुकसान ही हुआ है, पहले तो राजनीतिक हल्कों में यह माना गया कि गैर राजनीतिक कद्दावरों में अन्ना की छवि से खुद की छवि को कमतर होता देखते हुए इस सत्याग्रह की योजना बनी। दूसरे एक उभरते जननेता चाहे राजनेता वे ना कहलाना चाहें तो उसका यूं भागने की कोशिश करना, और मूर्खतापूर्ण बयान कि उनका एनकाउंटर करने वाली थी सरकार! जबकि लोकतंत्र का थोड़ा सा भी जानकार यह दावे के साथ कह सकता है कि बाबा रामदेव को मारकर सरकार अपनी राजनीतिक आत्महत्या का इंतजाम कभी नहीं करेगी, और अगर ऐसा होता तो उन्हें सरकारी विमान से देहरादून नहीं छोडती, बीच में बाबा गायब भी हो सकते थे। ऐसा हास्यास्पद बयान बाबा की बौद्धिक छवि का घोर अवसान प्रतीत होता है।

वैसे, मेरी एक जिज्ञासा यह भी है कि जरूरत पडने पर एक बार भगवा वेश छोडने पर क्या उन्हें बाबारूप से विचलित भी नहीं मान लेना चाहिए या फिर यह मान लिया जाए कि बाबा या फिर सामान्य स्त्री जैसा कोई वेष दोनों में उन्हें कोई अंतर नहीं दिखता, ऐसा है तो मैं भारत के सारे धर्माचार्यों, शंकराचार्यों से निवेदन करता हूं कि बाबा के वेश के प्रति उनकी प्रतिबद्धता पर भी सवाल उठने चाहिए। इसकी शुरुआत शंकराचार्य स्वरूपानंद सरस्वती ने कर दी है जिन्होंने कहा है कि बाबा का साम्राज्य 11 हजार करोड रूपए का है, बाबा रामदेव को भ्रष्टाचार को खात्मे का प्रारंभ अपने घर से करना चाहिए। स्वरूपानंद का यह कहना भी मायने रखता है कि बाबा अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षा के लिए यह सब कर रहे हैं। यहां क्या उनके कार्यकर्ताओं को उनसे नहीं पूछना चाहिए कि बाबा आप रहनुमा थे, आप को तो आगे बढ के गिरफतारी देनी चाहिए थी, आप मर्दानगी छोडकर स्त्रीवेश में भाग गए, हम डंडे खाते रहे, क्या ये सच्ची रहनुमाई है! हालांकि डंडे खाकर भागने वालों में कितने उनके वैचारिक समर्थक थे, कितने योग अनुयायी और उनकी आयुर्वेदिक दवाई बेचने वाले रिटेलर, अभी कहना मुश्किल है, मेरी राय यह भी है कि अगर उनमें ज्यादातर राजनीतिक विचार के समर्थ होते तो भागते नहीं! हां, यह तय है कि राजनीतिक कार्यकर्ता तो उस भीड में न्यूनतम ही होगे वरना राजनीतिक करिअर के लिए डंडे खाकर भी अड़े रहते!

क्या बाबा से हमें नहीं पूछना चाहिए कि केवल पांच हजार लोगों के लिए योग शिविर की अनुमति लेकर भी पचास हजार की भीड़ बुलाकर उन्होंने क्या उस सरकारी अनुमति का मजाक नहीं उडाया है, फिर अगर उस भीड़ पर अगर सरकरी कार्रवाई हुई तो बाबा जी दोष केवल सरकार का ही क्यों है! और फिर कुटिल अकेले कपिल सिब्बल ही क्यों है, आप भी तो हैं! वे तो राजनेता है, उनका आचारण तो वैसा ही है जैसा आप या तमाम भारतीय मानते हैं, जिसके लिए हम उन्हें कोसते हैं, पर आपका आचरण भी वैसा ही नहीं है, क्या और आगे जाकर आपका व्यवहार और ज्यादा भारतीय लोकतांत्रिक व्यवस्था जैसा नहीं हो जाएगा! हमें बताइए कि आप उनसे अलग कैसे खड़े हैं! आपसे तो हम और पूरा देश आचारण में शुचिता की उम्मीद करते हैं। क्या ये उम्मीदें बेमानी हैं?

आखिर में, मुझे कह देना चाहिए कि लालू की चिंता वाजिब है, मुझे खुशी है कि देश को नया नेता मिल गया है जिसे देश की चिंता है, राजनीति की पहली परीक्षा उन्होंने ऊंचे दर्जे में पास कर ली है, आत्मप्रचार, मीडिया मोह, गुप्त समझौता, सरकार पर मारने का इल्जाम, मौके के मुताबिक जुबान और वेश बदलने जैसे सारे काम बाबा ने बखूबी किए हैं, नेताओं को अब इसे चुनौती मानना ही चाहिए। बेशक बाबा को बतौर हिंदुस्तानी संविधान के अनुसार राजनीति में आने का हक है, यह सोचना जनता का काम है कि योग के बहाने से वे अपनी राजनीति की नींव डाल रहे थे, ऐसे व्यक्ति को स्वीकारना चाहिए या नहीं! वे सिखा योग रहे थे, पर एजेंडा कुछ और था, और राजनेता राजनीति करते हैं, पर दरअसल कुछ और रहे होते हैं, तो रामदेव भी निश्चित ही प्रकारांतर से वहीं आके खडे हो जाते हैं, आगे से क्या भारतीय हर संत को राजनीति के रंगरूट के तौर पर नहीं देखेगे या उन्हे नहीं देखना चाहिए। हम तो इतना ही कह दें -'' वो सबसे जुदा है तो जुदा ही लगे, वो सबसे खफा है तो खफा ही लगे!'' आमीन!

Monday, May 23, 2011

''दूसरों के अंतस से जोड़ती है कविता''




इंग्रिड स्टोरहॉमेन भारत दूसरी बार आई हैं, उन्होंने तुलनात्मक साहित्य की पढ़ाई की है, दो कविता संग्रह आ चुके हैं। एक कथात्मक रिपोर्ताज लिखा है चेर्नोबिल पर, जिस पर उन्हेंं नार्वे का प्रतिष्ठित सुल्ट सम्मान प्राप्त हुआ है..
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काफी हाउस की आखिरी टेबल, जहां से स्मोकिंग जोन शुरू होता है, अपने लैपटॉप पर तेजी ग्रोवर की कविताओं का अनुवाद करते हुए थमी इंग्रिड स्टोरहॉमेन को एक सिगरेट ब्रेक की जरूरत थी। मुझे ऑफर किया तो मैंने जवाब दिया कि मैं खुशकिस्मत नहीं हूं। मेरी बात के जवाब में उनका ठहाका धुएं के छल्लों में घुल-मिलकर उस टेबल पर बिखर गया और गंध ने मुझे भी अपने आगोश में ले लिया। पड़ोस की टेबल पर कुछ किशोरों का समूह अठखेलियों, शरारतों में मुब्तिला है और अगली टेबल पर एक युवा जोड़ा जेरेबहस है। उस हंसी में शामिल था बहुत कुछ।

वह इंग्रिड हैं, भारत दूसरी बार आई हैं, उन्होंने तुलनात्मक साहित्य की पढ़ाई की है। दो कविता संग्रह आ चुके हैं, एक कथात्मक रिपोर्ताज लिखा है चेर्नोबिल पर, जिस पर उन्हें नार्वे का प्रतिष्ठित सुल्ट सम्मान दिया गया है। सुल्ट का अर्थ है- भूख। सुल्ट दरअसल नार्वे के नोबेल विजेता लेखक हाम्सुन का चर्चित उपन्यास है, जिसके नाम पर ये सम्मान दिया जाता है। वो अपने बारे में बताती हैं कि ओस्लो में छ: साल तक कॉलेज की पढ़ाई की, अब पूर्णकालिक लेखक हैं, पिछले दस साल से, चार किताबें और फिलहाल एक उपन्यास कुछ अनुवाद और कुछ छिटपुट काम में लगी हैं। नार्वे सरकार की एक राइटर फैलोशिप पर भारत आई हैं और इसके तहत एक किताब लिख रही हैं। भोपाल में कई भारतीय कवियों को वह सुन आई हैं, कोलकाता घूम लिया है, ईसाई मिशनरियों के काम, उनकी कार्य शैली और विरासत से प्रभावित हुई हैं।

वे बताती हैं कि उनका दूसरा कविता संग्रह फॉर्म आधारित कविताओं का संग्रह है अब उन्होंने भारतीय कवियों का अनुवाद भी शुरू किया है उनमें पहला नाम तेजी ग्रोवर का है। मैं उनसे पूछ बैठता हूं कि भारतीय और नार्वेजियन कविताओं में क्या अंतर पाया है तो वे सोच में पड़ गईं। मुझे लगा कि मैंने जल्दबाजी की है, जबकि इंग्रिड ने अभी भारतीय कविताओं से साक्षात्कार किया ही है, पर उसने जो जवाब दिया वह यह था -'' मुझे लगता है कि नार्वे की कविताएं ज्यादा अंतर्मुखी और राजनीतिक है। मुझे लगा कि भारतीय कवि फिजिकल कविता को ज्यादा पसंद करते हैं। हालांकि इसे मेरा शुरुआती निर्णय भी कहा जा सकता है और संभव है कि कुछ और कवियों को पढऩे के बाद मेरी धारणा पूरी तरह बदल जाए।''

इस समय मुझे महसूस होता है कि सही समय है, जब मुझे इंग्रिड से उनके पसंदीदा कवियों के बारे में और उनकी पसंदीदा कविता के बारे में पूछ लेना चाहिए, मैं पूछ लेता हूं तो वे कहती हैं -'' ग्रीक माइथोलॉजिकल कविताएं मुझे प्रिय हैं वहीं रिल्के और मारिना स्वेतायेवा भी मेरी पसंद में शामिल हैं।'' थोड़ा रुककर वह कहने लगती हैं कि दरअसल मुझे लगता है कि कविता मेरे अंतस को दूसरों के अंतस से जोड़ देती है। जब इसके बाद उन्होंने यह कहा कि उसे बौद्धिक तत्वमीमांसीय कविताएं पसंद हैं, तब मुझे लगा कि जरूर वह दर्शन की छात्रा रही हैं तो उसने कहा -'' कुछ औपचारिक, कुछ अनौपचारिक। कविता और भाषा उसे जीने के लिए जगह उपलब्ध कराते हैं, शायद मन का सा जीवन, जो अन्यथा असंभव सा हो।'' शायद सब लेखक और कवि ऐसा ही चाहते हैं, इंग्रिड फिर कहां अलग हैं। वह भी सच्ची और पक्की कवयित्री हैं।

उनकी पहली सिगरेट कब की खत्म हो चुकी थी, मुझे पता ही नहीं चला, अब इंग्रिड दूसरी के लिए व्याकुल थीं।

Saturday, May 21, 2011

2050 तक भारत का विभाजन जातीय आधार पर हो जाएगा! / बेहतर दुनिया एक असंभव ख्वाब है !


जातीय गणना की परिणति जो मुझे नजर आती है वह यह है कि किसी भी विधानसभा या संसदीय क्षेत्र में आनुपातिक रूप से कम जनसंख्या वाली जाति के लोग कभी प्रतिनिधि नहीं हो पाएंगे क्योंकि कोई राजनीतिक दल उन्हें टिकट ही नहीं देगा...
इन हालात में 2050 तक भारत को कई विभाजनों के लिए तैयार रहना चाहिए, और तब विभाजन के आधार धर्म नहीं, जातियां होंगी!



अब साधु भी जाति वाले होते हैं, हमारे समय के एक लोकप्रिय संत कैंसर का इलाज करते हैं, मगर जाति उनके नाम के साथ संत होने के बावजूद जुड़ी है, जो जातीय बोध से मुक्त नहीं हो पाए, मुझे माफ करें वे कितने संत हुए हैं, मेरी चिंता और जिज्ञासा है! यह अब सिद्ध और प्रसिद्ध है कि राजनीति की अस्तित्वमूलक जरूरत है जाति, पर दुख तब होता है जब बौद्धिक लोग आर्थिक स्थितियों के अंदाजे के लिए सामाजिक आधार की गणना को सही ठहराते हैं। मुझे क्षमा कीजिए, इतिहास का छात्र होने ने यह समझ दी है कि धर्म ने आर्थिक आधार पर समाज का बंटवारा किया और उसका आधार कर्म था और समय के साथ उसका आधार जन्म हो गया। अब अगर आर्थिक जरूरत से गणना करनी है तो आर्थिक गणना ही कर लीजिए साहेब! दूसरा यह कि मुझे समतामूलक समाजवादी समाज की कल्पना में जाति की यह निरंतरता बाधा नजर आती है, भारत के लिहाज से कहा जाए तो पूर्व वैदिक युग जिसे ऋग्वैदिक युग भी कहा जाता है, केवल कर्म आधारित वर्ण थे जो उत्तरवैदिक युग में जन्म आधारित हो गए। कहना जरूरी है कि ऋग्वैद के पुरुष सूक्त में आदि पुरुष के अंगो से वर्ण उत्पत्ति को भास शास्त्रीय आधार पर बाद में जोड़ा गया स्वीकार किया गया है।

अगर जातीय गणना को स्वीकार करने का कारण हम यह मानते हैं कि यह भारतीय समाज की कड़वी सचाई है, तो धर्म इससे पहले का सच है और धर्म के अन्यायों को भी हमें कड़वा सच मानकर स्वीकार लेना चाहिए और सामाजिक विभेद को भी मान लेना चाहिए, और उसकी निरंतरता में कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए। मुझे हैरानी के साथ दुख है कि हमखयाल वामपंथी दोस्त भी इसके समर्थन में दिख रहे हैं, ऐसी संस्थागत पैदाइश जिसका जनक धर्म है, उसे कैसे स्वीकार पा रहे हैं, फिर धर्म को भी स्वीकार करना चाहिए, क्या यह धार्मिक स्वीकार बाबा माक्र्स की सोच से विरोधाभासी नहीं है!

मुझे यह भी प्रकारांतर से लगता है कि सामाजिक सुधार की एनजीओवादी एजेंडे की जरूरत भी जातीय निरंतरता है। संभव है कि गांधी द्वारा जन्म आधारित जाति व्यवस्था का समर्थन करना उनकी भी राजनीतिक मजबूरी हो, जिसका अंबेडकर ने विरोध किया था, यह एक ऐतिहासिक सच और तथ्य है। इस जातीय गणना की परिणति जो मुझे नजर आती है वह यह है कि किसी भी विधानसभा या संसदीय क्षेत्र में आनुपातिक रूप से कम जनसंख्या वाली जाति के लोग कभी प्रतिनिधि नहीं हो पाएंगे क्योंकि कोई राजनीतिक दल उन्हें टिकट ही नहीं देगा, और फिर मतदान व्यवहार भी उत्तरोत्तर इसे प्रगाढ़ करेगा, कहिए कि क्या मैं गलत सोचता हू!

जिन लोगों की आंखों में बेहतर दुनिया का सपना अब भी झिलमिलाता है, बेहतर दुनिया का मतलब बिना हमारी रेशियल, एथ्नीकल पहचान के, समान वजूद और व्यवहार के साथ जी पाना है, उनके लिए भारत एक भौगोलिक संभावना बचा है, सेवा में सविनय निवेदन है कि अब मुझे नहीं लगता। अब भारत में जाति छोड़ो, भारत जोड़ो के नारे शायद ही कभी सुनाई दें। खुदा न करे, पर इन हालात में 2050 तक भारत को कई विभाजनों के लिए तैयार रहना चाहिए, और तब विभाजन के आधार धर्म नहीं, जातियां होंगी!

Tuesday, April 19, 2011

हर्फे जुनूँ सबकी जुबां ठहरी है



बिनायक सेन को देशद्रोही मानने से इनकार करते हुए भारत की अदालते आला का यह कहना बहुत मायने रखता है कि किसी के घर में नक्सली साहित्य मिल जाने से वह नक्सली ठीक वैसे ही नहीं हो जाता जैसे गांधी की आत्मकथा रख लेने मात्र से कोई गांधीवादी।


बिनायक सेन के बहाने कितना कुछ कहा जा सकता है ठीक वैसे ही जैसे अन्ना हजारे के बहाने। जब कभी इक्कीसवी सदी के दूसरे दशक का इतिहास लिखा जाएगा तो कहा जाएगा कि यह अन्ना और बिनायक का समय था जिसमें इरोम शर्मिला भी थी, और तीनों के साथ देश का सुलूक अलग अलग था। बिनायक सेन को लेकर भारत की अदालते आला का फैसला और उसकी भाषा दोनों ही महत्वपूर्ण हैं, आला अदालत का यह कहना बहुत मायने रखता है कि किसी के घर में नक्सली साहित्य मिल जाने से वह नक्सली ठीक वैसे ही नहीं हो जाता जैसे गांधी की आत्मकथा रख लेने मात्र से कोई गांधीवादी। इस अहम फैसले के बाद आज क्या यह नहीं सोचना चाहिए कि आजाद भारत का सबसे बडा इतिहासकार रामचंद्र गुहा और अर्थशास्त्री आद्रे बेते क्यों उनके साथ खडे थे। क्यों दुनिया भर के बुद्धिजीवियों ने उनका समर्थन किया उनमें अमत्र्य सेन जैसे दर्जनों नोबेल पुरस्कार विजेता थे।

मेरी पहली अनौपचारिक मुलाकात बिनायक सेन से कोई दस बरस पहले शायद जेएनयू के ब्रह्मपुत्रा छात्रावास में हुई थी, यह एक सार्वजनिक मुलाकात थी, जब वे मैस में बुलाए गए थे, जब मैं करोलबाग के एक सस्ते से होटल में अपने एक ब्रिटिश रिसर्च स्कॉलर दोस्त के साथ रुका था और राष्ट्रीय अभिलेखागार की अपनी तय दिनचर्या को तोडक़र दिल्ली की सर्दी में दो बसें बदलकर उन्हें सुनने पहंचा था, हालांकि ठीक-ठाक सी व्यक्तिगत मुलाकात इसके सालों बाद हाल ही कुछ महीनों पहले जयपुर में पीयूसीएल के एक आयोजन में हुई। तब तक पिछली मुलाकात धुंधली हो गई थी, देखना भर जेहन में अटका हो तो बहुत, पर अब जो चेहरा सामने था, वक्त के निशान उस चेहरे पर कुछ इस तरह से थे कि शक्ल के नक्श बदल गए थे, कि चेहरा नया सा था। मेरा बहुत मन था कि उनके नक्सली संपर्को पर उनसे तीखे सवाल करूं कि क्यों वे मासूम मनुष्यों को मारने वाले लोगों के साथ खड़े नजर आते हैं? पर मैं स्वीकार करता हूं कि उनकी मासूमियत और सहज मानवीयता ने मुझे वे क्रूर सवाल करने से रोक दिया। हालांकि बहुत से मित्र लोग सेन की इस मासूमियत के दूसरे अर्थ निकाल सकते हैं, निकालेंगे ही, और निकालना उनका लोकतांत्रिक अधिकार भी है। पर क्या यही अधिकार सेन को दिया जाता है, यकीनन नहीं! उनसे मैंने पूछा- 'क्या योजना है? कल को किस उम्मीद से देखते है?' तो उनका जवाब था- 'जी पाना और बेहतर दुनिया के लिए खड़े लोगों का साथ देने की कोशिश करना।' ..
फिर कुछ समय बाद उनकी यह गिरफ्तारी हो गई और उसके बाद जो कुछ हुआ वह सब अखबारों में दर्ज है ही।

मुझे कहने में शर्म नहीं है कि कुछ महीनों पहले जब बिनायक सेन की पत्नी और बेटी जयपुर आए तो सामाजिक कार्यकर्ता और बिनायक समर्थक उनसे मिले, उनकी भीड़ के पीछे मैं भी कहीं खड़ा था, तब भी मेरा नैतिक समर्थन उन्हें था, जब मुख्य धारा का मीडिया उनके पक्ष में खड़ा होने से कतरा रहा था या उसकी जुबान बिनायक को लेकर कमोबेश वही थी जो उसे गिरफ्तार करने वाली पुलिस की थी या तदंतर सरकार की थी।

विश्वकप जीतने के उन्माद में डूबे देश को टीआरपी ढूंढते मीडिया ने अन्ना से मिलवा दिया, क्या अजीब बात नहीं है कि जो लोग पत्रकार सरकार विरोधी होने को देशद्रोह कहते थे, अन्ना के पक्ष में खडे हो गए जबकि अन्ना भी सरकार का ही विरोध कर रहे थे। संयोग ही है कि कोई सरकार विरोधी होकर नायक हो जाता है कोई खलनायक की हद तक खड़ा कर दिया जाता है बिनायक को खलनायक की हद तक ले जरने का तार्किक आधार यह दिया गया कि वे नक्सली समर्थक हैं और नक्सली सरकार विरोधी हैं, अब सर्वोच्च न्यायालय का यह कहना कि नक्सल समर्थन भी देशद्रेह नहीं है, बहुत बहुत मायने रखता है, यह अपने आप में एक नजीर है और भारतीय लोकतंत्र की ताकत भी। हालांकि संभावना थी भी और ऐसा हुआ भी कि बिनायक को फांसी चढ़1ने की मंशा रखने वाले लोग देशद्रोह के कानून को ही बदलवाने की मांग करेगे और ऐसी आवाजें उठने लगी हैं। यह फैसला इस लिहाज से भी देखे जाने की जरूरत है कि सरकार और देश में अंतर होता है और पुलिस ट्रायल खतरनाक होता है, पुलिस की बात को अक्षरश: स्वीकारना सरकार और मीडिया देानों के लिए ठीक नहीं है, उसके आधार पर बात करें तो एक मासूम सा सामान्यीकरण करने की गुस्ताखी करने की इजाजत दें कि पुलिस की नजर में क्या हर व्यक्ति अपराधी, हर स्त्री चरित्रहीन, हर संबध अवैध संबध नहीं होता है, ऐसा पुलिस महकमे में आला अफसर दोस्तों के मुख से भी सुना है कि क्या करें यार, ना चाहते हुए भी सोच लगभग ऐसी ही हो जाती है। पुलिस से आगे बढकर, मुझे एक भारतीय के रूप में कह और स्वीकार कर लेना चाहिए कि सामान्यीकरण करने की हड़बड़ी में कितने ही गलत निष्कर्ष निकाल लिए जाते हैं हालांकि दार्शनिक भाषा में यह भी एक सामान्यीकरण ही है।

तारीख गवाह है कि दुनिया में कितने ही उदाहरण है जब दार्शनिकों, लेखकों, कलाकारों को सरकार विरोधी कहकर जेलों में डाला गया। और ऐसे मामलों में प्राय: और बार- बार यह स्थापित हुआ है कि सरकार विरोधी होने और देश विरोधी होने में अंतर होता है, तानाशाह तो अपने खिलाफ को ही देश विरोधी मान लेते हैं क्योंकि अपने आप में वहीं स्वयंभू देश होते है। निसंदेह भारत में ऐसे उदाहरण कम है सिवाय एमरजेंसी के, तो यह उदाहरणों की अनुपलब्धता बनी रहे हमें ऐसी ईश्वर से प्रार्थना और हमें आपस में ऐसी कोशिश करनी चाहिए।

उम्मीद करें कि बिनायक के बाद पुलिस हर सरकार विरोधी को नक्सल समर्थक को देशद्रोही नहीं मानेगी और पुलिस के बयान और निष्कर्ष को मीडिया के लोग अंतिम सत्य नहीं मानेगे, (जबकि हम देखते हैं किसी भी अपराध समाचार में एक ही नजरिया होता है जो कि पुलिस की नजरिया होता है ) हम भारत को एक दुनिया का सबसे बडा ही नहीं परिपक्व और बेहतर लोकतंत्र भी कह सकेगे। आखिर में बिनायक की तरह देशद्रोह के आरोप में पड़ौसी मुल्क पाकिस्तान की जेल में बंद रहे फैज अहमद फैज जिनकी इस साल पूरी दुनिया में जन्म शताब्दी मनाई जा रही है, के शब्द याद कर लें- ''अब वही हर्फे जुनूँ सबकी जुबां ठहरी है, जो भी बात निकली है, वो बात कहां ठहरी है।''

Friday, April 8, 2011

साहित्य का आउटहाउस


हिंदी की मशहूर साहित्यिक पत्रिका 'कथादेश'(अप्रेल 2011) के मीडिया वार्षिकी अंक में मेरा लेख आया है, जो मीडिया और साहित्य की परस्पर अंतरक्रिया पर है, इसे आपसे यथा रूप बांट रहा हूं,

पूर्व कथन -
अपनी बात शुरू करने से पहले कहना ठीक रहेगा कि इसे पढने के बाद संभव है कि दोनों और के दोस्त मुझ पर टूट पडे पर फिर भी कहने की जुर्रत और जरूरत है, और दूसरी बात यह कि इसे अनाधिकारिक बयान भी माना जा सकता है पर यह सब कहने की गुस्ताखी इसलिए कर पा रहा हूं कि लगभग एक दशक से अंदर- बाहर रहकर दोनों के रिश्ते और बदलती स्थितियों को देखने का मौका मिला है.. और अंग्रेजी की कहावत रीड बिटविन दी लाइंस को दोहराते कहूं तो आगे की पंक्तियों में दोनों के तरफ के दोस्त अपनी पीडाओं को महसूस करेगे, ऐसा भी मुझे विरोधाभासी रूप से लगता है...


एक मासूम सा इत्तेफाक है कि अखबारवाले साहित्य को, साहित्यकारों को या तो हीन भाव से देखते है या गालियां देते हैं और कमोबेश यही हालत दूसरी तरफ भी है. जरा पतला करके बात करूं तो हिंदी में कम लोग बचे है जो अखबारनवीसी के पेशे में पढने से सरोकार रखते हैं, यहां पढने से तात्पर्य साहित्य से है या साहित्य से इतर नॉन फिक्शन गंभीर लेखन
से भी, मुझे माफ कीजिए, वो जमाना हवा हुआ जब साहित्यकार और पत्रकार भाई- भाई होते थे, कहा जाता था कि साहित्यकार पत्रकार का बडा भाई होता है... हुआ करता होगा साहिब, हिंदी में तो अब उत्तरोत्तर छोटा भाई महाभाई बन गया है और बडा भाई उसका मुखापेक्षी निरीह बुजुर्ग.

बहरहाल मीडिया के दोस्तों में जाहिर तौर पर लोक-लिहाज में थोडा बहुत सम्मान अब भी साहित्यकार और साहित्य का बचा हुआ है, इसे आंख की शर्म भी कह सकते हैं,

हालांकि मेरा मानना है कि पत्रकार का साहित्य या इससे इतर पढना बहुत जरूरी नहीं है पर इसके दो फायदे होते हैं, एक तो संवेदना को बनाए रखने में, दूसरा भाषा के निरंतर विकास में वह पढना मदद करता है...मुझे कहने में कोई परहेज नहीं है कि साहित्य से दूरी ने उन्हें संवेदनारहित बनाया है..और शायद हमारे समय की कॉर्पोरेट पत्रकारिता की जरूरत यह है भी तो इस लिहाज से यह जस्टीफिकेशन भी इसे हासिल है , तो पढना गैरजरूरी होना गैरवाजिब ठहराए वह तो पागल ही कहलाएगा.

अब इसे क्या कहेगे कि पत्रकारों की निगाह में पल्प साहित्य लिखनेवाले लेखक सच्चे और आइकननुमा साहित्कार हैं, तो बेस्टसेलर को उम्दा लेखन का मानक मानने वालों में अखबार के लोग सबसे पहले हैं, यह नजरिया साहित्य से जुडी खबर को अखबार में जगह से जुडा है क्योंकि प्रकारांतर से वहीं लेखक जो पत्रकार साहब की जानकारी में है, अखबार की खबर में जगह पाएगा. मुझे खुशी होती है जब कोई कहता है कि उसने इन दिनों यह किताब पढी है (और ऐसे अवसर दुर्लभ ही होते हैं) वरना प्रायः उनके लिए आज भी साहित्य का मतलब या तो प्रेमचंद है या फैशन के बतौर चेतन भगत. ..और मुझे हमेशा याद रहता है कि किसी भी कारण से पत्रकारों पर पडने वाली गालियां मेरे उस पेशे के भाईयों पर पडने वाली गालियां है जिससे मुझे दाल रोटी मिलती है.

अपनी आत्मा पर हाथ रखकर पूछिए कि क्या यह पिछले दशक की देन नहीं है कि अखबार में काम करने वाला पत्रकार यानी रिपोर्टर यर डेस्क वाला व्यक्ति अगर साहित्य के पास भी फटकता है तो गुनाहगार है, यहां तक कि इस अहसास को जन्म देने वाली कि मियां अगर इतना ही पढने लिखने का शौक था तो इस पेशे में आने की जरूरत ही क्या थी! और तुरंत यूं भी खारिज किया जा सकता है कि आपको खबर लिखनी क्या आएगी, और एक वक्त था जब माना जाता था कि आप लेखक है तो खबर भी अच्छी लिखेगे, मेरे पास एकाधिक उदाहरण है कि धर्मयुग आदि में प्रकाशित कहानियों के आधार पर बहुत से युवाओं को बडे समूहों में पत्रकारिता की नौकरी मिली और वे कालांतर में बडे नामी पत्रकार साबित हुए

अब जरा दूसरी तरफ का रुख कर लें, साहित्यकारों का वर्ग प्रायः अखबार के लोगों को मूर्ख मानकर अपना अहं तुष्ट करता है और उनमें खबर या इतर छपास की आकांक्षा या जरूरत ना हो तो शायद वे बात ही ना करें, इसके लिए मूर्ख से मूर्ख को भी वे महान पत्रकार और साहित्य संवेदना सम्पन्न कहने से नहीं चूकते.वे अक्सर गाली देते पाए जाते है कि अखबारों में साहित्य की जगह कम हो रही है मैं भी सहमत हूं, तथ्यात्मक तौर पर यह कहना सही है पर कोई संपादक को कहने की जुर्रत नहीं करता कि आप ऐसा नहीं करते, हमेशा यही कहा जाता है कि 'आप तो समझते है आपके हाथ बंधे है पर जो कर सकते हैं, वह ऐसा होना रोक नहीं रहे हैं ' और यह कहना उनके लिए भी ठीक ऐसा ही होता है जिनके लिए वे कहते है कि वे ऐसा कर सकते हैं पर कर नहीं रहे हैं .... जबकि मेरा तो यह मानना है कि साहित्य का छौंक पूरे अखबार में हो पर वह उसे गरिष्ठ ना बनाए कि केवल साहित्कारों का अखबार(साहित्यिक पत्रिका या शोध जर्नल जैसा कुछ होकर ) बनकर रह जाए और लोग उल्टी गिनती शुरू कर दें ..

मुझे गालियां दी जाती होगी, दी भी जाएंगी कि मुझे दुख नहीं होता कि अखबारों में साहित्य की तयशुदा जगहें कम हो रही हैं, पहली बात तो यह कि ये चिंताएं केवल साहित्यकारों की चिंताएं है, दूसरे, हिंदी के उन अध्यापकों की चिंताएं है प्रकारांतर से जिनके पांडित्यपूर्ण लेख छपने की जगहें नहीं बची हैं...दूसरे जब साहित्य को बचाने की जिम्मा हमारे पूरे समाज ने ही भुला दिया है, हम अपने बच्चों का साहित्य पढने के संस्कार नहीं देते, समझ-विचार और सरोकार की बजाय धन, सफलता और पता नहीं किन किन चीजों के ख्वाब दिखाते हैं तो अखबार से क्यों उम्मीद करें ? उन्हें क्यों ठेकेदार बनाते हैं, मेरी मान्यता है कि पब्लिक आइकन के तौर पर लेखकों को देखना समाज ने पहले छोडा, मीडिया ने बाद में, बेशक मीडिया की जिम्मेदारी कम नहीं है और आप मुझे कह सकते हैं कि ''तू भी है इस गुनाह में बराबर का शरीक अपने किस्से औरों को सुनाता क्या है ''

और कहना लाजिम है कि अखबार में साहित्य की उपस्थिति मुझे भी सुख देती है, वज्ह ये कि प्रकारांतर से मैं भी इसी जमात में हूं क्योंकि पत्रकारिता करते हुए भी हमेशा यह माना है कि जीवन का लक्ष्य तो अंततः स्वतंत्र लेखक के बतौर जीना संभव बनाना है

वैसे, मेरी निगाह में जिंदगी के दूसरे हिस्सों- विज्ञान, दर्शन (धर्म से इतर) जैसी बहुत सी चींजें अखबारों से गायब है, ले दे के जाने माने लोगों की दिनचर्या और राजनीतिक उठापटक, कुछ खेल कुलमिलाकर यही तो अखबार है इनदिनों ..बदलते समय में, मुझे हैरानी है कि हिंदी के साहित्यकारों को यह नहीं दिखता कि केवल नई किताबों पर सूचनात्मक और कहीं कहीं समीक्षात्मक टिप्पणियों के अलावा अंग्रेजी मीडिया भी कहां साहित्य छापता है तो साहित्य का बचना और उसका भविष्य अखबार पर निर्भर करता है, ऐसी कोई गलतफहमी मुझे जरा भी नहीं है जिन्हे है, उनके लिए मेरी शुभकामनाएं ही हो सकती है, वे भी मददगार होगी, मुझे संदेह है.

और आखिर में बस इतना ही कि अदब को अखबार और व्यापार दोनों ही ना बनाया जाए, वहीं यह भी कि अखबार को अदब भी नहीं बनाया जाए, पर दोनों में दोस्ती रहे, आवाजाही बनी रहे ...और व्यापार भी चलता रहे.

Saturday, April 2, 2011

इतिहास की मौत के दिनों में





इस देश में अब इतिहास की जरूरत नहीं बची है, उसकी जगह प्रशस्तिमूलक जीवनियां और मिथकशास्त्र पढाए जाने चाहिए, और ऐतिहासिक शोध में लग रहे धन और उर्जा को नष्ट होने से बचाना चाहिए...



गांधी को लेकर फिर एक किताब और लेखक चर्चा में है। महान इनसान पर ऐसे लांछन शुक्र है कि अब भी लोगों को दुखी करते हैं, खासकर जब उन दुखी लोगों में ज्यादातर लोगों का प्राथमिक आदर्श सच नहीं है और बात ऐसे महान इनसान की हो रही है जो सच के पैरोकार के रूप में मशहूर रहा है, वैसे सच का आदर्श निरपेक्ष ही होना चाहिए या होता है, सापेक्ष नहीं। गांधी खुद भी अगर होते तो तो शायद शायद क्या कम से कम मुझे तो यकीन ही है कि वे ऐसा व्यवहार नहीं करते।

सवाल पुलित्जर से सम्मानित पत्रकार लेखक जोसेफ लेलीवेल्ड की किताब ''ग्रेट सोल - महात्मा गांधी एंड हिज स्टृगल विद इंडिया'' में उनकी समलैंगिता की ओर इशारे का है हालांकि लेखक ने एक बयान में इसका खंडन किया है कि मेरी किताब में उन्हें समलैंगिक बताया गया है..

यहां यह बताना जरूरी है कि गांधी जी के पोते गोपाल कृष्ण गांधी के एक ताजा लेख में ऐसी अंध भावुकता का ना होना बहुत सुखद है, क्या कीजिएगा अगर उन्हे गांधी जी पर ऐसे गैरभावुक लेख के लिए देश निकाला दे दिया जाए... ताजा खबर यह है कि इस किताब के बाद सरकार का रूख है कि कौमी प्रतीकों के साथ राष्ट्रपिता के अपमान पर भी सजा होगी(बजाय इसके कि इतिहासकारों का एक समूह उस किताब में प्रस्तुत तथ्यों की प्रामाणिकता और ऐतिहासिकता जांचता), तो ऐसे में मेरी बुनियादी स्थापना और निजी विचार है कि अब इतिहास को विषय और अनुशासन के तौर पर समाप्त कर देना चाहिए, क्योकि जब ऐतिहासिक सच की तलाश से बडा सवाल अपमान को रोकना हो जाएगा, वहां इतिहास के जिंदा बचने की संभावना क्षीणतम ही होगी।

याद कीजिए कुछ समय पहले एक ऐतिहासिक मसले पर न्यायालय का फैसला देश की आस्था के आधार पर आया था तो इतिहासकारों के बडे वर्ग ने इतिहास के साथ इस बलात्कार (यह शब्द मैं दे रहा हूं, क्षमा करें), पर सामूहिक चिंता जताई थी।

फर्ज कीजिए कि या मान ही लीजिए कि मेरे दादा अपने जीवन की अनगिन उपलब्धियों के साथ, एक दिन मुझे पता चले कि बलात्कारी भी थे, मेरी नजर में वे गिर जाएंगे और मुझे तुरंत लीपापोती करनी चाहिए और उन प्रमाणों को नष्ट करने में अपना सबकुछ दांव पर लगा देना चाहिए कि यह सच यह राज जाहिर ना हो और मेरी और प्रकारांतर से सब मुझे या मेरे दादा को जानने वालों की नजर में उनकी प्रतिष्ठा बची रहे, बहुत सभव है कि आप सहमत होगे कि मुझे ऐसा ही करना चाहिए और तमाम सबूतों को नष्ट करके मुझे मान लेना चाहिए कि दादाजी की छवि मैंने बचा ली है और वे महान बने रहेगे और कभी वैसा सबूत दुबारा नहीं मिलेगा जैसा मैंने नष्ट कर दिया है....पर मेरी राय है कि इतनी सहिष्णुता तो हम में अवश्य ही होनी चाहिए कि अपने पूर्वजों को इनसान मानकर उनकी मानवीय कमजोरियों और उससे जुडी बातों को हम उसी भाव से स्वीकार कर लें जिस भाव से उनपर गर्व करने वाली बातों को स्वीकार करते हैं, और इस स्वीकार के साथ उनका इनसान होना खारिज ना करें।

इतिहास के साथ जुडाव ने यह समझ बनाई है कि तथ्य मिलें और प्रमाण हों तो कुछ भी प्रिय अप्रिय स्वीकार करना ही चाहिए वहा भावुकता का सवाल नहीं है, पुनः कहना चाहिए कि इस किताब से उपजे विवाद के मददेनजर भी ऐतिहासिक नजरिए से तथ्यों कर परीक्षण सबसे पहली प्राथमिकता होनी चाहिए थी होनी ही चाहिए !

मेरी समझ में यह नहीं आता कि अब तक जो बाते जाहिर और सिद्ध हुई है जिनसे गांधी के व्यक्तिगत जीवन के बारे में वह पता चलता है जो उनकी देश के पिता के बतौर सम्मानीय होने में बाधक हो सकती थीं! क्या वाकई उनसे अंतर आया है या आना चाहिए? आजादी के आंदोलन की उनकी भूमिका एक नेता की भूमिका थी और व्यक्ति के तौर पर गांधी की भूमिका अलग मसअला नहीं है क्या? सुभाष, भगतसिंह, चौरी चौरा, पूना पैक्ट और भारत का विभाजन लगातार उनकी चर्चा और आलोचना के विषय रहे हैं, पर मेरा मानना है कि कोई भी मसअला, बहस, कुलमिलाकर देश की आजादी में उनके योगदान को कमतर नहीं कर सकते, ऐसा ही मेरा मानना उनके व्यक्तिगत जीवन को लेकर है !

बहरहाल ताजा बहस पर लौटते हैं, अगर यह विधेयक बन जाता है तो पारित होकर लागू हो जाता है तो, अब फिर वही सवाल खडा है कि क्या महान लोगों को क्रमश: देवता बनाकर आस्था का प्रश्न ही बनाता है, उन्हें हम ऐसे व्यक्ति हाड़ - मांस के इनसान के तौर पर देख और मान नहीं सकते जिन्होने मानव इतिहास में उपस्थित होकर अपनी मानवीय कमजोरियों के साथ महान काम किए...पर महान इनसान को सम्मान देते हुए उसे सामान्य व्यक्ति के रूप में खारिज करना क्यों जरूरी है, दूसरा अगर व्यक्ति के बतौर उसकी कुछ ऐसी छवियां प्रकट हो जाएं जो उसकी महान छवि में तनिक निषेध आरोपित करती हों और सप्रमाण हो तो क्या हमारी परंपरागत छवि की निरंतरता के लिए उन नए ऐतिहासिक तथ्यों को कूडेदान में डाल इेना चाहिए और उन खोजी व्यक्ति को जेल में! अगर ऐसा करना ही महान व्यक्तियों के प्रति हमारे सम्मान को निरंतरता दे सकता है तो मेरा बहुत विनम्र सा निवेदन है कि इस देश में अब इतिहास की जरूरत नहीं बची है, उसकी जगह प्रशस्तिमूलक जीवनियां और मिथकशास्त्र पढाए जाने चाहिए, और ऐतिहासिक शोध में लग रहे धन और उर्जा को नष्ट होने से बचाना चाहिए,. एक गलती देशद्रोही का खिताब दिलवा सकती है, उम्र भर की अकादमिक या वैचारिक दुनिया की प्रतिष्ठा को नेस्तनाबूत कर सकती है।

Sunday, March 20, 2011

दुनिया से लडे सबके लिए, पर काल से होड हार गए आलोक


मन बहुत, बेहद भारी है, लिखने का मानस ना भी हो तो लिख रहा हूं कि जिसने लिखना सिखाया, और उससे भी बढकर लिखने का हौसला दिया, उस पर लिखना जरूरी है....




'बको, संपादक बको' ये शब्द अब मेरे लिए कभी नहीं होगे. मुख्यधारा की पत्रकारिता में मेरे पहले संपादक जिसने क्या कुछ नहीं सिखाया, आज ये सोचता हूं तो लगता है पत्रकारिता में जो जानता हूं, लिखना सीखा है अगर उसमें से आलोक जी की पाठशाला के पाठ निकाल दूं तो कुछ बचेगा क्या? क्या कहूं उनके लिए ज्यादातर मेरा अपना है, वज्ह ये कि एक दशक से ज्यादा बडे भाई का सा हाथ सिर पे रहा ..एक बार बोले-'' उदास क्यों हो, ब्रेक अप हो गया!'' मैं ने कहा -''हां'' तो जो कहा आज भी याद है - ''और प्यार कर ले, सुप्रिया से पहले दो बार प्यार में हारा था, आज ही पहली प्रेमिका का तबादला करवाया है, परेशान थी.. सो चीअर अप! चल, बियर पीएगा ''.. सीनियर इंडिया के लिए काम करते लिखते वक्त एक बार उन्हें फोन किया (ऐसे ही पूछता था हमेशा उनसे - क्या लिखूं हालात यह है) तो बोले - ''जाफना हूं, किसी ने वादा किया है कि प्रभाकरण से मिलवा देगा'' तो मैंने कहा- ''मुझे ही साथ ले लेते'' तो बोले -''कलेजा है इतना अरे पागल! चलो अगली बार आजमाउंगा '' उनसे जुडे अनंत किस्से हैं, उनके मिजाज का दूसरा पत्रकार होना दुर्लभ है, उनकी इस उर्जा और हौसले का स्रोत ईश्वर ही जानता है .



सोचता हूं किस रूप में याद करूं, जो एक कवि था, अपने मूल में, समय के साथ पत्रकार हो गया जिसने हमेशा सरोकार की पत्रकारिता की जिसका शब्द शब्द जनता की पक्षधारिता का है, टीवी सीरियल लिखे तो मनोरंजन के नए प्रतिमान दिए ..'एक हरा भरा अकाल' और 'पाप के दस्तावेज' जैसी किताबें लिखी, कई अधूरी फिल्मों की पूरी पटकथाएं, रोजाना असंभव लेकिन संभव किस्म का लेखन- गुणवत्ता और मात्रा दोनों में अपनी बेहद खास शैली में लिखने वाले आलोक मेरी नजर में अब भी हिंदी के अकेले वैश्विक पत्रकार हैं, वो प्रिंट का समय था भारत से दाउद का पहला मीडिया इंटरव्यू उन्होनें किया था उन के जैसी क्राइम रिपोर्टिंग आज भी मिसाल है ...डेटलाइन इंडिया में उनके सहयोगी मिलन के मुंह से अनेक बार सुना-' सर कितना पढते हैं, कितना लिखते हैं '..और दोनों की वास्तविक परख कोई भी उनका पाठक कर सकता है...



उनके गुरू प्रभाष जी ने उनके लिए कहा था- '' आलोक एक प्रतिभा का विस्फोट है और ऐसी प्रतिभाएं आत्मविस्फोट से ही कभी समाप्त हो जाती है'' वह आत्मविस्फोट ऐसे कैंसर के रूप में होते हैं, यह अंदाजा नहीं था...प्रभाष जी पर उनसे लिखवाने की गुजारिश का दिन याद है -

''मुझ पे लिखने का वक्त भी आ जाएगा, संपादक, जल्दी ही!''

''बकवास मत कीजिए, बताइए लिख पाएंगे?''

''लिख पाएंगे का क्या मतलब है लिखना है और जरूर लिखना है, मैं नहीं लिखूंगा तो कौन लिखेगा!''

आज उन पर लिखते हुए यही दोहरा रहा हूं- ''मैं नहीं लिखूंगा तो कौन लिखेगा!''

तिहाड मामले के दोरान प्रभाषजी ने जो कागद कोरे लिखा, वह मुझे कभी नहीं भूलता, इससे आलोक जी की भारतीय पत्रकारिता में अहमियत का अंदाजा होता है ..समय के साथ जाना कि पत्रकारिता के बदलते स्वरूप से आहत थे...पत्रकारिता के पतनशील समय में बदलाव के लिए योजना थी और सोच भी पर काल ने उन्हें मोहलत नहीं थी, सरोकार की पत्रकारिता के राडिया की पत्रकारिता होने से वे बहुत आहत थे पर निराश नहीं थे, उन्हें निराशा, टूटा हुआ कभी नहीं पाया, पैगंबर कार्टून मामले में तिहाड जाने पर भी नहीं, मालिकों के असहयोग पर भी नहीं जब मैंने सीनियर इंडिया में काम छोड दिया कि जब मालिक आपसे ऐसे व्यवहार कर सकते हैं तो मैं क्यो जारी रखूं, बहुत नाराज रहे -''जीयोगे कैसे! पागल हो!'' खैर.. वे टूटे नहीं, लडते रहे, तोडते रहे, लोगों को अपने शब्दों से जोडते रहे ,लोग मुग्ध रहे, उनके शब्दों पर और शब्दों पर यूं मोहित होना शायद ही किसी पत्रकार के लिए देखा हो मैंने ...



एक दिन बोले कि तुम मेरा लिखा पढते हो, मैंने कहा- 'आपको संदेह है', बोले-'नहीं,जानना चाहता हूं, क्यों पढते हो? मैंने कहा-'' मेरा स्वार्थ होता है, लिखना सीखता हूं आपका लिखा पढते हुए'' बोले -''बकवास मत करो '', वे दिल से नहीं चाहते थे कि मैं दिल्ली में आकर पत्रकारिता करूं, पिछले दिनों कहा-'' चाहता रहा हूं कि तुम लेखक के तौर पर ही पहचाने जाओ, मैं सलीम खान रहूं, तुम जावेद अख्तर हो जाओ..आखिर शाइर तो तुम ही हो ना..''



भाभी सुप्रिया और भतीजी मिष्टी के लिए यह वक्त कैसा होगा, इसका अंदाजा दुष्कर है, संकेत हो सकता है कि जब तिहाड जाना पडा था उन क्षणों का गवाह रहा हूं, आखिरकार वे मेरे शब्दों मे जिंदा रहेगे, मेरा शब्द-शब्द उनका है, महान लोग कम जीकर सदियों तक करोडों जिंदगियों को रौशन रखते हैं, उन्हें जिंदगी जीने का हौसला देते हैं.कह देना चाहता हूं कि मेरे लिए उनका जाना मेरे अंदर के साहस का चले जाना है, लिखने और जीने का साहस उन्होंने लगातार मुझमें भरा, ऐसा करने वाला मुझे अपने जीवन में कोई दूसरा मिलेगा क्या!



''कम्प्यूटरजी लॉक कर दिया जाए'' लिखने वाले की जिंदगी का यूं लॉक होना मेरे भीतर का कितना कुछ अनलॉक कर रहा है, मेरे शब्दो कुछ देर विराम ले लो, मेरे भाई जान सोने गए हैं, इससे ज्यादा विश्वास नहीं हो रहा है .. अभी मेरा मोबाइल उनके नंबर से कॉल डिसप्ले करेगा, आवाज आएगी - ''बको संपादक''

Tuesday, March 15, 2011

शोध में क्या रखा है !




खबर आई कि जर्मनी की सरकार में रक्षा मंत्री कार्ल थियोडोर त्सु गुटनबर्ग साहब को अपने पद से इस्तीफा देना पड़ा। उन पर आर्थिक भ्रष्टाचार या कि यौन दुराचार जैसा कोई आरोप नहीं था, उन पर आरोप यह था कि उन्होने पीएच डी के शोध प्रबंध में नकल की थी।


शोध नहीं बल्कि शोध से प्राप्त होने वाली उपाधि ही सर्वोपरि होती है, किसी को यह भय नहीं सताता कि कभी हमारी आत्मा सवाल करेगी कि क्या तुमने वाकई शोध किया था! कुछ ज्ञान की दुनिया में वाकई इजाफा किया है! या कि कोई हिस्सा अगर गुटनबर्ग साहब की तरह पकड़ा गया तो क्या होगा!


पहले मामले का परिचय दे दिया जाय, उन्होनें 2006 में संविधान और संवैधानिक संधि: अमेरिका और यूरोपीय संघ के देशों के संविधान का विकास विशय पर अपना शोध प्रबंध लिखा था, जिस पर उन्हें 2007 मेे डॉक्टरेट की उपाधि दे दी गई थी और यह पाया गया कि उन्होने कई शोध लेखों का हुबहू इस्तेमाल किया है, गत 21 पफरवरी को उन्होने घो ाणा कर दी थी कि वे अब उस अकादमिक उपाधि का इस्तेमाल नहीं करेगे, दो दिन बाद बायरूथ विवि ने उनकी उपाधि को खारिज कर दिया था। उन पर आरोप है कि उन्होने छ: ऐसे शोध लेखों का इस्तेमाल किया जिन पर कॉपीराइट था। मुछदा इतना उछला कि जर्मनी के 51 हजार डॉक्टरल शोधार्थियों ने इसको लेकर खुला पत्र लिखा था।

ये घटना हमें चौंकाती नहीं है क्योंकि भारत में शोध की स्थितियां और इज्जत बहुत उत्साहजनक नहीं है, शायद ही कोई महफि ल हो जहां पीएचडी की उपाधि को गुणवत्ता के लिहाज से संदेह से ना देखा जाता हो, ये हालात हमारे यहां हमारे ही लोगों की चाही अनचाही गतिविधियों का नतीजा है, क्या वजह है कि समाजविज्ञान और मानविकी के प्राय: शोध हिकारत भरी नजर से देखे जाते हैं, उनमें गुणवत्ता की बात करना ही अपने आप में शोधपरक होता है। कितने ही दोस्तों, सहपाठियों और समकालीनों तथा अगली एकाधिक पीढियों के शोध की प्रक्रिया, सोच और मंतव्यों का गवाह रहा हूं, दुख होता है शोध नहीं बल्कि शोध से प्राप्त होने वाली उपाधि ही सर्वोपरि होती है, किसी को यह भय नहीं सताता कि कभी हमारी आत्मा सवाल करेगी कि क्या तुमने वाकई शोध किया था! कुछ ज्ञान की दुनिया में वाकई इजाफा किया है! या कि कोई हिस्सा अगर गुटनबर्ग साहब की तरह पकड़ा गया तो क्या होगा!

मामला इतना इक तरफा नहीं है, यहां हमें यह भी देखना होगा कि शोध के लिए उत्साहजनक परिस्थितियां देने में क्या हमारे अकादमिक संस्थान नाकामयाब नहीं रहे हैं! हालांकि ऐसा नहीं है कि यह हालात अमेरिका या अन्य विकसित देशों में आदर्श स्तर पर हों, वहां के कई शोधार्थियों के साथ सलाहकारी भूमिका में काम करते हुए जाना कि शोध उपाधि के बाद बेरोजगारी की प्रबल संभावनाओं के बावजूद भी कम से कम शोध उपाधि के समय तो अकादमिक संस्थान शोध के लिए अनुकूल परिस्थितियां बना ही रहे हैं, यहां तर्क यह दिया जा सकता है कि भारत में भी फेलोशिप्स हैं, बहुुत से संस्थान है जो अच्छा काम कर रहे हैं, पर पहली दिक्कत उनके कम होने की है, दूसरे, व्यवहारिक दिक्कतें हैं जो भारतीय परिवेश की दिक्कतें हैं। यह मेरी व्यक्तिगत राय है कि प्राय: संस्थानों को धोखे में रखे जाने की संभावनाएं बहुत हैं।

हम वापिस बडे सवाल गुणवत्ता पर फिर आते हैं, उसके लिए हमें संस्कारित होने की जरूरत महसूस होती है, हम प्राय: ऐसे क्यों संस्कारित होते हैं कि बस डिग्री की अहमियत है, या कुछ भी लिख दिया जाए, थिसिस रिजेक्ट तो होती ही नहीं हैं, जमा करवाने के बाद कौन पूछता है कि आपने क्या लिखा था आदि आदि।

एक तो यह हुआ है कि समाज में वैसे ही प्रबंध और तकनीक की वाजिब बढती अहमियत ने शोध के प्रति उत्साह को कम किया है पर जो करें उनके लिए वाजिब माहौल, वाजिब संस्कार और वाजिब हालात देने का जिम्मा किसका है! महज उच्चशिक्षा को व्यवस्थागत कारणों से गाली देना इस कलमी कवायद का मकसद नहीं हैं, गुटनबर्ग साहब के बहाने से अपने गिरेबां में झााकने और कुछ बेहतर कल की उम्मीद में रास्ता ढूंढने के लिए लालटेन को रौशन करना है।

मुझे हैरानी होती है, हमारे प्रदेश में समाजविज्ञान के अधिकांश शोध प्रबंध प्रकाशन योग्य नहीं होते, हालांकि परीक्षक महावरे के रूप में प्रकाशन की संस्तुति करते हैं, फिर क्या वजह है कि वे ज्ञान की दुनिया की जरूरत नहीं बनती, इसीलिए कोई प्रकाशक उन्हें प्रकाशित करेन का हौसला नहीं दिखाता! और मार्के की बात यह भी कि कोई डॉक्टरेट होल्डर इसलिए प्रकाशित नहीं करवाना चाहता कि इससे ज्ञान की दुनिया का भला होगा इजाफा होगा, बल्कि महज इसलिए कि प्रकाशित शोधप्रबंध किसी विवि में प्रध्यापक की नौकरी में मदद करेगा। हालाकि मुझे यह भी लगता है कि अच्छे प्रकाशक या किसी भी प्रकाशक से उसे छपवाने की कोशिश इसलिए भी शायद ना होती हो कि गुटनबर्ग साहब की तरह कुछ गड़बड़ भी हो सकती है।

अपने कई प्राध्यापक साथियों को मैं बुरा लगता हूं जब उन्हें कहता हूं कि इस पर शोध पत्र केवल इसलिए मत लिखिए कि इस विषय को तो हम जानते ही हैं और सेमिनार में पर्चा पढने का एक और सर्टिफिकेट मिल जाएगा, जब तक कि आपके शोध का विषय नहीं है और उसमे भी कुछ नया विचार या तथ्य हम नहीं दे पा रहे हैं तो। अकसर डांट और फटकार साथ में मिलती है मुझे, अपना काम करो, ज्ञान मत दो भाई।

इंशाल्लाह मेरा यह भ्रम कायम रहे कि अब भी कुछ शोध निर्देशक हैं जो उपाधि के दौरान शोधार्थी से कोई तोहफा नहीं लेते, अब भी कुछ शोध प्रबंध परीक्षक हैं जो वायवा के लिए आते हुए तोहफे के अलावा आने जाने का व्यय विवि और शोधार्थी दोनों से नहीं वसूलते।

एक तरफ तमाम उपाधियां मूल्यहीन हो रही हैं, अगर वे धनोपार्जन में सहयोगी नहीं है तो बेकार है, सोच को सुलझााने और बेहतर बनाने वाली किसी उपाधि को अनपाने की आज करिअर काउंसलर भूल के भी सलाह नहीं देता। मुझे खुशी है कि कुछ लोगों को वहम है कि नाम के आगे डॉक्टर लगाना गौरवपूर्ण है, अरे लोगो! मुझे चिकोटी काटो, यकीन नहीं हो रहा है, जबकि अंतत: विचार और ज्ञान की दुनिया में अहमियत उपाधि की नहीं नए विचार और ज्ञान के बेहतर इस्तेमाल की है। ऐसे वक्त ज्ञान का अर्थ धन कमाने की विधियां और कौशल ही रह गया हो और नए विचार का अर्थ धन कमाने के नए तरीकों से हो गया हो, नाम के आगे डॉक्टर लगाने की ऐसी मासूम शरारतें लोग क्यों करते हैं साहब! ये तो अंतत: यह जाहिर करेगी कि सबसे निठल्ला आदमी ही डॉक्टर होगा जिसे धन वैभव और सुख के साधनों से इतर केवल ज्ञान की बात और विचार सुख दे रहे हैं! संभव है शोध और उपाधियों का यह हाल पूरी दुनिया में ऐसा ही हो, खुदा ना करे कि ऐसा ही हो, ऐसा सुनने से पहले मेरे कान बहरे हो जाएं!

खैर, गुटनबर्ग साहब तो केवल एक नाम है, बेचारे नाहक बदनाम हुए हैं! ये तो शायद एक वैश्विक परंपरा का हिस्सा भर हैं, तो जश्न मनाएं कि शोध में नया शोध हो रहा है, शोध के नए आयाम सामने आ रहे हैं। वैसे शोध में क्या रखा है, कमाने के नए तरीके सोचिए, शोध तो फालतू लोगों का काम है। इसलिए मेरा अनुरोध है कि गुटनबर्ग साहब को माफ कर देना हमारा वैश्विक कर्तव्य है।

Wednesday, March 2, 2011

नाशुकरे की कुबूलियत



श्रीगंगानगर के मुशाइरे में पढी मेरी इस नज्म को बहुत प्यार मिला मुलाहिजा फरमाएं


मैं भी देखो किन अफवाहों में फंस गया हूं
गया जो एक रोज गांव अपने
दूर तक साथ कौन था कोई नहीं था
आधी रात कुंडा खडकाने वाला भी कोई नहीं था
कुछ सरकंडे थे,
कुछ तंगलियां थी
कुछ बियाबान खेत थे,
टूटी हुई कोठे की जंगलियां थी
सरहद के इस पार मगर साठ साल का इतिहास था
हरेक लम्हा पानी के लिए गोली खाके मरे किसानों की प्यास था
कुछ जिस्मों के कुप्पे थे जिनमें तूडी नहीं थी अबके सालों में
अब खेत में किसी मोगे पर बैठके बीडी और
गुवाड में मुडडे पर बैठकर होका पीने का सुकून नहीं था
कस्सी मांग कर खेत में पानी लगाने का भी मन नहीं था
कारीगरों के घर से बास्ते मांगकर चूल्हा जलाने का मन नहीं था
इन सालों में
गांव में सरदारों के अकेले घर के लोग छोड गए थे गांव
और चुनाव पंचायत के कई बार तोड गए थे गांव

पता नहीं
किस किस मामूली बात पर आपस में लड गया था गांव
कितनी ही बार बेमतलब अपने ही बुजुर्गो से अड गया था गांव
बरसों पहले ही मधानी में तरेड आ गई थी
खडवंजे लगे तो गांव कई मुल्कों में बंट गया
सरहदें बन गईं गलियां और चोबारों से मिसाइलें भी बेसाख्ता चलने लगीं
गांव की पाक मटटी कहीं गांव में खो गई, रूल गई

गली गुजरती औरत को बाई, बेबे, काकी और ताई कहने को तरस गया हूं मैं
फिर भी झूठ कह रहा हूं कि दूर शहर में बस गया हूं मैं।
किन अफवाहों में फंस गया हूं मैं
ये सारी सच्ची अफवाहें हैं
मैं एक झूठा नाशुकरा हूं
अभी अभी जयपुर की बस से उतरा हूं।

Thursday, January 20, 2011

सरहद पार सब ठीक नहीं है


पाकिस्तान में सलमान तासीर के कत्ल के बाद सेकुलरिज्म बहुत बड़े खतरे की स्थिति में पहुच गया है...


पाकिस्तानी पंजाब के गवर्नर सलतान तासीर दरअसल पूरे भारतीय उपमहाद्वीप का चेहरा था और उनका कत्ल इसीलिए मानीखेज है। वो इसीलिए भी मायने रखता है कि वह एक मुहीम के झंडाबरदार थे, वह मुहीम गैरइरादतन तरीके से सीधे सीधे इस्लाम के खिलाफ हो गई थी। थोड़ा खुलासा करके बताया जाए तो खेत में काम करने वाली एक गरीब अनपढ़ ईसाई महिला असिया बीबी द्वारा तथाकथित रूप से पैगंबर साहब के लिए कुछ कह दिया गया, जिया उल हक के जमाने में बने एक कानून के तहत उसे सजा-ए-मौत मिलनी थी कि तासीर ने उसका पक्ष ले लिया। फिर क्या था, जो होना था, हम आप उसकी कल्पना कर सकते हैं कि पाकिस्तान में क्या होना चाहिए यानी क्या हो सकता है?

जरा पीछे जाएं तो सलमान तासीर का परिचय यूं दे सकते हैं कि वे मशहूर शाइर फैज अहमद फैज की साली बिल्किस तासीर के बेटे हैं, उनके पिता एमडी तासीर विभाजन से पहले भारत के अमृतसर में एक कॉलेज के प्रिसिपल थे। उनकी गिनती उर्दू में प्रगतिशील आंदोलन यानी तरक्कीपसंद तहरीर के शुरूआती लोगों में सैय्यद सज्जाद जहीर साहब के साथ होती है। यही वजह रही कि सलमान तासीर की परवरिश ऐसे ही माहौल में हुई जहां उनमें कट्टरता के संस्कार तो हरगिज नहीं आ सकते थे।

उनके कत्ल के पीछे सिर्फ और सिर्फ यही वजह हो कि उन्होंने एक ईसाई औरत की तरफदारी की, ऐसा लगता नहीं हैं, इसके पीछे कहीं ना कहीं उनका भारतीय पत्रकार तवलीन सिंह से जुड़ाव, जिससे उनके एक बेटा आतिश तासीर पैदा हुआ जो आज अंग्रेजी का एक चर्चित युवा लेखक है, भी है, तो इस कत्ल के साथ चाहे अनचाहे भारत बहुत गहरे से जुड़ता है और इसे कतई नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। क्योंकि परंपरा और जड़ें साझी हैं, और इस लिहाज से वे हिंदुस्तान की साझी और सेकुलर परंपरा के प्रतीक ही तो थे। उन्हें मारनेवाले वाला मुमताज कादरी छब्बीस साल का युवा कट्टर मुस्लिम है, ऐसा ही होना चाहिए था ना हमारी कल्पना के मुताबिक। इत्तेफाक देखिए कि दोनों मुल्कों और कई तहजीबों को जोडऩे वाले लगभग इतनी ही उम्र आतिश तासीर की है। कुल मिलाकर वजह जो बनती है, वह सेकुलरिज्म ही बनती दीखती है।

खास बात यह भी है कि पाकिस्तानी मीडिया के ऑनलाइन संस्करणों पर जब मैंने नजर दौड़ाई तो पाया कि उर्दू के अखबार तासीर के पक्ष में खड़े होने से हिचकिचा रहे है और अंग्रेजी मीडिया उदारता से उदार तासीर पर लिख रहा है, कत्ल के खिलाफ उठती आवाजों की खबरें दे रहा है। इसके संकेत भी हमारे लिए साफ ही हैं। कुलमिलाकर यह कत्ल भी पाकिस्तान में सेकुलरिज्म के लिए काम करने वाले मुट्ठी भर लोगों के लिए भी संकेत के रूप में बहुत साफ है, बहुत महत्वपूर्ण बात यह भी कि बहस या चर्चा की भी कोई गुंजाइश नहीं है, और यह संकेत सबसे बुरा है। मुझे इतना सा कह लेने दीजिए कि जब किसी मुल्क में ईशनिंदा कानून में बिना किसी सुनवाई के सजाएमौत देने के खिलाफ भी सुनवाई या आवाज के लिए कत्ल की सजा अवाम तय करने लगे तो हुक्मरां और देश की तकदीर पर बहस कौन और कैसे करेगा?

प्रकारांतर से यह कत्ल बेनजीर भुट्टो वाली पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी के लिए भी मायने रखता है क्यांकि सलमान तासीर उसके सदस्य थे, और मुस्लिम जनभावनाओं और सेकुलरिज्म के बीच पार्टी फंस गई है, दोनों में से एक को चुनना जाहिर है कि पाकिस्तान जैसे मुल्क में बड़ा चुनौतीपूर्ण है, हालांकि बेनजीर के बेटे बिलावल ने सलमान के कत्ल के खिलाफ बयान दिया है, पर उनका स्वर जरा कमजोर सा है, शायद सियासत इसी का नाम है, चाहे यह सरहद के इस तरफ हो या उस तरफ। इस सियासती खेल में एक जरूरी सवाल यह भी उठ गया है कि क्या पाकिस्तान की राजनीति में अब किसी उदारवादी राजनेता की कोई गुंजाइश या जरूरत नहीं बची है?

बहरहाल, ईशनिंदा के खिलाफ बने इस कानून में सुधार का प्रस्ताव पाकिस्तानी संसद में लाया गया है, शेरी रहमान को इसका श्रेय जाता है, या कह लें कि वह अकेली मर्द सांसद साबित हुई हैं। पाकिस्तान में जगह जगह से इस सुधार प्रस्ताव के समर्थन में प्रदर्शन और सभाओं की खबरें आ रही हैं। पर यकीन मानिए, ऐसी उम्मीद बहुत कम है कि ऐसा कोई सुधार उस कानून में लागू हो जाएगा। इसी बीच पोप बेंडिक्ट सोलहवें के ईशनिंदा कानून के खिलाफ आए बयान से यह मसअला नया धार्मिक रंग ले रहा है जो सलमान तासीर की मंशा और नजरिये के भी खिलाफ जाता है। और, हम सरहद के इस तरफ जब प्याज, महंगाई, नेताओं के घोटालों और भगवा आतंकवाद को परिभाषित करने में उलझे हुए हैं, पड़ोस से उठती लपटों से बेखबर हैं जब कि ये भूल जाते हैं कि दिल्ली से जितनी दूरी मुम्बई, कोलकाता या चेन्नई क्रमश: १४०७, १४६१ और २०९५ किमी की है, उससे कहीं कम भौगोलिक दूरी दिल्ली से लाहौर, इस्लामाबाद या कराची की क्रमश: ४२७,६८२ और १०९५ किमी है, यानी दिल्ली से पाकिस्तानी शहर भारत के तीनों अन्य महानगरों की बजाय नजदीक हैं। इसके गहरे और दूरगामी अर्थ हम आप बखूबी निकाल सकते हैं।

सलमान तासीर के मौसे फैज साहब के ही एक शेर को याद करें- ''हर इक कदम अजल था, हर इक गाम जिंदगी, हम घूम फिर के कूचा-ए- कातिल से आए हैं।'' आज और अब जबकि दुनिया फैज की जन्म शताब्दी मना रही है, कितने मौजूं है ये दो मिसरे, यानी कि पाकिस्तान में लोकतंत्र का रास्ता कितनी मुश्किलों भरा है, इस कत्ल से साफ जाहिर है, और यह भी कहीं ना कहीं कि सेकुलरिज्म एक कितना बड़ा ख्वाब है एक दीवाने का? चाहे जिन्ना ने संविधान सभा में ११ अगस्त १९४७ को जिन भी शब्दों में अपनी तकरीर में सेकुलरिज्म की उम्मीद जाहिर की थी- आप आजाद है, पाकिस्तान में आप कहीं भी जाने के लिए, अपने मंदिरों में, मस्जिदों में या अपने किसी भी पूजा स्थल में। उनका बनाया वह मुल्क आज किस हाल और दौर में पहुच गया है, यह सोच कर उन्हें अल्लाह मियां के पास बैठकर भी तकलीफ हो रही होगी, बहुत संभव है वह इसमें जाने अनजाने हुआ अपना कोई गुनाह भी शामिल कर रहे हों।

सेन को फांसी दे दो




क्या हमें नहीं सोचना चाहिए कि लोकतंत्र में भ्रष्टाचार से निपटने से बड़ी चुनौती अब उसको औपनिवेशिक और साम्राज्यवादी होने से बचाने की है


२४ दिसबर की शाम जब सूरज ढ़ल रहा था, गीतकार नीलेश मिश्रा फेसबुक वॉल पर जो लिख रहे थे, वह उनका अगला गीत नहीं था, वह जो था , उसका कार्यकारी अनुवाद यह हो सकता है कि *''बिनायक सेन नक्सलियों को जानते हैं, जो दातेवाड़ा में काम करने के लिए उन्हें जरूरी था, क्या उन्होंने उनके आंदोलन को भड़काया? मुझे नहीं पता पर अगर नहीं तो नक्सली लोगों को जानना और उनसे संपर्क होना आतंकवादी और देशद्रोही नहीं बना सकता। क्या इंटेलीजेंस एजेंसी के लोगों को जानने भर से कोई जासूस करार दिया जा सकता है? *''

मैं २४ दिसबर की शाम से आज तक भी नीलेश मिश्रा से असहमत होने का तर्क नहीं खड़ा कर पाया हूं। दरअसल मुझे तो लगता है कि बहुत जरूरी हो गया था बिनायक सेन को अंदर करना। कलमाडियों, राडियाओं, वीर सांघवियों और बरखा दत्तों के देश में बिनायक सेन को कैसे खुला घूमने दिया जा सकता है?

आजाद भारत का सबसे बड़ा इतिहासकार बिनायक सेन के लिए लिख रहा है ! क्यों आंद्रे बेते और हर्ष मंदर जैसे राष्ट्रीय सलाहकार परिषद के लोग उसके पक्ष में बोल रहे है? मेरी समझ में नहीं आ रहा है? क्यों एमनेस्टी वाले इस नॉनसेंस सेन के लिए चिल्ला रहे हैं? उनके पास और कोई काम नहीं है क्या?

मेरी पहली अनौपचारिक मुलाकात बिनायक सेन से कोई दस बरस पहले शायद जेएनयू के ब्रह्मपुत्रा छात्रावास में हुई थी, यह एक सार्वजनिक मुलाकात थी, जब वे मैस में बुलाए गए थे, जब मैं करोलबाग के एक सस्ते से होटल में अपने एक ब्रिटिश रिसर्च स्कॉलर दोस्त के साथ रुका था और राष्ट्रीय अभिलेखागार की अपनी तय दिनचर्या को तोड़कर दिल्ली की सर्दी में दो बसें बदलकर उन्हें सुनने पहंचा था, हालांकि ठीक-ठाक सी व्यक्तिगत मुलाकात पिछले दिनों जयपुर में पीयूसीएल के एक आयोजन में हुई। तब तक पिछली मुलाकात धुंधली हो गई थी, देखना भर जेहन में अटका हो तो बहुत, पर अब जो चेहरा सामने था, वक्त के निशान उस चेहरे पर कुछ इस तरह से थे कि शक्ल के नक्श बदल गए थे, कि चेहरा नया सा था। मेरा बहुत मन था कि उनके नक्सली संपर्को पर उनसे तीखे सवाल करूं कि क्यों वे मासूम मनुष्यों को मारने वाले लोगों के साथ खड़े नजर आते हैं? पर मैं स्वीकार करता हूं कि उनकी मासूमियत और सहज मानवीयता ने मुझे वे क्रूर सवाल करने से रोक दिया। हालांकि बहुत से मित्र लोग सेन की इस मासूमियत के दूसरे अर्थ निकाल सकते हैं, निकालेंगे ही, और निकालना उनका लोकतांत्रिक अधिकार भी है। पर क्या यही अधिकार सेन को दिया जा सकता है, क्या दिया जाना चाहिए, शायद नहीं, यकीनन नहीं! उनसे मैंने पूछा-'' क्या योजना है? कल को किस उम्मीद से देखते है?'' तो उनका जवाब था- ''जी पाना और
बेहतर दुनिया के लिए खड़े लोगों का साथ देने की कोशिश करना।'' ये बिनायक सेन कितना वाहियात आदमी है, कितना अजीब सोचता है, भारतीय लोकतंत्र में सब खुशी से जी ही रहे हैं, तरक्की कर रहे हैं? उसको हम सबकी इन तरक्कियों से जलन हो रही है, शायद, नहीं उनके ये शब्द प्रमाण हैं, भारतीय परंपरा में प्रमाण की बड़ी महिमा है, इसलिए उसको फांसी नितांत वाजिब है।

सेन का नॉनसेंस व्यवहार उन्हें इक्कीसवीं सदी का सुकरात बना सकता है, हम क्या इजाजत दे सकते हैं? कतई नहीं दे सकते? यह ईसा से पांच सौ साल पहले का यूनान नहीं है, यह दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है, कोई मजाक थोड़े ही है साहेब।
मेरी पुरजोर मांग है कि सेन को फांसी बहुत जरूरी है, देशहित मानवहित से बड़ा है, देश यानी सत्ता भारत के चुने हुए नेताओं की सत्ता। घोटालों से बचकर जीवन जीना और चुनाव लड़कर फिर फिर घोटलों के लिए जनता का लाइसेंस हासिल कर देना यथेष्ट देशहित है। इससे लोकतांत्रिक अधिकार से किसी ने बिनायक सेन को वंचित किया क्या? कोई प्रमाण नहीं है, तो दोष सरकार का नहीं है, और लोकतंत्र का तो बिल्कुल भी नहीं है। उसे खाने और कमाने से किसी ने रोका था क्या? बदनाम करते हैं ऐसे टुच्चे लोग, देश को, देश की गरीबी को, यह राष्ट्रद्रोह हुआ ना? फांसी के लायक भी हो गया ना? तो दे दीजिए ना रोज-रोज का टंटा खत्म कीजिए, नहीं तो कहीं पुलिस मुठभेड़ में ही मार देना चाहिए।

देश विकास के पथ पर है, इसमें गरीब और गरीबी, आदिवासी और जंगल की बात सिर्फ मानव संसाधन के लिहाज से होनी चाहिए, गरीबों को रोका ही नहीं है कि वे विकास कार्यो में मजदूरी करें, ऐसे मानव संसाधनों को जो देश के विकास की नींव हो सकते हैं, के किसी इतर स्वाभिमान की बात करना उन्हें देश के विकास के अलावा अपने विकास और भूख के नारे लगाने के लिए भड़काने का काम सेन प्रत्यक्ष परोक्षत: करते रहे हैं। यह राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा है। उन्हें तुरंत फांसी देनी चाहिए।

मेरी समझ में नहीं आता कि ऐसे सेन-नॉनसेंस जन्म ही कैसे ले लेते हैं? क्या ऐसे गुणसूत्रों को बैंक में रखकर किसी भी नवगर्भस्थ के गुणसूत्रों के मिलान और मिलान पर गर्भपात की राष्ट्रीय हित में मुकम्मल व्यवस्था करवाने का समय आ गया है। देश आजाद हो चुका है ऐसे नॉनसेंस को यह समझ क्यों नहीं आता? अब भगतसिंह की जरूरत नहीं है जिनकी जरूरत है वे सब हैं हमारे पास। ऐसे भगतसिंह को फांसी देनी ही चाहिए, २३ मार्च अभी दूर है, पहले ही दे दो। आखिर में १९९६ के नोबेल साहित्य की विजेता शिंबोर्स्का की एक पंक्ति- ''सबसे बड़ा व्यभिचार है सोचना''। इसलिए मेरे महान राष्ट्र भारत के वीरो, सोचिए मत, सेन बाबू को तुरंत फांसी देना सबसे बड़ा राष्ट्रहित है।

Friday, December 17, 2010

हमने अपनाया दर्द जमानेवाला




निजता वहां समाप्त हो जाती है जहां उसके दायरे में आपके निजी संदर्भ समाप्त होना शुरू होते हैं।


व्यवहार का बुनियादी सिद्धांत है कि मेरी आजादी का दायरा आपकी आजादी तक है और व्यक्तिगत आजादी का दायरा लिहाजा मौहल्ले, गांव, शहर प्रदेश और देश की आजादी से तय होना ही चाहिए। मैं अगर आपका दोस्त हूं और आपके परिवार और प्रियजनों के बारे में पूछता हूं और ठीक वैसा ही आप भी करते हैं तो यह निजता के दायरे में आता है, पर अगर हम आपस में देश समाज का कोई मुद्दा ले आते हैं और तय करते हैं, अगर वैध अवैध रूप से तय करने की स्थिति में हैं तो, तो यकीनन यह निजी बात नहीं है। राडिया मोहतरमा रतन टाटा साहेब से क्या गुफ्तगू करती हैं, कितनी अंतरंगता से करती हैं यह किसी गॉसिप का विषय हो सकता है पर गंभीर चर्चा का नहीं, वह अंतरंगता अगर किसी स्तर पर देश के फैसलों पर असर डालती है तो सेवा में सविनय निवेदन यह है कि यह आपकी निजता का उल्लंघन नहीं है, कतई नहीं है।

यह ऐसे वक्त का मसअला है जब विकीलिक्स के खुलासे कहर बरपा रहे हैं, इसके प्रमुख जूलियन असांजे को झूठे-सच्चे रेप के मुकदमे में फंसाया गया है और यह पंक्तियां लिखे जाने तक उन्हें लंदन हाईकोर्ट ने सशर्त जमानत दे दी है। वहां यही सवाल सरकारें भी उठा रही हैं, कि यह हमारी निजता और गोपनीयता का हनन है। मानना पड़ेगा कि वहां तो देशों के परस्पर संबध और कूटनीतिक सवाल तथा चुनौतियां महत्वपूर्ण हैं, दूसरे शब्दों में कहें तो निजता वहां समाप्त हो जाती है जहां उसके दायरे में आपके निजी संदर्भ समाप्त होना शुरू होते हैं। सिमटे तो बूंद और फैले तो समंदर, माफ कीजिए साहिब, ये तो मुमकिन नहीं है।

साहित्य और कलाओं में कहते हैं कि आपका लेखन और सृजन बडा होता है जब आपका दर्द और अनुभूतियां पूरे जहान का दर्द हो जाए, राडिया और रतन टाटा जैसे दीवानों की दीवानगी देखिए, देश के तथाकथित दर्द का अपना दर्द कहकर अपना बचाव करने की बेहद मासूम सी फिराक में हैं। इस मासूमियत पे कौन ना मर जाए ए खुदा? हां यह जरूर संभव है कि जहां से राष्टृ गौरव राडिया जी और रतन जी की अंतरंग बातें प्रारंभ होती हों उन्हें सार्वजनिक ना किया जाए। पर सब कुछ वैसा कब होता है जैसा होना चाहिए या जैसा हम चाहते हैं। राडिया रतन जो चाहते थे बहुत कुछ हुआ अब यह भी हो जाता कि सारा प्रसंग-प्र्रपंच जाहिर ना होता तो शाइर निदा फाजली की बात तो झूठ हो जाती और उन्हें जमी भी मिल जाती, आसमां भी मिल जाता और मुकम्मल जहां भी मिल जाता।

लगभग अप्रासगिक से कर दिए गए या हो गए नेता चौधरी देवीलाल का एक कथन हरियाणा के हर विधान सभा चुनाव में दीवारों पर पुतवाया जाता है कि लोकराज लोकलाज से चलता है, मुझे बेतरह इस प्रसंग में भी याद आ रहा है, दरअसल यह लडा़ई निजता की नहीं है लोकलाज की है, जिसे सत्ता और धन के मद में भुला दिया जाता है पर जब वे कर्म सामने आते है तो हमारी छवि को छिन्न-भिन्न होते हुए देखना हमारे लिए असह्य हो जाता है तो हमें निजता का आवरण याद आता है। मेरा बहुत विनम्र सा खयाल है कि हैकिंग, टैपिंग और सूचना का अधिकार कहीं करीब करीब ही हैं। संभव है ये सब मिलकर कुछ अच्छा करेगे। मंतव्य और परिणामों को साथ रखकर हर बात का मतलब निकालने की फुरसत किसके पास है साहेब। खुशवंत सिंह, अरिंदम चौधरी और कई स्तंभकार खुलकर पत्रकारों की कार्यशैली की आड़ में बरखा दत्त-वीर संाघवी को बचाने का प्रयास कर चुके हैं, पर मेरे जैसे कितनों के ही मन में उनकी नायकीय छवि कर जो हश्र हुआ है, वह नाकाबिलेभरपाई है। राडिया-रतन अपनी निजता और बरखा- वीर सांघवी अपनी पत्रकारीय शैली की दुहाई देकर क्या सब कुछ को झुठला सकते हैं? विज्ञान के ऊर्जा सरंक्षण के नियम को भी याद कर लूं कि ऊर्जा ना नष्ट होती है ना उसका जन्म होता है केवल रूप बदलता है। राडियाओं, रतनों, बरखाओं और वीरों के फैसले, उनके पाप-पुण्य,अंतरंगताएं और अतुलनीय राष्ट्रप्रेम हमारी फिजाओं में रहेगा। क्यांकि अब यह इतिहास है और इतिहास पीढियां भुगतती हैं, लम्हों की खता सदियां झेलती हैं।

Saturday, November 20, 2010

शाही शादी में अब्दुल्ला और दीवाने कितने?


एक सरकार आई थी जिसके लिए परंपरा और हैरिटेज का अर्थ केवल पर्यटन का बाजार था और अब अनेक बुद्धिजीवियों और मीडिया के दोस्तों के लिए हैरिटेज और राजस्थानी संस्कृति का अर्थ केवल सामंती परपराओं और प्रतीकों की निरंतरता है...
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शादी की तैयारियां जोरों पर थी, और पर्यटन व्यवसाय से वाबस्ता एक दोस्त चैट पर मुखातिब थे, उन्होंने पूछा कि क्या मैं उसमें शामिल हो रहा हूं, तो मैं ने कहा कि मन नहीं है और मन होता भी तो न्यौता नहीं हैं। मैंने प्रतिप्रश्र कर दिया आप तो जा ही रहे होगे पेशेवर कारणों से? तो उन्होंने कहा कि कहां राजाओं के घर मैं सुदामा? मेरा जवाब अनायास था बंधु, माफ कीजिए, ना तो वो राजा हैं और ना आप सुदामा ही। तो मेरे दोस्त मेरी इस बात पर मुग्ध भाव से मुस्कुराए, जैसी भी मुस्कुराहट चैट बॉक्स में संभव थी। पर मेरी यह छोटी बात या छोटे मुह और छोटी बात कि वे अब राजा नहीं रहे, सबको पता है और नहीं भी, या बहुत से लोग पता होकर भी अनजान बने रहते हैं, संभव है इससे उनके कोई हित जुड़े हों, माफ कीजिए साहिब, अगर पत्रकार के लहजे में कुछ कह रहा हूं तो। पर देखिए ना, मीडिया का एक बड़ा तबका अब भी यह मान रहा है कि किसी राजकुमार की शादी है, कई राजे-राजकुमार शादी में शामिल हैं। संविधान में हम सब बराबर हैं, सारी शाही पदवियां समाप्त की जा चुकी हैं।

अब जब कि शादी हो गई है, मुहावरे में कहें तो सब कुछ राजी खुशी, सांई सेंती निपट गया है, मेरी यह अब्दुल्लानुमा दीवानगी ही मानिए कि अशुभ बातें कह रहा हूं, गौरवान्वित शहर का मजा किरकिरा कर रहा हूं, पर क्या किया जाए। एक सरकार आई थी जिसके लिए परंपरा और हैरिटेज का अर्थ केवल पर्यटन का बाजार था और अब अनेक बुद्धिजीवियों और मीडिया के दोस्तों के लिए हैरिटेज और राजस्थानी संस्कृति का अर्थ केवल सामंती परपराओं, प्रतीकों की निरंतरता है तो तकलीफ का ईमानदारी से बयान दीवानगी कहा जाए, वाजिब ही है। इस शहर में ऐसी दीवानगी वाले लोग कम नहीं होगे, यह भी मुझे यकीन है, अकेले होने का कोई मुगालता नहीं है मुझेे।

खैर, हम सब आजाद हैं, अपनी राय बनाने के लिए, अपनी जिंदगियां और उसे जीने के तौर तरीके चुनने के लिए, संविधान को भूलने के लिए भी। पर राजस्थानी की एक कहावत हमें अपने आसपास टांग या चस्सा करके रख लेनी चाहिए- आप कमाया कामड़ा कीनै दीजे दोस।

Saturday, October 2, 2010

मेरी जात क्या पूछते हैं साहिब ?



महानगरों में डेढ़ दशक की रहनवारी के बाद मैं नाउम्मीद सा हूं कि भारत में कभी ऐसा होगाकि जब लोग आपकी जातीय पहचान जानने को लालायित नहीं होंगे। मेरा जाती खयाल है कि यह लालायित तबका हमेशा ही बड़ा रहा है और रहेगा भी।


लेखक और जाने माने स्तंभकार डॉ. वेदप्रताप वैदिक पिछले दिनों मेरे लिए अतिरिक्त सम्माननीय इसलिए हो गए कि उन्होंने जनगणना में जातीय आधार और फिर जातिवाद के खिलाफ एक अभियान की जोरदार कोशिश की, मैं जाती तौर पर इस खयाल का रहा हूं, थोड़ा व्यक्तिगत बात कहने की छूट लेते हुए कहूं तो इसीलिए अपने नाम को किसी जातिमूलक प्रत्यय से बचा के रखता हूं। मेरा मानना है कि अगर मैं अपने काम में बुरा हूं तो गाली देने के लिए और अच्छा हूं तो भी श्रेय के लिए किसी जातिसूचक शब्द तक जाने की जरूरत क्या है। वैसे यह भी पूरी तरह जाती मामला है कि आप अपनी पहचान किस रूप में मानते हैं और किस रूप में लोगों के सामने पेश होना चाहते हैं, यकीन मानिए मुझे जरा भी अफसोस नहीं है कि इस घोर गैरजातिवादी सोच के कारण जिंदगी में कितने दोस्त खोए हैं जिनके लिए किसी की पहचान उसकी जात से शुरू होती है। इतिहास के थोड़े बहुत जानकार तो कम से कम मेरे साथ खड़े ही होंगे कि इनसान तो दुनिया में तब भी था जब किसी काल विशेष में जातियों का विभाजन नहीं हुआ था, और तार्किक रूप से जब कर्म के आधार पर, अगर केवल भारतीय संदर्भों की बात करें तो, पहले वर्ण बनें और तदंतर वे जाति के रूप में प्रतिस्थापित, प्रचलित और मान्य हो गए, सेवा में, सविनय निवेदन है कि, तो फिर क्या इस मूलत: कर्म आधारित व्यवस्था को पूरे जीवन का आधार बनाना वाजिब है?
मुझे अपने विद्यार्थी जीवन का एक किस्सा याद आता है, मुझसे एक बहुत मेधावी लड़की, जो एक दर्जा आगे थी पर उम्र में मुझसे छोटी थी, तथाकथित रेगिंग के दौरान, उसने मेरे नाम को अधूरा पाकर पूछा- आगे? तो इस अप्रत्याशित सवाल पर मेरा जवाब भी अनायास था कि अगर मैं जिस जाति से हूं जिससे आप, तो क्या आप मुझसे शादी कर लेंगी और नहीं तो क्या मुझे गोली मार देंगी? मेरे जवाब में तल्खी थी और अब उसके पास कोई जवाब नहीं था, जाहिरन उसका मूड खराब हुआ और मेरा भी। और फिर जब तक हम उस संस्थान में रहे, हमारा छत्तीस का आंकड़ा रहा। इससे इतर भी जिंदगी में जाति ना जाहिर करने की वजह से बहुत अजीबोगरीब वाकए मेरे साथ हुए हैं, कई बार लोग यह मानते हैं कि दलित होकर किसी हीनताबोध में जाति छुपाता हूं, या कई बार तथाकथित वर्णसंकर होने के किस्से अपने बारे में सुनने को मिलते हैं, जो मानना चाहें लोग मान सकते हैं। काबिले गौर है कि ऐसे वाकए तथाकथित सभ्य-पढ़े लिखे तबकों की ओर से होते हैं, महानगरों में डेढ़ दशक की रहनवारी के बाद मैं नाउम्मीद सा हूं कि भारत में कभी ऐसा होगाकि जब लोग आपकी जातीय पहचान जानने को लालायित नहीं होंगे। मेरा जाती खयाल है कि यह लालायित तबका हमेशा ही बड़ा रहा है और रहेगा भी।
अपने निजी उदाहरण से ही एक बात और कहूं तो अपनी नौकरियों के दौरान भी एचआर विभागों के लोगों से हर जगह मेरी झड़प हुई है, वे कोई तर्क आसानी से नहीं मानते कि मैं क्यों अपनी पहचान में जाति इस्तेमाल नहीं करता, और वे मेरे पिता के नाम से उठा के जातिवाचक शब्द मेरे नाम से जोड़ देते हैं, और मैं अकसर उग्र हो जाता हूं, पर फिर मुझे उन पर रहम आता है, और फिर खुद पर भी। दुआ ही कर सकते हैं कि जातियां हमारी बुनियादी पहचान ना बनें, और जातियों के आधार पर हम दोस्तियां या रिश्ते या दुश्मनियां ना बनाएं। ऐसे जातिनिरपेक्ष लोग अभी तो बहुत कम हैं, वैसे भी हमें जातियों में बांटकर अपनी जीत को पक्का करना सियासत की मजबूरी और बेशर्मी हो सकती है, पर हमारी क्यों हो?

Monday, June 21, 2010

लेखक भी तो बाजार का हिस्सा हैं




क्या आप यकीन कर सकते हैं कि आजादी के बाद के साठ सालों के बारे में कोई इतिहास निर्विवादित रूप से लिखा जा सकता है जिस पर कोई ना कोई ‘आहत’ ना हो।


कोई लेखक क्यों लिखता है, सवाल बहुत बड़ा है और इसके जवाब कई हो सकते हैं। इस एक सवाल पर सैंकड़ों शोध हो सकते हैं, हुए भी होंगे, कई किताबें लिखी जा सकती हैं, लिखी भी गई होंगी। इस विषय पर लिखने के बारे में सोचने से पहले लेखक रसेल बेकर का एक कथन कहीं से मेरे सामने आया और जेहन पर तारी रहा है। वह कथन यह है- ‘मैं केवल लेखक होने के लिए ही उपयुक्त था, मुझे संदेह था कि क्या मैं वास्तव में कोई भी कर सकता हूं, लेखन के लिए किसी काम को करने की जरूरत ही कहां होती है।’ आंशिक रूप से सहमत होते हुए भी मैं रसेल के इस कथन से पूरी तरह सहमत तो नहीं हो सकता।

इतिहास का विद्यार्थी हूं और हाल के कुछ सालों में इत्तेफाकन इतिहास पर लिखी किताबों ने ही ज्यादा कहर बरपाया है, कई चूलें हिलाई हैं, सत्ताएं उखड़ती-उखड़ती बची हैं। कभी नेहरू को लेकर, कभी गांधी को लेकर, कभी जिन्ना को लेकर कभी इंदिरा को लेकर। मैं अक्सर ये सोचता हूं कि आजादी के बाद के भारत को लेकर सबसे महत्वपूर्ण किताब रामचंद्र गुहा ने लिखी- इंडिया आफ्टर गांधी। शुक्र है कि उस पर कोई विवाद नहीं हुआ, मुझे यकीन है कि विवाद पैदा करने वाले इसका वृहदाकार देखकर खोलने की हिम्मत नहीं करते होंगे, खोजकर विवादास्पद पंक्ति या विचार खोजना तो बाद की बात है। क्या आप यकीन कर सकते हैं कि आजादी के बाद के साठ सालों के बारे में कोई इतिहास निर्विवादित रूप से लिखा जा सकता है जिस पर कोई ना कोई ‘आहत’ ना हो। इसलिए मेरे प्रिय इतिहासकार गुहा पर निस्संदेह ईश्वर मेहरबान है, शुक्र है।

जिन्ना पर जसवंत सिंह ने लिखा, बवाल मचा, गांधी पर जेड एडम्स की किताब आई -नेक्ड एम्बिशन, बवाल ना हो, ऐसा हो नहीं सकता था, तो हुआ। अब तो कई बार यह भी लगता है कि इन ऐतिहासिक पात्रों पर कुछ भी लिख दीजिए, चर्चा और विवाद तय है। और यही बात इस बहस की मूल बात है जिसे दूसरे तरीके से कान पकडऩे के रूप में लेना चाहिए यानी लेखक विवादित होकर चर्चा मे आकर लिखता है या इन विषयों पर कुछ भी लिख दे तो चर्चा में आना, विवाद में आना लाजिम है। मेरी राय है कि नई किताब आए तो ज्यदा महत्वपूर्ण उसका तथ्यसम्मत होना है, संभव है लेखक ने अब तक अज्ञात या लगभग अज्ञात तथ्यों और स्रोतों को खेजा हो या पूर्व उपलब्ध तथ्यों और स्रोतों की पुनव्र्याख्या की हो। जेड एडम्स जो एक काबिल और समझदार इतिहासकार माने जाते रहे हैं, ने भी यही किया, विवाद होना लाजिम था क्योंकि इसमें एक महान इनसान की सहज मानवीय कमजोरियों की ओर इशारा था, यह कौन पूछे कि वो तथ्यसम्मत है या नहीं, हम उनके नाम पर राजनीति की रोटी सेंकते हैं, तो उनकी छवि को बेदाग रहना चाहिए तथ्य जाए भाड़ में, व्याख्या जाए जहन्नुम में। और यही बात बहुत संभव है कि जेवियर मोरो की लाल साड़ी को लेकर हो।

अब जरा इस बात पर आएं कि लेखक क्या ऐसे विषयों पर जानबूझ कर लिखता है, इस तरह से जानबूझकर लिखता है कि वह विवाद में आ जाए, पहली बात तो यह कि विवदित विषय पर लिखने में कोई बुराई नहीं है, पर शर्त इतनी सी है कि तथ्यों के साथ लिखा जाए। ओमपुरी की जीवनी लिखी नंदिता पुरी ने, जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल के दौरान एक डिनर पर वे साथ थीं तो पत्रकारीय मित्रता भाव से पूछ बैठा, उनका जवाब विश्वसनीय था, जिसे बाद में उन्होंने मंच से भी स्वीकारा कि उस किताब के विवादित अंश बिना उनकी जानकारी के संभवत: प्रकाशक ने जारी कर दिए। तो दूसरी बात यह कि मुझे यह लगता है कि विवाद और उसके बाद बेस्टसेलर होने के गणित में लेखक से ज्यादा भूमिका प्रकाशक की होती है, किताब लिखना और छपना दोनों अलग बाते हैं और छपकर बिकना इससे भी अलग और आगे की बात। लेखक चाहे- अनचाहे इस बाजार के गणित का हिस्सा ना हो, ऐसा दावे के साथ हम नहीं कह सकते, पर लेखक लिखता क्यों है और विवादित लेखन सायास करता है क्या? इस सवाल के लिए हमें यह और साफ तौर पर देखने की जरूरत है कि यश की इच्छा तो सृजन में छुपी होती ही है, और सृजन के पाठक या दर्शक या श्रोता की दरकार भी सहज है, इसके साथ अर्थ का जुडऩा भी स्वाभाविक है, अखबार तात्कालिक और विवादित विषयों को उठाते ही है, यह पठनीयता के लिहाज से किया जाता है, और यह पठनीयता बाजार से भी कई बार संचालित होती है, पर पुस्तक लेखन हो या अखबार, इसका विस्तार अतिरेक में किसी भी हद तक जाने का हो जाए, यह असंभव नहीं है तो सही तो इसे कोई शायद ही कहेगा, पर अंतत: अगर बाजार का दोष है तो गालियां सिर्फ लेखक को क्यों दी जाए? यानी उसे बेचारा मान कर उसी को बलि का बकरा मत बनाइए।

Saturday, May 1, 2010

समय जब लिखता है इतिहास



हाल ही एक किताब आई है- गांधी: नेक्ड एम्बिशन, जो ब्रिटिश लेखक जेड एडम्स ने लिखी है, इसमें गांधी के यौन व्यवहार पर खुलकर बात की गई है।


ऑस्टे्रलिया के गांधीवादी दोस्त अब्बास रजा अल्वी का ई-मेल आया, उनकी चिंता वाजिब है। दरअसल एक किताब आई है जो ब्रिटिश लेखक जेड एडम्स ने लिखी है- गांधी: नेक्ड एम्बिशन। जेड एडम्स फिलहाल लंदन विश्वविद्यालय के स्कूल ऑफ एडवांस स्टडी के अंग्रेजी अध्ययन विभाग में रिसर्च फेलो हैं, उन्हें हम द डायनेस्टी- गांधी नेहरू स्टोरी, टोनी बेन जैसी किताबों के लिए जानते हैं। कहा जा रहा है कि इस नई किताब में गांधी के यौन व्यवहार पर खुलकर बात की गई है, अल्वी को यह खबर वहां के एक अखबार में मिली, वे इसलिए भावुक हुए कि कुछ लेखक सस्ती लोकप्रियता के लिए गांधी पर कीचड़ उछाल रहे हैं। फिर तो कई ईमेल के जरिए यह लिंक देश भर से जाने अनजाने लोगों से बार-बार आया, सभी राष्ट्रपिता की छवि को लेकर बहुत चिंतित प्रतीत हुए। दरअसल, गांधी पर इस तरह की यह पहली किताब नहीं है, जैसे हंसराज रहबर ने भी कभी गांधी बेनकाब लिखी थी। इतिहास के विद्यार्थी के तौर पर मेरा मानना है कि भावुकता से ज्यादा महत्वपूर्ण तथ्य या वह स्रोत हैं जिन के आधार पर निष्कर्ष निकाले गए हंै। और व्यक्ति कोई भी हो, कोई भी ऐतिहासिक निर्णय तो आखिरकार व्यक्ति की बजाय तथ्य से तय होगा और ऐसा होना भी चाहिए। एक बात और मेरी समझ से बाहर है कि क्या महान लोगों को हमें सामान्य मानवीय कमजोरियों से ऊपर मान लेना चाहिए? क्या यह सच नहीं है कि स्थूल भावुकता हमें कहीं नहीं ले जाती, तर्क और तथ्यों के आलोक में निपजी भावुकता यकीनन स्थाई और सहज हो सकती है। मान लीजिए, अतीत में मेरे बुजर्गो ने कुछ मानवीय कमजोरियों के वशीभूत कुछ बुरा काम किया तो मुझे उसे उसी सहजता से क्यों नहीं स्वीकार करना चाहिए जितना अच्छे कामों को स्वीकारते हुए गौरवान्वित होता हूं। इसी तरह, गांधी मेरे प्रिय व्यक्तित्वों में से हैं और अगर कोई ऐतिहासिक तथ्य गांधी में कुछ मानवीय कमजोरियों को सिद्ध भी कर दें तो उनके पिछली सदी में हमारे सबसे महत्वपूर्ण और सर्वकालिक महान व्यक्ति होने का तथ्य और उनका महान काम कमतर तो नहीं हो जाएंगे?

Monday, April 26, 2010

ऑरकुट भर आकाश है, ट्विटर भर संसार




इस नई चौपाल ने नई बहस, नई आजादी, नई चुनौतियों को जन्म दिया है, कोई भी नया संचार माध्यम अच्छे के साथ बुरी संभावनाओं को भी अपने भीतर लिए हुए होता है, तो यह चौपाल भी इसका कतई अपवाद नहीं है और इसमें कुछ नया भी नहीं है। अब यह तो यकीनन इस्तेमाल करने वाले पर ही है कि वह किसी माध्यम को कैसे अपनाता है जैसे विषयांतर होने की आजादी लेते हुए कहूं तो, लगभग सवा सदी से गांव के अकेले मेरे ब्राह्मण परिवार और पढे लिखे भी यानी ज्ञानपिशाच परिवार ने धर्म का इस्तेमाल रचनात्मक कम और अपने स्वार्थवश ज्यादा किया तो इसमें धर्म का क्या दोष?


मार्च के आखिरी दिन की शाम ढल गई थी, मेरे विवाह की अफवाह से ऑरकुट, फेसबुक, ट्विटर और बज पर हंगामा था, थोड़ी सी देर के वक्फे में आश्चर्यजनक रूप से तकरीबन डेढ़ सौ लोगों तक अफवाह पहुंच गई और सुबह तक एसएमएस, फोन, ईमेल से और व्यक्तिश: शुभकामना, बधाई, आश्चर्य और तानों का मिश्रित सिलसिला रहा, मेरी हालत जिंदगी में कभी इतनी एम्बे्रसिंग नहीं हुई, ये दरअसल पहली अप्रेल की पूर्व संध्या पर एक मित्र का मजाक था पर इस प्रकरण से जाती तौर पर सोशल नेटवर्किंग की ताकत का एहसास मुझे गहरे तक हो गया। अब इसे जरा व्यापक स्तर पर देखने की कोशिश करें तो शशि थरूर और ललित मोदी की ट्विटरिंग से दुनिया में भूचाल अभी थमा नहीं है, थरूर की महिला मित्र सुनंदा पुष्कर के तथाकथित फेसबुक अकाउंट पर की गई टिप्पणियां भी चर्चा में रही हैं, कुलमिलाकर नतीजा यह है कि ऑरकुट, फेसबुक ट्विटर के नाम तद्भव रूप में गांव की चौपाल पर बैठे लोगों यानी सोशल नेटवर्किंग से लगभग नावाकिफ लोगों की जुबान पर आ गए हैं और गोया इस कदर कि पड़ौसी की बात हो रही हो। और कम्प्यूटर से जुड़ा शायद ही कोई शख्स होगा जो किसी ना किसी सोशल नेटवर्किंग पर ना होगा, मेरी जानकारी में तो नहीं ही है, आप भी याद करके देखिए क्या आपके परिचय में कोई ऐसा है।

सैद्धांतिकी की स्तर पर दो समाजशास्त्रीय शब्दों से मेरा नजदीक का संबंध रहा है, वे हैं- समाजीकरण और सामाजिक अंतर्कि्रया। आज इस वेबजालीय उठापटक की बात करते हुए इन दोनों शब्दों की अनुगूंज हमारे पास महसूस हो रही है। मूल वजह ये है कि किसी भी जीव का अपना समाज होता है और उसकी अपनी समाजीकरण की एक खास प्रक्रिया भी होती है, साथ ही पारस्परिक अंतर्कि्रया उसका बुनियादी स्वभाव होता है, हां ये जरूर है कि अंतक्र्रिया किस स्तर पर और किस जरिए से हो, प्राय: सामाजिक अंतक्र्रिया समान रुचि या किसी अन्य सामान्य आधार जैसे कि लिंग, पेशा, जाति, धर्म या क्षेत्रीय पहचान के इर्दगिर्द होती है, मुझे यह कह देना चाहिए कि सोशल नेटवर्किंग से ये तमाम दायरे छोटे या गौण हो गए हैं यानी क्या समाजविज्ञानियों के लिए यह चिंतनीय आहट नहीं है कि इससे सदियों पुराने समाजशास्त्रीय मिथक टूट रहे हैं या गड्डमड्ड हो रहे हैं। आप अपने या किसी दोस्त के सोशल नेटवर्किंग साइट के प्रोफाइल में फे्रंड्स नेटवर्क को खंगालिए, तो पता चलेगा कि सोशल नेटवर्किंग ने हमारी मित्रताओं या परिचय को विविधता का असीम विस्तार दिया है, यही कारण है कि मीडिया से जुड़े होने के कारण मैं सोशल नेटवर्किंग को पत्रकारों के लिए तो स्वर्ग ही मानता हूं, लिहाजा जनसंपर्क की अथाह संभावना और विविध जीवन स्थितियों तथा कार्यक्षेत्रों ने जो वर्चुअल अनुभव का संसार रचा है, उसे गूंगे का गुड़ ही कहना चाहिए। एकांत और अकेलेपन के संत्रास से गुजरती दुनिया को सोशल नेटवर्किंग ने जुडऩे का, खुद को जाहिर करने का जो व्यापक अवसर और विकल्प दिया है, उससे जाहिर होता है कि मनुष्य स्वभावत: जुडऩा चाहता है, पर उसके जुडऩे की सीमा और स्वरूप वह खुद तय करना चाहता है, और इसमें कोई बुराई भी नहीं है। व्यक्तिश: या आवाज के जरिए मोबाइल की संचार क्रांति ने आजादी तो दी थी पर यह अतिवादी आजादी कि सीमा वह खुद तय करे, यह मुमकिन नहीं हो पाया था जो कि सोशल नेटवर्किंग ने संभव कर दिया। सोचकर देखिए कि ऑरकुट पर स्के्रप छोडऩे, फेसबुक की वॉल पर या बज पर कुछ विचार बांटने, ट्विटर पर 140 शब्द लिखने, या किसी भी सोशल नेटवर्किंग साइट पर फोटो शेयर करने के बाद किसी दोस्त की अच्छी या बुरी प्रतिक्रिया पर यह जरूरी नहीं कि आप जवाब दें और फिर यहां सब इतनी तेजी से भी घटता है कि ठहराव की कोई गुंजाइश नहीं होती।

बेशक, इस नई चौपाल ने नई बहस, नई आजादी, नई चुनौतियों को जन्म दिया है, कोई भी नया संचार माध्यम अच्छे के साथ बुरी संभावनाओं को भी अपने भीतर लिए हुए होता है, तो यह चौपाल भी इसका कतई अपवाद नहीं है और इसमें कुछ नया भी नहीं है। अब यह तो यकीनन इस्तेमाल करने वाले पर ही है कि वह किसी माध्यम को कैसे अपनाता है जैसे विषयांतर होने की आजादी लेते हुए कहूं तो, लगभग सवा सदी से गांव के अकेले मेरे ब्राह्मण परिवार और पढे लिखे भी यानी ज्ञानपिशाच परिवार ने धर्म का इस्तेमाल रचनात्मक कम और अपने स्वार्थवश ज्यादा किया तो इसमें धर्म का क्या दोष? और इसी तरह जैसे, मेरे कितने ही परिचित मुस्लिम परिवार दो वक्त की हक की रोटी और खौफेखुदा और नेकनीयत के साथ जिंदगी बसर कर रहे हैं तो उसी मजहब के कुछ सरफिरे लोग जेहाद का खूनी खेल खेलते हैं, तो यही बात सौ फीसदी सोशल नेटवर्किंग पर भी लागू होती है, यहां भी सरफिरे हैं, यहां भी स्वार्थी लोग हैं।

बहरहाल, हमारे समय का कमाल यह है कि दुनिया सिमट गई है, सिमटी भी इतनी कि खुद सिमटने की क्रिया भी शरमा जाए, निदा फाजली के दोहे को तोड़ मरोडऩे को दिल कर रहा है, निदा से माफी चाहता हूं- छोटा करके देखिए जीवन का विस्तार, ऑरकुट भर आकाश है, ट्विटर भर संसार। आप इससे असहत हो सकते हैं क्या? अगर ऐसा है तो जरा खोलकर बताने की इजाजत दीजिए, सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर जितना लोग खुद को, अपने विचार और इच्छाओं को बांट रहे है, उसे देखकर हैरानी होती है, इतना कुछ इस धरती के इनसानों के सीनों में घुट रहा था, जो जाहिर हो रहा है, गुस्सा, प्यार, नफरत, तारीफें, या अपनी पसंद के गाने वेबसाइट्स के लिंक्स, क्या- क्या कुछ नहीं है जो लोग बांट रहे हैं, बांटने की खुशी के समंदर ठाठें मार रहे हैं, नफरतें जाहिर हो रही है तो मन का गुबार निकल रहा है, यह दबा रहता तो कितनी आत्महत्याएं हो सकती थीं, तनाव और कुंठा के मारे लोग कितने और हो सकते थे? इतना ही नहीं, सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर चंद लफ्जों में लोगों का सेंस आफ ह्यूमर देखिए, जनाब हमें तो हैरानी होती है।

और एक बात देखने लायक है कि सोशल नेटवर्किंग साइट्स अब सिर्फ दोस्ती का जरिया नही हैं, केवल मन के गुबार निकालने का वाइज नहीं है, प्रमोशन का बड़ा जरिया भी है, हमारे फिल्मी दुनिया से जुड़े दोस्त फिल्म का ग्रुप बनाकर भावी फिल्म के लिए माहौल बना रहे हैं, लिटरेरी एजेंसी अपनी गतिविधियों की जानकारी दे रही है, एक गायक दोस्त प्रचार में लगा है, प्रकाशक अपनी किताबों का प्रचार कर रहे हैं, और मुझे कम से कम इन सब में कोई बुराई भी नजर नहीं आती है और इससे यह तो जाहिर है ही कि यह हम पर है, इसे किस तरह लेते हैं, किस तरह इसका इस्तेमाल करते हैं, हमारी सोच अगर सकारात्मक है तो हमें उसकी उड़ान के लिए यह अनंत आकाश देता ही है। जाहिर सी बात है कि यह खुला मंच है, सबके लिए है, और अपने स्वरूप में बेहद लोकतांत्रिक भी है। हर माध्यम की अपनी चुनौतियां होती है, इसकी चुनौतियों पर विजय पाने के तरीके और रास्ते खोज लें, अभीष्ट तो यही है, इसकी आलोचना से कुछ हासिल होना नहीं है और इससे वापसी का रास्ता तो अब बंद ही मानिए।

Wednesday, April 21, 2010

एक कविता सा कुछ



कविता लिखना इतना अनायास होता है कि खुद मैं बहुत बार हैरानी करता हूं और फिर यह यकीन भी पुख्ता हो जाता है कि कविता दरअसल इलहाम होती है ऐसी ही एक ताजा इलहामी कविता पेशे नजर है
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बुझे से दिन और उदास शामें
बिखरे सपने हैं
उजाड से आशियाने में
जैसे टूटी हांडी में दबा रखती थी कुछ बीज मेरी दादी
दस घडों वाले परिंडे के कोने में

मुझे सहानुभूति की जरूरत नहीं है
पर छुपाना भी तो नहीं आता है मुझे

सच कह रहा हूं
छुपाने की नाकामयाब कोशिशों में
बहुत खत्म हुआ हूं मैं, मेरे दोस्त

शाम ढल ही जाती है
सुबह हो ही जाती है
उम्र बीत ही जाती है

छूटे हुए रिश्ते और बिछडा हुआ प्रेम
तात्कालिक याद से हट जाते हैं कुछ वक्त बाद
जीना संभव बनाने के लिए
या
जीना संभव हो ही जाता है

हांडियां कई बंधी है
बीज जिनके बेकार हो गए हैं
दिन मेरे बुझ गए हैं
और शामें बेतरह उदास
क्या किसी हांडी में छुपाके मिटटी में दबा दिया गया है
उनका कुछ हिस्सा हमेशा के लिए।

Painting by Tim Parish

Tuesday, March 9, 2010

कच्ची रेखाएं और जाहिद अबरोल साहब की एक नज्म

अपने बनाए एक कच्चे से पर सच्चे से रेखाचित्र को बांट रहा हूं
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लगे हाथ, पंजाब के मशहूर शाइर जाहिद अबरोल साहब की नज्म भी मुलाहिजा फरमाइए जो अंबाला में रहने वाले मेरे दोस्त शिवनंदन बाली ने साढे तीन साल पहले, मेरे ब्रेक-अप के बाद सुनाई थी-


जब मैं नन्हा सा बच्चा था
मेरी मां ने इक दिन मुझसे
एक पहेली पूछी थी-

एक डाल पे पांच कबूतर
एक शिकारी ने गोली से
एक कबूतर मार गिराया
बोलो कितने बचे कबूतर!

मैंने नन्हीं सी उंगली पर
गिनकर चार कहा था लेकिन
मो ने मुझको समझाया था
एक कबूतर के मरने से
बाकी के सब भाग गए हैं

आज तुम जीवन के वीराने पथ पर
मुझे अकेला छोड चले हो,
एक खुशी दम तोड रही है
बाकी खुशियों का क्या होगा!
वही पहेली आज मैं तुमसे पूछ रहा हूं -
जो मेरी मां ने मुझसे पूछी थी,

एक डाल पे पांच कबूतर
एक शिकारी ने गोली से
एक कबूतर मार गिराया,
एक खुशी दम तोड रही है
बाकी खुशियों का क्या होगा!